समुद्री सुरक्षा: सागर के रक्षक (Maritime Security: Sea Guards)
समुद्री सुरक्षा: सागर के रक्षक (Maritime Security: Sea Guards)

समुद्री सुरक्षा: सागर के रक्षक (Maritime Security: Sea Guards)

विषय-सूची (Table of Contents)

1. समुद्री सुरक्षा का परिचय (Introduction to Maritime Security)

कल्पना कीजिए, गुजरात के तट पर एक छोटी सी मछली पकड़ने वाली नाव, ‘सागर-पुत्री’, अपनी रोज़ की यात्रा पर निकली है। मछुआरे अपनी धुन में मग्न हैं, उन्हें इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं है कि लहरों के साथ बहते-बहते वे अनजाने में अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (International Maritime Boundary Line) के करीब आ गए हैं। अचानक, एक विदेशी तटरक्षक बल का जहाज़ उन्हें घेर लेता है। यह एक छोटी सी भूल एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटना का रूप ले सकती है। यह साधारण सा परिदृश्य हमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर ले जाता है – समुद्री सुरक्षा (Maritime Security)। असल में, समुद्री सुरक्षा का अर्थ केवल युद्धपोतों और नौसैनिक अड्डों तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक अवधारणा है जिसमें राष्ट्र की समुद्री सीमाओं की रक्षा, समुद्री व्यापार की सुरक्षा, समुद्री डकैती और आतंकवाद का मुकाबला, अवैध गतिविधियों की रोकथाम और समुद्री पर्यावरण का संरक्षण शामिल है। एक मजबूत समुद्री सुरक्षा ढाँचा किसी भी तटीय राष्ट्र की संप्रभुता, अर्थव्यवस्था और अखंडता के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है।

समुद्री सुरक्षा की परिभाषा (Defining Maritime Security)

समुद्री सुरक्षा एक बहुआयामी अवधारणा है जिसका उद्देश्य समुद्र से उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खतरों से निपटना है। इसे सरल शब्दों में समझा जाए तो, यह समुद्र के माध्यम से होने वाली उन सभी गतिविधियों की निगरानी और प्रबंधन है जो किसी देश की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं।

  • राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में: इसमें देश की तटरेखा, बंदरगाहों, विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ), और समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा शामिल है।
  • अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में: यह समुद्री डकैती (maritime piracy), आतंकवाद, मानव तस्करी, नशीले पदार्थों की तस्करी, और अवैध मछली पकड़ने जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को संदर्भित करता है।
  • यह केवल सैन्य सुरक्षा नहीं है: एक प्रभावी समुद्री सुरक्षा रणनीति में कानून प्रवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, व्यापार सुविधा और आपदा प्रबंधन जैसे पहलू भी शामिल होते हैं।

समुद्री सुरक्षा का दायरा और आयाम (Scope and Dimensions of Maritime Security)

समुद्री सुरक्षा का दायरा बहुत व्यापक है और इसमें कई अलग-अलग आयाम शामिल हैं। यह सिर्फ नौसेना की गश्त तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समग्र दृष्टिकोण की मांग करता है।

  • सैन्य आयाम (Military Dimension): यह पारंपरिक समुद्री खतरों जैसे कि नौसैनिक आक्रमण, नाकाबंदी और समुद्री विवादों से देश की रक्षा से संबंधित है। भारतीय नौसेना (Indian Navy) इस आयाम की मुख्य प्रहरी है।
  • कानून प्रवर्तन आयाम (Law Enforcement Dimension): इसमें समुद्री कानूनों को लागू करना, तस्करी, अवैध आप्रवासन और समुद्री डकैती जैसी आपराधिक गतिविधियों को रोकना शामिल है। भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) और समुद्री पुलिस इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • आर्थिक आयाम (Economic Dimension): समुद्र वैश्विक व्यापार का मुख्य माध्यम है। इसलिए, बंदरगाहों, शिपिंग लेन और अपतटीय संपत्तियों (जैसे तेल रिग) की सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो सीधे तौर पर देश की आर्थिक समृद्धि को प्रभावित करता है।
  • पर्यावरणीय आयाम (Environmental Dimension): तेल रिसाव, खतरनाक कचरे का डंपिंग और अवैध मछली पकड़ने जैसी गतिविधियाँ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती हैं। समुद्री सुरक्षा इन पर्यावरणीय खतरों से निपटने में भी मदद करती है।
  • मानवीय आयाम (Human Dimension): इसमें समुद्र में फंसे मछुआरों और नाविकों की खोज और बचाव (Search and Rescue – SAR) अभियान, और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मानवीय सहायता प्रदान करना शामिल है।

इस प्रकार, समुद्री सुरक्षा एक जटिल और गतिशील क्षेत्र है जो किसी भी तटीय राष्ट्र की समग्र भलाई के लिए आवश्यक है। यह न केवल सीमाओं की रक्षा करता है, बल्कि देश की आर्थिक जीवन रेखा को भी सुरक्षित रखता है और इसके प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करता है।

2. भारत के लिए समुद्री सुरक्षा का महत्व (Importance of Maritime Security for India)

भारत, अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के साथ, तीन तरफ से समुद्र से घिरा एक प्रायद्वीप है। भारत की 7,516.6 किलोमीटर लंबी तटरेखा और 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक का विशाल विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) इसे एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र बनाता है। इस विशाल समुद्री क्षेत्र के कारण, भारत के लिए समुद्री सुरक्षा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है।

भौगोलिक और सामरिक महत्व (Geographical and Strategic Importance)

हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region – IOR) में भारत की केंद्रीय स्थिति इसे एक अद्वितीय सामरिक लाभ प्रदान करती है। यह दुनिया के कुछ सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों के चौराहे पर स्थित है।

  • प्रमुख समुद्री मार्गों पर नियंत्रण: भारत होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स के करीब स्थित है, जहाँ से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा और व्यापार का परिवहन करता है। इन मार्गों की सुरक्षा भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए आवश्यक है।
  • क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भूमिका: एक मजबूत समुद्री सुरक्षा क्षमता भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में एक शुद्ध सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) के रूप में अपनी भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और शांति को बढ़ावा मिलता है।
  • चीन का बढ़ता प्रभाव: हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति, जिसे ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के रूप में जाना जाता है, भारत के लिए एक बड़ी सामरिक चुनौती है। इस प्रभाव का मुकाबला करने के लिए एक मजबूत समुद्री सुरक्षा अनिवार्य है।

