विषय-सूची (Table of Contents)
- 1. परिचय: आपदा और एक गाँव की कहानी (Introduction: Disaster and a Village’s Story)
- 2. आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा: यह क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है? (Institutional Framework for Disaster Management: What is it and Why is it Important?)
- 3. भारत में आपदा प्रबंधन का त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा (The Three-Tier Institutional Framework for Disaster Management in India)
- 4. राष्ट्रीय स्तर का संस्थागत ढाँचा (National Level Institutional Framework)
- 5. राज्य स्तर का संस्थागत ढाँचा (State Level Institutional Framework)
- 6. जिला स्तर का संस्थागत ढाँचा (District Level Institutional Framework)
- 7. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: संस्थागत ढाँचे की कानूनी नींव (Disaster Management Act, 2005: The Legal Foundation of the Institutional Framework)
- 8. संस्थागत ढाँचे के अन्य महत्वपूर्ण घटक (Other Important Components of the Institutional Framework)
- 9. संस्थागत ढाँचे की चुनौतियाँ और भविष्य की राह (Challenges of the Institutional Framework and the Way Forward)
- 10. निष्कर्ष (Conclusion)
- 11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
1. परिचय: आपदा और एक गाँव की कहानी (Introduction: Disaster and a Village’s Story)
उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव, रैणी में, सूरज की पहली किरणें पहाड़ों पर पड़ती थीं और नदी शांत भाव से बहती थी। गाँव वाले अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त थे, उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि कुछ ही घंटों में उनकी दुनिया हमेशा के लिए बदलने वाली है। अचानक, नदी का जल स्तर तेज़ी से बढ़ने लगा। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, पानी और मलबे का एक विशाल सैलाब गाँव की ओर बढ़ने लगा। गाँव में अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग ऊँची जगहों पर भागे, लेकिन कई लोग इस अचानक आई बाढ़ में फँस गए। इस विनाशकारी घटना ने न केवल घरों और खेतों को नष्ट कर दिया, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा कर दिया: क्या हम ऐसी आपदाओं के लिए तैयार थे? इस घटना के बाद जब बचाव दल पहुँचे, तो उन्होंने पाया कि समन्वय की भारी कमी थी। कोई स्पष्ट योजना नहीं थी, और संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा था। यहीं पर एक मजबूत आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा (institutional framework for disaster management) की कमी महसूस हुई। एक सुव्यवस्थित संस्थागत ढाँचा यह सुनिश्चित करता है कि ऐसी स्थिति में कौन क्या करेगा, संसाधन कहाँ से आएँगे, और लोगों को कैसे सुरक्षित किया जाएगा। यह सिर्फ एक सरकारी संरचना नहीं, बल्कि एक जीवन रक्षक प्रणाली है।
यह कहानी हमें सिखाती है कि आपदाएँ बताकर नहीं आतीं, लेकिन उनसे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है। भारत, अपनी विविध भौगोलिक संरचना (geographical structure) के कारण, बाढ़, भूकंप, चक्रवात, और सूखे जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील है। इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए, एक सुनियोजित और मजबूत संस्थागत ढाँचा अनिवार्य है। यह ढाँचा केवल आपदा के बाद राहत और बचाव कार्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य आपदा के जोखिम को कम करना, तैयारी को बढ़ाना और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को सुगम बनाना भी है। इस लेख में, हम भारत में आपदा प्रबंधन के इसी संस्थागत ढाँचा की गहराई से पड़ताल करेंगे, इसके विभिन्न स्तरों, कानूनी आधार, और चुनौतियों को समझेंगे।
2. आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा: यह क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है? (Institutional Framework for Disaster Management: What is it and Why is it Important?)
