जैव प्रौद्योगिकी का रहस्य (Secret of Biotech)
जैव प्रौद्योगिकी का रहस्य (Secret of Biotech)

जैव प्रौद्योगिकी का रहस्य (Secret of Biotech)

इस लेख में क्या है? (Table of Contents)

1. परिचय: जैव प्रौद्योगिकी की दुनिया (Introduction: The World of Biotechnology)

कल्पना कीजिए एक छोटे से गाँव में रहने वाले रमेश की, जो कई सालों से मधुमेह (diabetes) से पीड़ित थे। हर दिन इंसुलिन का इंजेक्शन लेना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। एक दिन उन्होंने अपने डॉक्टर से पूछा, “डॉक्टर साहब, यह इंसुलिन आखिर बनता कैसे है?” डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए समझाया, “रमेश जी, यह विज्ञान के एक चमत्कार का नतीजा है, जिसे हम जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) कहते हैं। वैज्ञानिकों ने एक बैक्टीरिया को इस तरह बदल दिया है कि वह हमारे शरीर के लिए इंसुलिन बना सकता है।” रमेश हैरान रह गए। यह कहानी किसी कल्पना से कम नहीं लगती, लेकिन यह आज की हकीकत है। जैव प्रौद्योगिकी हमारे जीवन के हर पहलू को चुपचाप बदल रही है, स्वास्थ्य सेवा से लेकर कृषि और पर्यावरण तक। यह एक ऐसी शक्तिशाली तकनीक है जो जीवित जीवों या उनके घटकों का उपयोग करके मानव जाति के लिए उपयोगी उत्पाद और सेवाएं बनाती है।

यह लेख आपको जैव प्रौद्योगिकी के रहस्यमयी और रोमांचक दुनिया में ले जाएगा। हम इसकी परिभाषा से लेकर इसके इतिहास, प्रकार, तकनीकों और हमारे जीवन पर इसके गहरे प्रभाव तक हर पहलू को सरल भाषा में समझने की कोशिश करेंगे। चाहे आप एक छात्र हों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हों, या बस विज्ञान में रुचि रखते हों, यह लेख आपके लिए ज्ञान का खजाना साबित होगा। तो चलिए, इस अद्भुत यात्रा की शुरुआत करते हैं और जानते हैं कि कैसे सूक्ष्म जीव और डीएनए (DNA) के छोटे-छोटे अणु हमारे भविष्य को आकार दे रहे हैं।

2. जैव प्रौद्योगिकी क्या है? – मूल बातें समझें (What is Biotechnology? – Understanding the Basics)

जैव प्रौद्योगिकी की सरल परिभाषा (Simple Definition of Biotechnology)

जैव प्रौद्योगिकी, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘जैव’ (Bio) यानी जीवन या जीवित जीव, और ‘प्रौद्योगिकी’ (Technology) यानी तकनीक। सरल शब्दों में, जब हम मानव कल्याण के लिए उत्पादों या प्रक्रियाओं को बनाने या संशोधित करने के लिए जीवित जीवों (जैसे बैक्टीरिया, यीस्ट, पौधे, या जानवर) या उनके घटकों (जैसे एंजाइम, डीएनए) का उपयोग करते हैं, तो इसे जैव प्रौद्योगिकी कहा जाता है।

  • यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी का एक एकीकृत क्षेत्र है जो इंजीनियरिंग और जीवन विज्ञान को जोड़ता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जैविक प्रणालियों (biological systems) की क्षमताओं का उपयोग करके स्वास्थ्य में सुधार करना, भोजन का उत्पादन बढ़ाना और पर्यावरण को स्वच्छ बनाना है।
  • दही बनाना, ब्रेड बनाना और शराब बनाना पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी के सदियों पुराने उदाहरण हैं, जबकि जेनेटिक इंजीनियरिंग आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख उदाहरण है।

पारंपरिक बनाम आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी (Traditional vs. Modern Biotechnology)

जैव प्रौद्योगिकी कोई नई अवधारणा नहीं है। यह हजारों वर्षों से हमारे साथ है, बस इसका रूप बदल गया है। इसे मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है:

  • पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी: इसमें प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता था। इसका ज्ञान अनुभव और अवलोकन पर आधारित था, न कि गहन वैज्ञानिक समझ पर।
    • उदाहरण: दूध से दही और पनीर बनाना (बैक्टीरिया का उपयोग), सिरका बनाना, और आटे में खमीर उठाकर ब्रेड बनाना (यीस्ट का उपयोग)। ये प्रक्रियाएं हजारों सालों से चली आ रही हैं।
  • आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी: यह 1970 के दशक के बाद विकसित हुई और यह आनुवंशिक स्तर (genetic level) पर काम करती है। इसमें हम जीवों के डीएनए में हेरफेर करके वांछित गुण प्राप्त कर सकते हैं।
    • उदाहरण: जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) द्वारा इंसुलिन का उत्पादन, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (GM crops) बनाना, और जीन थेरेपी (Gene Therapy) द्वारा बीमारियों का इलाज करना। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी अधिक सटीक, शक्तिशाली और लक्षित है।

संक्षेप में, पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी प्रकृति के दिए हुए साधनों का उपयोग करती थी, जबकि आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी उन साधनों को अपनी आवश्यकता के अनुसार संशोधित करने की क्षमता रखती है।

3. जैव प्रौद्योगिकी का ऐतिहासिक सफर (The Historical Journey of Biotechnology)

जैव प्रौद्योगिकी का इतिहास मानव सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है। यह धीरे-धीरे विकसित हुआ है, प्राचीन खाद्य प्रक्रियाओं से लेकर आज की अत्याधुनिक जीन संपादन तकनीकों तक। आइए इस रोमांचक सफर के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों पर नजर डालें।

प्राचीन काल (8000 ईसा पूर्व – 1800 ईस्वी) (Ancient Era)

  • कृषि का आरंभ: लगभग 10,000 साल पहले, जब मनुष्यों ने पौधों और जानवरों को पालतू बनाना शुरू किया, तो यह चयनात्मक प्रजनन (selective breeding) का पहला रूप था, जो पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी का आधार है।
  • किण्वन (Fermentation): सुमेरियों और बेबीलोनियों ने लगभग 6000 ईसा पूर्व में बीयर बनाने के लिए किण्वन प्रक्रिया का उपयोग किया। मिस्रवासियों ने लगभग 4000 ईसा पूर्व में खमीर का उपयोग करके ब्रेड बनाना सीखा। ये प्रक्रियाएं सूक्ष्मजीवों की अनजानी शक्ति का उपयोग थीं।
  • खाद्य संरक्षण: दही, पनीर और सिरका जैसे उत्पादों का विकास भी इसी काल में हुआ, जो भोजन को लंबे समय तक संरक्षित रखने के तरीके थे।

19वीं और 20वीं सदी का आरंभ: वैज्ञानिक आधार (19th and Early 20th Century: The Scientific Foundation)

  • लुई पाश्चर (Louis Pasteur): 1857 में, उन्होंने साबित किया कि किण्वन एक जीवित जीव (यीस्ट) के कारण होता है, न कि एक रासायनिक प्रक्रिया। इसने माइक्रोबायोलॉजी (microbiology) की नींव रखी और जैव प्रौद्योगिकी को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
  • ग्रेगर मेंडल (Gregor Mendel): 1865 में, मेंडल ने मटर के पौधों पर अपने प्रयोगों के माध्यम से आनुवंशिकता (heredity) के नियमों की खोज की, जिन्हें आज हम आनुवंशिकी (genetics) के रूप में जानते हैं।
  • एंटीबायोटिक्स की खोज: 1928 में, अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने पेनिसिलिन की खोज की, जो एक कवक (fungus) द्वारा उत्पादित पहला एंटीबायोटिक था। इसने चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति ला दी और दिखाया कि सूक्ष्मजीव जीवन रक्षक यौगिक भी बना सकते हैं।

आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का उदय (The Rise of Modern Biotechnology)

  • डीएनए की संरचना: 1953 में, जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने डीएनए की डबल हेलिक्स संरचना की खोज की। यह खोज आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के लिए एक मील का पत्थर थी, क्योंकि इसने हमें जीवन के ब्लूप्रिंट को समझने की कुंजी दी।
  • पुनर्योगज डीएनए तकनीक (Recombinant DNA Technology): 1973 में, स्टेनली कोहेन और हर्बर्ट बॉयर ने पहली बार एक जीव के डीएनए को दूसरे जीव के डीएनए में सफलतापूर्वक डाला। इसने जेनेटिक इंजीनियरिंग के युग की शुरुआत की। यह आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।
  • मानव इंसुलिन का उत्पादन: 1982 में, जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग करके बनाए गए मानव इंसुलिन ‘ह्यूमुलिन’ को मधुमेह के इलाज के लिए मंजूरी दी गई। यह जैव प्रौद्योगिकी द्वारा बनाया गया पहला व्यावसायिक स्वास्थ्य उत्पाद था।
  • मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project): 1990 में शुरू हुई और 2003 में पूरी हुई इस परियोजना ने मानव डीएनए में मौजूद सभी जीनों का मानचित्रण किया। इसने बीमारियों को समझने और उनके इलाज के नए रास्ते खोले हैं।

4. जैव प्रौद्योगिकी के रंग: शाखाएं और प्रकार (The Colors of Biotechnology: Branches and Types)

जैव प्रौद्योगिकी एक विशाल क्षेत्र है जिसके अनुप्रयोग विभिन्न उद्योगों में फैले हुए हैं। इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए, वैज्ञानिकों ने इसके विभिन्न अनुप्रयोग क्षेत्रों को रंगों के आधार पर वर्गीकृत किया है। आइए इन “रंगों” या शाखाओं को विस्तार से जानें।

लाल जैव प्रौद्योगिकी (Red Biotechnology) – चिकित्सा और स्वास्थ्य

  • यह शाखा स्वास्थ्य सेवा और चिकित्सा से संबंधित है। इसका उद्देश्य बीमारियों की रोकथाम, निदान और उपचार के लिए नए तरीके विकसित करना है।
  • अनुप्रयोग: नई दवाओं और टीकों का विकास, एंटीबायोटिक्स का उत्पादन, जीन थेरेपी, स्टेम सेल थेरेपी, और डायग्नोस्टिक किट (जैसे गर्भावस्था परीक्षण किट या COVID-19 टेस्ट किट) बनाना। जैव प्रौद्योगिकी की यह शाखा सीधे तौर पर मानव जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

हरित जैव प्रौद्योगिकी (Green Biotechnology) – कृषि

  • यह कृषि प्रक्रियाओं से संबंधित है। इसका लक्ष्य पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक पर्यावरण-अनुकूल समाधान प्रदान करना और फसल उत्पादन को बढ़ाना है।
  • अनुप्रयोग: आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (GM crops) विकसित करना जो कीट-प्रतिरोधी, सूखा-सहिष्णु या अधिक पौष्टिक हों (जैसे बीटी कॉटन, गोल्डन राइस), जैव-कीटनाशक (bio-pesticides), और जैव-उर्वरक (bio-fertilizers) बनाना।

श्वेत या सफेद जैव प्रौद्योगिकी (White Biotechnology) – उद्योग

  • इसे औद्योगिक जैव प्रौद्योगिकी भी कहा जाता है। यह उद्योगों में अधिक कुशल और टिकाऊ प्रक्रियाओं को बनाने के लिए एंजाइम और सूक्ष्मजीवों का उपयोग करती है।
  • अनुप्रयोग: जैव-ईंधन (biofuels) जैसे इथेनॉल और बायोडीजल का उत्पादन, डिटर्जेंट में एंजाइम का उपयोग, जैव-प्लास्टिक (bio-plastics) का निर्माण, और कपड़ा और कागज उद्योगों में प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना।

नीली जैव प्रौद्योगिकी (Blue Biotechnology) – समुद्री और जलीय

  • यह समुद्री और जलीय जीवों के उपयोग से संबंधित है। महासागर एक विशाल जैव विविधता का घर है, और नीली जैव प्रौद्योगिकी इस क्षमता का पता लगाती है।
  • अनुप्रयोग: एक्वाकल्चर (aquaculture) में सुधार, नई दवाओं के लिए समुद्री जीवों की खोज, सौंदर्य प्रसाधनों में समुद्री शैवाल (algae) का उपयोग, और समुद्री स्रोतों से जैव-ईंधन का उत्पादन।

ग्रे जैव प्रौद्योगिकी (Grey Biotechnology) – पर्यावरण

  • यह शाखा पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों को बहाल करना और बनाए रखना है।
  • अनुप्रयोग: जैव-उपचार (Bioremediation), जिसमें प्रदूषित मिट्टी या पानी को साफ करने के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है, अपशिष्ट जल उपचार, और औद्योगिक कचरे का प्रबंधन।

पीली जैव प्रौद्योगिकी (Yellow Biotechnology) – खाद्य

  • यह खाद्य उत्पादन से संबंधित है, विशेष रूप से किण्वन के माध्यम से। यह पारंपरिक जैव प्रौद्योगिकी से निकटता से जुड़ी हुई है।
  • अनुप्रयोग: पनीर, दही, बीयर, वाइन और ब्रेड का उत्पादन। इसके अलावा, पोषण मूल्य बढ़ाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण में एंजाइमों का उपयोग भी इसी शाखा के अंतर्गत आता है।

गोल्ड जैव प्रौद्योगिकी (Gold Biotechnology) – जैव सूचना विज्ञान

  • यह जैव प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी का मेल है। इसमें जैविक डेटा (biological data) का विश्लेषण करने के लिए कंप्यूटर विज्ञान, सांख्यिकी और गणित का उपयोग किया जाता है।
  • अनुप्रयोग: डीएनए अनुक्रमण (DNA sequencing) से प्राप्त विशाल डेटा का प्रबंधन और विश्लेषण, नई दवाओं को डिजाइन करना, और विभिन्न प्रजातियों के बीच विकासवादी संबंधों को समझना।

5. चिकित्सा में जैव प्रौद्योगिकी का चमत्कार (Miracles of Biotechnology in Medicine)

लाल जैव प्रौद्योगिकी ने स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में एक क्रांति ला दी है, जिससे अनगिनत लोगों के जीवन में सुधार हुआ है। इसने बीमारियों के इलाज और निदान के तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया है। आइए इसके कुछ प्रमुख योगदानों पर एक नजर डालते हैं।

दवा उत्पादन (Pharmaceutical Production)

  • इंसुलिन: जैसा कि हमने परिचय में देखा, जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग करके बैक्टीरिया में मानव इंसुलिन जीन डालकर बड़े पैमाने पर शुद्ध इंसुलिन का उत्पादन किया जाता है। इससे पहले, सूअरों और गायों से इंसुलिन निकाला जाता था, जो महंगा और कम प्रभावी था।
  • टीके (Vaccines): पारंपरिक टीकों में कमजोर या मृत रोगजनकों का उपयोग किया जाता था। आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी हमें केवल रोगज़नक़ के एक विशिष्ट प्रोटीन (एंटीजन) का उत्पादन करने की अनुमति देती है, जिससे टीके अधिक सुरक्षित और प्रभावी हो जाते हैं। COVID-19 के खिलाफ mRNA टीके इसका एक बेहतरीन उदाहरण हैं।
  • मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (Monoclonal Antibodies): ये प्रयोगशाला में बनाई गई विशेष प्रोटीन हैं जो शरीर में विशिष्ट लक्ष्यों, जैसे कि कैंसर कोशिकाओं या वायरस, को पहचानकर उन पर हमला कर सकती हैं। इनका उपयोग कैंसर, गठिया और अन्य बीमारियों के इलाज में किया जाता है।

जीन थेरेपी (Gene Therapy)

  • जीन थेरेपी एक क्रांतिकारी तकनीक है जिसका उद्देश्य आनुवंशिक विकारों को उनके मूल कारण – दोषपूर्ण जीन (defective gene) – पर ठीक करना है।
  • इसमें एक मरीज की कोशिकाओं में एक स्वस्थ जीन की एक प्रति डाली जाती है ताकि वह दोषपूर्ण जीन के कार्य को संभाल सके।
  • इसका उपयोग सिस्टिक फाइब्रोसिस, हीमोफिलिया और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज के लिए किया जा रहा है। हालांकि यह अभी भी एक प्रयोगात्मक अवस्था में है, लेकिन यह चिकित्सा के भविष्य के लिए अपार संभावनाएं रखती है।

नैदानिक उपकरण (Diagnostic Tools)

  • जैव प्रौद्योगिकी ने बीमारियों का जल्दी और सटीक रूप से पता लगाना संभव बना दिया है।
  • ELISA (एंजाइम-लिंक्ड इम्यूनोसॉर्बेंट एसे): यह एक सामान्य परीक्षण है जिसका उपयोग रक्त में एंटीबॉडी या एंटीजन का पता लगाने के लिए किया जाता है, जैसे कि एचआईवी परीक्षण में।
  • PCR (पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन): यह तकनीक डीएनए की बहुत छोटी मात्रा को बढ़ाकर उसकी पहचान करना संभव बनाती है। इसका उपयोग आनुवंशिक रोगों, वायरल संक्रमणों (जैसे COVID-19) का पता लगाने और फोरेंसिक विज्ञान में किया जाता है।

सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Pros and Cons)

हर शक्तिशाली तकनीक की तरह, चिकित्सा जैव प्रौद्योगिकी के भी दो पहलू हैं।

  • सकारात्मक पहलू (Pros):
    • लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियों के लिए नए उपचार प्रदान करता है।
    • दवाओं को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाता है।
    • बीमारियों का शीघ्र निदान संभव बनाता है, जिससे उपचार की सफलता दर बढ़ जाती है।
    • व्यक्तिगत चिकित्सा (personalized medicine) का मार्ग प्रशस्त करता है, जहां उपचार किसी व्यक्ति के आनुवंशिक मेकअप के अनुरूप होता है।
  • नकारात्मक पहलू (Cons):
    • उच्च लागत: जैव प्रौद्योगिकी उपचार और दवाएं अक्सर बहुत महंगी होती हैं, जिससे वे आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाती हैं।
    • नैतिक चिंताएं: जीन थेरेपी और स्टेम सेल अनुसंधान जैसी तकनीकें “डिजाइनर बेबी” और मानव क्लोनिंग जैसी नैतिक बहस को जन्म देती हैं।
    • अज्ञात दीर्घकालिक प्रभाव: कुछ नई तकनीकों, जैसे जीन थेरेपी, के दीर्घकालिक दुष्प्रभाव अभी भी पूरी तरह से ज्ञात नहीं हैं।

6. कृषि में क्रांति: हरित जैव प्रौद्योगिकी (Revolution in Agriculture: Green Biotechnology)

बढ़ती वैश्विक आबादी के लिए भोजन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। हरित जैव प्रौद्योगिकी इस चुनौती का सामना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसका उद्देश्य फसलों को बेहतर बनाना, पैदावार बढ़ाना और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाना है।

आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें (Genetically Modified – GM Crops)

  • जीएम फसलें वे फसलें हैं जिनके डीएनए में जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से एक या एक से अधिक नए जीन डाले गए हैं ताकि उनमें वांछित गुण पैदा किए जा सकें।
  • बीटी फसलें (Bt Crops): इनमें बेसिलस थुरिंजिएन्सिस (Bacillus thuringiensis) नामक बैक्टीरिया से एक जीन डाला जाता है। यह जीन एक प्रोटीन बनाता है जो कुछ कीड़ों के लिए विषैला होता है लेकिन मनुष्यों और अन्य जानवरों के लिए हानिरहित है। इससे कीटनाशकों की आवश्यकता कम हो जाती है। भारत में बीटी कपास (Bt Cotton) इसका एक सफल उदाहरण है।
  • हर्बिसाइड-टॉलरेंट फसलें (Herbicide-Tolerant Crops): ये फसलें कुछ शाकनाशियों (herbicides) के प्रति प्रतिरोधी होती हैं। इससे किसानों को खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, बिना मुख्य फसल को नुकसान पहुंचाए।
  • पोषक रूप से संवर्धित फसलें (Nutritionally Enhanced Crops): इन फसलों को अतिरिक्त विटामिन या खनिज प्रदान करने के लिए संशोधित किया जाता है। “गोल्डन राइस” इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जिसे विटामिन ए की कमी से लड़ने के लिए बनाया गया है।

पादप ऊतक संवर्धन (Plant Tissue Culture)

  • यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें पौधे के एक छोटे से हिस्से (जैसे पत्ती या तना) से प्रयोगशाला में नियंत्रित परिस्थितियों में एक पूरा पौधा उगाया जाता है।
  • लाभ:
    • रोग मुक्त पौधे तैयार करना।
    • कम समय में बड़ी संख्या में समान पौधे उगाना (क्लोनिंग)।
    • उन पौधों का संरक्षण करना जो विलुप्त होने के कगार पर हैं।

जैव-उर्वरक और जैव-कीटनाशक (Bio-fertilizers and Bio-pesticides)

  • जैव-उर्वरक: ये सूक्ष्मजीव होते हैं जो मिट्टी की उर्वरता (soil fertility) को बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए, राइजोबियम बैक्टीरिया पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन को स्थिर करता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
  • जैव-कीटनाशक: ये प्राकृतिक स्रोतों जैसे बैक्टीरिया, कवक या पौधों से प्राप्त कीटनाशक होते हैं। ये रासायनिक कीटनाशकों की तुलना में पर्यावरण के लिए कम हानिकारक होते हैं।

सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Pros and Cons)

कृषि जैव प्रौद्योगिकी एक विवादास्पद विषय रहा है, जिसके मजबूत समर्थक और आलोचक दोनों हैं।

  • सकारात्मक पहलू (Pros):
    • बढ़ी हुई पैदावार: जीएम फसलें कीटों, बीमारियों और पर्यावरणीय तनावों का बेहतर ढंग से सामना कर सकती हैं, जिससे खाद्य उत्पादन बढ़ता है।
    • कम कीटनाशक उपयोग: बीटी फसलों जैसी तकनीकें रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करती हैं, जिससे पर्यावरण और किसानों के स्वास्थ्य को लाभ होता है।
    • बेहतर पोषण: गोल्डन राइस जैसी फसलें विकासशील देशों में कुपोषण से लड़ने में मदद कर सकती हैं।
    • खाद्य सुरक्षा (Food Security): यह बढ़ती आबादी के लिए भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है।
  • नकारात्मक पहलू (Cons):
    • पर्यावरणीय जोखिम: यह चिंता है कि जीएम फसलें गैर-लक्षित कीड़ों को नुकसान पहुंचा सकती हैं या खरपतवारों में जीन स्थानांतरित कर सकती हैं, जिससे “सुपरवीड्स” बन सकते हैं।
    • मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव: हालांकि व्यापक शोध ने जीएम खाद्य पदार्थों को सुरक्षित पाया है, फिर भी कुछ लोगों को उनके दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में चिंता है।
    • आर्थिक निर्भरता: जीएम बीजों का पेटेंट अक्सर बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास होता है, जिससे छोटे किसान उन पर निर्भर हो सकते हैं।
    • जैव विविधता को खतरा: कुछ फसलों पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने से स्थानीय और पारंपरिक किस्मों को नुकसान हो सकता है, जिससे जैव विविधता (biodiversity) कम हो सकती है।

7. उद्योग और पर्यावरण में जैव प्रौद्योगिकी की भूमिका (Role of Biotechnology in Industry and Environment)

जैव प्रौद्योगिकी केवल स्वास्थ्य और कृषि तक ही सीमित नहीं है। श्वेत (औद्योगिक) और ग्रे (पर्यावरणीय) जैव प्रौद्योगिकी हमारे उद्योगों को स्वच्छ और अधिक टिकाऊ बनाने तथा पर्यावरण की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

औद्योगिक अनुप्रयोग (श्वेत जैव प्रौद्योगिकी) (Industrial Applications – White Biotechnology)

  • जैव-ईंधन (Biofuels): यह जीवाश्म ईंधन (fossil fuels) का एक नवीकरणीय विकल्प है। इथेनॉल (गन्ने या मक्के से) और बायोडीजल (वनस्पति तेलों से) का उत्पादन करने के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है। यह ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है।
  • एंजाइम (Enzymes): एंजाइम जैविक उत्प्रेरक (biological catalysts) हैं जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं को तेज करते हैं।
    • डिटर्जेंट: दाग हटाने के लिए प्रोटीज और लाइपेस जैसे एंजाइम का उपयोग किया जाता है।
    • खाद्य प्रसंस्करण: पनीर बनाने, फलों के रस को साफ करने और ब्रेड को नरम बनाने में एंजाइम का उपयोग होता है।
    • कपड़ा उद्योग: कपड़ों को नरम करने (स्टोन-वॉशिंग इफेक्ट) के लिए एंजाइम का उपयोग किया जाता है, जो कठोर रासायनिक प्रक्रियाओं का एक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।
  • जैव-प्लास्टिक (Bioplastics): ये प्लास्टिक पौधे-आधारित सामग्री जैसे मकई स्टार्च या गन्ने से बनाए जाते हैं। वे पारंपरिक प्लास्टिक के विपरीत, बायोडिग्रेडेबल (biodegradable) होते हैं, जो प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को कम करने में मदद कर सकते हैं।

पर्यावरणीय अनुप्रयोग (ग्रे जैव प्रौद्योगिकी) (Environmental Applications – Grey Biotechnology)

  • जैव-उपचार (Bioremediation): यह सबसे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय अनुप्रयोगों में से एक है। इसमें खतरनाक प्रदूषकों को हानिरहित पदार्थों में तोड़ने के लिए सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया और कवक) का उपयोग किया जाता है।
    • इसका उपयोग तेल रिसाव को साफ करने, औद्योगिक कचरे से दूषित मिट्टी को साफ करने और भूजल से कीटनाशकों को हटाने के लिए किया जा सकता है।
  • अपशिष्ट जल उपचार (Wastewater Treatment): सीवेज उपचार संयंत्र पानी से कार्बनिक पदार्थों और हानिकारक रसायनों को हटाने के लिए सूक्ष्मजीवों की एक विशाल आबादी पर निर्भर करते हैं, जिससे पानी को नदियों और झीलों में वापस छोड़ने से पहले साफ किया जा सके।
  • बायोमाइनिंग (Biomining): इसमें अयस्कों (ores) से धातुओं (जैसे तांबा, सोना) को निकालने के लिए बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता है। यह पारंपरिक खनन विधियों की तुलना में कम प्रदूषणकारी और अधिक ऊर्जा-कुशल है। यह तकनीक सतत विकास (sustainable development) के लिए महत्वपूर्ण है।

8. जैव प्रौद्योगिकी की प्रमुख तकनीकें (Key Techniques of Biotechnology)

आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की शक्ति कुछ मूलभूत तकनीकों में निहित है जो हमें जीवन के आणविक स्तर (molecular level) पर काम करने की अनुमति देती हैं। इन तकनीकों को समझना जैव प्रौद्योगिकी के चमत्कारों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी (Recombinant DNA Technology)

  • इसे आमतौर पर जेनेटिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) के रूप में जाना जाता है। यह आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का दिल है।
  • प्रक्रिया:
    1. पहचान और विलगन: सबसे पहले, वांछित जीन (जैसे मानव इंसुलिन जीन) वाले डीएनए की पहचान की जाती है और उसे कोशिका से बाहर निकाला जाता है।
    2. काटना: ‘आणविक कैंची’ कहे जाने वाले विशेष एंजाइमों, जिन्हें रेस्ट्रिक्शन एंजाइम (Restriction Enzymes) कहा जाता है, का उपयोग करके डीएनए से उस विशिष्ट जीन को काटा जाता है।
    3. सम्मिलन: उसी रेस्ट्रिक्शन एंजाइम का उपयोग करके एक वाहक (vector) के डीएनए को काटा जाता है। वाहक आमतौर पर एक प्लास्मिड (plasmid) होता है, जो बैक्टीरिया में पाया जाने वाला एक छोटा, गोलाकार डीएनए अणु है।
    4. जोड़ना: वांछित जीन को प्लास्मिड डीएनए में ‘आणविक गोंद’ कहे जाने वाले एक अन्य एंजाइम, डीएनए लाइगेज (DNA Ligase), का उपयोग करके जोड़ा जाता है। अब इस नए, संयुक्त डीएनए को पुनर्योगज डीएनए (Recombinant DNA) कहा जाता है।
    5. स्थानांतरण: इस पुनर्योगज प्लास्मिड को एक मेजबान जीव (host organism), आमतौर पर एक बैक्टीरिया (जैसे ई. कोलाई) में डाला जाता है।
    6. प्रजनन और उत्पादन: जब यह मेजबान बैक्टीरिया तेजी से प्रजनन करता है, तो वह पुनर्योगज डीएनए की कई प्रतियां बनाता है और साथ ही उस नए जीन द्वारा कोडित प्रोटीन (जैसे इंसुलिन) का भी उत्पादन करता है।
  • यह तकनीक जैव प्रौद्योगिकी के अधिकांश उत्पादों, जैसे इंसुलिन, टीके और जीएम फसलों का आधार है।

पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (Polymerase Chain Reaction – PCR)

  • PCR एक क्रांतिकारी तकनीक है जो एक प्रयोगशाला में डीएनए के एक विशिष्ट खंड की लाखों से अरबों प्रतियां बनाने की अनुमति देती है। इसे “डीएनए फोटोकॉपी मशीन” भी कहा जा सकता है।
  • उपयोग:
    • चिकित्सा निदान: यह रक्त या ऊतक के एक छोटे से नमूने में वायरस या बैक्टीरिया के डीएनए का पता लगा सकती है, जैसा कि COVID-19 परीक्षण में होता है।
    • फोरेंसिक विज्ञान: अपराध स्थल पर मिले डीएनए के एक छोटे से नमूने (जैसे बाल या रक्त की बूंद) को विश्लेषण के लिए पर्याप्त मात्रा में बढ़ाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।
    • आनुवंशिक अनुसंधान: यह वैज्ञानिकों को जीनों का अध्ययन करने और आनुवंशिक रोगों का निदान करने में मदद करती है।

CRISPR-Cas9 जीन एडिटिंग (CRISPR-Cas9 Gene Editing)

  • CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats) एक शक्तिशाली और सटीक जीन संपादन (gene editing) उपकरण है।
  • इसे डीएनए के लिए ‘खोजें और बदलें’ (find and replace) फ़ंक्शन के रूप में सोचें। यह वैज्ञानिकों को जीनोम में एक बहुत ही विशिष्ट स्थान खोजने और वहां डीएनए को काटने, हटाने या बदलने की अनुमति देता है।
  • संभावित अनुप्रयोग:
    • आनुवंशिक रोगों जैसे सिकल सेल एनीमिया या हंटिंगटन रोग को ठीक करना।
    • अधिक रोग-प्रतिरोधी और पौष्टिक फसलें बनाना।
    • कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा कोशिकाओं को संशोधित करना।
  • यह तकनीक अभी भी नई है और इसके उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण नैतिक चिंताएं हैं, लेकिन इसमें चिकित्सा और कृषि में क्रांति लाने की अपार क्षमता है।

9. भारत में जैव प्रौद्योगिकी का परिदृश्य (The Scenario of Biotechnology in India)

भारत ने जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी के रूप में अपनी पहचान बनाई है। सरकार के समर्थन, एक मजबूत दवा उद्योग और कुशल वैज्ञानिक कार्यबल के साथ, भारत इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है।

सरकारी पहल और नीतियां (Government Initiatives and Policies)

  • जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Biotechnology – DBT): 1986 में स्थापित, DBT भारत में जैव प्रौद्योगिकी के विकास और प्रचार के लिए नोडल एजेंसी है। यह अनुसंधान को वित्तपोषित करता है, बुनियादी ढांचे का निर्माण करता है और नीतियों को तैयार करता है। अधिक जानकारी के लिए, आप उनकी आधिकारिक वेबसाइट dbtindia.gov.in पर जा सकते हैं।
  • जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC): यह एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है जिसे जैव प्रौद्योगिकी स्टार्टअप और एसएमई को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया है, जो नवाचार और उद्यमिता को प्रोत्साहित करता है।
  • राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी विकास रणनीति: सरकार ने समय-समय पर रणनीतियां शुरू की हैं जिनका उद्देश्य भारत को एक वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी हब बनाना है।

प्रमुख क्षेत्र और उपलब्धियां (Key Sectors and Achievements)

  • वैक्सीन उत्पादन: भारत को “दुनिया की फार्मेसी” के रूप में जाना जाता है, खासकर वैक्सीन उत्पादन में। पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता है। भारत बायोटेक द्वारा विकसित कोवैक्सिन (Covaxin) COVID-19 महामारी के दौरान भारत की जैव प्रौद्योगिकी क्षमता का एक प्रमुख उदाहरण है।
  • कृषि: बीटी कपास की सफलता ने भारत में कृषि जैव प्रौद्योगिकी की क्षमता को प्रदर्शित किया है। इसने कपास उत्पादन में क्रांति ला दी और लाखों किसानों को लाभ पहुंचाया।
  • बायोफार्मास्यूटिकल्स: भारत जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर (जैविक दवाओं के जेनेरिक संस्करण) के उत्पादन में एक अग्रणी देश है, जिससे दुनिया भर में लाखों लोगों के लिए जीवन रक्षक दवाएं सस्ती हो गई हैं।
  • अनुसंधान और विकास: भारत में कई विश्व स्तरीय अनुसंधान संस्थान हैं, जैसे कि नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज (NCBS), सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB), और विभिन्न IITs और IISc, जो अत्याधुनिक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में लगे हुए हैं।

10. जैव प्रौद्योगिकी में करियर के अवसर (Career Opportunities in Biotechnology)

जैव प्रौद्योगिकी एक तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है जो विज्ञान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए विविध और पुरस्कृत करियर के अवसर प्रदान करता है। यदि आप समस्याओं को सुलझाने, अनुसंधान करने और दुनिया पर सकारात्मक प्रभाव डालने का शौक रखते हैं, तो यह क्षेत्र आपके लिए हो सकता है।

अनुसंधान और विकास (Research and Development – R&D)

  • यह जैव प्रौद्योगिकी का मूल है। R&D वैज्ञानिक नई दवाओं, टीकों, जीएम फसलों और नैदानिक उपकरणों को विकसित करने के लिए प्रयोगशालाओं में काम करते हैं।
  • योग्यता: आमतौर पर पीएचडी की डिग्री की आवश्यकता होती है।
  • नियोक्ता: विश्वविद्यालय, सरकारी अनुसंधान संस्थान (जैसे CSIR, ICMR), और निजी कंपनियों के R&D विभाग।

दवा और स्वास्थ्य सेवा उद्योग (Pharmaceutical and Healthcare Industry)

  • यह जैव प्रौद्योगिकी स्नातकों के लिए सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है।
  • भूमिकाएँ: उत्पादन और गुणवत्ता नियंत्रण, नैदानिक अनुसंधान (clinical research), नियामक मामले (regulatory affairs), और विपणन।
  • कंपनियाँ: Biocon, Dr. Reddy’s, Cipla, Serum Institute of India जैसी बड़ी भारतीय और बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियाँ।

कृषि उद्योग (Agriculture Industry)

  • यह क्षेत्र उन लोगों के लिए अवसर प्रदान करता है जो खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि में योगदान देना चाहते हैं।
  • भूमिकाएँ: पादप प्रजनक (plant breeder), आनुवंशिक इंजीनियर, और जैव-उर्वरक और जैव-कीटनाशक विकसित करने वाले वैज्ञानिक।
  • कंपनियाँ: Mahyco, Rallis India, और अन्य बीज और एग्रोकेमिकल कंपनियाँ।

जैव सूचना विज्ञान (Bioinformatics)

  • यह जीव विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान का एक अंतःविषय क्षेत्र है।
  • भूमिकाएँ: बायोइनफॉरमैटिक्स विशेषज्ञ जैविक डेटा (जैसे डीएनए अनुक्रम) का विश्लेषण करने, सॉफ्टवेयर उपकरण विकसित करने और कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग करने के लिए कंप्यूटर का उपयोग करते हैं।
  • नियोक्ता: अनुसंधान संस्थान, दवा कंपनियाँ, और विशेष जैव सूचना विज्ञान सेवा कंपनियाँ। यह जैव प्रौद्योगिकी में सबसे तेजी से बढ़ते करियर क्षेत्रों में से एक है।

11. नैतिक और सामाजिक चिंताएं (Ethical and Social Concerns)

जैव प्रौद्योगिकी की अपार शक्ति अपने साथ गंभीर नैतिक, कानूनी और सामाजिक मुद्दे (Ethical, Legal, and Social Issues – ELSI) भी लाती है। इन पर विचार-विमर्श करना महत्वपूर्ण है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इस तकनीक का उपयोग जिम्मेदारी से किया जाए।

नैतिक बहस (Ethical Debates)

  • “ईश्वर की भूमिका निभाना”: जेनेटिक इंजीनियरिंग और क्लोनिंग जैसी तकनीकें जीवन के मूल बिल्डिंग ब्लॉक्स के साथ छेड़छाड़ करती हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह प्रकृति के काम में हस्तक्षेप करने के बराबर है और नैतिक रूप से गलत है।
  • डिजाइनर बेबी (Designer Babies): भविष्य में, जीन एडिटिंग का उपयोग न केवल बीमारियों को ठीक करने के लिए, बल्कि बच्चों में बुद्धिमत्ता या शारीरिक शक्ति जैसे वांछनीय लक्षणों को बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। यह एक “आनुवंशिक रूप से समृद्ध” और “आनुवंशिक रूप से गरीब” के बीच एक सामाजिक विभाजन पैदा कर सकता है।
  • मानव क्लोनिंग: मानव क्लोनिंग की संभावना गंभीर नैतिक प्रश्न खड़े करती है। एक क्लोन व्यक्ति की पहचान और अधिकारों के बारे में क्या? यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां अधिकांश देश सख्त नियमों का पालन करते हैं।
  • जानवरों का उपयोग: जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान में जानवरों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है, जो पशु अधिकारों और कल्याण के बारे में चिंताएं पैदा करता है।

सामाजिक और आर्थिक प्रभाव (Social and Economic Impacts)

  • पहुंच और सामर्थ्य: क्या महंगी जैव प्रौद्योगिकी उपचार और दवाएं केवल अमीरों के लिए उपलब्ध होंगी? यह स्वास्थ्य सेवा में मौजूदा असमानताओं को और बढ़ा सकता है। जैव प्रौद्योगिकी को सभी के लिए सुलभ बनाना एक बड़ी सामाजिक चुनौती है।
  • किसानों पर प्रभाव: जीएम बीजों के पेटेंट बड़ी कंपनियों के पास होने से छोटे किसान उन पर निर्भर हो सकते हैं, जिससे उनकी सौदेबाजी की शक्ति कम हो सकती है और कर्ज बढ़ सकता है।
  • लेबलिंग और उपभोक्ता पसंद: क्या जीएम खाद्य पदार्थों को लेबल किया जाना चाहिए ताकि उपभोक्ता एक सूचित विकल्प चुन सकें? यह दुनिया भर में एक गरमागरम बहस का विषय है।

कानूनी और नियामक मुद्दे (Legal and Regulatory Issues)

  • बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights): क्या जीनों और जीवित जीवों का पेटेंट कराया जा सकता है? यह एक जटिल कानूनी सवाल है। जबकि कंपनियां अपने निवेश की रक्षा के लिए पेटेंट चाहती हैं, आलोचकों का तर्क है कि जीवन के रूपों का निजीकरण नहीं किया जाना चाहिए।
  • जैव सुरक्षा (Biosafety): आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (Genetically Modified Organisms – GMOs) को पर्यावरण में छोड़ने के संभावित जोखिमों का प्रबंधन कैसे किया जाए? इसके लिए सख्त सरकारी नियमों और निगरानी की आवश्यकता है। कार्टाजेना प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जो जीएमओ की सुरक्षित हैंडलिंग और परिवहन को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है।

12. निष्कर्ष: जैव प्रौद्योगिकी का भविष्य (Conclusion: The Future of Biotechnology)

हमने जैव प्रौद्योगिकी के रहस्यमयी दुनिया में एक लंबी और ज्ञानवर्धक यात्रा की है। पारंपरिक किण्वन प्रक्रियाओं से लेकर अत्याधुनिक जीन एडिटिंग तक, इस क्षेत्र ने मानव जीवन को बेहतर बनाने में एक लंबा सफर तय किया है। यह स्पष्ट है कि जैव प्रौद्योगिकी सिर्फ विज्ञान की एक शाखा नहीं है, बल्कि यह एक शक्तिशाली शक्ति है जो हमारे भविष्य को आकार दे रही है।

स्वास्थ्य सेवा में, हम व्यक्तिगत चिकित्सा के एक नए युग की दहलीज पर खड़े हैं, जहां उपचार हमारे अद्वितीय आनुवंशिक मेकअप के अनुरूप होंगे। कृषि में, जैव प्रौद्योगिकी जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी की दोहरी चुनौतियों का सामना करने के लिए अधिक लचीला और पौष्टिक फसलें बनाने का वादा करती है। उद्योग और पर्यावरण में, यह हमें एक स्वच्छ, हरित और अधिक टिकाऊ भविष्य की ओर ले जा सकती है।

हालांकि, इस अपार क्षमता के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है। हमें नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय चिंताओं को दूर करने के लिए सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा। सार्वजनिक संवाद, मजबूत नियमन और एक जिम्मेदार दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे कि जैव प्रौद्योगिकी का लाभ सभी को मिले। जैव प्रौद्योगिकी का रहस्य इसकी तकनीकों में नहीं, बल्कि मानव कल्याण के लिए इसका बुद्धिमानी से उपयोग करने की हमारी क्षमता में निहित है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो हमेशा विकसित होता रहेगा, नई खोजों और संभावनाओं के साथ हमें आश्चर्यचकित करता रहेगा।

13. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: जैव प्रौद्योगिकी और आनुवंशिक इंजीनियरिंग में क्या अंतर है? (What is the difference between Biotechnology and Genetic Engineering?)

उत्तर: जैव प्रौद्योगिकी एक व्यापक शब्द है जिसमें जीवित जीवों या उनके घटकों का उपयोग करने वाली कोई भी तकनीक शामिल है। आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) या पुनर्योगज डीएनए प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी का एक विशिष्ट उपकरण या तकनीक है जिसमें एक जीव के डीएनए को सीधे संशोधित किया जाता है। संक्षेप में, आनुवंशिक इंजीनियरिंग आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी का एक हिस्सा है।

प्रश्न 2: क्या जीएम (Genetically Modified) खाद्य पदार्थ खाने के लिए सुरक्षित हैं? (Are GM foods safe to eat?)

उत्तर: दुनिया भर के प्रमुख वैज्ञानिक संगठनों, जैसे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, के अनुसार, बाजार में उपलब्ध जीएम खाद्य पदार्थ सुरक्षित हैं और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की तरह ही स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। प्रत्येक जीएम उत्पाद को बाजार में आने से पहले कठोर सुरक्षा परीक्षण से गुजरना पड़ता है।

प्रश्न 3: भारत में जैव प्रौद्योगिकी का अध्ययन करने के लिए शीर्ष संस्थान कौन से हैं? (What are the top institutes to study Biotechnology in India?)

उत्तर: भारत में कई उत्कृष्ट संस्थान हैं जो जैव प्रौद्योगिकी में पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं। कुछ शीर्ष नामों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs – दिल्ली, खड़गपुर, मद्रास), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बैंगलोर, राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) करनाल, और दिल्ली विश्वविद्यालय शामिल हैं।

प्रश्न 4: क्लोनिंग क्या है और क्या यह मनुष्यों पर किया जा सकता है? (What is cloning and can it be done on humans?)

उत्तर: क्लोनिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक जीव या कोशिका की आनुवंशिक रूप से समान प्रतिलिपि बनाई जाती है। 1996 में डॉली भेड़ पहला स्तनपायी क्लोन था। तकनीकी रूप से मानव क्लोनिंग संभव हो सकती है, लेकिन गंभीर नैतिक, सामाजिक और सुरक्षा चिंताओं के कारण दुनिया के लगभग सभी देशों में इस पर प्रतिबंध लगा हुआ है। जैव प्रौद्योगिकी में, चिकित्सीय क्लोनिंग (Therapeutic Cloning) पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है, जिसका उद्देश्य बीमारियों के इलाज के लिए स्टेम सेल बनाना है, न कि एक पूरा इंसान।

प्रश्न 5: जैव प्रौद्योगिकी जलवायु परिवर्तन से लड़ने में कैसे मदद कर सकती है? (How can biotechnology help fight climate change?)

उत्तर: जैव प्रौद्योगिकी कई तरीकों से जलवायु परिवर्तन से निपटने में योगदान दे सकती है। यह जैव-ईंधन जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को विकसित करने में मदद करती है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हैं। यह सूखा-सहिष्णु फसलों का विकास कर सकती है जो बदलते मौसम के पैटर्न के अनुकूल हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, औद्योगिक प्रक्रियाओं में एंजाइमों का उपयोग ऊर्जा की खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम कर सकता है।

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