आर्थिक महत्व (Economic Importance)

भारत की अर्थव्यवस्था समुद्र पर बहुत अधिक निर्भर है। एक मजबूत समुद्री सुरक्षा सीधे तौर पर देश की आर्थिक समृद्धि से जुड़ी हुई है।

  • व्यापार का माध्यम: भारत का लगभग 95% व्यापार मात्रा के हिसाब से और 70% मूल्य के हिसाब से समुद्र के रास्ते होता है। बंदरगाहों और शिपिंग लेन की सुरक्षा इस व्यापार को सुचारू रूप से चलाने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy): भारत की नीली अर्थव्यवस्था, जिसमें मत्स्य पालन, जलीय कृषि, समुद्री पर्यटन और अपतटीय ऊर्जा शामिल है, का देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान है। अवैध मछली पकड़ने और समुद्री प्रदूषण जैसी गतिविधियाँ इस क्षमता को कमजोर करती हैं, जिनसे निपटना समुद्री सुरक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य है।
  • ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के रास्ते आयात करता है। इन ऊर्जा आपूर्ति लाइनों की सुरक्षा देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सर्वोपरि है।

राष्ट्रीय सुरक्षा का पहलू (National Security Aspect)

समुद्र के रास्ते आने वाले खतरे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमेशा एक चिंता का विषय रहे हैं। इतिहास गवाह है कि कई आक्रमणकारी समुद्र के रास्ते ही भारत में आए।

  • 26/11 मुंबई हमला: 2008 का मुंबई आतंकवादी हमला इस बात का एक दुखद उदाहरण है कि कैसे समुद्री मार्ग का दुरुपयोग करके आतंकवादी देश में घुसपैठ कर सकते हैं। इस घटना ने भारत की तटीय सुरक्षा (coastal security) में मौजूद कमियों को उजागर किया और समुद्री सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया।
  • तस्करी और अवैध गतिविधियाँ: भारत की लंबी और छिद्रपूर्ण तटरेखा इसे नशीले पदार्थों, हथियारों और मानव तस्करी के लिए संवेदनशील बनाती है। इन अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए एक मजबूत निगरानी और गश्त प्रणाली आवश्यक है।
  • समुद्री आतंकवाद: आतंकवादी समूह समुद्र का उपयोग हमलों को अंजाम देने, रसद पहुंचाने या भागने के मार्ग के रूप में कर सकते हैं। एक प्रभावी समुद्री सुरक्षा ढाँचा इस तरह के खतरों को बेअसर करने के लिए महत्वपूर्ण है।

3. समुद्री सुरक्षा के प्रमुख घटक (Key Components of Maritime Security)

एक व्यापक समुद्री सुरक्षा रणनीति कई परस्पर जुड़े घटकों से मिलकर बनती है जो एक साथ मिलकर काम करते हैं। ये घटक समुद्र से उत्पन्न होने वाले विभिन्न प्रकार के खतरों से निपटने के लिए एक समग्र और स्तरित सुरक्षा प्रदान करते हैं। भारत की समुद्री सुरक्षा का ढाँचा भी इन्हीं प्रमुख घटकों पर आधारित है।

नौसैनिक सुरक्षा (Naval Security)

यह समुद्री सुरक्षा का सबसे पारंपरिक और मौलिक घटक है। इसका मुख्य उद्देश्य देश की समुद्री सीमाओं को बाहरी सैन्य आक्रमण से बचाना है।

  • भारतीय नौसेना की भूमिका: भारतीय नौसेना इस घटक की मुख्य संचालक है। इसका कार्य युद्ध के समय देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करना और शांति के समय समुद्री मार्गों पर अपनी उपस्थिति बनाए रखकर निवारक (deterrence) के रूप में कार्य करना है।
  • शक्ति प्रदर्शन (Power Projection): एक मजबूत नौसेना देश को अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिए अपने समुद्री क्षेत्र से परे भी शक्ति का प्रदर्शन करने में सक्षम बनाती है।
  • समुद्री मार्ग की सुरक्षा: नौसेना अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो वैश्विक व्यापार के लिए आवश्यक है।

तटीय सुरक्षा (Coastal Security)

तटीय सुरक्षा का ध्यान देश की तटरेखा और निकट-तटीय जल (territorial waters) की सुरक्षा पर केंद्रित होता है। 26/11 मुंबई हमलों के बाद इस घटक पर विशेष ध्यान दिया गया है।

  • बहु-एजेंसी दृष्टिकोण: इसमें भारतीय तटरक्षक बल, समुद्री पुलिस, सीमा शुल्क विभाग, मत्स्य विभाग और खुफिया एजेंसियां शामिल हैं, जो मिलकर काम करती हैं।
  • गश्त और निगरानी: इसका मुख्य उद्देश्य अवैध घुसपैठ, तस्करी और आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए तटरेखा की निरंतर निगरानी और गश्त करना है।
  • मछुआरों की भूमिका: मछुआरा समुदाय को ‘समुद्र की आँख और कान’ के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि वे किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना अधिकारियों को दे सकें।

बंदरगाह सुरक्षा (Port Security)

बंदरगाह देश की अर्थव्यवस्था के प्रवेश द्वार हैं। इसलिए, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • भौतिक सुरक्षा: इसमें बंदरगाहों के चारों ओर बाड़ लगाना, पहुंच नियंत्रण प्रणाली स्थापित करना और सीसीटीवी कैमरों से निगरानी करना शामिल है।
  • कार्गो की जाँच: बंदरगाहों पर आने और जाने वाले कंटेनरों और कार्गो की पूरी तरह से जाँच की जाती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनमें कोई अवैध सामान जैसे हथियार या नशीले पदार्थ तो नहीं हैं।
  • साइबर सुरक्षा: आधुनिक बंदरगाह काफी हद तक स्वचालित और कम्प्यूटरीकृत हैं। इसलिए, उनके संचालन प्रणालियों को साइबर हमलों से बचाना भी बंदरगाह सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

अपतटीय सुरक्षा (Offshore Security)

इसका संबंध देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में स्थित महत्वपूर्ण संपत्तियों की सुरक्षा से है।

