परिचय: भारत की सामरिक स्थिति और सीमाओं का महत्व
भारत की भौगोलिक स्थिति
भारत, दक्षिण एशिया के केंद्र में स्थित, एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे एक अद्वितीय सामरिक महत्व प्रदान करती है। उत्तर में ऊँचे हिमालय पर्वत से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर तक फैला यह देश अपनी लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के कारण हमेशा से भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। भारत की स्थलीय और समुद्री सीमाएँ इसे विभिन्न संस्कृतियों, अर्थव्यवस्थाओं और राजनीतिक प्रणालियों वाले कई पड़ोसी देशों से जोड़ती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का महत्व
किसी भी देश के लिए उसकी अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ केवल भौगोलिक रेखाएँ नहीं होतीं, बल्कि वे उसकी संप्रभुता, सुरक्षा और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक होती हैं। भारत के संदर्भ में, ये सीमाएँ दोस्ती, सहयोग, व्यापार के साथ-साथ तनाव, संघर्ष और विवादों का भी स्रोत रही हैं। इन सीमाओं का प्रभावी प्रबंधन देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह विषय छात्रों के लिए न केवल भूगोल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा को समझने में भी मदद करता है।
सीमाओं की जटिल प्रकृति
भारत की सीमाएँ दुनिया की कुछ सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण सीमाओं में से हैं। एक ओर पाकिस्तान और चीन के साथ ऐतिहासिक विवादों से ग्रस्त सीमाएँ हैं, तो दूसरी ओर नेपाल और भूटान के साथ खुली और मैत्रीपूर्ण सीमाएँ हैं। बांग्लादेश के साथ दुनिया की सबसे जटिल सीमाओं में से एक को सफलतापूर्वक सुलझाया गया है। इन विभिन्न प्रकार की सीमाओं का अध्ययन हमें भारत की विदेश नीति और रक्षा रणनीति की गहरी समझ प्रदान करता है।
इस लेख का उद्देश्य
इस लेख में, हम भारत की सभी प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं का विस्तृत विश्लेषण करेंगे। हम प्रत्येक पड़ोसी देश के साथ सीमा की लंबाई, उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, और उससे जुड़े प्रमुख विवादों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। हमारा उद्देश्य छात्रों को इस महत्वपूर्ण विषय पर एक व्यापक, तथ्यात्मक और आसानी से समझ में आने वाली जानकारी प्रदान करना है, ताकि वे भारत की भौगोलिक और सामरिक चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ सकें।
भारत की स्थलीय सीमाएँ: एक विस्तृत अवलोकन
भारत की कुल स्थलीय सीमा
भारत की कुल स्थलीय सीमा की लंबाई लगभग 15,106.7 किलोमीटर है। यह सीमा सात देशों के साथ लगती है, जो उत्तर-पश्चिम, उत्तर और पूर्व में स्थित हैं। ये देश हैं: पाकिस्तान, अफगानिस्तान (एक छोटा हिस्सा पाक-अधिकृत कश्मीर से लगता है), चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और म्यांमार। प्रत्येक सीमा की अपनी अलग भौगोलिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक विशेषताएँ हैं, जो भारत के द्विपक्षीय संबंधों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।
पड़ोसी देशों के साथ सीमाओं का वितरण
भारत अपनी सबसे लंबी स्थलीय सीमा बांग्लादेश के साथ (4,096.7 किमी) साझा करता है, और सबसे छोटी सीमा अफगानिस्तान के साथ (106 किमी)। चीन के साथ भारत की दूसरी सबसे लंबी सीमा (3,488 किमी) है, जिसके बाद पाकिस्तान (3,323 किमी), नेपाल (1,751 किमी), म्यांमार (1,643 किमी) और भूटान (699 किमी) का स्थान आता है। इन आंकड़ों को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि सीमा की लंबाई अक्सर सीमा प्रबंधन की जटिलता और संसाधनों की आवश्यकता को प्रभावित करती है।
सीमाओं की भौगोलिक विविधता
भारत की स्थलीय सीमाएँ अत्यधिक भौगोलिक विविधता दर्शाती हैं। पश्चिम में कच्छ के रण के दलदली मैदानों और थार के रेगिस्तान से लेकर उत्तर में हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों तक, और पूर्व में घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों तक, ये सीमाएँ विभिन्न प्रकार के भू-भागों से होकर गुजरती हैं। यह भौगोलिक विविधता न केवल सीमांकन को कठिन बनाती है, बल्कि सीमा सुरक्षा बलों के लिए भी गंभीर चुनौतियाँ पैदा करती है।
सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ
इन विशाल और विविध सीमाओं का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इसमें सीमा पार आतंकवाद, अवैध घुसपैठ, तस्करी (मादक पदार्थ, हथियार, और नकली मुद्रा), और जातीय संघर्ष जैसी समस्याएँ शामिल हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारत ने विभिन्न अर्धसैनिक बलों को तैनात किया है, जैसे कि सीमा सुरक्षा बल (BSF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), सशस्त्र सीमा बल (SSB), और असम राइफल्स (Assam Rifles), जो विशिष्ट सीमाओं की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं।
भारत-पाकिस्तान सीमा: तनाव और संघर्ष की रेखा
सीमा की लंबाई और संरचना
भारत और पाकिस्तान के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा लगभग 3,323 किलोमीटर लंबी है। यह सीमा गुजरात के कच्छ के रण से शुरू होकर राजस्थान, पंजाब और जम्मू-कश्मीर तक फैली हुई है। इस सीमा को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है: अंतर्राष्ट्रीय सीमा (IB), जिसे रेडक्लिफ रेखा भी कहा जाता है, जो गुजरात से जम्मू तक फैली है; नियंत्रण रेखा (LoC), जो जम्मू-कश्मीर में सैन्य नियंत्रण वाले क्षेत्रों को अलग करती है; और वास्तविक भूमि स्थिति रेखा (AGPL), जो सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र को विभाजित करती है।
सीमा का संवेदनशील स्वरूप
यह दुनिया की सबसे अधिक सैन्यीकृत और संवेदनशील सीमाओं में से एक है। 1947 में भारत के विभाजन के बाद से ही यह सीमा लगातार तनाव, संघर्ष और युद्धों का केंद्र रही है। दोनों देशों के बीच अविश्वास और शत्रुता की गहरी ऐतिहासिक जड़ों ने इस सीमा को स्थायी रूप से अस्थिर बना दिया है। सीमा पर बाड़बंदी, फ्लडलाइटिंग और निरंतर निगरानी भारत की सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रेडक्लिफ रेखा: एक ऐतिहासिक विभाजन
रेडक्लिफ रेखा का निर्धारण 1947 में ब्रिटिश वकील सर सिरिल रेडक्लिफ की अध्यक्षता में सीमा आयोग द्वारा किया गया था। इस आयोग को भारत और पाकिस्तान के बीच पंजाब और बंगाल प्रांतों को विभाजित करने का कार्य सौंपा गया था। जल्दबाजी में और अपर्याप्त जानकारी के आधार पर खींची गई इस रेखा ने लाखों लोगों को विस्थापित किया और भीषण सांप्रदायिक हिंसा को जन्म दिया। इस विभाजन की त्रासदी आज भी दोनों देशों के संबंधों पर अपनी छाया डालती है।
रेडक्लिफ रेखा की आलोचना
आलोचकों का तर्क है कि रेडक्लिफ रेखा का निर्धारण धार्मिक आधार पर किया गया था, लेकिन इसमें भौगोलिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। इसने कई गाँवों, परिवारों और जल संसाधनों को मनमाने ढंग से विभाजित कर दिया, जिससे लंबे समय तक चलने वाले विवादों की नींव पड़ी। यह रेखा भारत-पाकिस्तान के बीच कई सीमा विवादों का मूल कारण मानी जाती है।
नियंत्रण रेखा (Line of Control – LoC)
नियंत्रण रेखा (LoC) जम्मू और कश्मीर में लगभग 740 किलोमीटर लंबी एक वास्तविक सीमा है, जो भारतीय और पाकिस्तानी नियंत्रित क्षेत्रों को अलग करती है। यह 1947 के युद्ध के बाद बनी संघर्ष-विराम रेखा पर आधारित है, जिसे 1972 के शिमला समझौते के बाद आधिकारिक तौर पर LoC का नाम दिया गया। यह एक अंतर्राष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सीमा नहीं है, बल्कि एक सैन्यीकृत विभाजन रेखा है, जहाँ दोनों देशों की सेनाएँ आमने-सामने तैनात रहती हैं।
LoC पर निरंतर संघर्ष
LoC पर अक्सर संघर्ष-विराम का उल्लंघन, गोलीबारी और घुसपैठ की घटनाएँ होती रहती हैं। यह क्षेत्र आतंकवादियों द्वारा भारत में घुसपैठ करने का एक प्रमुख मार्ग रहा है, जिसे पाकिस्तानी सेना का समर्थन प्राप्त होने का आरोप लगाया जाता है। 1999 का कारगिल युद्ध भी LoC के उल्लंघन का ही परिणाम था। इस क्षेत्र में तनाव कम करने के लिए कई प्रयास किए गए हैं, लेकिन वे अक्सर असफल रहे हैं।
प्रमुख विवाद: संघर्ष के मूल कारण
1. जम्मू और कश्मीर विवाद
विवाद की जड़ें
जम्मू और कश्मीर विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष का सबसे प्रमुख और केंद्रीय मुद्दा है। इसकी जड़ें 1947 में भारत के विभाजन के समय से हैं, जब रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्र रहने का फैसला किया, लेकिन पाकिस्तानी कबाइलियों के आक्रमण के बाद उन्होंने भारत से सैन्य सहायता के बदले में भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।
पाकिस्तान का दावा और युद्ध
पाकिस्तान ने इस विलय को कभी स्वीकार नहीं किया और दावा किया कि मुस्लिम बहुल राज्य होने के कारण कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर दोनों देशों के बीच 1947, 1965 और 1999 में बड़े युद्ध हो चुके हैं। पाकिस्तान लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देकर इस क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करता रहा है, जबकि भारत कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानता है।
2. सियाचिन ग्लेशियर विवाद
दुनिया का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र
सियाचिन ग्लेशियर हिमालय के पूर्वी काराकोरम रेंज में स्थित है और यह दुनिया का सबसे ऊँचा युद्धक्षेत्र है। यह विवाद 1984 में तब शुरू हुआ जब भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ के तहत इस ग्लेशियर पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, क्योंकि पाकिस्तान इस पर कब्जा करने की तैयारी कर रहा था। यह क्षेत्र सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाकिस्तान और चीन के बीच एक सीधा लिंक बनने से रोकता है।
कठिन परिस्थितियाँ और लागत
इस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बनाए रखना दोनों देशों के लिए बेहद महंगा और खतरनाक है। यहाँ सैनिकों को दुश्मन की गोलियों से ज्यादा कठोर मौसम, हिमस्खलन और अत्यधिक ऊँचाई की बीमारियों से खतरा रहता है। दोनों देश इस विवाद को सुलझाने के लिए कई दौर की वार्ता कर चुके हैं, लेकिन आपसी अविश्वास के कारण कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
3. सर क्रीक विवाद
विवादित मुहाना
सर क्रीक गुजरात के कच्छ क्षेत्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच अरब सागर में स्थित 96 किलोमीटर लंबा एक ज्वारीय मुहाना है। विवाद इस मुहाने के सीमांकन को लेकर है। पाकिस्तान का दावा है कि सीमा मुहाने के पूर्वी किनारे पर होनी चाहिए, जैसा कि 1914 के एक संकल्प में दर्शाया गया था, जबकि भारत अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सीमा को मुहाने के बीच में (थलवेग सिद्धांत) मानता है।
आर्थिक और सामरिक महत्व
यह क्षेत्र मछली पकड़ने के लिए समृद्ध है और माना जाता है कि यहाँ तेल और गैस के विशाल भंडार हो सकते हैं। इस विवाद के कारण दोनों देशों के मछुआरे अक्सर अनजाने में सीमा पार कर जाते हैं और उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है, जो एक मानवीय मुद्दा भी बन गया है। इस विवाद को सुलझाने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है।
भारत-चीन सीमा: अनिश्चितता और भू-राजनीतिक टकराव
सीमा की लंबाई और क्षेत्र
भारत और चीन के बीच लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो दुनिया की सबसे लंबी अविवादित सीमाओं में से एक है। यह सीमा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरती है। स्पष्ट सीमांकन की कमी और दोनों देशों के परस्पर विरोधी दावों के कारण यह सीमा अत्यधिक तनावपूर्ण और अस्थिर है। इस सीमा को मुख्य रूप से तीन सेक्टरों में बांटा गया है: पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख), मध्य सेक्टर (हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) और पूर्वी सेक्टर (सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश)।
सीमा की अनिश्चित प्रकृति
भारत-चीन सीमा का अधिकांश हिस्सा स्पष्ट रूप से परिभाषित और सीमांकित नहीं है। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की अपनी-अपनी धारणा रखते हैं, जो अक्सर एक-दूसरे के दावों के साथ ओवरलैप होती है। यह अस्पष्टता अक्सर गश्त के दौरान दोनों सेनाओं के बीच टकराव और गतिरोध का कारण बनती है, जैसा कि हाल के वर्षों में डोकलाम और गलवान घाटी में देखा गया है।
मैकमोहन रेखा: एक विवादित विरासत
मैकमोहन रेखा पूर्वी सेक्टर में भारत और चीन के बीच सीमा का निर्धारण करती है। इसे 1914 के शिमला समझौते में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों के बीच निर्धारित किया गया था। इस समझौते पर चीन के प्रतिनिधि ने हस्ताक्षर नहीं किए थे। भारत मैकमोहन रेखा को एक वैध अंतर्राष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि चीन इसे ‘औपनिवेशिक विरासत’ कहकर खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है।
चीन का रुख
चीन का तर्क है कि तिब्बत उस समय एक संप्रभु राष्ट्र नहीं था और उसे किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं था। इसलिए, वह शिमला समझौते और मैकमोहन रेखा को अवैध मानता है। यह ऐतिहासिक असहमति आज भी पूर्वी सेक्टर में सीमा विवाद का मुख्य कारण बनी हुई है, जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में लगातार तनाव बना रहता है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control – LAC)
वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) वह रेखा है जो भारतीय नियंत्रित क्षेत्र को चीनी नियंत्रित क्षेत्र से अलग करती है। यह एक स्पष्ट रूप से सीमांकित रेखा नहीं है, बल्कि दोनों देशों की सेनाओं की स्थिति पर आधारित एक अवधारणा है। LAC की लंबाई और स्थिति को लेकर दोनों पक्षों में भारी मतभेद है। भारत LAC को 3,488 किमी लंबा मानता है, जबकि चीन इसे केवल 2,000 किमी के आसपास मानता है।
LAC पर अस्पष्टता
LAC पर कई ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ दोनों देशों की धारणाएँ एक-दूसरे को ओवरलैप करती हैं, जिससे तनाव और टकराव की स्थिति पैदा होती है। 1993 और 1996 में, दोनों देशों ने LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए, लेकिन इन समझौतों का अक्सर उल्लंघन होता रहा है। LAC को स्पष्ट करने और सीमांकन करने के प्रयास अब तक असफल रहे हैं।
प्रमुख विवाद: हिमालयी टकराव
1. अक्साई चिन विवाद
पश्चिमी सेक्टर का विवाद
अक्साई चिन पश्चिमी सेक्टर में स्थित एक विशाल उच्च-ऊंचाई वाला पठार है, जो लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। भारत इसे अपने लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा मानता है, जबकि इस पर चीन का वास्तविक नियंत्रण है। चीन ने 1950 के दशक में इस क्षेत्र में एक रणनीतिक सड़क (G219) का निर्माण किया था जो तिब्बत को शिनजियांग से जोड़ती है। भारत को इस सड़क के बारे में बहुत बाद में पता चला, जो 1962 के युद्ध का एक प्रमुख कारण बना।
रणनीतिक महत्व
अक्साई चिन पर चीन का नियंत्रण उसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ प्रदान करता है। यह चीन को अपने दो अशांत प्रांतों, तिब्बत और शिनजियांग पर नियंत्रण बनाए रखने में मदद करता है। भारत के लिए, इस क्षेत्र का नुकसान एक बड़ी रणनीतिक हार है। यह विवाद आज भी भारत-चीन संबंधों में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
2. अरुणाचल प्रदेश विवाद
पूर्वी सेक्टर का विवाद
चीन पूर्वी सेक्टर में अरुणाचल प्रदेश के लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अपना दावा करता है और इसे ‘दक्षिण तिब्बत’ (Zangnan) कहता है। चीन मैकमोहन रेखा को अवैध मानता है और अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा बताता है। वह अक्सर अरुणाचल प्रदेश में भारतीय नेताओं के दौरे पर आपत्ति जताता है और वहाँ के निवासियों को स्टेपल वीजा जारी करके अपने दावे को मजबूत करने की कोशिश करता है।
भारत की दृढ़ स्थिति
भारत चीन के इन दावों को पूरी तरह से खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को अपना अभिन्न और अविभाज्य अंग मानता है। भारत ने इस क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास, जैसे कि सड़कों, पुलों और हवाई पट्टियों का निर्माण करके अपनी स्थिति को मजबूत किया है। यह विवाद दोनों देशों के बीच संबंधों में एक और प्रमुख कांटा बना हुआ है।
3. डोकलाम विवाद
ट्राई-जंक्शन पर टकराव
2017 में डोकलाम में भारत और चीन के बीच 73 दिनों तक सैन्य गतिरोध चला। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन के बीच एक ट्राई-जंक्शन पर स्थित है। विवाद तब शुरू हुआ जब चीनी सेना ने इस क्षेत्र में सड़क निर्माण का प्रयास किया, जिसका भारतीय और भूटानी सैनिकों ने विरोध किया। भूटान इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है, और भारत-भूटान मैत्री संधि के तहत भारत भूटान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
सामरिक चिंताएँ
भारत के लिए, डोकलाम में चीनी सड़क का निर्माण एक गंभीर सुरक्षा चिंता थी, क्योंकि यह चीन को भारत के संवेदनशील ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ (चिकन नेक) के करीब ले आता, जो पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। कूटनीतिक बातचीत के बाद दोनों सेनाएँ पीछे हट गईं, लेकिन इस घटना ने सीमा पर तनाव को और बढ़ा दिया।
4. गलवान घाटी संघर्ष
हिंसक टकराव
जून 2020 में, लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच एक हिंसक झड़प हुई, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए और चीन को भी भारी नुकसान हुआ। यह पिछले 45 वर्षों में दोनों देशों के बीच सबसे गंभीर सीमा संघर्ष था। यह झड़प तब हुई जब चीनी सैनिकों ने LAC पर यथास्थिति को एकतरफा बदलने का प्रयास किया।
संबंधों पर प्रभाव
इस घटना ने भारत-चीन संबंधों को दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुँचा दिया। इसके बाद से दोनों देशों ने LAC पर बड़ी संख्या में सैनिकों और हथियारों की तैनाती की है। तनाव कम करने के लिए कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी तक पूरी तरह से सफलता नहीं मिली है।
भारत-नेपाल सीमा: दोस्ती और मतभेद
सीमा की विशेषताएँ और ऐतिहासिक संबंध
भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा है जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम राज्यों से लगती है। यह दुनिया की कुछ अनूठी सीमाओं में से एक है क्योंकि यह एक ‘खुली सीमा’ है। दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे के देश में आने-जाने के लिए वीजा या पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होती है। यह व्यवस्था 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि पर आधारित है।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव
भारत और नेपाल के बीच गहरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई संबंध हैं, जिन्हें अक्सर ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’ कहा जाता है। यह खुली सीमा इन संबंधों को और मजबूत करती है और दोनों देशों के लोगों के बीच आवागमन और व्यापार को सुगम बनाती है। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं और भारतीय भी नेपाल में व्यापार और तीर्थयात्रा के लिए जाते हैं।
खुली सीमा और उसके प्रभाव
खुली सीमा दोनों देशों के लिए फायदेमंद है, लेकिन यह कुछ चुनौतियाँ भी पैदा करती है। इसका दुरुपयोग अक्सर असामाजिक तत्वों द्वारा अवैध गतिविधियों, जैसे तस्करी (मानव, मादक पदार्थ, और नकली मुद्रा), और आतंकवादियों द्वारा घुसपैठ के लिए किया जाता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए, दोनों देशों ने सशस्त्र सीमा बल (SSB) और नेपाल सशस्त्र पुलिस बल को तैनात किया है, जो सीमा पर संयुक्त गश्त करते हैं।
प्रबंधन की आवश्यकता
खुली सीमा के बावजूद, इसके बेहतर प्रबंधन और विनियमन की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। दोनों देश सीमा पर सुरक्षा सहयोग बढ़ाने, खुफिया जानकारी साझा करने और अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। हालांकि, सीमा का पूरी तरह से बंद होना दोनों देशों के ऐतिहासिक और लोगों के बीच संबंधों के लिए हानिकारक होगा।
प्रमुख विवाद: कालापानी और सुस्ता
1. कालापानी-लिपुलेख-लिंपियाधुरा विवाद
विवाद की उत्पत्ति
यह विवाद उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लगभग 372 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को लेकर है। इस विवाद की जड़ें 1816 की सुगौली संधि में हैं, जो नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। संधि के अनुसार, काली नदी (जिसे महाकाली नदी भी कहा जाता है) नेपाल की पश्चिमी सीमा निर्धारित की गई थी। विवाद इस बात पर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्रोत कौन सा है।
दोनों देशों के दावे
नेपाल का दावा है कि काली नदी लिंपियाधुरा से निकलती है, और इसलिए लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी का पूरा क्षेत्र उसका है। वहीं, भारत का मानना है कि नदी का उद्गम कालापानी के पास है और यह क्षेत्र उसके उत्तराखंड राज्य का हिस्सा है। यह विवाद 2020 में तब और बढ़ गया जब भारत ने लिपुलेख दर्रे तक एक सड़क का उद्घाटन किया और इसके जवाब में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें इस पूरे क्षेत्र को अपने हिस्से के रूप में दिखाया गया।
2. सुस्ता क्षेत्र विवाद
नदी के मार्ग परिवर्तन से उपजा विवाद
सुस्ता क्षेत्र बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले और नेपाल के नवलपरासी जिले के बीच स्थित है। यह विवाद गंडक नदी (नेपाल में नारायणी नदी) द्वारा अपने मार्ग में किए गए परिवर्तन के कारण उत्पन्न हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, गंडक नदी को दोनों देशों के बीच सीमा माना जाता था। समय के साथ, नदी ने अपना मार्ग पूर्व की ओर बदल दिया, जिससे पहले नदी के पूर्व में स्थित भूमि अब पश्चिम में आ गई है।
भूमि पर दावा
नेपाल का दावा है कि चूँकि यह भूमि ऐतिहासिक रूप से उसकी थी, इसलिए नदी के मार्ग परिवर्तन के बावजूद यह उसी की रहनी चाहिए। भारत का तर्क है कि सीमा नदी के बदलते प्रवाह के साथ निर्धारित होनी चाहिए। इस विवाद के कारण सुस्ता क्षेत्र में अक्सर दोनों तरफ के निवासियों के बीच तनाव और झड़पें होती रहती हैं। दोनों देश इस मुद्दे को सर्वेक्षण और बातचीत के माध्यम से सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं।
भारत-भूटान सीमा: शांति और सहयोग का प्रतीक
सीमा की प्रकृति और द्विपक्षीय संबंध
भारत और भूटान के बीच 699 किलोमीटर लंबी सीमा है जो असम, अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और सिक्किम राज्यों से लगती है। यह सीमा भारत की सबसे शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण सीमाओं में से एक है। दोनों देशों के बीच विशेष और घनिष्ठ संबंध हैं, जो आपसी विश्वास, सम्मान और समझ पर आधारित हैं। 1949 की भारत-भूटान मैत्री संधि इन संबंधों का आधार है, जिसे 2007 में अद्यतन किया गया था।
सहयोग के स्तंभ
भारत, भूटान का सबसे बड़ा व्यापारिक और विकास भागीदार है। भारत ने भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास, विशेष रूप से जलविद्युत क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सीमा पर सुरक्षा मामलों में भी दोनों देशों के बीच घनिष्ठ सहयोग है। भारतीय सेना भूटानी सेना को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करती है, और दोनों देश सीमा पर सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करते हैं।
एक शांतिपूर्ण सीमा का उदाहरण
भारत-भूटान सीमा काफी हद तक खुली है और दोनों देशों के लोगों के बीच मुक्त आवागमन की अनुमति देती है। सीमा पर कोई बड़ा विवाद नहीं है, और सीमांकन का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। यह सीमा दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह दर्शाता है कि कैसे दो पड़ोसी देश आपसी सम्मान और सहयोग के माध्यम से एक स्थिर और सुरक्षित सीमा बनाए रख सकते हैं।
सीमा प्रबंधन
इस सीमा की सुरक्षा का जिम्मा सशस्त्र सीमा बल (SSB) पर है। यद्यपि सीमा शांतिपूर्ण है, फिर भी अवैध व्यापार और तस्करी जैसी छोटी-मोटी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियां इन मुद्दों से निपटने के लिए नियमित रूप से सूचनाओं का आदान-प्रदान करती हैं और समन्वित प्रयास करती हैं।
डोकलाम और चीन का बढ़ता प्रभाव
हालांकि भारत-भूटान सीमा शांतिपूर्ण है, लेकिन भूटान और चीन के बीच सीमा विवाद का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ता है। 2017 का डोकलाम गतिरोध इसका एक प्रमुख उदाहरण था। चीन, भूटान के पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्रों पर अपना दावा करता है, जो भारत की सुरक्षा के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। चीन लगातार भूटान पर राजनयिक संबंध स्थापित करने और सीमा विवाद को अपनी शर्तों पर सुलझाने के लिए दबाव बना रहा है।
भारत की चिंताएँ
भारत इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों को लेकर चिंतित है, क्योंकि यह भारत की सुरक्षा, विशेष रूप से सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। भारत, भूटान की संप्रभुता का सम्मान करते हुए, सीमा विवाद पर भूटान के रुख का समर्थन करता है। भूटान और चीन के बीच चल रही सीमा वार्ता पर भारत की कड़ी नजर है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी भी समाधान से भारत के सुरक्षा हितों से समझौता न हो।
भारत-बांग्लादेश सीमा: सहयोग और चुनौतियों का संगम
विश्व की पाँचवीं सबसे लंबी स्थलीय सीमा
भारत और बांग्लादेश 4,096.7 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं, जो दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी स्थलीय सीमा है। यह सीमा भारत के पांच राज्यों – पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम – से लगती है। यह सीमा भौगोलिक रूप से बहुत जटिल है, जो घनी आबादी वाले गांवों, नदियों, खेतों और जंगलों से होकर गुजरती है। इस जटिलता के कारण सीमा का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है।
सीमा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस सीमा का निर्धारण भी 1947 में रेडक्लिफ रेखा के माध्यम से हुआ था, जब बंगाल का विभाजन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) और पश्चिम बंगाल (भारत) के बीच हुआ था। इस विभाजन ने कई सीमा संबंधी विसंगतियां और विवाद पैदा किए, जिनमें सबसे प्रमुख एन्क्लेव (enclaves) या छिटमहलों की समस्या थी, जिसे दशकों बाद सुलझाया गया।
सीमांकन का जटिल इतिहास
रेडक्लिफ रेखा के मनमाने निर्धारण के कारण, कई क्षेत्रों में सीमा स्पष्ट नहीं थी। इसने एन्क्लेव की समस्या को जन्म दिया – एक देश के क्षेत्र के भीतर दूसरे देश के भू-भाग। भारत के 111 एन्क्लेव बांग्लादेश के अंदर थे, और बांग्लादेश के 51 एन्क्लेव भारत के अंदर थे। इन एन्क्लेवों में रहने वाले लोग दशकों तक राज्यविहीन और बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहे, क्योंकि उनकी अपनी सरकार तक उनकी कोई पहुंच नहीं थी।
चुनौतियों का दौर
इस जटिल और छिद्रपूर्ण सीमा ने कई समस्याओं को जन्म दिया, जिनमें अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, पशु तस्करी, और मादक पदार्थों की तस्करी प्रमुख हैं। भारत ने घुसपैठ और तस्करी को रोकने के लिए सीमा पर बाड़ लगाने का एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है, लेकिन नदियों और कठिन भू-भाग के कारण यह काम अभी भी अधूरा है। सीमा पर होने वाली घटनाओं से कभी-कभी दोनों देशों के संबंधों में तनाव भी पैदा होता है।
प्रमुख मुद्दे और ऐतिहासिक समाधान
1. सीमा पार घुसपैठ और तस्करी
एक गंभीर चुनौती
आर्थिक अवसरों की तलाश में बांग्लादेश से भारत में अवैध प्रवासन एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है, जिसने असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सामाजिक तनाव पैदा किया है। इसके अलावा, सीमा का उपयोग रोहिंग्या शरणार्थियों द्वारा भारत में प्रवेश के लिए भी किया जाता रहा है। तस्करी, विशेष रूप से पशुओं और नशीले पदार्थों की, एक और बड़ी चुनौती है जो दोनों देशों के लिए सुरक्षा और आर्थिक चिंता का विषय है।
उठाए गए कदम
इन चुनौतियों से निपटने के लिए, भारत और बांग्लादेश ने सीमा प्रबंधन में सहयोग बढ़ाया है। इसमें समन्वित सीमा गश्त (Coordinated Border Patrols), खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान, और सीमा हाटों की स्थापना शामिल है ताकि स्थानीय व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके और अवैध गतिविधियों को कम किया जा सके। सीमा सुरक्षा बल (BSF) और बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (BGB) के बीच नियमित बैठकें भी होती हैं।
2. भूमि सीमा समझौता (Land Boundary Agreement – LBA)
एक ऐतिहासिक उपलब्धि
2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौते (LBA) का अनुसमर्थन दोनों देशों के संबंधों में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर था। इस समझौते के तहत, दोनों देशों ने दशकों पुरानी एन्क्लेव की समस्या को सुलझाया। भारत ने अपने 111 एन्क्लेव बांग्लादेश को सौंप दिए, और बांग्लादेश ने अपने 51 एन्क्लेव भारत को सौंप दिए। एन्क्लेव के निवासियों को अपनी पसंद की नागरिकता चुनने का विकल्प दिया गया।
समझौते का प्रभाव
इस समझौते ने न केवल एक जटिल मानवीय समस्या का समाधान किया, बल्कि दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास और सहयोग को भी मजबूत किया। इसने सीमा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने और उसके बेहतर प्रबंधन का मार्ग प्रशस्त किया। यह समझौता इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे जटिल सीमा विवादों को शांतिपूर्ण और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाया जा सकता है।
3. तीस्ता नदी जल विवाद
एक अनसुलझा मुद्दा
तीस्ता नदी, जो सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश में बहती है, के जल बंटवारे को लेकर दोनों देशों के बीच एक लंबे समय से विवाद चल रहा है। बांग्लादेश, जो नदी के निचले हिस्से में स्थित है, का तर्क है कि उसे शुष्क मौसम में सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए नदी के पानी का एक बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए। वह भारत पर नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने का आरोप लगाता है।
समाधान की राह में बाधाएँ
इस मुद्दे पर एक समझौते पर पहुंचना मुश्किल रहा है क्योंकि भारत में पश्चिम बंगाल सरकार को इस बात की चिंता है कि जल बंटवारे से उत्तरी बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी की आपूर्ति प्रभावित होगी। भारत एक संघीय देश है और जल एक राज्य का विषय है, इसलिए किसी भी अंतर्राष्ट्रीय समझौते के लिए राज्य सरकार की सहमति आवश्यक है। यह विवाद दोनों देशों के मैत्रीपूर्ण संबंधों के बावजूद एक अनसुलझा मुद्दा बना हुआ है।
भारत-म्यांमार सीमा: भौगोलिक जटिलता और रणनीतिक महत्व
सीमा का भौगोलिक स्वरूप और जनजातीय संबंध
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम राज्यों से लगती है। यह सीमा घने जंगलों, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों और नदियों से होकर गुजरती है, जिससे इसका प्रबंधन और निगरानी करना बेहद कठिन हो जाता है। सीमा का अधिकांश हिस्सा अभी भी पूरी तरह से सीमांकित नहीं है, और कई स्थानों पर केवल पारंपरिक समझ के आधार पर सीमा मानी जाती है।
जातीय और सांस्कृतिक जुड़ाव
इस सीमा की एक अनूठी विशेषता यह है कि सीमा के दोनों ओर समान जातीय और जनजातीय समुदाय रहते हैं, जैसे नागा, मिजो और कुकी। इन समुदायों के बीच गहरे पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं जो अंतर्राष्ट्रीय सीमा को नहीं मानते हैं। यह जातीय जुड़ाव सीमा प्रबंधन को और भी जटिल बना देता है।
मुक्त आवाजाही व्यवस्था (Free Movement Regime – FMR)
सीमा पर रहने वाले जनजातीय समुदायों के पारंपरिक संबंधों को बनाए रखने के लिए, भारत और म्यांमार के बीच एक मुक्त आवाजाही व्यवस्था (FMR) लागू है। इस व्यवस्था के तहत, सीमा के दोनों ओर रहने वाले जनजातीय लोग बिना वीजा के एक-दूसरे के क्षेत्र में 16 किलोमीटर अंदर तक जा सकते हैं और 14 दिनों तक रह सकते हैं। इसका उद्देश्य स्थानीय व्यापार और लोगों के बीच संपर्क को सुविधाजनक बनाना है।
FMR की चुनौतियाँ
हालांकि FMR का उद्देश्य अच्छा है, लेकिन इसका दुरुपयोग उग्रवादियों, तस्करों और अन्य आपराधिक तत्वों द्वारा सीमा पार करने के लिए किया जाता है। उग्रवादी समूह भारतीय सुरक्षा बलों पर हमला करने के बाद म्यांमार के दुर्गम इलाकों में शरण ले लेते हैं। हाल के वर्षों में, भारत सरकार ने FMR की समीक्षा करने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सीमा पर बाड़ लगाने पर विचार किया है, जिसका स्थानीय समुदायों ने विरोध किया है।
प्रमुख चुनौतियाँ: उग्रवाद और तस्करी
1. उग्रवाद और सीमा पार गतिविधियाँ
उग्रवादी समूहों के लिए सुरक्षित पनाहगाह
पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय कई उग्रवादी समूह, जैसे NSCN-K, ULFA, और मणिपुरी विद्रोही संगठन, म्यांमार के सीमावर्ती क्षेत्रों को अपने प्रशिक्षण शिविरों, ठिकानों और सुरक्षित पनाहगाहों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। वे भारत में हमलों को अंजाम देने के बाद आसानी से सीमा पार कर म्यांमार भाग जाते हैं। यह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती है।
संयुक्त सैन्य अभियान
इस समस्या से निपटने के लिए, भारत और म्यांमार की सेनाओं ने संयुक्त सैन्य अभियान (जैसे ‘ऑपरेशन सनराइज’) चलाए हैं ताकि सीमा पार उग्रवादी शिविरों को नष्ट किया जा सके। दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग में सुधार हुआ है, लेकिन म्यांमार की राजनीतिक अस्थिरता और दुर्गम भू-भाग के कारण इन समूहों को पूरी तरह से खत्म करना मुश्किल है।
2. मादक पदार्थों की तस्करी
गोल्डन ट्राएंगल का प्रभाव
म्यांमार तथाकथित ‘गोल्डन ट्राएंगल’ का हिस्सा है, जो दुनिया के प्रमुख अफीम और हेरोइन उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। भारत-म्यांमार सीमा मादक पदार्थों, विशेष रूप से हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स (जैसे याबा टैबलेट) की तस्करी का एक प्रमुख मार्ग बन गई है। यह तस्करी न केवल भारत के युवाओं के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य खतरा पैदा करती है, बल्कि इससे प्राप्त धन का उपयोग उग्रवादी गतिविधियों को वित्तपोषित करने के लिए भी किया जाता है।
रोकथाम के उपाय
इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए असम राइफल्स, जो इस सीमा की सुरक्षा करती है, और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियां कड़ी निगरानी रखती हैं। दोनों देश खुफिया जानकारी साझा करने और तस्करी नेटवर्क को खत्म करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। हालांकि, सीमा की छिद्रपूर्ण प्रकृति के कारण इस पर पूरी तरह से रोक लगाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भारत की समुद्री सीमाएँ: एक विशाल विस्तार
विशाल तटरेखा का सामरिक और आर्थिक महत्व
भारत एक प्रायद्वीपीय देश है जिसकी मुख्य भूमि पर 6,100 किलोमीटर और द्वीपों (अंडमान और निकोबार, और लक्षद्वीप) को मिलाकर कुल 7,516.6 किलोमीटर लंबी तटरेखा है। यह विशाल तटरेखा भारत को एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र बनाती है और हिंद महासागर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति प्रदान करती है। भारत की समुद्री सीमाएँ सात देशों – पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका, इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यांमार और बांग्लादेश – के साथ लगती हैं।
आर्थिक जीवनरेखा
भारत का लगभग 95% अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मात्रा के हिसाब से और 70% मूल्य के हिसाब से समुद्री मार्गों से होता है। इसके अलावा, भारत का विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ) 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैला है, जो मछली पकड़ने, तेल और प्राकृतिक गैस के अन्वेषण, और अन्य समुद्री संसाधनों से समृद्ध है। इसलिए, समुद्री सीमाओं की सुरक्षा भारत की आर्थिक समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पड़ोसी देशों के साथ समुद्री सीमाएँ
भारत ने अपने अधिकांश समुद्री पड़ोसियों के साथ समुद्री सीमाओं का सफलतापूर्वक सीमांकन कर लिया है। यह सीमांकन संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के सिद्धांतों के आधार पर किया गया है। बांग्लादेश के साथ समुद्री सीमा विवाद को 2014 में एक अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के माध्यम से शांतिपूर्वक सुलझा लिया गया, जो समुद्री विवादों के समाधान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी
भारतीय नौसेना (Indian Navy) और भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) भारत की समुद्री सीमाओं और समुद्री हितों की रक्षा के लिए जिम्मेदार हैं। वे समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी, और अवैध मछली पकड़ने जैसी चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए इस विशाल क्षेत्र में निरंतर निगरानी और गश्त करते हैं। 26/11 मुंबई हमलों के बाद, भारत ने अपनी तटीय सुरक्षा प्रणाली को काफी मजबूत किया है।
प्रमुख मुद्दे और विवाद
1. श्रीलंका के साथ मछुआरों का मुद्दा
कच्चाथीवू और पाक जलडमरूमध्य
भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य में मछुआरों का मुद्दा एक लगातार बना रहने वाला मानवीय और कूटनीतिक मुद्दा है। भारतीय मछुआरे, विशेष रूप से तमिलनाडु के, अक्सर मछली पकड़ते हुए अनजाने में श्रीलंकाई जलक्षेत्र में चले जाते हैं, जहाँ उन्हें श्रीलंकाई नौसेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है और उनकी नौकाओं को जब्त कर लिया जाता है। यह विवाद 1974 के उस समझौते से और बढ़ गया जिसके तहत भारत ने कच्चाथीवू द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया था, जो पारंपरिक रूप से भारतीय मछुआरों के लिए एक महत्वपूर्ण मछली पकड़ने का क्षेत्र था।
समाधान के प्रयास
दोनों देश इस संवेदनशील मुद्दे को सुलझाने के लिए लगातार बातचीत कर रहे हैं। इसमें संयुक्त गश्त, मछुआरों के लिए हॉटलाइन स्थापित करना, और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने को बढ़ावा देना शामिल है ताकि पाक जलडमरूमध्य पर दबाव कम हो सके। हालांकि, स्थायी समाधान अभी भी दूर है और यह दोनों देशों के संबंधों में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है।
2. समुद्री डकैती और सुरक्षा
हिंद महासागर में खतरा
हिंद महासागर, विशेष रूप से अदन की खाड़ी के पास, समुद्री डकैती के लिए एक हॉटस्पॉट रहा है। सोमालियाई समुद्री डाकुओं ने कई व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग लेन के लिए खतरा पैदा हो गया है। भारतीय नौसेना ने इस क्षेत्र में समुद्री डकैती विरोधी अभियानों में सक्रिय रूप से भाग लिया है और कई जहाजों को बचाया है, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता के रूप में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है।
क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचा
भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक सहयोगी और नियम-आधारित सुरक्षा ढाँचा बनाने के लिए अन्य देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। ‘सागर’ (Security and Growth for All in the Region) पहल के माध्यम से, भारत अपने समुद्री पड़ोसियों की क्षमता निर्माण में मदद कर रहा है और समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) बढ़ाने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान कर रहा है।
3. दक्षिण चीन सागर में भारत की भूमिका
एक बढ़ता हुआ विवाद
हालांकि दक्षिण चीन सागर भारत की प्रत्यक्ष समुद्री सीमा से नहीं लगता है, लेकिन यह भारत के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है। भारत का 50% से अधिक व्यापार इस क्षेत्र से होकर गुजरता है। चीन इस पूरे क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और जिससे कई दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ उसका विवाद है।
भारत का रुख
भारत दक्षिण चीन सागर में नेविगेशन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation and Overflight) का समर्थन करता है और चाहता है कि विवादों को UNCLOS के अनुसार शांतिपूर्वक हल किया जाए। भारत इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ा रहा है और वियतनाम, फिलीपींस जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग मजबूत कर रहा है ताकि एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सुनिश्चित किया जा सके।
सीमा प्रबंधन: चुनौतियाँ और रणनीतियाँ
सीमा सुरक्षा बलों की भूमिका
भारत की विशाल और विविध सीमाओं का प्रबंधन एक जटिल कार्य है जिसे विभिन्न केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) द्वारा किया जाता है। प्रत्येक बल को एक विशिष्ट सीमा की सुरक्षा का जिम्मा सौंपा गया है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाओं की रक्षा करता है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) चीन के साथ सीमा पर तैनात है। सशस्त्र सीमा बल (SSB) नेपाल और भूटान की शांतिपूर्ण सीमाओं की निगरानी करता है, और असम राइफल्स भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है।
समन्वय और सहयोग
इन बलों के अलावा, भारतीय सेना भी नियंत्रण रेखा (LoC) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रभावी सीमा प्रबंधन के लिए इन सभी बलों, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच घनिष्ठ समन्वय और सहयोग आवश्यक है। यह समन्वय सीमा पार खतरों से निपटने और एक एकीकृत सुरक्षा प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में मदद करता है।
एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (IBMS)
प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से सीमा प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए, भारत सरकार एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (IBMS) को लागू कर रही है। इस प्रणाली के तहत, सीमाओं पर अत्याधुनिक निगरानी उपकरण, जैसे थर्मल इमेजर, नाइट विजन डिवाइस, रडार, ड्रोन और भूमिगत सेंसर लगाए जा रहे हैं। इन सभी उपकरणों को एक कमांड और कंट्रोल सेंटर से जोड़ा जाता है ताकि चौबीसों घंटे वास्तविक समय पर निगरानी की जा सके।
व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS)
CIBMS या ‘स्मार्ट फेंसिंग’ परियोजना IBMS का एक हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमाओं पर संवेदनशील हिस्सों में लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों में घुसपैठ को रोकना है जहाँ भौतिक बाड़ लगाना संभव नहीं है, जैसे कि नदी के किनारे और दलदली इलाके। यह प्रौद्योगिकी-संचालित दृष्टिकोण मानव गश्त पर निर्भरता को कम करता है और सीमा सुरक्षा को मजबूत करता है।
कूटनीतिक पहल और समाधान की दिशा
भारत का मानना है कि प्रभावी सीमा प्रबंधन केवल सैन्य और तकनीकी उपायों से हासिल नहीं किया जा सकता है। इसके लिए पड़ोसी देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंध और सहयोग भी आवश्यक है। भारत अपने पड़ोसियों के साथ नियमित रूप से द्विपक्षीय वार्ता, संयुक्त कार्य समूहों और सीमा कर्मियों की बैठकों का आयोजन करता है ताकि आपसी विश्वास बनाया जा सके और सीमा संबंधी मुद्दों को शांतिपूर्वक हल किया जा सके।
सीमा अवसंरचना का विकास
सीमा प्रबंधन रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास करना है। इसमें हर मौसम में उपयोगी सड़कों, पुलों, सुरंगों और हवाई पट्टियों का निर्माण शामिल है। यह न केवल सैनिकों की त्वरित आवाजाही में मदद करता है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए आर्थिक अवसर भी पैदा करता है और उन्हें मुख्य धारा से जोड़ता है। सीमा सड़क संगठन (BRO) इस कार्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
निष्कर्ष: सीमाओं की सुरक्षा और भविष्य की दिशा
एक जटिल और गतिशील चुनौती
भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आर्थिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान और चीन के साथ लंबे समय से चले आ रहे विवादों से लेकर नेपाल और बांग्लादेश के साथ प्रबंधन की चुनौतियों तक, भारत को एक जटिल और गतिशील सीमा वातावरण का सामना करना पड़ता है। इन सीमाओं का प्रभावी प्रबंधन भारत की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता
एक प्रभावी सीमा प्रबंधन रणनीति के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जो मजबूत सुरक्षा उपायों को कूटनीतिक जुड़ाव और आर्थिक विकास के साथ जोड़ती है। जहाँ एक ओर प्रौद्योगिकी और बेहतर निगरानी के माध्यम से सीमाओं को सुरक्षित करना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर पड़ोसी देशों के साथ विश्वास और सहयोग का माहौल बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भूमि सीमा समझौते जैसे सफल उदाहरण दिखाते हैं कि जटिल विवादों को भी शांतिपूर्ण ढंग से हल किया जा सकता है।
सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास
सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग सीमा प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका कल्याण और विकास सुनिश्चित करना राष्ट्रीय हित में है। इन क्षेत्रों में बेहतर बुनियादी ढाँचा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका के अवसर प्रदान करके, सरकार स्थानीय आबादी का विश्वास जीत सकती है और उन्हें राष्ट्र की सुरक्षा में एक भागीदार बना सकती है।
भविष्य की दिशा
भविष्य में, भारत को अपनी सीमाओं पर उभरती चुनौतियों, जैसे साइबर खतरे, ड्रोन का उपयोग, और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए तैयार रहना होगा। इसके लिए निरंतर नवाचार, उन्नत प्रौद्योगिकी को अपनाने और एक व्यापक, एकीकृत और भविष्योन्मुखी सीमा प्रबंधन रणनीति विकसित करने की आवश्यकता होगी। शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध पड़ोस भारत के अपने विकास के लिए महत्वपूर्ण है, और प्रभावी सीमा प्रबंधन इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


Pingback: Indian Geography Syllabus - mcqwale.in