प्रमुख शक्तियाँ और भारत (Major Powers & India)
प्रमुख शक्तियाँ और भारत (Major Powers & India)

प्रमुख शक्तियाँ और भारत (Major Powers & India)

विषय-सूची (Table of Contents)

परिचय (Introduction)

कल्पना कीजिए कि आप एक बड़े अंतरराष्ट्रीय स्कूल के खेल के मैदान में खड़े हैं। कुछ छात्र बहुत मजबूत हैं, उनके पास सबसे अच्छे खेल के उपकरण हैं, और वे तय करते हैं कि कौन सा खेल खेला जाएगा। बाकी छात्र या तो उनके साथ जुड़ना चाहते हैं या उनसे बचकर रहते हैं। वैश्विक राजनीति का मंच भी कुछ ऐसा ही है, जहाँ कुछ देश अपनी आर्थिक, सैन्य और सांस्कृतिक ताकत के कारण नियम तय करते हैं। इन्हीं देशों को हम प्रमुख शक्तियाँ (Major Powers) कहते हैं। ये वो देश हैं जिनकी नीतियां न केवल उनकी अपनी सीमाओं को प्रभावित करती हैं, बल्कि पूरी दुनिया की दिशा तय करती हैं। भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, इन प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को बहुत सावधानी से संतुलित करता है।

यह समझना कि ये प्रमुख शक्तियाँ कौन हैं और भारत के साथ उनके रिश्ते कैसे हैं, आज के वैश्विक परिदृश्य को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। चाहे वह अमेरिका के साथ बढ़ती दोस्ती हो, चीन के साथ तनावपूर्ण पड़ोसी रिश्ता हो, या रूस के साथ ऐतिहासिक संबंध, हर समीकरण भारत के भविष्य और दुनिया में उसकी जगह को आकार देता है। इस लेख में, हम गहराई से जानेंगे कि प्रमुख शक्तियाँ क्या होती हैं, दुनिया की मुख्य प्रमुख शक्तियाँ कौन-कौन सी हैं, और भारत इन शक्तिशाली देशों के साथ अपने जटिल संबंधों को कैसे नेविगेट कर रहा है। यह यात्रा आपको अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में एक स्पष्ट और ज्ञानवर्धक दृष्टिकोण प्रदान करेगी।

1. प्रमुख शक्तियाँ क्या हैं? (What are Major Powers?)

परिभाषा और मानदंड (Definition and Criteria)

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, “प्रमुख शक्ति” एक ऐसा संप्रभु राष्ट्र है जिसे वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने की क्षमता के लिए पहचाना जाता है। यह प्रभाव केवल सैन्य ताकत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई कारकों का एक संयोजन है। किसी देश को प्रमुख शक्ति का दर्जा दिलाने वाले मुख्य मानदंड निम्नलिखित हैं:

  • आर्थिक शक्ति (Economic Power): एक बड़ी और स्थिर अर्थव्यवस्था, उच्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP), महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापार हिस्सेदारी और मजबूत वित्तीय बाजार किसी भी देश को एक प्रमुख शक्ति बनाते हैं। आर्थिक रूप से शक्तिशाली देश अन्य देशों को ऋण, सहायता और निवेश के माध्यम से प्रभावित कर सकते हैं।
  • सैन्य शक्ति (Military Power): एक आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत और बड़ी सेना, जिसमें परमाणु हथियार (nuclear weapons), एक मजबूत नौसेना और वायु सेना शामिल है, एक देश की शक्ति का एक स्पष्ट प्रतीक है। सैन्य ताकत देश को अपनी रक्षा करने और अपने हितों को प्रोजेक्ट करने की क्षमता देती है।
  • राजनीतिक प्रभाव (Political Influence): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में स्थायी सदस्यता, एक मजबूत राजनयिक कोर, और वैश्विक मुद्दों पर एजेंडा तय करने की क्षमता राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती है। ये प्रमुख शक्तियाँ अक्सर वैश्विक नियमों और संधियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • सांस्कृतिक प्रभाव (Cultural Influence): इसे ‘सॉफ्ट पावर’ (soft power) भी कहा जाता है। किसी देश की संस्कृति, मूल्य, भाषा, शिक्षा प्रणाली और मीडिया का वैश्विक आकर्षण भी उसे एक प्रमुख शक्ति बनाता है। हॉलीवुड फिल्में, अमेरिकी विश्वविद्यालय, और चीनी कन्फ्यूशियस संस्थान इसके उदाहरण हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (Historical Perspective)

प्रमुख शक्तियों की सूची कभी भी स्थिर नहीं रही है। इतिहास इस बात का गवाह है कि समय के साथ शक्तियों का उदय और पतन होता रहा है।