  • तेल और गैस प्लेटफॉर्म: भारत के पश्चिमी तट पर कई महत्वपूर्ण तेल और गैस प्लेटफॉर्म हैं, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनकी सुरक्षा एक उच्च प्राथमिकता है।
  • आर्थिक संपदा की रक्षा: अपतटीय सुरक्षा यह भी सुनिश्चित करती है कि देश के EEZ में मौजूद मछली, खनिज और अन्य समुद्री संसाधनों का कोई अवैध रूप से दोहन न कर सके।
  • भारतीय तटरक्षक बल की भूमिका: भारतीय तटरक्षक बल अपतटीय संपत्तियों की सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है और इस क्षेत्र में नियमित रूप से गश्त करता है।

4. समुद्री सुरक्षा के सामने प्रमुख चुनौतियाँ (Major Challenges to Maritime Security)

समुद्री क्षेत्र जितना अवसरों से भरा है, उतना ही यह चुनौतियों और खतरों से भी ग्रस्त है। भारत की विशाल तटरेखा और हिंद महासागर में इसकी रणनीतिक स्थिति इसे कई पारंपरिक और गैर-पारंपरिक समुद्री खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती है। एक प्रभावी समुद्री सुरक्षा रणनीति के लिए इन चुनौतियों को समझना और उनसे निपटने के लिए तैयार रहना आवश्यक है।

समुद्री डकैती और सशस्त्र लूट (Maritime Piracy and Armed Robbery)

हालांकि सोमालिया के तट पर समुद्री डकैती में कमी आई है, लेकिन यह खतरा पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। मलक्का जलडमरूमध्य और गिनी की खाड़ी जैसे अन्य क्षेत्रों में यह अभी भी एक बड़ी समस्या है।

  • व्यापार मार्गों पर खतरा: समुद्री डकैती अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन के लिए एक सीधा खतरा है, जिससे माल की लागत बढ़ जाती है और नाविकों के जीवन को खतरा होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता: समुद्री डकैती एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है और इससे निपटने के लिए विभिन्न देशों की नौसेनाओं के बीच समन्वित गश्त और सूचना साझाकरण की आवश्यकता होती है।
  • आर्थिक प्रभाव: डकैती से बीमा प्रीमियम बढ़ता है, शिपिंग कंपनियों को सुरक्षा पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, और कुछ मामलों में फिरौती की भारी रकम चुकानी पड़ती है, जो अंततः उपभोक्ताओं पर बोझ डालती है।

समुद्री आतंकवाद (Maritime Terrorism)

समुद्र का उपयोग आतंकवादी समूहों द्वारा हमलों को अंजाम देने, हथियार और कर्मियों को स्थानांतरित करने, या महत्वपूर्ण समुद्री बुनियादी ढांचे को लक्षित करने के लिए किया जा सकता है।

  • 26/11 का सबक: मुंबई हमला इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि आतंकवादी कैसे समुद्री मार्ग का उपयोग करके विनाशकारी हमले कर सकते हैं।
  • संभावित लक्ष्य: बंदरगाह, तेल टैंकर, यात्री जहाज और अपतटीय तेल प्लेटफॉर्म आतंकवादियों के लिए आकर्षक लक्ष्य हो सकते हैं।
  • रोकथाम और प्रतिक्रिया: इससे निपटने के लिए बेहतर खुफिया जानकारी, तटीय निगरानी, बंदरगाहों पर कड़ी सुरक्षा और त्वरित प्रतिक्रिया बलों की तैनाती की आवश्यकता है। एक मजबूत समुद्री सुरक्षा ढाँचा इस चुनौती का सामना करने के लिए महत्वपूर्ण है।

अवैध, असूचित और अनियमित (IUU) मत्स्य पालन (Illegal, Unreported, and Unregulated (IUU) Fishing)

IUU मछली पकड़ना एक गंभीर समस्या है जो न केवल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाती है, बल्कि तटीय देशों की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती है।

  • आर्थिक नुकसान: विदेशी ट्रॉलरों द्वारा अवैध रूप से मछली पकड़ने से भारत जैसे देशों को हर साल अरबों डॉलर का राजस्व का नुकसान होता है और स्थानीय मछुआरों की आजीविका प्रभावित होती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: यह मछली के स्टॉक को कम करता है, समुद्री जैव विविधता को नष्ट करता है और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है।
  • अन्य अपराधों से जुड़ाव: IUU मछली पकड़ने वाली नौकाओं का उपयोग अक्सर नशीले पदार्थों, हथियारों और मानव तस्करी जैसी अन्य अवैध गतिविधियों के लिए भी किया जाता है, जिससे समुद्री सुरक्षा को दोहरा खतरा होता है।

तस्करी और अवैध व्यापार (Smuggling and Illicit Trafficking)

भारत की लंबी और जटिल तटरेखा इसे विभिन्न प्रकार की तस्करी की गतिविधियों के लिए एक आसान लक्ष्य बनाती है।

  • नशीले पदार्थों की तस्करी: ‘गोल्डन क्रीसेंट’ (ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान) से हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए समुद्री मार्गों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।
  • हथियार और गोला-बारूद: आतंकवादी और आपराधिक संगठन हथियार और गोला-बारूद की तस्करी के लिए भी समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करते हैं।
  • मानव तस्करी: अवैध आप्रवासियों और मानव तस्करी के पीड़ितों को एक देश से दूसरे देश ले जाने के लिए समुद्री मार्ग एक सामान्य साधन है। इन गतिविधियों पर लगाम लगाना एक बड़ी समुद्री सुरक्षा चुनौती है।

भू-राजनीतिक तनाव और विवाद (Geopolitical Tensions and Disputes)

हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

  • चीन की बढ़ती मुखरता: दक्षिण चीन सागर की तरह, हिंद महासागर में भी चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति और आक्रामक व्यवहार क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक चिंता का विषय है।
  • समुद्री सीमा विवाद: पड़ोसी देशों के साथ अनसुलझे समुद्री सीमा विवाद भी समय-समय पर तनाव पैदा कर सकते हैं, जैसा कि मछुआरों की गिरफ्तारी की घटनाओं में देखा जाता है।
  • शक्ति संतुलन बनाए रखना: भारत को इस क्षेत्र में एक स्थिर और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी नौसैनिक क्षमताओं को लगातार आधुनिक बनाने और समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है।

5. भारत में समुद्री सुरक्षा की त्रि-स्तरीय संरचना (The Three-Tiered Structure of Maritime Security in India)