संस्थागत ढाँचे की परिभाषा (Definition of Institutional Framework)
आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा उन संस्थानों, कानूनों, नीतियों, और प्रक्रियाओं की एक संगठित प्रणाली है जो किसी देश या क्षेत्र में आपदाओं के प्रबंधन के लिए मिलकर काम करती हैं। यह एक रोडमैप की तरह है जो यह निर्धारित करता है कि आपदा के विभिन्न चरणों – रोकथाम, तैयारी, प्रतिक्रिया, और पुनर्प्राप्ति – में विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों की क्या भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ होंगी।
- संस्थान (Institutions): इसमें राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर विशेष रूप से गठित प्राधिकरण और एजेंसियां शामिल हैं, जैसे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA)।
- कानून और नीतियां (Laws and Policies): इसमें वे अधिनियम और दिशानिर्देश शामिल हैं जो इन संस्थानों को कार्य करने की शक्ति और दिशा प्रदान करते हैं, जैसे आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005।
- प्रक्रियाएं (Procedures): इसमें स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs), संचार प्रोटोकॉल, और संसाधन आवंटन की प्रक्रियाएं शामिल हैं जो आपदा के समय त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करती हैं।
- संसाधन (Resources): इसमें वित्तीय संसाधन (जैसे आपदा राहत कोष), मानव संसाधन (जैसे प्रशिक्षित बचाव दल), और तकनीकी संसाधन (जैसे प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली) शामिल हैं।
संस्थागत ढाँचे का महत्व (Importance of the Institutional Framework)
एक सुदृढ़ संस्थागत ढाँचा आपदा प्रबंधन की रीढ़ होता है। इसके बिना, आपदा प्रतिक्रिया अक्सर अराजक, धीमी और अप्रभावी हो जाती है, जिससे जान-माल का नुकसान बढ़ जाता है।
- स्पष्ट भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ: यह ढाँचा सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक एजेंसी को अपनी भूमिका पता हो, जिससे भ्रम और देरी से बचा जा सके। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट करता है कि NDRF का काम बचाव करना है, जबकि जिला प्रशासन का काम राहत शिविर स्थापित करना है।
- बेहतर समन्वय: यह विभिन्न सरकारी विभागों, सेना, गैर-सरकारी संगठनों और सामुदायिक समूहों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करता है। एक अच्छा संस्थागत ढाँचा सभी हितधारकों को एक मंच पर लाता है।
- संसाधनों का कुशल उपयोग: यह सुनिश्चित करता है कि सीमित संसाधनों का उपयोग वहाँ किया जाए जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है, जिससे बर्बादी कम होती है और प्रभावशीलता बढ़ती है।
- रोकथाम और तैयारी पर ध्यान केंद्रित करना: एक आधुनिक संस्थागत ढाँचा केवल प्रतिक्रिया पर ही नहीं, बल्कि आपदा जोखिम में कमी (disaster risk reduction) और तैयारी पर भी जोर देता है, जिससे आपदाओं के प्रभाव को पहले ही कम किया जा सके।
- कानूनी जवाबदेही: यह कानूनी आधार प्रदान करता है, जिससे अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वे अपने कर्तव्यों का पालन करें।
भारत में संस्थागत ढाँचे का विकास (Evolution of the Institutional Framework in India)
भारत में आपदा प्रबंधन का दृष्टिकोण समय के साथ विकसित हुआ है। प्रारंभ में, यह दृष्टिकोण राहत-केंद्रित (relief-centric) था, जिसका अर्थ है कि मुख्य ध्यान आपदा के बाद राहत और पुनर्वास पर होता था।
- स्वतंत्रता के बाद का युग: इस दौरान, आपदा प्रबंधन को नागरिक सुरक्षा का एक हिस्सा माना जाता था और यह मुख्य रूप से राहत आयुक्तों और जिला कलेक्टरों द्वारा संचालित होता था।
- 1990 का दशक: योकोहामा रणनीति (1994) और अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक आपदा न्यूनीकरण दशक ने भारत को आपदा रोकथाम और तैयारी पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया।
- 2001 का भुज भूकंप: गुजरात में आए इस विनाशकारी भूकंप ने एक व्यापक और एकीकृत आपदा प्रबंधन प्रणाली की आवश्यकता को उजागर किया। इसने एक समर्पित संस्थागत ढाँचा बनाने की प्रक्रिया को गति दी।
- 2004 की सुनामी: हिंद महासागर में आई सुनामी ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 पारित हुआ। इस अधिनियम ने भारत में आपदा प्रबंधन के लिए एक संपूर्ण संस्थागत ढाँचा स्थापित किया।
3. भारत में आपदा प्रबंधन का त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा (The Three-Tier Institutional Framework for Disaster Management in India)
ढाँचे का अवलोकन (Overview of the Framework)
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत, भारत ने एक एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए एक त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा स्थापित किया है। यह ढाँचा राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर कार्य करता है, ताकि नीतियों का निर्माण शीर्ष स्तर पर हो और उनका कार्यान्वयन जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से हो सके। यह पदानुक्रमित संरचना (hierarchical structure) सुनिश्चित करती है कि आपदा प्रबंधन के हर पहलू पर ध्यान दिया जाए।