  • 19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश साम्राज्य को दुनिया की सबसे बड़ी प्रमुख शक्ति माना जाता था, जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। इसके साथ ही फ्रांस, ऑस्ट्रिया-हंगरी साम्राज्य और रूसी साम्राज्य भी प्रमुख खिलाड़ी थे।
  • दो विश्व युद्धों ने यूरोपीय शक्तियों को कमजोर कर दिया और दो नई महाशक्तियों को जन्म दिया: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR)। शीत युद्ध (Cold War) का दौर इन दो प्रमुख शक्तियों के बीच वैचारिक, राजनीतिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा का काल था।
  • 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद, दुनिया एकध्रुवीय (unipolar) हो गई, जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति था। लेकिन 21वीं सदी में, चीन के अभूतपूर्व आर्थिक उदय ने इस समीकरण को बदल दिया है, और दुनिया अब एक बहुध्रुवीय (multipolar) व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जिसमें कई प्रमुख शक्तियाँ हैं।

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में प्रमुख शक्तियाँ (Major Powers in the Current Global Order)

आज की दुनिया में कई देश प्रमुख शक्ति के दर्जे का दावा करते हैं, लेकिन कुछ को निर्विवाद रूप से इस श्रेणी में रखा जाता है। ये देश वैश्विक घटनाओं पर सबसे अधिक प्रभाव डालते हैं।

  • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): अपनी विशाल अर्थव्यवस्था, दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रभाव के साथ, अमेरिका अभी भी दुनिया की अग्रणी प्रमुख शक्ति है। इसका डॉलर वैश्विक आरक्षित मुद्रा है, और इसकी तकनीकी कंपनियाँ दुनिया पर हावी हैं।
  • चीन (China): दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, एक विशाल सेना और अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साथ, चीन अमेरिका के लिए मुख्य चुनौती बनकर उभरा है। चीन को भविष्य की महाशक्ति माना जाता है।
  • रूस (Russia): सोवियत संघ का उत्तराधिकारी, रूस अपने विशाल ऊर्जा संसाधनों, शक्तिशाली सेना (विशेषकर परमाणु शस्त्रागार) और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर के कारण एक महत्वपूर्ण प्रमुख शक्ति बना हुआ है।
  • यूरोपीय संघ (European Union – EU): हालांकि यह एक देश नहीं है, यूरोपीय संघ एक आर्थिक ब्लॉक के रूप में एक बड़ी प्रमुख शक्ति है। इसकी संयुक्त अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी है और यह व्यापार और नियमों के क्षेत्र में एक वैश्विक मानक निर्धारक है। जर्मनी और फ्रांस इसके प्रमुख सदस्य हैं।
  • उभरती शक्तियाँ (Emerging Powers): भारत, जापान, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव रखते हैं और भविष्य की प्रमुख शक्तियों के रूप में देखे जाते हैं।

2. संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और भारत के संबंध (USA-India Relations)

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

भारत और अमेरिका, दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र, के बीच संबंधों का एक जटिल इतिहास रहा है। शीत युद्ध के दौरान, भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति (Non-Aligned Movement) और सोवियत संघ के साथ उसके करीबी संबंधों के कारण दोनों देशों के बीच रिश्ते ठंडे थे। अमेरिका पाकिस्तान को अपना एक प्रमुख सहयोगी मानता था, जिससे भारत के साथ उसके संबंधों में और दूरी आई। हालांकि, 1991 में सोवियत संघ के विघटन और भारत के आर्थिक उदारीकरण (economic liberalization) के बाद, दोनों देशों ने एक-दूसरे के महत्व को पहचानना शुरू किया। 21वीं सदी में, यह रिश्ता एक व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Global Strategic Partnership) में बदल गया है।

सामरिक साझेदारी (Strategic Partnership)

आज, भारत-अमेरिका संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ उनकी बढ़ती सामरिक और रक्षा साझेदारी है। यह साझेदारी मुख्य रूप से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के साझा लक्ष्य पर आधारित है।

  • रक्षा समझौते: दोनों देशों ने कई मूलभूत रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जैसे LEMOA (Logistics Exchange Memorandum of Agreement), COMCASA (Communications Compatibility and Security Agreement), और BECA (Basic Exchange and Cooperation Agreement)। ये समझौते दोनों देशों की सेनाओं के बीच गहरे सहयोग और अंतर-संचालनीयता (interoperability) को सक्षम बनाते हैं।
  • क्वाड (QUAD): भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का यह चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (Quadrilateral Security Dialogue) हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। यह इन लोकतंत्रों को चीन की आक्रामकता के खिलाफ एक साथ लाता है।
  • सैन्य अभ्यास: दोनों देश नियमित रूप से ‘मालाबार’ (नौसेना), ‘युद्ध अभ्यास’ (सेना) और ‘कोप इंडिया’ (वायु सेना) जैसे जटिल सैन्य अभ्यासों में भाग लेते हैं। यह सहयोग दोनों देशों को एक-दूसरे की सैन्य क्षमताओं को समझने में मदद करता है। अमेरिका जैसी प्रमुख शक्ति के साथ ऐसा सहयोग भारत की सैन्य क्षमताओं को बढ़ाता है।