26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद, भारत ने अपनी समुद्री सुरक्षा (maritime security) व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की और कमजोरियों को दूर करने के लिए एक मजबूत, एकीकृत और बहु-स्तरीय ढाँचा स्थापित किया। यह त्रि-स्तरीय संरचना यह सुनिश्चित करती है कि समुद्र में अलग-अलग दूरी पर अलग-अलग एजेंसियां जिम्मेदार हों, जिससे सुरक्षा में कोई चूक न हो। यह संरचना भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और राज्य समुद्री पुलिस के बीच एक समन्वित प्रयास पर आधारित है।

पहला स्तर: भारतीय नौसेना (Tier 1: The Indian Navy)

भारतीय नौसेना समुद्री सुरक्षा की सबसे बाहरी परत बनाती है। यह भारत की प्राथमिक समुद्री सैन्य शक्ति है और गहरे समुद्र में देश के हितों की रक्षा के लिए जिम्मेदार है।

  • दायित्व का क्षेत्र: नौसेना का संचालन क्षेत्र आमतौर पर भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की बाहरी सीमा से परे, यानी तट से 200 समुद्री मील से आगे तक फैला हुआ है।
  • मुख्य भूमिकाएँ:
    • युद्ध के समय देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा करना।
    • शांति के समय रणनीतिक समुद्री मार्गों पर गश्त करना और अपनी उपस्थिति बनाए रखना।
    • समुद्री डकैती विरोधी अभियानों में भाग लेना।
    • अन्य देशों की नौसेनाओं के साथ संयुक्त अभ्यास करना।
    • भारत की समग्र समुद्री सुरक्षा की निगरानी और समन्वय करना।
  • क्षमताएँ: भारतीय नौसेना विमानवाहक पोत, विध्वंसक, फ्रिगेट, पनडुब्बियों और लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमानों से लैस है, जो इसे हिंद महासागर क्षेत्र में एक शक्तिशाली बल बनाती है।

दूसरा स्तर: भारतीय तटरक्षक बल (Tier 2: The Indian Coast Guard)

भारतीय तटरक्षक बल (ICG) भारत के समुद्री क्षेत्रों में कानून प्रवर्तन के लिए जिम्मेदार प्रमुख एजेंसी है। यह रक्षा मंत्रालय के तहत काम करता है और समुद्री सुरक्षा की मध्य परत का गठन करता है।

  • दायित्व का क्षेत्र: ICG का मुख्य कार्यक्षेत्र भारत के निकट-तटीय जल (territorial waters) से लेकर विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) तक, यानी तट से 12 से 200 समुद्री मील के बीच का क्षेत्र है।
  • मुख्य भूमिकाएँ:
    • भारत के समुद्री कानूनों को लागू करना।
    • अपतटीय संपत्तियों जैसे तेल रिग की सुरक्षा करना।
    • समुद्र में खोज और बचाव (Search and Rescue) अभियान चलाना।
    • अवैध मछली पकड़ने और तस्करी को रोकना।
    • समुद्री पर्यावरण की रक्षा करना और प्रदूषण पर नियंत्रण रखना।
  • समन्वय: ICG भारतीय नौसेना और राज्य समुद्री पुलिस के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है, जो सूचनाओं के आदान-प्रदान और संचालन में समन्वय सुनिश्चित करता है। अधिक जानकारी के लिए, आप भारतीय तटरक्षक बल की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।

तीसरा स्तर: राज्य समुद्री पुलिस (Tier 3: The State Marine Police)

राज्य समुद्री पुलिस (SMP) तटीय सुरक्षा की सबसे भीतरी परत है। इसका गठन विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में पुलिसिंग के लिए किया गया है।

  • दायित्व का क्षेत्र: SMP का अधिकार क्षेत्र तट से लेकर 12 समुद्री मील तक के निकट-तटीय जल तक सीमित है।
  • मुख्य भूमिकाएँ:
    • तट के करीब के पानी में गश्त करना।
    • स्थानीय आपराधिक गतिविधियों जैसे छोटी-मोटी तस्करी और अवैध लैंडिंग को रोकना।
    • तटीय समुदायों के साथ संपर्क बनाए रखना और खुफिया जानकारी इकट्ठा करना।
    • बंदरगाहों और मछली पकड़ने वाले बंदरगाहों पर सुरक्षा व्यवस्था में सहायता करना।
  • चुनौतियाँ: राज्य समुद्री पुलिस को अक्सर अपर्याप्त प्रशिक्षण, उपकरणों की कमी और ICG और नौसेना के साथ समन्वय की समस्याओं जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिन्हें दूर करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। एक मजबूत समुद्री सुरक्षा के लिए इस तीसरे स्तर को सशक्त बनाना अत्यंत आवश्यक है।

6. समुद्री सुरक्षा में प्रौद्योगिकी की भूमिका (The Role of Technology in Maritime Security)

आधुनिक युग में, प्रौद्योगिकी समुद्री सुरक्षा का एक अनिवार्य अंग बन गई है। विशाल समुद्री क्षेत्रों की प्रभावी ढंग से निगरानी और सुरक्षा के लिए केवल मानव गश्त पर्याप्त नहीं है। उपग्रहों से लेकर ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, उन्नत तकनीकें सुरक्षा एजेंसियों को समुद्र में होने वाली गतिविधियों की एक स्पष्ट और व्यापक तस्वीर प्रदान करती हैं, जिससे वे खतरों का जल्दी पता लगा सकते हैं और उन पर प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया कर सकते हैं।

निगरानी और टोही प्रौद्योगिकी (Surveillance and Reconnaissance Technology)

विशाल समुद्री डोमेन के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए उन्नत निगरानी प्रौद्योगिकियाँ महत्वपूर्ण हैं।

  • तटीय रडार श्रृंखला (Coastal Radar Chain): भारत ने अपनी पूरी तटरेखा पर स्थिर रडार सेंसरों की एक श्रृंखला स्थापित की है। यह नेटवर्क तट के करीब जहाजों और नावों की आवाजाही पर वास्तविक समय में नज़र रखने में मदद करता है।
  • उपग्रह निगरानी (Satellite Surveillance): ISRO द्वारा लॉन्च किए गए उपग्रह, जैसे कि RISAT श्रृंखला, समुद्र की सतह की उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियां प्रदान करते हैं, जो दिन और रात दोनों समय जहाजों की पहचान और ट्रैकिंग में सक्षम हैं, चाहे मौसम कैसा भी हो।
  • लंबी दूरी के समुद्री गश्ती विमान (Long-Range Maritime Patrol Aircraft): भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल P-8I और डोर्नियर जैसे विमानों का उपयोग करते हैं जो उन्नत रडार, सेंसर और कैमरों से लैस हैं। ये विमान विशाल समुद्री क्षेत्रों पर घंटों तक गश्त कर सकते हैं।
  • मानव रहित हवाई वाहन (Unmanned Aerial Vehicles – UAVs): ड्रोन या यूएवी का उपयोग तटीय क्षेत्रों की निगरानी और विशिष्ट लक्ष्यों पर नज़र रखने के लिए तेजी से किया जा रहा है। वे पारंपरिक विमानों की तुलना में लागत प्रभावी हैं और लंबे समय तक संचालन कर सकते हैं।

डेटा विश्लेषण और सूचना संलयन (Data Analysis and Information Fusion)

विभिन्न स्रोतों से बड़ी मात्रा में डेटा एकत्र करना केवल पहला कदम है। असली चुनौती उस डेटा का विश्लेषण करके उपयोगी खुफिया जानकारी निकालना है।

  • स्वचालित पहचान प्रणाली (Automatic Identification System – AIS): AIS एक ऐसी प्रणाली है जो जहाजों की पहचान, स्थिति, गति और मार्ग जैसी जानकारी स्वचालित रूप से प्रसारित करती है। यह जहाज यातायात की निगरानी के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
  • सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (Information Management and Analysis Centre – IMAC): गुरुग्राम में स्थित IMAC, भारतीय नौसेना द्वारा संचालित एक नोडल केंद्र है। यह विभिन्न स्रोतों (जैसे रडार, उपग्रह, AIS) से आने वाले सभी समुद्री डेटा को एकत्र करता है, उनका विश्लेषण करता है और एक व्यापक समुद्री तस्वीर बनाता है, जिसे राष्ट्रीय समुद्री डोमेन जागरूकता (National Maritime Domain Awareness – NMDA) कहा जाता है।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग (ML): AI-आधारित एल्गोरिदम का उपयोग असामान्य जहाज व्यवहार (जैसे अचानक मार्ग बदलना, अवैध क्षेत्रों में प्रवेश करना) का पता लगाने के लिए किया जा रहा है, जिससे अधिकारियों को संभावित खतरों के प्रति सचेत किया जा सकता है।

प्रौद्योगिकी के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Positive and Negative Aspects of Technology)

सकारात्मक पहलू (Positive Aspects)

  • बढ़ी हुई जागरूकता: प्रौद्योगिकी सुरक्षा एजेंसियों को विशाल समुद्री क्षेत्र पर नज़र रखने में मदद करती है, जिससे ‘समुद्री अंधापन’ (sea blindness) कम होता है।
  • त्वरित प्रतिक्रिया: खतरों का जल्दी पता लगने से प्रतिक्रिया का समय कम हो जाता है, जिससे घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सकता है।
  • दक्षता में वृद्धि: ड्रोन और स्वचालित प्रणालियाँ मानव संसाधनों का अधिक कुशलता से उपयोग करने में मदद करती हैं, जिससे लागत कम होती है।
  • बेहतर समन्वय: IMAC जैसे सूचना संलयन केंद्र विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और सहयोग को सक्षम बनाते हैं, जो एक एकीकृत समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

नकारात्मक पहलू (Negative Aspects)

  • उच्च लागत: उन्नत तकनीकों की खरीद, तैनाती और रखरखाव बहुत महंगा हो सकता है, जो विकासशील देशों के लिए एक चुनौती है।
  • साइबर सुरक्षा का खतरा: जैसे-जैसे समुद्री सुरक्षा प्रणालियाँ अधिक नेटवर्क-आधारित होती जा रही हैं, वे साइबर हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई हैं। हैकर्स नेविगेशन सिस्टम में हस्तक्षेप कर सकते हैं या संवेदनशील डेटा चुरा सकते हैं।
  • तकनीकी निर्भरता: प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता पारंपरिक कौशल जैसे कि नेविगेशन और सीमैनशिप को कमजोर कर सकती है। सिस्टम की विफलता के मामले में बैकअप योजनाओं का होना महत्वपूर्ण है।
  • डेटा ओवरलोड: विभिन्न स्रोतों से बहुत अधिक डेटा एकत्र करने से ‘सूचना अधिभार’ (information overload) हो सकता है, जिससे विश्लेषकों के लिए वास्तविक खतरों की पहचान करना मुश्किल हो सकता है।

7. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और समुद्री सुरक्षा (International Cooperation and Maritime Security)

समुद्र किसी एक देश की संपत्ति नहीं है; यह एक वैश्विक साझा संसाधन (global commons) है। समुद्री डकैती, आतंकवाद, और तस्करी जैसी चुनौतियाँ किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। वे प्रकृति में अंतरराष्ट्रीय हैं और इसलिए, उनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए मजबूत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। कोई भी देश अकेले इन व्यापक खतरों का मुकाबला नहीं कर सकता है। भारत, हिंद महासागर क्षेत्र में एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में, एक सुरक्षित और स्थिर समुद्री व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है।

द्विपक्षीय और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास (Bilateral and Multilateral Naval Exercises)

संयुक्त नौसैनिक अभ्यास विभिन्न देशों की नौसेनाओं को एक साथ काम करने, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने और अंतर-संचालनीयता (interoperability) में सुधार करने का एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान करते हैं।

  • मालाबार अभ्यास (Malabar Exercise): यह भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं के बीच एक प्रमुख वार्षिक अभ्यास है। यह अभ्यास जटिल समुद्री अभियानों में समन्वय को बढ़ाता है और एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देता है।
  • सिम्बेक्स (SIMBEX): यह भारत और सिंगापुर के बीच एक लंबा चलने वाला द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है जो आपसी विश्वास और सहयोग को मजबूत करता है।
  • वरुण (Varuna): यह भारत और फ्रांस की नौसेनाओं के बीच एक रणनीतिक अभ्यास है जो उन्नत नौसैनिक युद्ध तकनीकों पर केंद्रित है।
  • बहुपक्षीय अभ्यास: भारत मिलन (MILAN) जैसे बहुपक्षीय अभ्यासों की भी मेजबानी करता है, जिसमें हिंद महासागर क्षेत्र और उससे परे के कई देशों की नौसेनाएं भाग लेती हैं।

सूचना साझाकरण समझौते (Information Sharing Agreements)

समय पर और सटीक खुफिया जानकारी समुद्री खतरों से निपटने की कुंजी है। भारत ने समुद्री डोमेन जागरूकता बढ़ाने के लिए कई देशों के साथ सूचना साझाकरण समझौते किए हैं।

  • व्हाइट शिपिंग समझौते (White Shipping Agreements): भारत ने वाणिज्यिक जहाजों (जिन्हें ‘व्हाइट शिपिंग’ कहा जाता है) की आवाजाही पर जानकारी साझा करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों के साथ समझौते किए हैं। यह समुद्री यातायात की एक स्पष्ट तस्वीर बनाने में मदद करता है।
  • हिंद महासागर क्षेत्र के लिए सूचना संलयन केंद्र (Information Fusion Centre for Indian Ocean Region – IFC-IOR): गुरुग्राम में स्थित, यह केंद्र एक क्षेत्रीय सूचना केंद्र के रूप में कार्य करता है जो भागीदार देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ वास्तविक समय में समुद्री सुरक्षा जानकारी साझा करता है। यह अवैध गतिविधियों पर नज़र रखने और समन्वय में सुधार करने में मदद करता है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Positive and Negative Aspects of International Cooperation)

सकारात्मक पहलू (Positive Aspects)

  • साझा बोझ: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग समुद्री सुरक्षा के बोझ को साझा करने में मदद करता है। विशाल महासागरों की गश्त करना किसी एक देश के लिए महंगा और कठिन है।
  • बढ़ी हुई क्षमता: संयुक्त अभ्यास और प्रशिक्षण कार्यक्रम भागीदार देशों की नौसेनाओं और तटरक्षक बलों की क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करते हैं।
  • विश्वास निर्माण: देशों के बीच नियमित बातचीत और सहयोग आपसी विश्वास और समझ को बढ़ावा देता है, जिससे संघर्ष की संभावना कम हो जाती है।
  • व्यापक जागरूकता: सूचना साझाकरण से समुद्री क्षेत्र की एक अधिक संपूर्ण और सटीक तस्वीर मिलती है, जिससे अवैध गतिविधियों का पता लगाना आसान हो जाता है।

नकारात्मक पहलू (Negative Aspects)

  • राष्ट्रीय संप्रभुता की चिंताएँ: कुछ देश संवेदनशील जानकारी साझा करने या विदेशी नौसेनाओं को अपने जल में संचालित करने की अनुमति देने में झिझक सकते हैं, क्योंकि उन्हें अपनी संप्रभुता के क्षरण का डर होता है।
  • अलग-अलग प्राथमिकताएँ: विभिन्न देशों की समुद्री सुरक्षा को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताएँ और हित हो सकते हैं, जिससे एक आम रणनीति पर सहमत होना मुश्किल हो सकता है।
  • खुफिया जानकारी साझा करने में कठिनाइयाँ: राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और आपसी अविश्वास के कारण देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने में अक्सर नौकरशाही बाधाएं और हिचकिचाहट होती है।
  • राजनीतिक जटिलताएँ: अंतर्राष्ट्रीय सहयोग अक्सर भू-राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित होता है। दो देशों के बीच खराब राजनीतिक संबंध उनके बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग को बाधित कर सकते हैं।

8. भारत सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम (Major Steps Taken by the Government of India)

पिछले कुछ दशकों में, विशेष रूप से 26/11 मुंबई हमलों के बाद, भारत सरकार ने देश की समुद्री सुरक्षा (maritime security) को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम उठाए हैं। इन पहलों का उद्देश्य न केवल भारत की अपनी तटरेखा और समुद्री हितों की रक्षा करना है, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में एक जिम्मेदार और अग्रणी समुद्री शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को भी मजबूत करना है।

सागर (SAGAR) पहल (SAGAR Initiative)

2015 में शुरू की गई ‘सागर’ (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास – Security and Growth for All in the Region) पहल भारत की समुद्री रणनीति का एक प्रमुख स्तंभ है। यह एक व्यापक दृष्टि है जो केवल सैन्य सुरक्षा से परे है।

  • सहयोग पर जोर: सागर पहल का मूलमंत्र सहयोग और समावेशिता है। भारत का मानना है कि हिंद महासागर क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि सभी देशों के सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।
  • आर्थिक और सुरक्षा सहयोग: इस पहल के तहत, भारत अपने समुद्री पड़ोसियों के साथ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देता है, जिसमें उनकी क्षमताओं का निर्माण, सूचना साझाकरण और संयुक्त विकास परियोजनाएं शामिल हैं।
  • मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR): भारत ने खुद को इस क्षेत्र में मानवीय सहायता और आपदा राहत के लिए प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता (first responder) के रूप में स्थापित किया है, जैसा कि सुनामी, चक्रवात और अन्य संकटों के दौरान देखा गया है।
  • नियम-आधारित व्यवस्था: सागर पहल अंतरराष्ट्रीय कानूनों, विशेष रूप से समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCLOS) के सम्मान पर आधारित एक नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का समर्थन करती है।

राष्ट्रीय समुद्री डोमेन जागरूकता (NMDA) परियोजना (National Maritime Domain Awareness (NMDA) Project)

यह एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसका उद्देश्य भारत के समुद्री क्षेत्र में होने वाली सभी गतिविधियों की एक व्यापक और वास्तविक समय की तस्वीर बनाना है।

  • सूचना का एकीकरण: NMDA परियोजना विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्रोतों से समुद्री डेटा को एकीकृत करती है, जिसमें नौसेना, तटरक्षक बल, बंदरगाह, सीमा शुल्क, और खुफिया एजेंसियां शामिल हैं।
  • IMAC और IFC-IOR की भूमिका: सूचना प्रबंधन और विश्लेषण केंद्र (IMAC) इस परियोजना का केंद्र बिंदु है, जो डेटा का विश्लेषण करता है। हिंद महासागर क्षेत्र के लिए सूचना संलयन केंद्र (IFC-IOR) इस जानकारी को मित्र देशों के साथ साझा करता है, जिससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा मजबूत होती है।
  • खतरों की शीघ्र पहचान: एक एकीकृत समुद्री तस्वीर होने से, सुरक्षा एजेंसियां असामान्य या संदिग्ध गतिविधियों को जल्दी से पहचान सकती हैं और समय पर प्रतिक्रिया कर सकती हैं।

तटीय सुरक्षा योजना (Coastal Security Scheme)

26/11 हमलों के बाद शुरू की गई, इस योजना का उद्देश्य राज्य समुद्री पुलिस बलों की क्षमताओं को बढ़ाना और तटीय बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है।

  • बुनियादी ढांचे का विकास: इस योजना के तहत, तटीय पुलिस स्टेशनों की स्थापना, गश्ती नौकाओं की खरीद, और जेटी (jetties) का निर्माण किया गया है।
  • प्रशिक्षण और उपकरण: राज्य समुद्री पुलिस के कर्मियों को भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल द्वारा समुद्री संचालन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है और उन्हें आधुनिक उपकरणों से लैस किया जा रहा है।
  • सामुदायिक भागीदारी: इस योजना में तटीय समुदायों, विशेष रूप से मछुआरों को शामिल करने पर भी जोर दिया गया है, ताकि वे खुफिया जानकारी इकट्ठा करने में मदद कर सकें। इसके लिए ‘सागर रक्षक’ जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

नौसेना और तटरक्षक बल का आधुनिकीकरण (Modernization of Navy and Coast Guard)

सरकार भारत की समुद्री क्षमताओं को बढ़ाने के लिए भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के आधुनिकीकरण पर लगातार जोर दे रही है।

  • स्वदेशीकरण पर जोर: ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत, सरकार स्वदेशी रूप से युद्धपोतों, पनडुब्बियों और अन्य उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा दे रही है। आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) जैसे स्वदेशी विमानवाहक पोत का निर्माण इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।
  • नई संपत्तियों का अधिग्रहण: नौसेना और तटरक्षक बल को लगातार नए जहाजों, विमानों और निगरानी प्रणालियों से लैस किया जा रहा है ताकि वे भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहें।
  • क्षमता वृद्धि: इन प्रयासों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत की समुद्री सेनाएं न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करने में सक्षम हों, बल्कि पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में भी योगदान दे सकें। इन सभी कदमों से भारत की समुद्री सुरक्षा काफी मजबूत हुई है।

9. समुद्री सुरक्षा का भविष्य (The Future of Maritime Security)

समुद्री सुरक्षा का क्षेत्र लगातार विकसित हो रहा है। प्रौद्योगिकी में प्रगति, बदलती भू-राजनीतिक गतिशीलता और उभरते हुए नए खतरे यह सुनिश्चित करते हैं कि भविष्य में समुद्री सुरक्षा की चुनौतियाँ और भी जटिल होंगी। भारत और दुनिया को इन भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और अवसरों का लाभ उठाने के लिए तैयार रहना होगा। एक दूरंदेशी दृष्टिकोण अपनाकर ही हम अपने समुद्री हितों की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकते हैं।

उभरते खतरे और नई चुनौतियाँ (Emerging Threats and New Challenges)

भविष्य में समुद्री सुरक्षा को कई नए और अपारंपरिक खतरों का सामना करना पड़ सकता है।

  • साइबर युद्ध (Cyber Warfare): जैसे-जैसे जहाज और बंदरगाह अधिक डिजिटल और नेटवर्क-आधारित होते जा रहे हैं, वे साइबर हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएंगे। हैकर्स जहाजों के नेविगेशन सिस्टम को जाम कर सकते हैं, बंदरगाह संचालन को बाधित कर सकते हैं, या संवेदनशील डेटा चुरा सकते हैं।
  • मानव रहित प्रणालियों का खतरा (Threat from Unmanned Systems): आतंकवादी या गैर-राज्य तत्व हमले करने के लिए सशस्त्र ड्रोन या मानव रहित पानी के नीचे के वाहनों (UUVs) का उपयोग कर सकते हैं। इन छोटे, तेज और सस्ते खतरों का पता लगाना और उन्हें बेअसर करना मुश्किल हो सकता है।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: समुद्र के स्तर में वृद्धि और चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति तटीय समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करेगी। इससे विस्थापन और संसाधनों पर संघर्ष बढ़ सकता है, जिसका समुद्री सुरक्षा पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा।
  • समुद्र तल संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा: जैसे-जैसे जमीन पर संसाधन कम होते जाएंगे, समुद्र तल में मौजूद खनिजों (जैसे पॉलीमेटेलिक नोड्यूल) के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे देशों के बीच नए विवाद पैदा हो सकते हैं।

भविष्य की प्रौद्योगिकियाँ और रणनीतियाँ (Future Technologies and Strategies)

इन उभरते खतरों से निपटने के लिए, समुद्री सुरक्षा एजेंसियों को नई तकनीकों और रणनीतियों को अपनाना होगा।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बिग डेटा: AI का उपयोग विशाल समुद्री डेटा का विश्लेषण करने, पैटर्न की पहचान करने और विसंगतियों का पता लगाने के लिए और भी अधिक किया जाएगा। यह भविष्य कहनेवाला विश्लेषण (predictive analysis) को सक्षम करेगा, जिससे अधिकारी खतरों के उत्पन्न होने से पहले ही उनका अनुमान लगा सकेंगे।
  • अंतरिक्ष-आधारित निगरानी: छोटे और अधिक शक्तिशाली उपग्रहों के नक्षत्र (constellations) समुद्र की निरंतर और वास्तविक समय की निगरानी प्रदान करेंगे, जिससे अवैध गतिविधियों को छिपाना लगभग असंभव हो जाएगा।
  • स्वायत्त प्रणाली (Autonomous Systems): निगरानी, गश्त और यहां तक कि खोज और बचाव मिशनों के लिए स्वायत्त जहाजों और पानी के नीचे के वाहनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाएगा। ये प्रणालियाँ मानव कर्मियों को जोखिम में डाले बिना खतरनाक वातावरण में काम कर सकती हैं।
  • अंतर-एजेंसी और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर अधिक जोर: भविष्य की समुद्री सुरक्षा के लिए सूचनाओं का निर्बाध साझाकरण और विभिन्न राष्ट्रीय एजेंसियों और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के बीच गहरा सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो जाएगा। जटिल खतरों से अकेले नहीं निपटा जा सकता है।

संक्षेप में, समुद्री सुरक्षा का भविष्य प्रौद्योगिकी-संचालित, डेटा-केंद्रित और सहयोग-आधारित होगा। जो राष्ट्र इन परिवर्तनों को अपनाने और अनुकूलित करने में सक्षम होंगे, वे ही 21वीं सदी में अपने समुद्री हितों को प्रभावी ढंग से सुरक्षित रख पाएंगे। एक मजबूत और अनुकूलनीय समुद्री सुरक्षा ढाँचा भारत के एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उदय के लिए अनिवार्य है।

10. निष्कर्ष (Conclusion)

समुद्र, जो सदियों से व्यापार, संस्कृति और विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम रहा है, आज भी किसी भी तटीय राष्ट्र की समृद्धि और सुरक्षा की जीवन रेखा है। भारत के लिए, जिसका एक गौरवशाली समुद्री इतिहास और एक विशाल समुद्री सीमा है, समुद्री सुरक्षा का महत्व सर्वोपरि है। यह केवल सैन्य तैयारी का विषय नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक अवधारणा है जो देश की आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्रीय संप्रभुता को सीधे प्रभावित करती है।

हमने इस लेख में देखा कि कैसे 26/11 जैसे हमलों ने हमें हमारी कमजोरियों का अहसास कराया और कैसे भारत ने एक मजबूत त्रि-स्तरीय सुरक्षा संरचना का निर्माण करके प्रतिक्रिया दी। भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और समुद्री पुलिस के समन्वित प्रयास, प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग और सागर जैसी दूरदर्शी पहलों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर, यह सब एक सुरक्षित समुद्री भविष्य की दिशा में सही कदम हैं। आज के समय में एक मजबूत समुद्री सुरक्षा किसी भी देश के लिए अत्यंत आवश्यक है।

हालांकि, समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं, और साइबर हमले तथा जलवायु परिवर्तन जैसे नए खतरे उभर रहे हैं। इन निरंतर विकसित हो रही चुनौतियों का सामना करने के लिए, भारत को अपनी क्षमताओं का लगातार आधुनिकीकरण करना होगा, अपनी एजेंसियों के बीच समन्वय को और बेहतर बनाना होगा, और हिंद महासागर क्षेत्र में अपने भागीदारों के साथ सहयोग को गहरा करना होगा। एक सुरक्षित, संरक्षित और स्थिर समुद्री क्षेत्र न केवल भारत के हित में है, बल्कि यह पूरे विश्व की समृद्धि और शांति के लिए भी आवश्यक है। सागर के ये रक्षक, चाहे वे वर्दी में हों या प्रौद्योगिकी के पीछे, हमारे राष्ट्र की सुरक्षा और प्रगति के मौन प्रहरी हैं।

11. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: समुद्री सुरक्षा क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है? (What is maritime security and why is it important?)

समुद्री सुरक्षा एक व्यापक अवधारणा है जिसमें किसी देश की समुद्री सीमाओं, व्यापार मार्गों, बंदरगाहों और समुद्री संसाधनों को विभिन्न खतरों से बचाना शामिल है। इन खतरों में समुद्री डकैती, आतंकवाद, तस्करी, अवैध मछली पकड़ना और बाहरी आक्रमण शामिल हैं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत जैसे देश का अधिकांश व्यापार समुद्र के रास्ते होता है, हमारी ऊर्जा सुरक्षा समुद्री आपूर्ति पर निर्भर करती है, और हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा समुद्री सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ी हुई है।

प्रश्न 2: भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए कौन सी एजेंसियां जिम्मेदार हैं? (Which agencies are responsible for India’s maritime security?)

भारत में समुद्री सुरक्षा के लिए एक त्रि-स्तरीय संरचना है। सबसे बाहरी परत में भारतीय नौसेना (Indian Navy) है, जो गहरे समुद्र में देश की रक्षा करती है। मध्य परत में भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) है, जो भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में कानून लागू करता है। सबसे भीतरी परत में तटीय राज्यों की समुद्री पुलिस (Marine Police) है, जो तट के करीब के पानी में गश्त करती है। इन सभी के बीच समन्वय सुनिश्चित करने के लिए कई अन्य एजेंसियां भी काम करती हैं।

प्रश्न 3: 26/11 के मुंबई हमलों ने भारत की समुद्री सुरक्षा को कैसे प्रभावित किया? (How did the 26/11 Mumbai attacks affect India’s maritime security?)

26/11 के मुंबई हमले भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ थे। आतंकवादियों ने समुद्र के रास्ते घुसपैठ की थी, जिससे तटीय सुरक्षा में मौजूद गंभीर कमियां उजागर हुईं। इस घटना के बाद, सरकार ने तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए, जिसमें तटीय रडार श्रृंखला की स्थापना, एक त्रि-स्तरीय सुरक्षा संरचना का निर्माण, समुद्री पुलिस बलों का आधुनिकीकरण और विभिन्न एजेंसियों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने के लिए IMAC जैसे केंद्रों की स्थापना शामिल है।

प्रश्न 4: ‘सागर’ (SAGAR) पहल क्या है? (What is the SAGAR initiative?)

सागर (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) भारत सरकार द्वारा 2015 में शुरू की गई एक पहल है। यह हिंद महासागर क्षेत्र के लिए भारत की समुद्री नीति का दृष्टिकोण है। इसका उद्देश्य केवल सैन्य सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, इस क्षेत्र के सभी देशों के साथ मिलकर आर्थिक विकास, सुरक्षा सहयोग, क्षमता निर्माण, और मानवीय सहायता के माध्यम से एक सुरक्षित और समृद्ध समुद्री क्षेत्र का निर्माण करना है। यह सहयोग और आपसी विश्वास पर आधारित एक समावेशी दृष्टिकोण है।

प्रश्न 5: समुद्री सुरक्षा में प्रौद्योगिकी की क्या भूमिका है? (What is the role of technology in maritime security?)

प्रौद्योगिकी आधुनिक समुद्री सुरक्षा की रीढ़ है। रडार, उपग्रह, ड्रोन और लंबी दूरी के गश्ती विमान विशाल समुद्री क्षेत्रों की निगरानी में मदद करते हैं। स्वचालित पहचान प्रणाली (AIS) जहाजों को ट्रैक करती है। सूचना संलयन केंद्र (Information Fusion Centres) विभिन्न स्रोतों से डेटा का विश्लेषण करके एक व्यापक तस्वीर बनाते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियां असामान्य गतिविधियों का पता लगाने और खतरों का अनुमान लगाने में मदद कर रही हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियां अधिक प्रभावी और कुशल बन रही हैं।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *