बहुपक्षीय मंच: नया विश्व? (Multilateral Forum: New World?)
बहुपक्षीय मंच: नया विश्व? (Multilateral Forum: New World?)

बहुपक्षीय मंच: नया विश्व? (Multilateral Forum: New World?)

विषय-सूची (Table of Contents)

1. परिचय: एक दुनिया, कई आवाज़ें (Introduction: One World, Many Voices)

कल्पना कीजिए, 2020 की शुरुआत है और दुनिया भर में एक अज्ञात वायरस तेज़ी से फैल रहा है। कोई भी देश अकेले इस अदृश्य दुश्मन का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। वैज्ञानिक जानकारी साझा करने, वैक्सीन विकसित करने, चिकित्सा उपकरणों की आपूर्ति श्रृंखला बनाए रखने और वैश्विक अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने के लिए दुनिया के नेताओं को एक साथ आने की ज़रूरत है। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि हाल की वास्तविकता है जिसने हमें एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया: आज की दुनिया में, हमारी सबसे बड़ी चुनौतियाँ वैश्विक हैं और उनका समाधान भी वैश्विक सहयोग से ही संभव है। यहीं पर एक बहुपक्षीय मंच (Multilateral Forum) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ विभिन्न देशों के प्रतिनिधि एक साथ आते हैं, बातचीत करते हैं, और साझा समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। यह एक ऐसी व्यवस्था है जो राष्ट्रों को अलगाव के बजाय सहयोग की ओर प्रेरित करती है।

जब हम अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (international relations) की बात करते हैं, तो अक्सर देशों के बीच तनाव, प्रतिस्पर्धा और युद्ध की तस्वीरें हमारे दिमाग में आती हैं। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है – सहयोग, संवाद और साझा विकास का। बहुपक्षीय मंच इसी दूसरे पहलू का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है। यह एक ऐसा विचार है जो इस विश्वास पर आधारित है कि जब राष्ट्र मिलकर काम करते हैं, तो वे अकेले काम करने की तुलना में कहीं अधिक हासिल कर सकते हैं। चाहे वह जलवायु परिवर्तन से लड़ना हो, गरीबी मिटानी हो, या वैश्विक शांति सुनिश्चित करनी हो, इन सभी के लिए एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच का होना अनिवार्य है। यह लेख आपको बहुपक्षीय मंच की दुनिया में गहराई तक ले जाएगा, इसके इतिहास, प्रकार, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा करेगा, विशेष रूप से भारत के दृष्टिकोण से।

2. बहुपक्षीय मंच क्या है? (What is a Multilateral Forum?)

बहुपक्षीयता की सरल परिभाषा (A Simple Definition of Multilateralism)

सरल शब्दों में, एक बहुपक्षीय मंच एक ऐसी संस्था या व्यवस्था है जिसमें तीन या अधिक देश साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साथ काम करते हैं। यह “बहु” (many) और “पक्षीय” (sided) शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “कई पक्षों वाला”। यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एक दृष्टिकोण है जो एकतरफा कार्रवाई (unilateral action), जहाँ एक देश अकेले निर्णय लेता है, या द्विपक्षीय कार्रवाई (bilateral action), जहाँ केवल दो देश मिलकर काम करते हैं, के विपरीत है। बहुपक्षीय मंच का मूल सिद्धांत यह है कि वैश्विक समस्याओं के लिए वैश्विक समाधान की आवश्यकता होती है, और यह समाधान संवाद, सर्वसम्मति और सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

इसके मुख्य सिद्धांत क्या हैं? (What are its Core Principles?)

प्रत्येक बहुपक्षीय मंच कुछ मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित होता है जो इसके कामकाज को दिशा देते हैं। ये सिद्धांत सुनिश्चित करते हैं कि सहयोग व्यवस्थित और निष्पक्ष हो।

  • सामूहिक हित (Collective Interest): सदस्य राष्ट्र अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर व्यापक सामूहिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। विचार यह है कि वैश्विक शांति और समृद्धि सभी के हित में है।
  • नियम-आधारित व्यवस्था (Rules-Based Order): ये मंच अंतरराष्ट्रीय कानूनों, संधियों और मानदंडों के एक सेट के तहत काम करते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि बड़े और शक्तिशाली देश छोटे देशों पर अपनी मनमानी न कर सकें और सभी के लिए एक समान अवसर हो।
  • अविभाजितता (Indivisibility): इसका मतलब है कि सुरक्षा या समृद्धि जैसी चीजें अविभाज्य हैं। एक देश में अस्थिरता या संकट का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है, इसलिए सभी को मिलकर इन समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
  • पारस्परिकता (Reciprocity): सदस्य देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे एक-दूसरे को समान लाभ और जिम्मेदारियाँ प्रदान करें। यदि एक देश व्यापार में रियायतें देता है, तो उसे भी बदले में वैसी ही रियायतों की उम्मीद होती है।

एकपक्षीय, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय दृष्टिकोण में अंतर (Difference Between Unilateral, Bilateral, and Multilateral Approaches)

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को समझने के लिए इन तीन दृष्टिकोणों के बीच के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। आइए इसे एक सरल उदाहरण से समझें: मान लीजिए कि एक नदी कई देशों से होकर बहती है और उसमें प्रदूषण की समस्या है।

  • एकपक्षीय (Unilateral) दृष्टिकोण: एक शक्तिशाली देश नदी के ऊपरी हिस्से में एकतरफा रूप से एक बड़ा बांध बनाने का फैसला करता है, बिना नीचे के देशों से परामर्श किए। इससे उन देशों में पानी का प्रवाह कम हो सकता है। यह एकपक्षीय कार्रवाई है।
  • द्विपक्षीय (Bilateral) दृष्टिकोण: दो पड़ोसी देश आपस में मिलकर नदी के अपने हिस्से को साफ करने के लिए एक समझौता करते हैं, लेकिन अन्य देशों को इसमें शामिल नहीं करते। यह एक द्विपक्षीय समझौता है।
  • बहुपक्षीय (Multilateral) दृष्टिकोण: नदी के किनारे बसे सभी देश एक साथ बैठकर एक बहुपक्षीय मंच बनाते हैं। वे प्रदूषण को नियंत्रित करने, पानी के उचित बंटवारे और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को बचाने के लिए एक साझा संधि पर हस्ताक्षर करते हैं। यह सबसे व्यापक और स्थायी समाधान है।

यह उदाहरण स्पष्ट रूप से दिखाता है कि बहुपक्षीय मंच जटिल और साझा समस्याओं को हल करने के लिए सबसे प्रभावी तरीका क्यों है। यह सहयोग और विश्वास का एक ढांचा प्रदान करता है जो आज की परस्पर जुड़ी दुनिया के लिए नितांत आवश्यक है।

3. बहुपक्षीय मंचों का ऐतिहासिक सफ़र (Historical Journey of Multilateral Forums)

प्राचीन काल से लेकर वेस्टफेलिया तक (From Ancient Times to Westphalia)

हालांकि आधुनिक बहुपक्षीय मंच एक हालिया अवधारणा की तरह लग सकता है, लेकिन विभिन्न राज्यों के बीच सहयोग और संवाद का विचार हजारों साल पुराना है। प्राचीन ग्रीस में, शहर-राज्य अक्सर बाहरी खतरों का सामना करने के लिए गठबंधन बनाते थे। भारत में भी, मौर्य और गुप्त साम्राज्यों के दौरान पड़ोसी राज्यों के साथ राजनयिक संबंध और संधियाँ आम थीं। हालाँकि, आधुनिक राष्ट्र-राज्य प्रणाली की नींव 1648 की ‘वेस्टफेलिया की संधि’ (Treaty of Westphalia) के साथ रखी गई, जिसने राज्यों की संप्रभुता (sovereignty) के सिद्धांत को स्थापित किया। इसने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिए एक नया ढांचा तैयार किया, जहाँ राष्ट्रों को स्वतंत्र और समान माना जाता था।

यूरोप की कॉन्सर्ट और 19वीं सदी (The Concert of Europe and the 19th Century)

19वीं शताब्दी में नेपोलियन के युद्धों की समाप्ति के बाद, यूरोप की प्रमुख शक्तियों – ऑस्ट्रिया, ब्रिटेन, प्रशिया और रूस – ने ‘कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप’ का गठन किया। यह पहला सचेत प्रयास था जहाँ प्रमुख शक्तियों ने यूरोप में शक्ति संतुलन बनाए रखने और बड़े पैमाने पर युद्धों को रोकने के लिए नियमित रूप से परामर्श करने पर सहमति व्यक्त की। यह आधुनिक बहुपक्षीय मंच का एक प्रारंभिक प्रोटोटाइप था। इसी अवधि में, अंतर्राष्ट्रीय टेलीग्राफ यूनियन (1865) और यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (1874) जैसे पहले कार्यात्मक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का भी गठन हुआ, जिन्होंने विशिष्ट क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग की नींव रखी।

राष्ट्र संघ: एक असफल प्रयोग (The League of Nations: A Failed Experiment)

प्रथम विश्व युद्ध की भयावहता ने दुनिया को एक स्थायी शांति संगठन की आवश्यकता का एहसास कराया। इसके परिणामस्वरूप 1920 में ‘राष्ट्र संघ’ (League of Nations) की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और भविष्य के युद्धों को रोकना था। यह वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए स्थापित पहला वैश्विक बहुपक्षीय मंच था। हालांकि, यह अपने मिशन में बुरी तरह विफल रहा। इसकी विफलता के कई कारण थे, जिनमें प्रमुख शक्तियों (जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका) की अनुपस्थिति, निर्णय लेने में सर्वसम्मति की आवश्यकता और आक्रामक राष्ट्रों के खिलाफ प्रवर्तन तंत्र की कमी शामिल थी। राष्ट्र संघ की विफलता ने द्वितीय विश्व युद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।

संयुक्त राष्ट्र का जन्म और शीत युद्ध का दौर (The Birth of the United Nations and the Cold War Era)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, विजेता शक्तियों ने राष्ट्र संघ की गलतियों से सीखा और एक अधिक मजबूत और प्रभावी संगठन बनाने का फैसला किया। 1945 में ‘संयुक्त राष्ट्र’ (United Nations) की स्थापना हुई। यूएन को राष्ट्र संघ की तुलना में अधिक अधिकार दिए गए, जिसमें सुरक्षा परिषद (Security Council) के माध्यम से सैन्य हस्तक्षेप करने की शक्ति भी शामिल थी। शीत युद्ध (Cold War) के दौरान, संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बीच वैचारिक विभाजन के कारण संयुक्त राष्ट्र का कामकाज अक्सर बाधित होता था, लेकिन यह संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण चैनल बना रहा। इसी अवधि में विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच भी स्थापित हुए, जिन्होंने वैश्विक शासन (global governance) की नींव रखी।

इस ऐतिहासिक यात्रा से स्पष्ट है कि बहुपक्षीय मंच का विकास युद्ध और संकट की राख से हुआ है। प्रत्येक बड़ी वैश्विक उथल-पुथल ने राष्ट्रों को सहयोग की आवश्यकता का एहसास कराया है, जिससे अधिक परिष्कृत और व्यापक बहुपक्षीय संरचनाओं का निर्माण हुआ है। यह एक सतत विकास की प्रक्रिया है जो आज भी जारी है।

4. बहुपक्षीय मंचों के विभिन्न प्रकार (Various Types of Multilateral Forums)

जब हम “बहुपक्षीय मंच” शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में संयुक्त राष्ट्र का नाम आता है। लेकिन सच्चाई यह है कि बहुपक्षीय मंच कई अलग-अलग आकारों, दायरों और उद्देश्यों में आते हैं। उन्हें मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: वैश्विक, क्षेत्रीय और विषय-विशिष्ट। इन विभिन्न प्रकारों को समझना यह जानने के लिए महत्वपूर्ण है कि वैश्विक शासन कैसे काम करता है।

वैश्विक मंच: पूरी दुनिया के लिए (Global Forums: For the Entire World)

ये वे मंच हैं जिनकी सदस्यता और कार्यक्षेत्र वैश्विक होता है। वे उन मुद्दों से निपटते हैं जो पूरी मानवता को प्रभावित करते हैं।

  • संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN): यह सबसे प्रमुख और सार्वभौमिक बहुपक्षीय मंच है। इसकी स्थापना शांति और सुरक्षा बनाए रखने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इसके मुख्य अंग महासभा, सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हैं।
  • विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization – WTO): यह वैश्विक व्यापार के नियमों से संबंधित एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यापार सुचारू, अनुमानित और स्वतंत्र रूप से हो।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO): यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार है। COVID-19 महामारी के दौरान इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई थी।
  • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक (IMF and World Bank): ये ब्रेटन वुड्स संस्थान वैश्विक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने, विनिमय दरों को स्थिर करने और विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए बनाए गए थे।

क्षेत्रीय मंच: पड़ोसियों का सहयोग (Regional Forums: Cooperation among Neighbors)

ये मंच एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के देशों से बने होते हैं। वे अक्सर साझा सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

  • यूरोपीय संघ (European Union – EU): यह क्षेत्रीय एकीकरण का सबसे उन्नत उदाहरण है। यह एक आर्थिक और राजनीतिक संघ है जिसकी अपनी संसद, केंद्रीय बैंक और न्यायालय हैं।
  • आसियान (Association of Southeast Asian Nations – ASEAN): यह दक्षिण पूर्व एशिया के 10 देशों का एक संगठन है जो आर्थिक, राजनीतिक, सुरक्षा और सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • सार्क (South Asian Association for Regional Cooperation – SAARC): यह दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है, जिसका उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है। हालांकि, भारत-पाकिस्तान तनाव के कारण यह अक्सर अप्रभावी रहा है।
  • अफ्रीकी संघ (African Union – AU): इसमें अफ्रीका के 55 देश शामिल हैं और यह महाद्वीप में शांति, लोकतंत्र और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।

विषय-विशिष्ट और अनौपचारिक समूह (Theme-Specific and Informal Groups)

ये समूह किसी विशिष्ट मुद्दे या साझा पहचान के आधार पर बनते हैं। वे अक्सर पारंपरिक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की तुलना में अधिक लचीले और अनौपचारिक होते हैं।

  • G20 (ग्रुप ऑफ ट्वेंटी): यह दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जिसमें विकसित और विकासशील दोनों देश शामिल हैं। इसका मुख्य फोकस वैश्विक आर्थिक शासन और वित्तीय स्थिरता पर है। G20 एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच है क्योंकि यह वैश्विक आर्थिक एजेंडा तय करने में मदद करता है।
  • G7 (ग्रुप ऑफ सेवन): यह दुनिया के सात सबसे उन्नत लोकतंत्रों का एक अनौपचारिक समूह है। वे वैश्विक सुरक्षा, ऊर्जा नीति और मानवाधिकारों जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं।
  • ब्रिक्स (BRICS): यह पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं – ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका – का एक समूह है। इसका उद्देश्य मौजूदा पश्चिमी-प्रभुत्व वाले वैश्विक शासन संरचनाओं को चुनौती देना और विकासशील देशों के हितों को बढ़ावा देना है।
  • क्वाड (Quadrilateral Security Dialogue – QUAD): यह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक रणनीतिक सुरक्षा संवाद है। इसका मुख्य उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी व्यवस्था को बढ़ावा देना है। यह एक नया और उभरता हुआ बहुपक्षीय मंच है।

इन विभिन्न प्रकार के मंचों का सह-अस्तित्व एक जटिल लेकिन गतिशील वैश्विक शासन प्रणाली का निर्माण करता है। कोई भी एक मंच सभी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता है, और इसलिए विभिन्न स्तरों पर सहयोग के लिए इन विविध संरचनाओं की आवश्यकता होती है।

5. 21वीं सदी में बहुपक्षीय मंच की प्रासंगिकता (Relevance of Multilateral Forums in the 21st Century)

आज की दुनिया 20वीं सदी से बहुत अलग है जब अधिकांश प्रमुख बहुपक्षीय संस्थानों की स्थापना हुई थी। वैश्वीकरण, प्रौद्योगिकी और नई वैश्विक चुनौतियों के आगमन के साथ, यह सवाल पूछना स्वाभाविक है: क्या बहुपक्षीय मंच आज भी प्रासंगिक हैं? इसका संक्षिप्त उत्तर है – हाँ, पहले से कहीं ज्यादा। 21वीं सदी की समस्याएं इतनी जटिल और परस्पर जुड़ी हुई हैं कि कोई भी देश अकेले उनका सामना नहीं कर सकता।

वैश्विक चुनौतियों का सामूहिक समाधान (Collective Solution for Global Challenges)

हमारी पीढ़ी कुछ सबसे गंभीर वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रही है, जिनके लिए सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता है।

  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change): यह एक ऐसी समस्या है जो सीमाओं को नहीं पहचानती। पेरिस समझौते जैसे बहुपक्षीय मंच ही एकमात्र तरीका हैं जिनसे दुनिया के देश ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए सामूहिक लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं और एक-दूसरे को जवाबदेह ठहरा सकते हैं।
  • महामारी (Pandemics): COVID-19 ने दिखाया कि वायरस कितनी तेजी से दुनिया भर में फैल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसे बहुपक्षीय स्वास्थ्य मंच सूचना साझा करने, अनुसंधान के समन्वय और टीकों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • आतंकवाद (Terrorism): आतंकवादी नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करते हैं। उनका मुकाबला करने के लिए खुफिया जानकारी साझा करने, वित्तीय प्रवाह को रोकने और कानूनी सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे बहुपक्षीय मंचों की आवश्यकता होती है।

शांति और सुरक्षा बनाए रखना (Maintaining Peace and Security)

हालांकि युद्ध अभी भी होते हैं, लेकिन बहुपक्षीय संस्थानों ने बड़े पैमाने पर वैश्विक संघर्षों को रोकने में मदद की है। संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन (peacekeeping missions) दुनिया भर के संघर्ष क्षेत्रों में स्थिरता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, परमाणु अप्रसार संधि (NPT) और रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC) जैसे बहुपक्षीय समझौते सामूहिक विनाश के हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं। ये मंच देशों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए एक स्थान प्रदान करते हैं, जिससे छोटे-मोटे विवादों को पूर्ण युद्ध में बदलने से रोका जा सकता है। एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच के बिना, दुनिया अराजकता की ओर बढ़ सकती है।

आर्थिक स्थिरता और सतत विकास (Economic Stability and Sustainable Development)

वैश्विक अर्थव्यवस्था एक दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। एक देश में वित्तीय संकट तेजी से पूरी दुनिया में फैल सकता है, जैसा कि 2008 में देखा गया था। G20, IMF और विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय मंच वैश्विक वित्तीय प्रणाली को स्थिर करने, आर्थिक संकटों का प्रबंधन करने और समन्वित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में मदद करते हैं। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDGs) 2030 तक गरीबी, भुखमरी, असमानता को समाप्त करने और सभी के लिए एक बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए एक वैश्विक रोडमैप प्रदान करते हैं। इन लक्ष्यों को केवल बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है।

मानवाधिकारों और वैश्विक मानदंडों को बढ़ावा देना (Promoting Human Rights and Global Norms)

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights) जैसे दस्तावेजों के माध्यम से, बहुपक्षीय मंचों ने मानवीय गरिमा और अधिकारों के लिए वैश्विक मानक स्थापित किए हैं। ये संगठन दुनिया भर में मानवाधिकारों के हनन की निगरानी करते हैं, रिपोर्ट करते हैं और सरकारों पर उन्हें सुधारने के लिए दबाव डालते हैं। यद्यपि उनका प्रवर्तन हमेशा सही नहीं होता, लेकिन वे उत्पीड़ितों के लिए आशा की किरण और अत्याचारियों के लिए एक नैतिक बाधा के रूप में काम करते हैं। ये एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करते हैं, जहाँ “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का सिद्धांत लागू नहीं होता।

संक्षेप में, 21वीं सदी में बहुपक्षीय मंच अपरिहार्य हैं। वे वैश्विक समस्याओं के लिए समाधान खोजने, संघर्षों को रोकने और एक अधिक न्यायपूर्ण और समृद्ध दुनिया बनाने के लिए आवश्यक ढांचा प्रदान करते हैं।

6. बहुपक्षीय मंचों की चुनौतियाँ और आलोचनाएँ (Challenges and Criticisms of Multilateral Forums)

अपनी अपरिहार्य भूमिका के बावजूद, बहुपक्षीय मंच आलोचनाओं से परे नहीं हैं। वे अक्सर धीमी, अक्षम और शक्तिशाली देशों के हितों से प्रभावित होने के आरोपों का सामना करते हैं। इन चुनौतियों को समझना उनके भविष्य में सुधार के लिए आवश्यक है। एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच को इन बाधाओं को दूर करना होगा।

सकारात्मक पहलू (Pros / Sakaratmaka Pahlu)

सबसे पहले, आइए बहुपक्षीय मंचों के उन सकारात्मक पहलुओं पर विचार करें जो उन्हें वैश्विक व्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा बनाते हैं।

  • संवाद का मंच प्रदान करना (Providing a Platform for Dialogue): सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये मंच दुश्मन देशों को भी बातचीत की मेज पर लाते हैं। इससे गलतफहमियों को दूर करने और तनाव को कम करने में मदद मिलती है, जो अन्यथा संघर्ष का कारण बन सकती हैं।
  • वैधता और सामूहिक इच्छा (Legitimacy and Collective Will): जब कोई कार्रवाई, जैसे कि आर्थिक प्रतिबंध या सैन्य हस्तक्षेप, एक बहुपक्षीय मंच जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत की जाती है, तो उसे अधिक अंतरराष्ट्रीय वैधता प्राप्त होती है। यह एक देश की एकतरफा कार्रवाई की तुलना में अधिक स्वीकार्य होती है।
  • संसाधनों का एकत्रीकरण (Pooling of Resources): गरीबी उन्मूलन, बीमारी से लड़ने या आपदा राहत जैसे बड़े पैमाने के कार्यों के लिए भारी संसाधनों की आवश्यकता होती है। बहुपक्षीय मंच विभिन्न देशों से वित्तीय, तकनीकी और मानवीय संसाधनों को इकट्ठा करने में मदद करते हैं।
  • छोटे देशों को आवाज देना (Giving a Voice to Smaller Nations): संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे मंचों पर, प्रत्येक देश को एक वोट मिलता है, चाहे उसका आकार या शक्ति कुछ भी हो। यह छोटे और कम शक्तिशाली देशों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने और वैश्विक एजेंडे को प्रभावित करने का अवसर देता है।

नकारात्मक पहलू (Cons / Nakaratmaka Pahlu)

अब, उन चुनौतियों और आलोचनाओं पर नजर डालते हैं जिनका सामना ये मंच नियमित रूप से करते हैं।

  • संप्रभुता का क्षरण (Erosion of Sovereignty): कुछ आलोचकों का तर्क है कि बहुपक्षीय संधियों और संगठनों में शामिल होने से देशों की अपनी निर्णय लेने की क्षमता या संप्रभुता (sovereignty) कम हो जाती है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करना पड़ता है जो शायद उनके राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हों।
  • महान शक्ति की राजनीति और वीटो (Great Power Politics and the Veto): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में, पांच स्थायी सदस्यों (P5) के पास वीटो शक्ति है। इसका मतलब है कि इनमें से कोई भी एक देश किसी भी प्रस्ताव को रोक सकता है, भले ही बाकी सभी सदस्य सहमत हों। इसने अक्सर सीरिया और यूक्रेन जैसे संकटों में सार्थक कार्रवाई को रोका है। यह सबसे बड़ी आलोचना है जिसका कोई भी बहुपक्षीय मंच सामना करता है।
  • धीमी और नौकरशाही प्रक्रियाएं (Slow and Bureaucratic Processes): इतने सारे देशों के साथ सर्वसम्मति बनाना एक बहुत धीमी प्रक्रिया हो सकती है। नौकरशाही, लालफीताशाही और अंतहीन बहसें तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता वाले संकटों में प्रभावी प्रतिक्रिया में बाधा डाल सकती हैं।
  • प्रतिनिधित्व और जवाबदेही का अभाव (Lack of Representation and Accountability): विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे संगठनों की अक्सर पश्चिमी देशों के प्रभुत्व और विकासशील देशों की चिंताओं को नजरअंदाज करने के लिए आलोचना की जाती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना भी 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकता को दर्शाती है, न कि आज की दुनिया को, जिसमें भारत, ब्राजील और जर्मनी जैसी शक्तियां शामिल नहीं हैं। भारत सरकार ने इस विषय पर कई बार अपनी बात रखी है, जैसा कि विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर देखा जा सकता है।
  • प्रवर्तन तंत्र की कमी (Lack of Enforcement Mechanisms): कई मामलों में, बहुपक्षीय मंचों के पास अपने निर्णयों को लागू करने की शक्ति नहीं होती है। वे प्रस्ताव पारित कर सकते हैं या निंदा कर सकते हैं, लेकिन अगर कोई शक्तिशाली देश उनके नियमों का उल्लंघन करने का फैसला करता है, तो उसे रोकने के लिए बहुत कम किया जा सकता है।

यह स्पष्ट है कि बहुपक्षीय मंच एक दोधारी तलवार हैं। वे वैश्विक सहयोग के लिए अपरिहार्य हैं, लेकिन उनकी संरचनात्मक कमजोरियां अक्सर उन्हें अप्रभावी बना देती हैं। भविष्य की चुनौती इन कमजोरियों को दूर करने और उन्हें 21वीं सदी की वास्तविकताओं के लिए अधिक उत्तरदायी, प्रतिनिधि और प्रभावी बनाने में है।

7. भारत और बहुपक्षीय मंच: एक वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा (India and Multilateral Forums: Aspiration for Global Leadership)

भारत का बहुपक्षवाद के साथ एक लंबा और गहरा संबंध रहा है। स्वतंत्रता के बाद से, भारत ने एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और वैश्विक सहयोग का लगातार समर्थन किया है। भारत की विदेश नीति (India’s foreign policy) की आधारशिला हमेशा “रणनीतिक स्वायत्तता” (strategic autonomy) और “वसुधैव कुटुम्बकम” (the world is one family) के दर्शन पर आधारित रही है। यह दर्शन भारत को एक स्वाभाविक बहुपक्षीय खिलाड़ी बनाता है।

गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर एक अग्रणी शक्ति तक (From Non-Aligned Movement to a Leading Power)

शीत युद्ध के दौरान, जब दुनिया दो शक्ति गुटों – अमेरिका और सोवियत संघ – में बंटी हुई थी, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement – NAM) का नेतृत्व किया। यह विकासशील देशों का एक बहुपक्षीय मंच था जिसने दोनों महाशक्तियों से स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की वकालत की। यह भारत की उस शुरुआती प्रतिबद्धता को दर्शाता है जहाँ उसने किसी एक शक्ति के बजाय नियमों और सिद्धांतों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन किया। आज, भारत एक उभरती हुई आर्थिक और सैन्य शक्ति है और अब वह केवल एक संतुलनकारी शक्ति नहीं बल्कि एक अग्रणी शक्ति (leading power) के रूप में अपनी भूमिका देख रहा है।

विभिन्न बहुपक्षीय मंचों में भारत की सक्रिय भूमिका (India’s Active Role in Various Multilateral Forums)

भारत आज लगभग सभी प्रमुख बहुपक्षीय मंचों का एक सक्रिय और प्रभावशाली सदस्य है।

  • संयुक्त राष्ट्र (United Nations): भारत संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में से एक है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक सैनिक भेजे हैं। भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है, यह तर्क देते हुए कि परिषद को आज की दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए।
  • G20: भारत G20 का एक प्रमुख सदस्य है और उसने वैश्विक आर्थिक नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता एक ऐतिहासिक क्षण था, जहाँ भारत ने ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की आवाज को बुलंद किया और अफ्रीकी संघ को एक स्थायी सदस्य के रूप में शामिल कराया। यह दिखाता है कि भारत एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच के माध्यम से क्या हासिल कर सकता है।
  • ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (BRICS and SCO): भारत इन गैर-पश्चिमी मंचों का भी एक महत्वपूर्ण सदस्य है। ये मंच भारत को विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने और वैश्विक शासन पर वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।
  • क्वाड (QUAD): क्वाड में भारत की भागीदारी उसकी बहु-संरेखण (multi-alignment) की नीति को दर्शाती है। यह दिखाता है कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए विभिन्न देशों के साथ लचीले ढंग से काम करने को तैयार है। क्वाड को अक्सर चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ एक संतुलनकारी ताकत के रूप में देखा जाता है।

भारत का दृष्टिकोण: एक सुधारित बहुपक्षवाद (India’s Vision: A Reformed Multilateralism)

भारत मौजूदा बहुपक्षीय प्रणाली का एक हितधारक है, लेकिन यह इसकी कमियों से भी अच्छी तरह वाकिफ है। इसलिए, भारत “सुधारित बहुपक्षवाद” (reformed multilateralism) का एक प्रबल समर्थक है। भारत का मानना है कि 21वीं सदी के लिए एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच को निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए:

  • अधिक प्रतिनिधि (More Representative): वैश्विक शासन निकायों, विशेष रूप से UNSC को, आज की दुनिया की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए सुधार किया जाना चाहिए।
  • अधिक लोकतांत्रिक (More Democratic): निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और समावेशी होनी चाहिए, जिसमें विकासशील देशों की आवाज को अधिक महत्व दिया जाए।
  • अधिक प्रभावी (More Effective): संगठनों को नौकरशाही की बाधाओं को दूर करना चाहिए और वैश्विक चुनौतियों पर समय पर और निर्णायक कार्रवाई करने में सक्षम होना चाहिए।
  • मानव-केंद्रित (Human-Centric): विकास का ध्यान केवल जीडीपी के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि मानव कल्याण, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण पर होना चाहिए, जैसा कि भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता के दौरान जोर दिया।

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, विशाल जनसंख्या और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ, यह वैश्विक मंच पर एक अद्वितीय स्थान रखता है। भारत का लक्ष्य एक ऐसे बहुपक्षीय विश्व का निर्माण करना है जो अधिक न्यायसंगत, संतुलित और टिकाऊ हो।

8. बहुपक्षीय मंचों का भविष्य: सुधार या अप्रासंगिकता? (The Future of Multilateral Forums: Reform or Irrelevance?)

हम एक चौराहे पर खड़े हैं। एक तरफ, जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी वैश्विक चुनौतियाँ हमें पहले से कहीं ज्यादा करीब ला रही हैं। दूसरी तरफ, बढ़ता राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद (protectionism) और महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता वैश्विक सहयोग की नींव को कमजोर कर रहे हैं। इस संदर्भ में, बहुपक्षीय मंचों का भविष्य अनिश्चित लगता है। क्या वे इस अवसर पर उठकर खुद को सुधारेंगे, या वे धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाएंगे?

सुधार की तत्काल आवश्यकता (The Urgent Need for Reform)

यदि बहुपक्षीय मंचों को प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें बदलना होगा। केवल पुरानी संरचनाओं और प्रक्रियाओं पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। सुधार के लिए कुछ प्रमुख क्षेत्र हैं:

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार (Expansion of the UN Security Council): यह सबसे महत्वपूर्ण और सबसे कठिन सुधार है। भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील (G4) जैसे देशों को स्थायी सदस्यता दिए बिना, परिषद अपनी वैधता और प्रभावशीलता खोती रहेगी।
  • वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार (Reforming Global Financial Institutions): विश्व बैंक और आईएमएफ में वोटिंग कोटा को समायोजित करने की आवश्यकता है ताकि चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बढ़ती भूमिका को प्रतिबिंबित किया जा सके।
  • विश्व व्यापार संगठन को पुनर्जीवित करना (Reviving the WTO): डब्ल्यूटीओ का विवाद निपटान तंत्र अपीलीय निकाय में नियुक्तियों को रोके जाने के कारण पंगु हो गया है। इसे फिर से कार्यात्मक बनाना वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है।
  • निर्णय लेने में तेजी लाना (Making Decision-Making Faster): सर्वसम्मति की आवश्यकता को संशोधित करने और अधिक लचीले तंत्र, जैसे “बहुमत मतदान” या “इच्छुकों का गठबंधन” को अपनाने की आवश्यकता है ताकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर कार्रवाई में देरी न हो।

“बहुपक्षवाद 2.0”: नए अभिनेताओं को शामिल करना (Multilateralism 2.0: Including New Actors)

भविष्य का बहुपक्षीय मंच केवल राष्ट्र-राज्यों का क्लब नहीं हो सकता। आज, कई गैर-राज्य अभिनेता (non-state actors) जैसे कि बहुराष्ट्रीय निगम, गैर-सरकारी संगठन (NGOs), परोपकारी संगठन (जैसे बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन), और शहर वैश्विक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। “बहुपक्षवाद 2.0” की अवधारणा इन नए अभिनेताओं को वैश्विक शासन में शामिल करने की वकालत करती है।

  • निगमों की भूमिका: बड़ी तकनीकी कंपनियाँ जैसे गूगल और फेसबुक का प्रभाव कई छोटे देशों से भी अधिक है। उन्हें डेटा गोपनीयता, साइबर सुरक्षा और डिजिटल कराधान पर वैश्विक नियमों को आकार देने में शामिल करने की आवश्यकता है।
  • नागरिक समाज का महत्व: एमनेस्टी इंटरनेशनल और ग्रीनपीस जैसे एनजीओ मानवाधिकारों और पर्यावरण संरक्षण पर सरकारों को जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी विशेषज्ञता और जमीनी स्तर पर उपस्थिति बहुपक्षीय प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बना सकती है।

प्रौद्योगिकी की दोधारी तलवार (The Double-Edged Sword of Technology)

प्रौद्योगिकी बहुपक्षवाद के भविष्य को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। एक ओर, यह सहयोग के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म वैश्विक संवाद को सुविधाजनक बना सकते हैं, डेटा साझाकरण को बढ़ा सकते हैं और पारदर्शिता में सुधार कर सकते हैं। दूसरी ओर, यह नई चुनौतियाँ भी पैदा करती है। साइबर हमले, दुष्प्रचार अभियान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के हथियारीकरण जैसे मुद्दे नए प्रकार के बहुपक्षीय नियमों की मांग करते हैं। भविष्य के बहुपक्षीय मंच को इन तकनीकी वास्तविकताओं के अनुकूल होना होगा।

अंततः, बहुपक्षीय मंचों का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या दुनिया के नेता संकीर्ण राष्ट्रवाद से ऊपर उठकर साझा भविष्य में निवेश करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा सकते हैं। चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं, लेकिन सहयोग से इनकार करने की कीमत और भी अधिक होगी। एक सफल बहुपक्षीय मंच ही हमें एक स्थिर और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा सकता है।

9. निष्कर्ष: सहयोग की अनिवार्यता (Conclusion: The Inevitability of Cooperation)

हमने बहुपक्षीय मंचों की एक लंबी और विस्तृत यात्रा की है – उनकी परिभाषा और ऐतिहासिक विकास से लेकर उनके प्रकार, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं तक। यह स्पष्ट है कि ये मंच संपूर्ण नहीं हैं। वे अक्सर धीमी, नौकरशाही और शक्तिशाली देशों के हितों से प्रभावित होते हैं। उनकी आलोचना करना आसान है, और कई बार यह आलोचना जायज भी होती है। लेकिन उनकी कमियों के बावजूद, वे हमारे पास मौजूद सबसे अच्छा उपकरण हैं जो एक अराजक दुनिया में कुछ हद तक व्यवस्था, संवाद और सहयोग लाते हैं।

एक ऐसी दुनिया में जहाँ हमारी सबसे बड़ी समस्याएं – चाहे वह जलवायु परिवर्तन हो, महामारी हो, या आर्थिक मंदी हो – वैश्विक हैं, तो हमारे समाधान भी वैश्विक होने चाहिए। कोई भी देश, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, इन चुनौतियों का अकेले सामना नहीं कर सकता। एकतरफावाद और अलगाववाद अंततः विफलता की ओर ले जाते हैं। एक प्रभावी बहुपक्षीय मंच ही वह स्थान है जहाँ साझा समझ विकसित की जा सकती है, सामूहिक कार्रवाई पर सहमति बन सकती है, और एक बेहतर, सुरक्षित और अधिक न्यायपूर्ण दुनिया का निर्माण किया जा सकता है।

भारत जैसी उभरती शक्तियों के लिए, बहुपक्षीय मंच विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। ये उन्हें अपनी वैश्विक आकांक्षाओं को पूरा करने, अपने हितों की रक्षा करने और अंतरराष्ट्रीय एजेंडे को आकार देने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं। “सुधारित बहुपक्षवाद” की वकालत करके, भारत न केवल अपने लिए बल्कि पूरे ‘ग्लोबल साउथ’ के लिए एक अधिक समावेशी विश्व व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रहा है। भविष्य अनिश्चित हो सकता है, लेकिन एक बात निश्चित है: सहयोग कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्यता है। और इस सहयोग का केंद्र हमेशा एक मजबूत और प्रभावी बहुपक्षीय मंच ही रहेगा।

10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: द्विपक्षीय (bilateral) और बहुपक्षीय (multilateral) मंच में मुख्य अंतर क्या है?

उत्तर: मुख्य अंतर शामिल देशों की संख्या में है। एक द्विपक्षीय मंच या समझौते में केवल दो देश शामिल होते हैं, जैसे भारत और जापान के बीच एक व्यापार समझौता। इसके विपरीत, एक बहुपक्षीय मंच में तीन या अधिक देश शामिल होते हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र या विश्व व्यापार संगठन, जहाँ कई देश मिलकर सामान्य नियमों और लक्ष्यों पर सहमत होते हैं।

प्रश्न 2: दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच कौन सा है?

उत्तर: यद्यपि यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इस बात से सहमत होंगे कि संयुक्त राष्ट्र (United Nations) दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच है। इसकी लगभग सार्वभौमिक सदस्यता (193 देश) और व्यापक जनादेश, जिसमें शांति और सुरक्षा, विकास और मानवाधिकार शामिल हैं, इसे अद्वितीय बनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा मंच है जहाँ पूरी दुनिया एक साथ आ सकती है।

प्रश्न 3: बहुपक्षीय मंचों की अक्सर आलोचना क्यों की जाती है?

उत्तर: बहुपक्षीय मंचों की आलोचना कई कारणों से की जाती है। सबसे आम आलोचनाओं में शामिल हैं: धीमी निर्णय लेने की प्रक्रिया, शक्तिशाली देशों का अत्यधिक प्रभाव (विशेषकर यूएन सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के कारण), नौकरशाही और अक्षमता, और आज की दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने में विफलता। इन मंचों में अक्सर अपने निर्णयों को लागू करने के लिए प्रवर्तन शक्ति की कमी होती है।

प्रश्न 4: इन मंचों में भारत की क्या भूमिका है?

उत्तर: भारत एक प्रमुख और सक्रिय बहुपक्षीय खिलाड़ी है। यह G20, ब्रिक्स, SCO और क्वाड जैसे कई महत्वपूर्ण समूहों का सदस्य है। भारत की विदेश नीति का एक मुख्य स्तंभ “सुधारित बहुपक्षवाद” की वकालत करना है, जिसका अर्थ है कि वह वैश्विक संस्थानों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है ताकि वे अधिक प्रतिनिधि, लोकतांत्रिक और प्रभावी बन सकें। भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की एक प्रमुख आवाज के रूप में भी देखता है।

प्रश्न 5: क्या बहुपक्षवाद विफल हो रहा है?

उत्तर: यह कहना कि बहुपक्षवाद पूरी तरह से विफल हो रहा है, शायद सही नहीं होगा। यह सच है कि यह गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे बढ़ता राष्ट्रवाद और महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता। हालांकि, यह भी सच है कि वैश्विक सहयोग के बिना हम जलवायु परिवर्तन, महामारी या आर्थिक संकट जैसी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। इसलिए, बहुपक्षवाद विफल नहीं हो रहा है, बल्कि यह एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। भविष्य में इसे प्रासंगिक बने रहने के लिए खुद को सुधारना और अनुकूलित करना होगा। एक जीवंत बहुपक्षीय मंच की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी।

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