आर्थिक संबंध (Economic Relations)

रक्षा के अलावा, आर्थिक संबंध भी भारत-अमेरिका साझेदारी की एक मजबूत कड़ी हैं। अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है।

  • व्यापार और निवेश: दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 150 बिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। अमेरिकी कंपनियाँ भारत में सबसे बड़े निवेशकों में से हैं, खासकर प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्रों में।
  • प्रौद्योगिकी सहयोग: iCET (Initiative on Critical and Emerging Technology) जैसी पहल के माध्यम से, दोनों देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और 5G जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों पर सहयोग कर रहे हैं।
  • भारतीय डायस्पोरा: अमेरिका में लगभग 4.5 मिलियन भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो सबसे धनी और सबसे शिक्षित समुदायों में से एक हैं। यह डायस्पोरा दोनों देशों के बीच एक जीवित पुल के रूप में कार्य करता है, जो व्यापार, प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देता है।

सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Positive and Negative Aspects)

किसी भी गहरे रिश्ते की तरह, भारत-अमेरिका संबंधों में भी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू हैं।

  • सकारात्मक पहलू (Positive Aspects):
    • चीन का मुकाबला: अमेरिका के साथ साझेदारी भारत को चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति का मुकाबला करने के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करती है।
    • प्रौद्योगिकी तक पहुंच: इस साझेदारी से भारत को उन्नत रक्षा और नागरिक प्रौद्योगिकी तक पहुंच मिलती है, जो भारत के आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक है।
    • आर्थिक अवसर: अमेरिकी बाजार और निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं।
    • वैश्विक मंच पर समर्थन: अमेरिका अक्सर संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर भारत की उम्मीदवारी (जैसे UNSC में स्थायी सीट) का समर्थन करता है।
  • नकारात्मक पहलू (Negative Aspects):
    • रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव: अमेरिका के साथ घनिष्ठता कभी-कभी भारत की स्वतंत्र विदेश नीति या रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) पर दबाव डालती है, खासकर जब रूस या ईरान जैसे देशों के साथ संबंधों की बात आती है।
    • व्यापार विवाद: टैरिफ, बौद्धिक संपदा अधिकार और बाजार पहुंच को लेकर दोनों देशों के बीच कभी-कभी व्यापारिक विवाद उत्पन्न होते हैं।
    • वीजा नीतियां: H-1B वीजा जैसे मुद्दों पर अमेरिका की नीतियां भारतीय पेशेवरों और आईटी उद्योग को सीधे प्रभावित करती हैं।
    • अपेक्षाओं में अंतर: कभी-कभी मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दृष्टिकोण भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

भविष्य की दिशा (Future Direction)

भविष्य में, भारत-अमेरिका संबंध और गहरे होने की उम्मीद है। चीन का उदय और एक अनिश्चित वैश्विक व्यवस्था दोनों देशों को एक साथ आने के लिए मजबूर करेगी। हालांकि कुछ मतभेद बने रहेंगे, लेकिन साझा लोकतांत्रिक मूल्य और रणनीतिक हित इस साझेदारी को 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक बनाते हैं। भारत के लिए, अमेरिका जैसी प्रमुख शक्ति के साथ मजबूत संबंध वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए अनिवार्य है।

3. चीन (China) और भारत के संबंध (China-India Relations)

पड़ोस की जटिलता (The Complexity of a Neighbor)

भारत और चीन, दो प्राचीन सभ्यताएं और दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश, एक लंबा और जटिल साझा इतिहास रखते हैं। यह रिश्ता सहयोग और संघर्ष दोनों से भरा रहा है। 1950 के दशक में “हिंदी-चीनी भाई-भाई” के नारे से शुरू हुआ यह रिश्ता 1962 के सीमा युद्ध के बाद कड़वाहट में बदल गया। आज तक, दोनों देशों के बीच 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control – LAC) पर सीमा विवाद अनसुलझा है, जो समय-समय पर तनाव का कारण बनता है, जैसा कि 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में देखा गया। चीन का एक प्रमुख शक्ति के रूप में उदय भारत के लिए सबसे बड़ी विदेश नीति चुनौतियों में से एक है।

आर्थिक निर्भरता और प्रतिस्पर्धा (Economic Interdependence and Competition)

तनाव के बावजूद, भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंध बहुत गहरे हैं। चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक है। हालांकि, यह रिश्ता भारत के पक्ष में बहुत असंतुलित है।

  • व्यापार घाटा (Trade Deficit): भारत चीन से बहुत अधिक आयात करता है और बहुत कम निर्यात करता है, जिसके कारण एक बड़ा व्यापार घाटा होता है। भारत स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और दवा बनाने के लिए आवश्यक कच्चे माल (APIs) के लिए चीन पर बहुत अधिक निर्भर है।
  • प्रतिस्पर्धा: दोनों देश एशिया और दुनिया भर में आर्थिक प्रभाव के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। चीन का ‘मेड इन चाइना 2025’ और भारत का ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं। 5G तकनीक और डिजिटल भुगतान जैसे क्षेत्रों में भी यह प्रतिस्पर्धा स्पष्ट है।
  • निवेश: चीनी कंपनियों ने भारतीय स्टार्टअप और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में महत्वपूर्ण निवेश किया है, हालांकि हाल के सीमा तनावों के बाद भारत सरकार ने चीनी निवेश पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं।

भू-राजनीतिक टकराव (Geopolitical Conflict)

आर्थिक संबंधों के अलावा, भू-राजनीतिक (geopolitical) क्षेत्र में भी भारत और चीन के बीच गंभीर टकराव है। चीन, एक स्थापित प्रमुख शक्ति के रूप में, एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है, जो भारत के हितों के सीधे खिलाफ है।

  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): चीन की यह महत्वाकांक्षी वैश्विक बुनियादी ढांचा परियोजना भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, खासकर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से होकर गुजरता है, जिससे भारत की संप्रभुता का उल्लंघन होता है।
  • स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स (String of Pearls): यह एक सिद्धांत है जिसके अनुसार चीन हिंद महासागर में भारत को घेरने के लिए बंदरगाहों और सैन्य ठिकानों का एक नेटवर्क बना रहा है, जैसे पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा और म्यांमार में क्यौकप्यू।
  • पाकिस्तान के साथ संबंध: चीन और पाकिस्तान के बीच “हर मौसम में दोस्ती” भारत के लिए एक स्थायी रणनीतिक चुनौती है। चीन पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करता है और अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसे बचाता है।
  • पड़ोस में प्रभाव: चीन नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों में अपने प्रभाव को तेजी से बढ़ा रहा है, जिससे भारत का पारंपरिक प्रभाव कम हो रहा है।

सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Positive and Negative Aspects)

भारत-चीन संबंधों का विश्लेषण करने पर इसके दोनों पक्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

  • सकारात्मक पहलू (Positive Aspects):
    • व्यापारिक भागीदार: तनाव के बावजूद, चीन एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार बना हुआ है, जो भारतीय उपभोक्ताओं को सस्ते सामान और उद्योगों को आवश्यक घटक प्रदान करता है।
    • बहुपक्षीय मंच: दोनों देश BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और SCO (शंघाई सहयोग संगठन) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सदस्य हैं, जहाँ वे कुछ वैश्विक मुद्दों पर सहयोग करते हैं।
    • वैश्विक मुद्दों पर सहयोग: जलवायु परिवर्तन और वैश्विक व्यापार नियमों जैसे कुछ मुद्दों पर, भारत और चीन के हित कभी-कभी समान होते हैं, खासकर विकासशील देशों के दृष्टिकोण से।
  • नकारात्मक पहलू (Negative Aspects):
    • सीमा विवाद: अनसुलझा सीमा विवाद दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक मुद्दा है, जो कभी भी सैन्य संघर्ष में बदल सकता है।
    • रणनीतिक अविश्वास: दोनों देशों के बीच गहरा रणनीतिक अविश्वास है। भारत चीन को एक विस्तारवादी शक्ति के रूप में देखता है, जबकि चीन भारत को पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका का सहयोगी मानता है।
    • आर्थिक असंतुलन: विशाल व्यापार घाटा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है और चीन पर निर्भरता एक रणनीतिक कमजोरी है।
    • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: हिंद महासागर और दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए सीधा खतरा है।

संतुलन का कार्य (The Balancing Act)

भारत के लिए चीन के साथ संबंध एक निरंतर संतुलन का कार्य है। भारत एक ओर चीन के साथ आर्थिक रूप से जुड़ना चाहता है, वहीं दूसरी ओर उसकी सैन्य और भू-राजनीतिक आक्रामकता का मुकाबला भी करना चाहता है। इसके लिए भारत ने एक बहु-आयामी रणनीति अपनाई है: अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करना, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे समान विचारधारा वाले देशों के साथ साझेदारी बनाना (जैसे क्वाड), और अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को गहरा करना। इस शक्तिशाली प्रमुख शक्ति के साथ भारत का रिश्ता आने वाले दशकों तक एशिया और दुनिया की राजनीति को परिभाषित करेगा।

4. रूस (Russia) और भारत के संबंध (Russia-India Relations)

समय की कसौटी पर खरा उतरा रिश्ता (A Time-Tested Relationship)

भारत और रूस के बीच संबंध “विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी” (Special and Privileged Strategic Partnership) के रूप में वर्णित किए जाते हैं। यह एक ऐसा रिश्ता है जो दशकों से समय की कसौटी पर खरा उतरा है। शीत युद्ध के दौरान, जब अधिकांश पश्चिमी प्रमुख शक्तियाँ भारत के प्रति उदासीन थीं, सोवियत संघ भारत का एक विश्वसनीय सहयोगी था। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान सोवियत संघ का समर्थन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर मुद्दे पर भारत के पक्ष में बार-बार वीटो का उपयोग, और भारत के शुरुआती औद्योगिक और अंतरिक्ष कार्यक्रमों में मदद ने इस दोस्ती की नींव रखी। सोवियत संघ के विघटन के बाद भी, रूस भारत का एक महत्वपूर्ण भागीदार बना रहा है।

ऊर्जा और रक्षा सहयोग (Energy and Defense Cooperation)

भारत-रूस संबंधों के दो मुख्य स्तंभ रक्षा और ऊर्जा हैं। इन क्षेत्रों में सहयोग बहुत गहरा और व्यापक है।

  • रक्षा आपूर्ति: आज भी, भारतीय सशस्त्र बलों के लगभग 60-70% उपकरण रूसी या सोवियत मूल के हैं। रूस भारत को उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी प्रदान करता है जो वह शायद ही किसी अन्य देश को देता हो। S-400 ट्रायम्फ वायु रक्षा प्रणाली, ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल (जो एक संयुक्त उद्यम है), सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान, और परमाणु पनडुब्बी (INS चक्र) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: रूस भारत की ऊर्जा सुरक्षा (energy security) के लिए एक महत्वपूर्ण भागीदार है। भारत रूस से तेल और गैस का आयात बढ़ा रहा है। इसके अलावा, रूस ने तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो भारत की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है।

बदलती वैश्विक गतिशीलता (Changing Global Dynamics)

हालांकि यह रिश्ता ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में बदलती वैश्विक गतिशीलता ने इसमें कुछ जटिलताएँ पैदा की हैं।

  • रूस-चीन की निकटता: पश्चिम के साथ रूस के बिगड़ते संबंधों के कारण, वह चीन के बहुत करीब आ गया है। रूस और चीन की यह रणनीतिक धुरी भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि भारत का चीन के साथ सीमा पर तनाव है।
  • भारत-अमेरिका की निकटता: दूसरी ओर, भारत की अमेरिका और अन्य पश्चिमी प्रमुख शक्तियों के साथ बढ़ती निकटता रूस को असहज करती है। क्वाड जैसे मंचों को रूस चीन-विरोधी गुट के रूप में देखता है।
  • रक्षा बाजार में विविधीकरण: भारत अब अपनी रक्षा जरूरतों के लिए केवल रूस पर निर्भर नहीं है। उसने अमेरिका, फ्रांस, इज़राइल जैसे देशों से भी हथियार खरीदना शुरू कर दिया है, जिससे रूस के साथ उसके पारंपरिक रक्षा संबंधों में थोड़ी कमी आई है।
  • यूक्रेन संघर्ष: यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने भारत को एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया है। भारत ने रूस की सीधी निंदा करने से परहेज किया है, जिससे पश्चिमी देश नाराज हुए हैं, लेकिन साथ ही उसने कूटनीति और संवाद का आह्वान किया है।

भारत के लिए रूस का महत्व (Russia’s Importance for India)

इन चुनौतियों के बावजूद, रूस भारत के लिए एक अनिवार्य भागीदार बना हुआ है। रूस जैसी प्रमुख शक्ति के साथ मजबूत संबंध भारत को अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।

  • रक्षा निर्भरता: भारतीय सेना अपने मौजूदा रूसी उपकरणों के रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और उन्नयन के लिए रूस पर बहुत अधिक निर्भर है। इस निर्भरता को रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता।
  • राजनयिक समर्थन: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस का वीटो पावर अभी भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है, खासकर कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर।
  • संतुलनकारी भूमिका: एक बहुध्रुवीय दुनिया में, रूस भारत को अमेरिकी दबाव के खिलाफ एक संतुलनकारी शक्ति प्रदान करता है। यह भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने में मदद करता है और उसे किसी एक गुट में शामिल होने से बचाता है।
  • यूरेशिया तक पहुंच: रूस मध्य एशिया और यूरेशिया में भारत की पहुंच के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो ऊर्जा और कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है।

निष्कर्षतः, भारत-रूस संबंध एक नए दौर से गुजर रहे हैं, जहाँ ऐतिहासिक विश्वास को नई भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ समायोजित करने की आवश्यकता है। यह रिश्ता भले ही पहले जैसा अनन्य न हो, लेकिन यह भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण और स्थायी स्तंभ बना रहेगा।