- राष्ट्रीय स्तर (National Level): यह नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश बनाने के लिए जिम्मेदार है।
- राज्य स्तर (State Level): यह राष्ट्रीय नीतियों को अपने राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार ढालने और उनके कार्यान्वयन की निगरानी करने के लिए जिम्मेदार है।
- जिला स्तर (District Level): यह जमीनी स्तर पर योजनाओं को लागू करने और आपदा प्रतिक्रिया का नेतृत्व करने वाली मुख्य इकाई है।
राष्ट्रीय स्तर की भूमिका (Role of the National Level)
राष्ट्रीय स्तर पर, संस्थागत ढाँचा देश के लिए आपदा प्रबंधन की समग्र दिशा तय करता है। इसका मुख्य कार्य एक समान और मानकीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित करना है जिसे सभी राज्य अपना सकें।
- नीति निर्माण: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (National Disaster Management Plan) और अन्य नीतियों को तैयार करना।
- दिशानिर्देश जारी करना: राज्यों और जिलों के लिए विशिष्ट आपदाओं (जैसे बाढ़, भूकंप) के लिए दिशानिर्देश जारी करना।
- क्षमता निर्माण: प्रशिक्षण, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से राज्यों की क्षमता को बढ़ाना।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: अन्य देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग करना।
राज्य स्तर की भूमिका (Role of the State Level)
राज्य स्तर पर, संस्थागत ढाँचा राष्ट्रीय नीतियों और राज्य की जमीनी हकीकत के बीच एक पुल का काम करता है। प्रत्येक राज्य की अपनी भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक विशिष्टताएँ होती हैं, और राज्य स्तरीय ढाँचा इन पर ध्यान केंद्रित करता है।
- राज्य योजना का निर्माण: राष्ट्रीय योजना के अनुरूप राज्य आपदा प्रबंधन योजना (State Disaster Management Plan) तैयार करना।
- समन्वय: राज्य के विभिन्न विभागों और जिला प्रशासनों के बीच समन्वय स्थापित करना।
- संसाधन प्रदान करना: जिलों को आपदा प्रबंधन के लिए आवश्यक वित्तीय और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराना।
- निगरानी और मूल्यांकन: जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
जिला स्तर की भूमिका (Role of the District Level)
जिला स्तर को आपदा प्रबंधन की रीढ़ माना जाता है क्योंकि वास्तविक कार्यान्वयन यहीं होता है। जिला स्तर का संस्थागत ढाँचा सीधे तौर पर प्रभावित समुदायों के साथ काम करता है।
- जिला योजना का निर्माण: जिला आपदा प्रबंधन योजना (District Disaster Management Plan) बनाना, जिसमें गाँव-स्तर की योजनाएँ भी शामिल हों।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: चेतावनियों को स्थानीय समुदायों तक पहुँचाना।
- प्रतिक्रिया का नेतृत्व: आपदा के समय खोज, बचाव, और राहत कार्यों का तत्काल संचालन करना।
- क्षति का आकलन: आपदा के बाद हुए नुकसान का आकलन करना और पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू करना।
यह त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा यह सुनिश्चित करता है कि आपदा प्रबंधन एक सतत और एकीकृत प्रक्रिया हो, जो ऊपर से नीचे (top-down) मार्गदर्शन और नीचे से ऊपर (bottom-up) कार्यान्वयन के सिद्धांत पर काम करती है।
4. राष्ट्रीय स्तर का संस्थागत ढाँचा (National Level Institutional Framework)
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA)
राष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत ढाँचा का शीर्ष निकाय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) है। यह भारत में आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करने वाली सर्वोच्च संस्था है।
- संरचना (Composition): NDMA की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं। इसमें एक उपाध्यक्ष और अधिकतम नौ सदस्य होते हैं, जिन्हें आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विशेषज्ञता حاصل होती है।
- प्रमुख कार्य (Key Functions):
- आपदा प्रबंधन पर राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करना।
- राष्ट्रीय योजना को मंजूरी देना।
- आपदा प्रबंधन के लिए विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के लिए दिशानिर्देश तैयार करना।
- आपदा रोकथाम (disaster prevention) और शमन (mitigation) के उपायों को बढ़ावा देना।
- बड़ी आपदा की स्थिति में राहत कार्यों में समन्वय स्थापित करना।
- महत्व: NDMA देश में आपदा प्रबंधन के प्रति एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है, जो केवल प्रतिक्रिया के बजाय जोखिम में कमी पर केंद्रित है। आप NDMA की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर और अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (National Executive Committee – NEC)
NEC, NDMA की कार्यकारी शाखा के रूप में कार्य करती है। यह राष्ट्रीय प्राधिकरण द्वारा बनाई गई नीतियों और योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है।
- संरचना (Composition): इसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह सचिव करते हैं। इसमें कृषि, रक्षा, स्वास्थ्य, और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सचिव सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
- प्रमुख कार्य (Key Functions):
- राष्ट्रीय योजना के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
- राष्ट्रीय प्राधिकरण के निर्णयों को लागू करने के लिए एक समन्वयकारी और निगरानी निकाय के रूप में कार्य करना।
- मंत्रालयों को उनकी आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने में सहायता करना।
- आपदा की स्थिति में केंद्र सरकार को सलाह देना।
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force – NDRF)
NDRF एक विशेष, बहु-कुशल बल है जिसे आपदा की स्थिति में तत्काल प्रतिक्रिया के लिए गठित किया गया है। यह राष्ट्रीय संस्थागत ढाँचा का एक महत्वपूर्ण और दृश्यमान हिस्सा है।
- गठन और संरचना: NDRF का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत किया गया है। इसमें विभिन्न अर्धसैनिक बलों (जैसे BSF, CRPF, ITBP) से प्रतिनियुक्ति पर आए कर्मी शामिल होते हैं। वर्तमान में इसकी कई बटालियनें देश के विभिन्न हिस्सों में रणनीतिक रूप से तैनात हैं।
- विशेषज्ञता (Specialization): NDRF के जवानों को ढह गई संरचनाओं में खोज और बचाव (CSSR), बाढ़ बचाव, और रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (CBRN) आपात स्थितियों से निपटने के लिए उच्च स्तरीय प्रशिक्षण दिया जाता है।
- भूमिका: इसका मुख्य कार्य आपदा की स्थिति में विशेषज्ञ बचाव और राहत अभियान चलाना है। यह राज्य बलों को प्रशिक्षण भी प्रदान करता है और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों में भी सहायता करता है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (National Institute of Disaster Management – NIDM)
NIDM राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण और अनुसंधान के लिए जिम्मेदार प्रमुख संस्थान है। यह क्षमता निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य मानव संसाधन विकास, अनुसंधान, नीति वकालत और प्रलेखन के माध्यम से आपदा जोखिम न्यूनीकरण को बढ़ावा देना है।
- गतिविधियाँ (Activities):
- सरकारी अधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
- आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान करना।
- राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं के विकास में सहायता करना।
- जागरूकता सामग्री और प्रकाशन विकसित करना।
- योगदान: NIDM यह सुनिश्चित करता है कि भारत का संस्थागत ढाँचा नवीनतम ज्ञान और सर्वोत्तम प्रथाओं से लैस हो, जिससे आपदा प्रबंधन की प्रभावशीलता में लगातार सुधार हो।
5. राज्य स्तर का संस्थागत ढाँचा (State Level Institutional Framework)
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (State Disaster Management Authority – SDMA)
जिस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर NDMA है, उसी प्रकार प्रत्येक राज्य में आपदा प्रबंधन के लिए शीर्ष निकाय राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) है। यह राज्य में आपदा प्रबंधन गतिविधियों के लिए जिम्मेदार है।
- संरचना (Composition): SDMA की अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री करते हैं। इसमें अधिकतम नौ सदस्य होते हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री द्वारा नामित किया जाता है। राज्य कार्यकारी समिति का अध्यक्ष इसका पदेन सदस्य होता है।
- प्रमुख कार्य (Key Functions):
- राज्य में आपदा प्रबंधन पर नीतियां और योजनाएं बनाना।
- राष्ट्रीय नीति और योजनाओं के अनुसार राज्य योजना का समन्वय और कार्यान्वयन करना।
- राज्य के विभिन्न विभागों के लिए आपदा प्रबंधन योजनाएं तैयार करने के लिए दिशानिर्देश जारी करना।
- आपदा शमन (mitigation) और तैयारी के उपायों की समीक्षा करना।
- भूमिका: SDMA यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रीय स्तर पर बने व्यापक संस्थागत ढाँचे को राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं और कमजोरियों के अनुसार अनुकूलित और लागू किया जाए।
राज्य कार्यकारी समिति (State Executive Committee – SEC)
राज्य कार्यकारी समिति (SEC) राज्य स्तर पर SDMA की सहायक और कार्यकारी शाखा है। यह SDMA द्वारा लिए गए निर्णयों के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है।
- संरचना (Composition): SEC की अध्यक्षता राज्य के मुख्य सचिव करते हैं। इसमें गृह, वित्त, स्वास्थ्य और अन्य संबंधित विभागों के सचिव सदस्य के रूप में होते हैं।
- प्रमुख कार्य (Key Functions):
- राज्य आपदा प्रबंधन योजना के कार्यान्वयन की निगरानी और समन्वय करना।
- SDMA के निर्णयों को लागू करने के लिए एक समन्वयकारी निकाय के रूप में कार्य करना।
- आपदा की चेतावनी और उसके प्रभाव का आकलन करना।
- खोज, बचाव और राहत कार्यों का समन्वय करना।
- महत्व: SEC राज्य के प्रशासनिक तंत्र को आपदा प्रबंधन के संस्थागत ढाँचा से जोड़ता है, जिससे नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित होता है।
राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (State Disaster Response Force – SDRF)
NDRF की तर्ज पर, कई राज्यों ने अपने स्वयं के समर्पित बचाव बल, राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) का गठन किया है। यह राज्य स्तर पर पहली प्रतिक्रिया देने वाली विशेषज्ञ टीम होती है।
- गठन और प्रशिक्षण: SDRF का गठन राज्य पुलिस बलों, होम गार्ड्स और अन्य इकाइयों से कर्मियों को लेकर किया जाता है। इन्हें NDRF द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाता है।
- भूमिका (Role):
- राज्य के भीतर किसी भी आपदा की स्थिति में तत्काल प्रतिक्रिया देना।
- NDRF के पहुँचने से पहले महत्वपूर्ण “सुनहरे घंटे” (golden hour) में बचाव कार्य शुरू करना।
- जिला प्रशासन और स्थानीय समुदायों को आपदा प्रतिक्रिया में सहायता करना।
- लाभ: SDRF के होने से राज्य की आत्मनिर्भरता बढ़ती है और वह राष्ट्रीय सहायता पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है, जिससे प्रतिक्रिया समय में काफी कमी आती है। यह राज्य के संस्थागत ढाँचा को और अधिक मजबूत बनाता है।
6. जिला स्तर का संस्थागत ढाँचा (District Level Institutional Framework)
जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (District Disaster Management Authority – DDMA)
जिला स्तर पर, जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) आपदा प्रबंधन की योजना, समन्वय और कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार मुख्य निकाय है। यह वह धुरी है जहाँ राष्ट्रीय और राज्य की नीतियां जमीनी कार्रवाई में बदलती हैं।
- संरचना (Composition): DDMA की अध्यक्षता जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट/उपायुक्त करते हैं। स्थानीय प्राधिकरण (जैसे जिला परिषद/जिला पंचायत) के निर्वाचित प्रतिनिधि इसके सह-अध्यक्ष होते हैं। इसमें जिले के पुलिस अधीक्षक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और अन्य महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख सदस्य होते हैं।
- प्रमुख कार्य (Key Functions):
- जिला आपदा प्रबंधन योजना तैयार करना और उसे नियमित रूप से अद्यतन करना।
- NDMA और SDMA द्वारा जारी दिशानिर्देशों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करना।
- जिले में आपदा प्रबंधन के लिए विभिन्न विभागों की गतिविधियों का समन्वय करना।
- आपदा शमन और रोकथाम के उपायों को बढ़ावा देना और उन्हें विकास योजनाओं में एकीकृत करना।
- राहत शिविरों की स्थापना और राहत सामग्री के वितरण का प्रबंधन करना।
- महत्व: DDMA आपदा प्रबंधन के संस्थागत ढाँचे की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि यह सीधे तौर पर प्रभावित समुदायों के साथ काम करता है और तत्काल प्रतिक्रिया के लिए जिम्मेदार होता है।
जिला कलेक्टर/मजिस्ट्रेट की भूमिका (Role of the District Collector/Magistrate)
जिला कलेक्टर (DC) या जिला मजिस्ट्रेट (DM) जिले में आपदा प्रबंधन तंत्र का केंद्र बिंदु होता है। DDMA के अध्यक्ष के रूप में, उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
- समन्वयकर्ता (Coordinator): DC जिले के सभी सरकारी विभागों, गैर-सरकारी संगठनों, सेना और मीडिया के बीच समन्वय स्थापित करता है।
- कमांडर (Commander): आपदा की स्थिति में, DC इंसीडेंट कमांडर (Incident Commander) के रूप में कार्य करता है और सभी खोज, बचाव और राहत कार्यों का निर्देशन करता है।
- निर्णायक (Decision-maker): उन्हें तत्काल निर्णय लेने का अधिकार होता है, जैसे कि लोगों को निकालना, स्कूल-कॉलेज बंद करना, और संसाधनों को जुटाना।
- जवाबदेही (Accountability): वे जिले में आपदा प्रबंधन की सफलता या विफलता के लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार के प्रति जवाबदेह होते हैं। यह स्थिति जिला स्तर पर संस्थागत ढाँचा को प्रभावी बनाती है।
स्थानीय प्राधिकरणों की भागीदारी (Involvement of Local Authorities)
स्थानीय प्राधिकरण, जैसे कि पंचायतें और नगर पालिकाएं, जमीनी स्तर पर संस्थागत ढाँचा का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। वे समुदाय के सबसे करीब होते हैं और उनकी भागीदारी के बिना प्रभावी आपदा प्रबंधन संभव नहीं है।
- पंचायती राज संस्थान (Panchayati Raj Institutions – PRIs):
- ग्राम-स्तरीय आपदा प्रबंधन योजनाएँ तैयार करना।
- प्रारंभिक चेतावनी को गाँव के हर घर तक पहुँचाना।
- स्थानीय संसाधनों की पहचान करना और उन्हें जुटाना।
- राहत और पुनर्वास कार्यों में जिला प्रशासन की सहायता करना।
- शहरी स्थानीय निकाय (Urban Local Bodies – ULBs):
- शहरों में जल निकासी प्रणालियों का रखरखाव, जो शहरी बाढ़ को रोकने में मदद करता है।
- असुरक्षित भवनों की पहचान करना और बिल्डिंग कोड लागू करना।
- आपदा के समय पेयजल, स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करना।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय प्राधिकरण सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देते हैं, जो किसी भी आपदा प्रबंधन योजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। एक जागरूक और तैयार समुदाय आपदाओं का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है।
7. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: संस्थागत ढाँचे की कानूनी नींव (Disaster Management Act, 2005: The Legal Foundation of the Institutional Framework)
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान (Key Provisions of the Act)
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 भारत में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कानून है। इसने देश में आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल दिया और एक मजबूत संस्थागत ढाँचा की कानूनी नींव रखी।
- संस्थागत संरचना की स्थापना: इस अधिनियम ने राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर NDMA, SDMA, और DDMA जैसे प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान किया, जिससे एक स्पष्ट और पदानुक्रमित संरचना बनी।
- योजनाओं का निर्माण: अधिनियम राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करना अनिवार्य बनाता है।
- वित्तीय तंत्र: इसने राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) जैसे समर्पित फंडों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
- विशेष बलों का गठन: अधिनियम के तहत ही NDRF जैसे विशेषज्ञ बलों का गठन किया गया, जो आपदा प्रतिक्रिया क्षमताओं को मजबूत करता है।
- शक्तियां और जिम्मेदारियां: यह अधिनियम विभिन्न अधिकारियों को आपदा के दौरान विशेष शक्तियां प्रदान करता है और उनकी जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।
अधिनियम का सकारात्मक मूल्यांकन (Positive Aspects of the Act)
इस अधिनियम ने भारत के आपदा प्रबंधन तंत्र में कई सकारात्मक बदलाव लाए हैं।
- दृष्टिकोण में बदलाव: इसने आपदा प्रबंधन को राहत-केंद्रित दृष्टिकोण से बदलकर एक समग्र, एकीकृत और रोकथाम-केंद्रित दृष्टिकोण में परिवर्तित कर दिया। यह सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है।
- स्पष्ट संरचना: इसने एक स्पष्ट संस्थागत ढाँचा प्रदान किया, जिससे भ्रम कम हुआ और समन्वय में सुधार हुआ। अब हर स्तर पर पता है कि किसे क्या करना है।
- कानूनी समर्थन: इसने आपदा प्रबंधन गतिविधियों को कानूनी समर्थन प्रदान किया, जिससे अधिकारियों को प्रभावी ढंग से कार्य करने में मदद मिली।
- क्षमता निर्माण पर जोर: अधिनियम ने प्रशिक्षण, अनुसंधान और जागरूकता के माध्यम से क्षमता निर्माण पर विशेष जोर दिया, जिससे देश की तैयारी का स्तर बढ़ा है।
- जवाबदेही: अधिनियम ने विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों की जवाबदेही तय की है, जिससे लापरवाही की संभावना कम हुई है।
अधिनियम का नकारात्मक मूल्यांकन और चुनौतियाँ (Negative Aspects and Challenges of the Act)
सकारात्मक पहलुओं के बावजूद, इस अधिनियम के कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ और कमियाँ भी हैं।
- कार्यान्वयन में देरी: कई राज्यों में, SDMAs और DDMAs का गठन तो हो गया है, लेकिन वे पूरी तरह से क्रियाशील नहीं हैं। उनकी बैठकें नियमित रूप से नहीं होतीं और उनके पास समर्पित कर्मचारी और संसाधन नहीं होते हैं।
- वित्त की कमी: यद्यपि NDRF और SDRF की स्थापना की गई है, लेकिन शमन (mitigation) और तैयारी गतिविधियों के लिए धन अक्सर अपर्याप्त होता है। अधिकांश धन अभी भी राहत और प्रतिक्रिया पर खर्च होता है।
- समन्वय की समस्या: कागज पर एक स्पष्ट संस्थागत ढाँचा होने के बावजूद, विभिन्न विभागों और एजेंसियों के बीच वास्तविक समन्वय अभी भी एक बड़ी चुनौती है, खासकर बड़ी आपदाओं के दौरान।
- स्थानीय स्तर पर कमजोरी: जिला और स्थानीय स्तर पर संस्थागत ढाँचा अभी भी कमजोर है। कई जिलों में आपदा प्रबंधन योजनाएं केवल दस्तावेजी औपचारिकता बनकर रह गई हैं और उन्हें नियमित रूप से अद्यतन नहीं किया जाता है।
- जागरूकता का अभाव: आम जनता के बीच आपदा प्रबंधन योजनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में जागरूकता की कमी है, जिससे सामुदायिक भागीदारी सीमित हो जाती है।
8. संस्थागत ढाँचे के अन्य महत्वपूर्ण घटक (Other Important Components of the Institutional Framework)
वित्तीय तंत्र: NDRF और SDRF (Financial Mechanisms: NDRF and SDRF)
किसी भी संस्थागत ढाँचा की सफलता के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन आवश्यक हैं। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने इसके लिए एक मजबूत वित्तीय तंत्र स्थापित किया है।
- राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (National Disaster Response Fund – NDRF): यह केंद्र सरकार के स्तर पर एक समर्पित कोष है जिसका उपयोग गंभीर प्रकृति की आपदाओं के दौरान तत्काल राहत और बचाव कार्यों के लिए किया जाता है। इसका प्रबंधन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (State Disaster Response Fund – SDRF): यह राज्य स्तर पर प्राथमिक कोष है। केंद्र और राज्य सरकारें इसमें योगदान करती हैं (आमतौर पर 75:25 के अनुपात में, विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए 90:10)। राज्य सरकारें अपनी सीमाओं के भीतर आपदाओं से निपटने के लिए इस कोष का उपयोग कर सकती हैं।
- महत्व: यह वित्तीय तंत्र सुनिश्चित करता है कि आपदा के समय धन की कमी के कारण राहत कार्यों में कोई देरी न हो।
अन्य मंत्रालयों और विभागों की भूमिका (Role of Other Ministries and Departments)
आपदा प्रबंधन केवल गृह मंत्रालय या NDMA की जिम्मेदारी नहीं है। यह एक बहु-विषयक कार्य है जिसमें कई अन्य मंत्रालयों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs): यह आपदा प्रबंधन के लिए नोडल मंत्रालय है और समग्र समन्वय के लिए जिम्मेदार है।
- रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence): सशस्त्र बल (सेना, नौसेना, वायु सेना) खोज, बचाव, निकासी और रसद सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare): यह चिकित्सा सहायता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी की रोकथाम के लिए जिम्मेदार है।
- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Sciences): भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) जैसी इसकी एजेंसियां चक्रवात, भारी वर्षा और सुनामी के लिए प्रारंभिक चेतावनी (early warning) जारी करती हैं।
- कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture): यह सूखे जैसी स्थिति का प्रबंधन करता है और किसानों को सहायता प्रदान करता है।
समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन (Community-Based Disaster Management – CBDM)
आधुनिक आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा मानता है कि समुदाय केवल पीड़ित नहीं हैं, बल्कि वे पहले प्रतिक्रियाकर्ता (first responders) भी हैं। CBDM एक ऐसा दृष्टिकोण है जो स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन प्रक्रिया के केंद्र में रखता है।
- उद्देश्य: समुदायों को अपनी कमजोरियों और जोखिमों को पहचानने, अपनी स्वयं की आपदा प्रबंधन योजनाएं बनाने और स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सशक्त बनाना।
- घटक:
- जागरूकता अभियान चलाना।
- स्थानीय स्वयंसेवकों को प्राथमिक चिकित्सा, खोज और बचाव में प्रशिक्षित करना।
- ग्राम आपदा प्रबंधन समितियों (VDMCs) का गठन करना।
- स्थानीय ज्ञान और परंपराओं को आपदा प्रबंधन योजनाओं में शामिल करना।
- लाभ: CBDM आपदाओं के प्रति समुदाय के लचीलेपन (resilience) को बढ़ाता है और बाहरी सहायता पर उनकी निर्भरता को कम करता है, जिससे एक मजबूत और आत्मनिर्भर समाज का निर्माण होता है।
गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और नागरिक समाज की भूमिका (Role of NGOs and Civil Society)
गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और नागरिक समाज संगठन (CSOs) आपदा प्रबंधन के संस्थागत ढाँचा के महत्वपूर्ण भागीदार हैं। वे सरकारी प्रयासों के पूरक के रूप में कार्य करते हैं।
- राहत और पुनर्वास: वे अक्सर राहत सामग्री (भोजन, पानी, आश्रय) के वितरण और दीर्घकालिक पुनर्वास कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- क्षमता निर्माण: वे समुदायों को प्रशिक्षित करने और जागरूकता फैलाने में मदद करते हैं।
- वकालत: वे कमजोर समुदायों के अधिकारों की वकालत करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सरकारी नीतियां समावेशी हों।
- लचीलापन: वे अक्सर दूर-दराज और दुर्गम क्षेत्रों में पहुँचते हैं जहाँ सरकारी सहायता पहुँचने में समय लग सकता है।
9. संस्थागत ढाँचे की चुनौतियाँ और भविष्य की राह (Challenges of the Institutional Framework and the Way Forward)
वर्तमान संस्थागत ढाँचे की प्रमुख चुनौतियाँ (Major Challenges of the Current Institutional Framework)
भले ही भारत ने एक व्यापक संस्थागत ढाँचा स्थापित किया है, लेकिन इसके प्रभावी कार्यान्वयन में अभी भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। इन चुनौतियों से निपटना भविष्य की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
- क्षमता का अंतर (Capacity Gap): राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञता मौजूद है, लेकिन राज्य और विशेष रूप से जिला और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित मानव संसाधनों और तकनीकी क्षमताओं की भारी कमी है।
- शहरी आपदा जोखिम (Urban Disaster Risk): भारत का तेजी से शहरीकरण हो रहा है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा अभी भी कमजोर है। बिल्डिंग कोड का खराब प्रवर्तन, अनियोजित विकास और भीड़भाड़ शहरी जोखिमों को बढ़ा रहे हैं।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव (Impact of Climate Change): जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम की घटनाओं (जैसे अत्यधिक वर्षा, हीटवेव, चक्रवात) की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। हमारा वर्तमान संस्थागत ढाँचा इन नई और बढ़ती चुनौतियों के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो सकता है।
- डेटा और प्रौद्योगिकी का अभाव: जोखिम मूल्यांकन और निर्णय लेने के लिए सटीक और समय पर डेटा महत्वपूर्ण है। कई क्षेत्रों में, जोखिम मानचित्रण (risk mapping) और वास्तविक समय डेटा संग्रह के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग अभी भी सीमित है।
- विकास योजनाओं के साथ एकीकरण का अभाव: आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) को अभी भी सड़क, आवास और सिंचाई जैसी मुख्य विकास परियोजनाओं में पूरी तरह से एकीकृत नहीं किया गया है। अक्सर, विकास परियोजनाएँ स्वयं ही नए जोखिम पैदा कर देती हैं।
भविष्य की राह: संस्थागत ढाँचे को कैसे मजबूत करें? (The Way Forward: How to Strengthen the Institutional Framework?)
इन चुनौतियों से निपटने और भारत के संस्थागत ढाँचा को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
- क्षमता निर्माण पर निवेश: जिला और स्थानीय स्तर पर अधिकारियों और समुदायों के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों में भारी निवेश करने की आवश्यकता है।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों, उपग्रह इमेजरी, ड्रोन और जीआईएस मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग करके जोखिम मूल्यांकन और प्रतिक्रिया क्षमताओं में सुधार किया जा सकता है।
- वित्तीय प्राथमिकताएं बदलना: आपदा के बाद राहत पर खर्च करने के बजाय, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और शमन उपायों के लिए अधिक धन आवंटित किया जाना चाहिए। रोकथाम इलाज से बेहतर है, और यह सिद्धांत आपदा प्रबंधन पर भी लागू होता है।
- स्थानीयकरण (Localization): आपदा प्रबंधन योजनाओं को स्थानीय संदर्भों और जरूरतों के अनुसार तैयार किया जाना चाहिए। स्थानीय समुदायों और पंचायती राज संस्थानों को योजना और कार्यान्वयन प्रक्रिया में अधिक अधिकार दिए जाने चाहिए।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership): निजी क्षेत्र के पास संसाधन, प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता होती है। आपदा प्रबंधन में उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए एक मजबूत संस्थागत ढाँचा बनाया जाना चाहिए।
- अंतर-एजेंसी समन्वय को सुदृढ़ बनाना: नियमित संयुक्त अभ्यास (mock drills) और कार्यशालाओं के माध्यम से विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय और संचार को बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
10. निष्कर्ष (Conclusion)
रैणी गाँव की कहानी हमें याद दिलाती है कि आपदाएँ प्राकृतिक हो सकती हैं, लेकिन उनसे होने वाली तबाही अक्सर मानव निर्मित कमजोरियों और तैयारियों की कमी का परिणाम होती है। पिछले कुछ दशकों में, भारत ने एक प्रतिक्रिया-आधारित दृष्टिकोण से एक सक्रिय और समग्र दृष्टिकोण की ओर बढ़ते हुए आपदा प्रबंधन में एक लंबी यात्रा तय की है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 ने इस परिवर्तन की नींव रखी, जिससे एक व्यापक त्रि-स्तरीय संस्थागत ढाँचा का निर्माण हुआ। NDMA, SDMA, DDMA और NDRF जैसी संस्थाओं की स्थापना ने देश की आपदाओं से निपटने की क्षमता में काफी सुधार किया है।
हालांकि, यह यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। कार्यान्वयन में अंतराल, क्षमता की कमी, और जलवायु परिवर्तन जैसी नई चुनौतियां हमारे सामने हैं। एक मजबूत और प्रभावी संस्थागत ढाँचा केवल कानूनों और संस्थानों के बारे में नहीं है; यह एक संस्कृति बनाने के बारे में है – सुरक्षा और लचीलेपन की संस्कृति। इसके लिए निरंतर प्रयास, राजनीतिक इच्छाशक्ति, और सभी हितधारकों – सरकार, नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और सबसे महत्वपूर्ण, समुदायों – की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है। जब आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा हर स्तर पर मजबूत और जीवंत होगा, तभी हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर सकते हैं जो न केवल आपदाओं का सामना कर सके, बल्कि उनसे और भी मजबूत होकर उभरे।
11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा क्या है? (What is the institutional framework for disaster management?)
उत्तर: आपदा प्रबंधन का संस्थागत ढाँचा उन संस्थानों, कानूनों, नीतियों और प्रक्रियाओं की एक संगठित प्रणाली है जो किसी देश में आपदाओं के प्रबंधन के लिए मिलकर काम करती हैं। भारत में, यह एक त्रि-स्तरीय संरचना है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर NDMA, राज्य स्तर पर SDMA और जिला स्तर पर DDMA शामिल हैं, जो आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 द्वारा शासित होते हैं।
प्रश्न 2: भारत में आपदा प्रबंधन के लिए सर्वोच्च निकाय कौन सा है? (Which is the apex body for disaster management in India?)
उत्तर: भारत में आपदा प्रबंधन के लिए सर्वोच्च निकाय राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority – NDMA) है। इसकी अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं और यह देश में आपदा प्रबंधन के लिए नीतियां, योजनाएं और दिशानिर्देश तैयार करने के लिए जिम्मेदार है।
प्रश्न 3: NDRF और SDRF में क्या अंतर है? (What is the difference between NDRF and SDRF?)
उत्तर: NDRF (National Disaster Response Force) एक राष्ट्रीय स्तर का विशेष बचाव बल है जो देश में कहीं भी बड़ी आपदाओं के लिए प्रतिक्रिया देता है। SDRF (State Disaster Response Force) राज्य स्तर का बचाव बल है जो अपने संबंधित राज्य के भीतर आपदाओं के लिए पहली प्रतिक्रिया देने वाली टीम के रूप में कार्य करता है। SDRF राज्य की आत्मनिर्भरता को बढ़ाता है।
प्रश्न 4: जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन का नेतृत्व कौन करता है? (Who leads disaster management at the district level?)
उत्तर: जिला स्तर पर, आपदा प्रबंधन का नेतृत्व जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट करते हैं। वे जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) के अध्यक्ष होते हैं और आपदा की स्थिति में सभी प्रतिक्रिया और राहत कार्यों के समन्वय के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसलिए, जिला स्तर के संस्थागत ढाँचा में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 5: आपदा प्रबंधन में समुदाय की क्या भूमिका है? (What is the role of the community in disaster management?)
उत्तर: समुदाय आपदा प्रबंधन का एक अभिन्न अंग हैं। वे आपदा के समय पहले प्रतिक्रियाकर्ता होते हैं। एक जागरूक और प्रशिक्षित समुदाय आपदा के प्रभाव को काफी कम कर सकता है। समुदाय-आधारित आपदा प्रबंधन (CBDM) दृष्टिकोण समुदायों को अपनी योजनाएं बनाने, जोखिमों को पहचानने और अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए सशक्त बनाता है, जिससे वे अधिक लचीले और आत्मनिर्भर बनते हैं।