5. अन्य प्रमुख शक्तियाँ और भारत (Other Major Powers and India)

अमेरिका, चीन और रूस के अलावा, भारत अन्य कई प्रमुख शक्तियों और प्रभावशाली देशों के साथ भी सक्रिय रूप से अपने संबंध विकसित कर रहा है। यह भारत की बहु-संरेखण (multi-alignment) की नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य किसी एक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय कई भागीदारों के साथ काम करना है।

यूरोपीय संघ (European Union – EU)

यूरोपीय संघ, 27 देशों का एक अनूठा आर्थिक और राजनीतिक संघ, एक सामूहिक प्रमुख शक्ति के रूप में कार्य करता है। भारत और यूरोपीय संघ स्वाभाविक भागीदार हैं क्योंकि दोनों लोकतंत्र, कानून के शासन और बहुपक्षवाद में विश्वास करते हैं।

  • आर्थिक भागीदार: यूरोपीय संघ भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों और निवेशकों में से एक है। दोनों पक्ष एक महत्वाकांक्षी मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement – FTA) पर बातचीत कर रहे हैं, जो सफल होने पर आर्थिक संबंधों को और बढ़ावा देगा।
  • रणनीतिक सहयोग: भारत और यूरोपीय संघ समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद का मुकाबला, और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर अपना सहयोग बढ़ा रहे हैं। यूरोपीय संघ की हिंद-प्रशांत रणनीति भारत के दृष्टिकोण के साथ मेल खाती है।
  • चुनौतियाँ: हालांकि, व्यापार वार्ता में कुछ मुद्दों पर मतभेद और यूरोपीय संघ की धीमी निर्णय लेने की प्रक्रिया कभी-कभी संबंधों की प्रगति में बाधा डालती है।

जापान (Japan)

भारत और जापान के बीच संबंध हाल के वर्षों में तेजी से मजबूत हुए हैं, जिन्हें अब “विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी” का दर्जा दिया गया है। दोनों देशों के बीच घनिष्ठता के पीछे साझा लोकतांत्रिक मूल्य और चीन की बढ़ती आक्रामकता को लेकर साझा चिंताएं हैं।

  • बुनियादी ढांचा और निवेश: जापान भारत में सबसे बड़े निवेशकों में से एक है। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन) परियोजना, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा (DMIC), और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में कई कनेक्टिविटी परियोजनाएं जापानी निवेश और प्रौद्योगिकी से बन रही हैं।
  • रक्षा और सुरक्षा: जापान क्वाड (QUAD) का एक महत्वपूर्ण सदस्य है। दोनों देशों की नौसेनाएं नियमित रूप से संयुक्त अभ्यास करती हैं। उन्होंने एक अधिग्रहण और क्रॉस-सर्विसिंग समझौते (ACSA) पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जो दोनों सेनाओं के बीच लॉजिस्टिक सहयोग की अनुमति देता है।
  • सॉफ्ट पावर: बौद्ध धर्म की साझा विरासत दोनों देशों के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक संबंध बनाती है। यह रिश्ता एशिया में शांति और स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है।

यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस (United Kingdom & France)

यूनाइटेड किंगडम (UK) और फ्रांस, दोनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य और परमाणु शक्तियां हैं, भारत के लिए महत्वपूर्ण यूरोपीय भागीदार हैं।

  • फ्रांस (France): फ्रांस भारत का सबसे विश्वसनीय रणनीतिक भागीदारों में से एक बनकर उभरा है। राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद, परमाणु ऊर्जा में सहयोग, और हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा पर संयुक्त गश्त भारत-फ्रांस संबंधों की गहराई को दर्शाते हैं। फ्रांस ने हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारत का समर्थन किया है।
  • यूनाइटेड किंगडम (UK): ऐतिहासिक संबंधों के कारण भारत और ब्रिटेन के बीच गहरे संबंध हैं। ब्रेक्सिट के बाद, यूके भारत के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, खासकर व्यापार और निवेश के क्षेत्र में। दोनों देश ‘रोडमैप 2030’ के माध्यम से स्वास्थ्य, जलवायु और रक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।

इन प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध विकसित करके, भारत अपनी विदेश नीति के विकल्पों को व्यापक बना रहा है और यह सुनिश्चित कर रहा है कि उसके हित किसी एक देश के साथ संबंधों पर निर्भर न रहें।

6. भारत की अपनी महत्वाकांक्षा: एक उभरती हुई प्रमुख शक्ति (India’s Own Ambition: An Emerging Major Power)

भारत केवल अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को ही नहीं संभाल रहा है, बल्कि वह स्वयं भी एक प्रमुख शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखता है। भारत अपने आप को केवल एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक अग्रणी शक्ति (leading power) के रूप में देखता है जो वैश्विक एजेंडे को आकार देने में मदद कर सकती है। इस महत्वाकांक्षा के पीछे भारत की कई ताकतें और कुछ अंतर्निहित चुनौतियाँ हैं।

भारत की ताकत (India’s Strengths)

भारत के पास वे सभी गुण हैं जो किसी देश को एक प्रमुख शक्ति बनाते हैं।

  • अर्थव्यवस्था: भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसकी विशाल घरेलू बाजार और बढ़ती क्रय शक्ति इसे वैश्विक विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन बनाती है।
  • जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend): भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, जिसकी 65% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा आबादी (युवा आबादी) नवाचार, उद्यमशीलता और आर्थिक विकास के लिए एक जबरदस्त क्षमता प्रदान करती है।
  • सैन्य शक्ति: भारत दुनिया की चौथी सबसे शक्तिशाली सेना रखता है। यह एक परमाणु-सशस्त्र देश है और इसकी सेना को विभिन्न इलाकों में लड़ने का व्यापक अनुभव है।
  • प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष शक्ति: भारत का आईटी और सॉफ्टवेयर उद्योग विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है। इसके अलावा, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान और मंगलयान जैसे सफल मिशनों के साथ अपनी कम लागत वाली और प्रभावी अंतरिक्ष क्षमताओं का प्रदर्शन किया है।
  • लोकतंत्र और सॉफ्ट पावर (Democracy and Soft Power): दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र (लोकतंत्र) के रूप में भारत की स्थिति इसे एक अद्वितीय नैतिक अधिकार देती है। भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड), योग, भोजन और इसकी जीवंत संस्कृति दुनिया भर में इसकी ‘सॉफ्ट पावर’ को बढ़ाती है।

भारत की चुनौतियाँ (India’s Challenges)

एक प्रमुख शक्ति बनने की राह में भारत के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ भी हैं, जिन्हें दूर करना आवश्यक है।

  • आंतरिक मुद्दे: गरीबी, असमानता, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार अभी भी बड़ी समस्याएं हैं। इन मुद्दों से निपटने के लिए निरंतर ध्यान और संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो कभी-कभी विदेश नीति के लक्ष्यों से ध्यान भटका सकते हैं।
  • बुनियादी ढांचे की कमी: सड़कों, बंदरगाहों, ऊर्जा और डिजिटल बुनियादी ढांचे में अभी भी सुधार की बहुत गुंजाइश है। मजबूत बुनियादी ढांचा निरंतर आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
  • पड़ोसी देशों के साथ संबंध: पाकिस्तान और चीन के साथ तनावपूर्ण संबंध भारत के संसाधनों और ध्यान का एक बड़ा हिस्सा लेते हैं। एक स्थिर और शांतिपूर्ण पड़ोस भारत के उदय के लिए महत्वपूर्ण है।
  • नौकरशाही और कार्यान्वयन: भारत में नीतियां अक्सर अच्छी होती हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन धीमा और अक्षम हो सकता है, जो प्रगति को बाधित करता है।

विदेश नीति के सिद्धांत (Principles of Foreign Policy)

इन ताकतों और चुनौतियों के बीच, भारत अपनी विदेश नीति को कुछ प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित करता है ताकि वह प्रमुख शक्तियों के जटिल जाल को नेविगेट कर सके। भारत की विदेश नीति के बारे में आप विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अधिक जान सकते हैं।

  • रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): यह भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत है। इसका मतलब है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा और किसी भी देश या सैन्य गठबंधन के दबाव में नहीं आएगा।
  • बहु-संरेखण (Multi-alignment): गुटनिरपेक्षता के पुराने विचार से आगे बढ़ते हुए, भारत अब बहु-संरेखण की नीति अपनाता है। इसका अर्थ है कि भारत एक साथ कई प्रमुख शक्तियों और समूहों (जैसे क्वाड और ब्रिक्स) के साथ सक्रिय रूप से जुड़ता है, भले ही उनके हित आपस में टकराते हों।
  • ‘पड़ोस पहले’ नीति (Neighbourhood First Policy): भारत मानता है कि एक वैश्विक शक्ति बनने के लिए पहले एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति बनना आवश्यक है। इसलिए, वह दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता देता है।
  • एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy): यह नीति दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों (ASEAN) के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने पर केंद्रित है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत का लक्ष्य: विश्व गुरु? (India’s Goal: Vishwa Guru?)

भारत की महत्वाकांक्षा केवल एक और आर्थिक या सैन्य शक्ति बनने तक सीमित नहीं है। ‘विश्व गुरु’ (दुनिया का शिक्षक) की अवधारणा भारत के उस लक्ष्य को दर्शाती है जहाँ वह अपने प्राचीन ज्ञान, लोकतांत्रिक मूल्यों और अद्वितीय विकास मॉडल के माध्यम से दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहता है। यह केवल प्रभुत्व की बात नहीं है, बल्कि दुनिया की समस्याओं, जैसे कि जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और गरीबी, के समाधान में एक रचनात्मक भूमिका निभाने की है। भारत का लक्ष्य एक ऐसी प्रमुख शक्ति बनना है जो नियमों का पालन करे, वैश्विक शांति और स्थिरता में योगदान दे, और विकासशील देशों की आवाज बने।

7. निष्कर्ष (Conclusion)

प्रमुख शक्तियों और भारत के बीच का संबंध एक गतिशील और लगातार विकसित होने वाली कहानी है। यह शतरंज के एक जटिल खेल की तरह है, जहां हर चाल का दूरगामी प्रभाव होता है। हमने देखा कि कैसे भारत अमेरिका जैसी स्थापित प्रमुख शक्ति के साथ अपनी दोस्ती को गहरा कर रहा है, वहीं चीन जैसी महत्वाकांक्षी प्रमुख शक्ति की चुनौती का सामना भी कर रहा है। साथ ही, वह रूस जैसे अपने पारंपरिक सहयोगी के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने का प्रयास कर रहा है, जबकि जापान और यूरोपीय संघ जैसी अन्य शक्तियों के साथ नई साझेदारियाँ भी बना रहा है।

यह स्पष्ट है कि भारत की विदेश नीति एक नाजुक संतुलन का कार्य है। यह सहयोग और प्रतिस्पर्धा, दोस्ती और प्रतिद्वंद्विता के बीच एक महीन रेखा पर चलती है। भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति उसे किसी एक गुट में बंधने से बचाती है और अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की स्वतंत्रता देती है। दुनिया आज एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, और इस नई व्यवस्था में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होने वाली है। भारत न केवल इन प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को नेविगेट कर रहा है, बल्कि वह स्वयं एक प्रमुख शक्ति बनने की राह पर मजबूती से अग्रसर है। अपनी विशाल अर्थव्यवस्था, युवा आबादी, और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ, भारत में 21वीं सदी की कहानी को आकार देने की पूरी क्षमता है। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी आंतरिक चुनौतियों से कैसे निपटता है और वैश्विक मंच पर अवसरों का कितनी चतुराई से लाभ उठाता है।

8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: प्रमुख शक्तियाँ कौन सी हैं? (Who are the major powers?)

उत्तर: वर्तमान में, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और रूस को दुनिया की तीन सबसे प्रमुख शक्तियाँ माना जाता है। इनके अलावा, यूरोपीय संघ (एक ब्लॉक के रूप में), यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और जापान भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को भविष्य की प्रमुख शक्तियों के रूप में देखा जाता है।

प्रश्न 2: भारत और अमेरिका के संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू क्या है? (What is the most important aspect of India-US relations?)

उत्तर: भारत और अमेरिका के संबंधों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनकी बढ़ती रणनीतिक और रक्षा साझेदारी है। यह साझेदारी मुख्य रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के साझा हित पर आधारित है। क्वाड (QUAD) और महत्वपूर्ण रक्षा समझौते (जैसे LEMOA, COMCASA) इस साझेदारी के प्रमुख स्तंभ हैं।

प्रश्न 3: भारत चीन के साथ अपने सीमा विवाद को कैसे संभालता है? (How does India handle its border dispute with China?)

उत्तर: भारत चीन के साथ सीमा विवाद को दो-स्तरीय रणनीति के माध्यम से संभालता है। एक ओर, वह सैन्य स्तर पर अपनी सीमाओं की मजबूती से रक्षा करता है और अपनी सेना को आधुनिक बनाता है। दूसरी ओर, वह राजनयिक और सैन्य स्तर पर बातचीत के चैनल खुले रखता है ताकि तनाव को कम किया जा सके और शांतिपूर्ण समाधान खोजा जा सके।

प्रश्न 4: क्या भारत भविष्य में एक प्रमुख शक्ति बन सकता है? (Can India become a major power in the future?)

उत्तर: हाँ, भारत में भविष्य में एक प्रमुख शक्ति बनने की पूरी क्षमता है। इसकी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल युवा आबादी, मजबूत सेना, और लोकतांत्रिक मूल्य इसे इस भूमिका के लिए एक मजबूत दावेदार बनाते हैं। हालांकि, इसके लिए भारत को गरीबी, बुनियादी ढांचे की कमी और भ्रष्टाचार जैसी अपनी आंतरिक चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटना होगा।

प्रश्न 5: QUAD क्या है और यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? (What is QUAD and why is it important for India?)

उत्तर: QUAD (चतुर्भुज सुरक्षा संवाद) भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक अनौपचारिक रणनीतिक संवाद मंच है। इसका मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देना है। यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चीन की बढ़ती आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों को एक साथ लाता है और समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करता है।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *