विषय-सूची (Table of Contents)
परिचय: भारत की प्राकृतिक संपदा का महत्व
पर्यावरण और संसाधनों का परिचय
भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है, जो अपनी समृद्ध प्राकृतिक संपदा के लिए जाना जाता है। यहाँ ऊँचे पहाड़ों से लेकर विशाल मैदानों तक, घने जंगलों से लेकर शुष्क मरुस्थलों तक, और लंबी तटरेखाओं से लेकर अनगिनत नदियों तक, सब कुछ मौजूद है। ये सभी भौगोलिक विशेषताएँ मिलकर भारत के पर्यावरण और संसाधनों का निर्माण करती हैं। किसी भी देश के विकास और उसकी प्रगति का आधार उसके प्राकृतिक संसाधन होते हैं, और भारत इस मामले में सौभाग्यशाली है।
छात्रों के लिए इस विषय का महत्व
विद्यार्थियों के लिए भारत के पर्यावरण और संसाधनों के बारे में जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल उनकी सामान्य ज्ञान को बढ़ाता है, बल्कि उन्हें देश की अर्थव्यवस्था, समाज और भविष्य की चुनौतियों को समझने में भी मदद करता है। प्रतियोगी परीक्षाओं, जैसे कि UPSC, SSC, और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं में, इस विषय से जुड़े प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं। इसलिए, इस लेख में हम भारत के प्राकृतिक संसाधनों, खनिज, जल, ऊर्जा, वन्य जीवन, और संरक्षण के मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण
प्राकृतिक संसाधनों को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है: नवीकरणीय (Renewable) और अनवीकरणीय (Non-renewable)। नवीकरणीय संसाधन वे होते हैं जिन्हें पुनः उत्पन्न किया जा सकता है, जैसे कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल और वन। वहीं, अनवीकरणीय संसाधन वे हैं जिनका भंडार सीमित है और जिन्हें बनने में लाखों वर्ष लगते हैं, जैसे कि कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस। इन दोनों प्रकार के संसाधनों का संतुलन बनाए रखना सतत विकास (Sustainable Development) के लिए आवश्यक है।
भारत की भौगोलिक विविधता और संसाधन
भारत की अद्वितीय भौगोलिक संरचना यहाँ के संसाधनों की विविधता का मुख्य कारण है। उत्तर में हिमालय पर्वत श्रृंखला नदियों और वनों का स्रोत है, तो वहीं दक्षिण का पठारी क्षेत्र खनिजों से भरपूर है। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे विशाल नदी तंत्रों ने उत्तर भारत के मैदानों को उपजाऊ बनाया है, जो देश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यह भौगोलिक विविधता ही भारत को एक आत्मनिर्भर और संसाधन संपन्न राष्ट्र बनाती है।
प्राकृतिक संसाधन: भारत की नींव
भूमि संसाधन का महत्व
भूमि या मृदा भारत का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। यह कृषि, वानिकी, आवास और उद्योगों का आधार है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। देश की अधिकांश आबादी अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूमि पर ही निर्भर है, खासकर कृषि क्षेत्र में, जो करोड़ों लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
भारत में मिट्टी के प्रकार
भारत में विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं, जो यहाँ की जलवायु, चट्टानों और वनस्पतियों की विविधता को दर्शाती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारत की मिट्टियों को कई प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया है। इनमें से प्रत्येक मिट्टी की अपनी विशेषताएँ होती हैं और वे विशेष प्रकार की फसलों के लिए उपयुक्त होती हैं। इन मिट्टियों का सही प्रबंधन करना कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।
जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil)
जलोढ़ मिट्टी भारत में सबसे व्यापक रूप से पाई जाने वाली और सबसे उपजाऊ मिट्टी है। यह देश के लगभग 40% हिस्से में फैली हुई है, विशेषकर उत्तरी मैदानों और तटीय क्षेत्रों में। इसका निर्माण नदियों द्वारा लाए गए अवसादों के जमाव से होता है। यह मिट्टी पोटाश, फॉस्फोरिक एसिड और चूने से भरपूर होती है, जो इसे गन्ना, चावल, गेहूँ और अन्य अनाज तथा दलहनी फसलों की खेती के लिए आदर्श बनाती है।
काली मिट्टी (Black Soil)
काली मिट्टी, जिसे ‘रेगुर मिट्टी’ या ‘काली कपास मिट्टी’ भी कहा जाता है, कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इसका निर्माण दक्कन के पठार के लावा चट्टानों के अपक्षय से हुआ है। यह मिट्टी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में पाई जाती है। इसकी जल धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है और यह कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूने जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध होती है।
लाल और पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil)
लाल मिट्टी का विकास दक्कन के पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर कम वर्षा वाले क्षेत्रों में हुआ है। इस मिट्टी का लाल रंग लौह यौगिकों की उपस्थिति के कारण होता है। जब यह जलयोजित रूप में होती है, तो यह पीली दिखाई देती है। यह मिट्टी ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी भागों और पश्चिमी घाट के कुछ क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मोटे अनाज, दलहन, और तिलहन की खेती के लिए उपयुक्त है।
लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)
लैटेराइट मिट्टी का निर्माण उच्च तापमान और भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में होता है, जहाँ तीव्र निक्षालन (leaching) की प्रक्रिया होती है। यह मिट्टी मुख्य रूप से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और ओडिशा तथा असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मिट्टी चाय, कॉफी और काजू जैसी बागानी फसलों के लिए बहुत उपयुक्त है। इसका उपयोग ईंटें बनाने के लिए भी किया जाता है।
वन संसाधन और उनका महत्व
वन एक महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन हैं। वे न केवल हमें लकड़ी, ईंधन, और कई अन्य उत्पाद प्रदान करते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन वन्यजीवों को आवास प्रदान करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, और जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। भारत की राष्ट्रीय वन नीति (1988) के अनुसार, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 33% हिस्से पर वन होना अनिवार्य है।
भारत में वनों के प्रकार
भारत में वर्षा, तापमान और स्थलाकृति की भिन्नता के कारण विभिन्न प्रकार के वन पाए जाते हैं। इन वनों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests): ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है। ये बहुत घने होते हैं और यहाँ के पेड़ साल भर हरे-भरे रहते हैं। ये पश्चिमी घाट, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और उत्तर-पूर्वी भारत में पाए जाते हैं।
- उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous Forests): ये भारत में सबसे बड़े क्षेत्र में फैले हुए हैं और इन्हें ‘मानसूनी वन’ भी कहा जाता है। ये 70 से 200 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। सागौन, साल, शीशम और चंदन इन वनों के प्रमुख वृक्ष हैं।
- कांटेदार वन तथा झाड़ियाँ (Thorn Forests and Scrubs): ये वन 70 सेमी से कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों में पाए जाते हैं। राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में इस प्रकार के वन मिलते हैं। बबूल, खैर और खजूर यहाँ के मुख्य पौधे हैं।
- पर्वतीय वन (Montane Forests): ये वन हिमालयी क्षेत्रों में ऊंचाई के अनुसार बदलते रहते हैं। कम ऊंचाई पर चौड़ी पत्ती वाले पेड़ जैसे ओक और चेस्टनट पाए जाते हैं, जबकि अधिक ऊंचाई पर शंकुधारी (Coniferous) पेड़ जैसे पाइन, देवदार और स्प्रूस मिलते हैं।
- मैंग्रोव वन (Mangrove Forests): ये वन तटीय क्षेत्रों के ज्वार-भाटे वाले डेल्टाओं में पाए जाते हैं। गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में स्थित सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है। सुंदरी वृक्ष यहाँ की एक प्रमुख प्रजाति है।
खनिज संसाधन: धरती के गर्भ में छिपा खजाना
भारत में खनिज संसाधनों का परिचय
खनिज प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक यौगिक हैं जिनका एक निश्चित रासायनिक संघटन और क्रिस्टलीय संरचना होती है। ये देश के औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भारत खनिज संसाधनों के मामले में एक धनी देश है। यहाँ विभिन्न प्रकार के खनिज पाए जाते हैं, जिन्हें धात्विक (Metallic) और अधात्विक (Non-metallic) खनिजों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
खनिजों का वितरण
भारत में खनिजों का वितरण बहुत असमान है। अधिकांश धात्विक खनिज प्रायद्वीपीय पठारी क्षेत्र की प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों में पाए जाते हैं। कोयले का लगभग 97% भंडार दामोदर, सोन, महानदी और गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है। पेट्रोलियम के भंडार असम, गुजरात और मुंबई हाई जैसे अपतटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं। इस असमान वितरण के कारण कुछ क्षेत्र औद्योगिक रूप से बहुत विकसित हो गए हैं।
लौह अयस्क (Iron Ore)
लौह अयस्क आधुनिक औद्योगिक विकास की रीढ़ है। भारत में उच्च कोटि के लौह अयस्क के विशाल भंडार हैं। यहाँ मुख्य रूप से दो प्रकार के लौह अयस्क पाए जाते हैं – मैग्नेटाइट और हेमाटाइट। मैग्नेटाइट सर्वोत्तम गुणवत्ता वाला अयस्क है जिसमें 70% तक लोहा होता है, जबकि हेमाटाइट सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक लौह अयस्क है, जिसमें 50-60% लोहा होता है।
भारत में प्रमुख लौह अयस्क पेटियाँ
भारत में लौह अयस्क मुख्य रूप से कुछ प्रमुख पेटियों में केंद्रित है। ओडिशा-झारखंड पेटी में उच्च कोटि का हेमाटाइट अयस्क पाया जाता है। दुर्ग-बस्तर-चंद्रपुर पेटी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में फैली हुई है। बेल्लारी-चित्रदुर्ग-चिकमगलूर-तुमकुर पेटी कर्नाटक में स्थित है, जहाँ कुद्रेमुख की खदानें प्रसिद्ध हैं। महाराष्ट्र-गोवा पेटी में भी लौह अयस्क का खनन होता है, हालांकि यहाँ का अयस्क उच्च गुणवत्ता का नहीं होता।
मैंगनीज (Manganese)
मैंगनीज का उपयोग मुख्य रूप से इस्पात और लौह-मिश्र धातु के निर्माण में किया जाता है। इसका उपयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक और पेंट बनाने में भी होता है। भारत मैंगनीज का एक प्रमुख उत्पादक देश है। ओडिशा मैंगनीज का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी इसके महत्वपूर्ण भंडार हैं।
बॉक्साइट (Bauxite)
बॉक्साइट एक अयस्क है जिससे एल्यूमीनियम प्राप्त किया जाता है। एल्यूमीनियम एक हल्की, मजबूत और संक्षारण-प्रतिरोधी धातु है, जिसका उपयोग हवाई जहाज, बर्तन और तार बनाने में होता है। भारत में बॉक्साइट के पर्याप्त भंडार हैं, जो मुख्य रूप से अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियों और बिलासपुर-कटनी के पठारी प्रदेश में पाए जाते हैं। ओडिशा भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है, जो देश के कुल उत्पादन का आधे से अधिक हिस्सा देता है।
तांबा (Copper)
तांबा एक लचीली, तन्य और ऊष्मा तथा बिजली की सुचालक धातु है। इसका उपयोग मुख्य रूप से बिजली के तार, इलेक्ट्रॉनिक्स और रासायनिक उद्योगों में किया जाता है। भारत में तांबे का भंडार और उत्पादन संतोषजनक नहीं है, इसलिए हमें इसका आयात करना पड़ता है। मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानें देश का लगभग 52% तांबा उत्पन्न करती हैं। इसके अलावा, राजस्थान का खेतड़ी क्षेत्र और झारखंड का सिंहभूम जिला भी तांबे के उत्पादन के लिए जाने जाते हैं।
अधात्विक खनिज: अभ्रक (Mica)
अभ्रक एक ऐसा खनिज है जो प्लेटों या परतों के क्रम में पाया जाता है। यह अपनी उत्कृष्ट परावैद्युत शक्ति, कम बिजली हानि गुणांक, और उच्च वोल्टेज के प्रतिरोध के गुणों के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उद्योगों में अनिवार्य रूप से उपयोग होता है। भारत अभ्रक का विश्व में एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक रहा है। झारखंड में कोडरमा-गया-हजारीबाग पेटी, राजस्थान में अजमेर के आसपास और आंध्र प्रदेश की नेल्लोर अभ्रक पेटी इसके मुख्य उत्पादक क्षेत्र हैं।
अधात्विक खनिज: चूना पत्थर (Limestone)
चूना पत्थर कैल्शियम कार्बोनेट या मैग्नीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों में पाया जाता है। यह सीमेंट उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है और इसका उपयोग लौह अयस्क के प्रगलन (smelting) के लिए भट्टियों में भी किया जाता है। भारत के लगभग सभी राज्यों में चूना पत्थर पाया जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं।
खनिज संरक्षण की आवश्यकता
खनिज अनवीकरणीय संसाधन हैं। इनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं, जबकि हम इनका बहुत तेजी से उपभोग कर रहे हैं। इसलिए, खनिजों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। हमें खनिजों का योजनाबद्ध और सतत पोषणीय ढंग से उपयोग करना चाहिए। निम्न कोटि के अयस्कों का उपयोग करने के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों का विकास करना, धातुओं का पुनर्चक्रण (recycling) करना और वैकल्पिक पदार्थों का उपयोग करना खनिज संरक्षण के कुछ प्रमुख उपाय हैं।
जल संसाधन: जीवन का अमृत
भारत में जल का महत्व
जल जीवन के लिए एक मौलिक आवश्यकता है और भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। भारत में विश्व की लगभग 18% आबादी निवास करती है, लेकिन इसके पास विश्व के कुल जल संसाधनों का केवल 4% ही है। जल का उपयोग पीने, घरेलू कार्यों, कृषि (सिंचाई), उद्योगों, और ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है। भारत की कृषि अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसून पर निर्भर करती है, जो जल संसाधनों के महत्व को और भी बढ़ा देता है।
भारत में जल के स्रोत
भारत में जल मुख्य रूप से चार स्रोतों से प्राप्त होता है: सतही जल (नदियाँ, झीलें, तालाब), भूजल (Groundwater), वायुमंडलीय जल (वर्षा), और महासागरीय जल। वर्षा जल का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है, जो नदियों और भूजल को पुनर्भरण (recharge) करता है। भारत की प्रमुख नदी प्रणालियाँ, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, गोदावरी, और कृष्णा, सतही जल का विशाल भंडार प्रदान करती हैं।
हिमालयी नदी प्रणाली
हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बारहमासी होती हैं क्योंकि इन्हें वर्षा के साथ-साथ पिघलने वाले ग्लेशियरों से भी जल प्राप्त होता है। इस प्रणाली में तीन प्रमुख नदियाँ हैं: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र। सिंधु नदी तंत्र जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में बहता है। गंगा नदी तंत्र भारत का सबसे बड़ा नदी तंत्र है, जो देश के एक-चौथाई क्षेत्र को कवर करता है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश के माध्यम से भारत में प्रवेश करती है।
प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली
प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ मौसमी होती हैं क्योंकि इनका प्रवाह पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर करता है। इन नदियों को दो मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है: पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ (जो बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं) और पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (जो अरब सागर में गिरती हैं)। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी पूर्व की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं, जबकि नर्मदा और तापी पश्चिम की ओर बहने वाली मुख्य नदियाँ हैं।
भूजल संसाधन
भूजल भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण जल संसाधन है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ सतही जल की कमी है। देश की सिंचाई और घरेलू जल आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा भूजल से ही पूरा होता है। हालांकि, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में कृषि के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है, जिससे भूजल स्तर में चिंताजनक गिरावट आई है। यह एक गंभीर समस्या है जिसके लिए तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएं
स्वतंत्रता के बाद, भारत ने सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, और मत्स्य पालन जैसे कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा करने के लिए बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का निर्माण शुरू किया। भाखड़ा-नांगल परियोजना (सतलुज नदी), दामोदर घाटी परियोजना (दामोदर नदी), और हीराकुंड परियोजना (महानदी) इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। इन परियोजनाओं ने देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
जल संरक्षण और प्रबंधन
बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता लगातार कम हो रही है। इसलिए, जल संरक्षण और प्रबंधन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) एक प्रभावी तरीका है जिससे भूजल स्तर को बढ़ाया जा सकता है। ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation) जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों का उपयोग करके कृषि में जल की बर्बादी को कम किया जा सकता है।
राष्ट्रीय जल नीति
भारत सरकार ने जल संसाधनों के योजनाबद्ध विकास और प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय जल नीति तैयार की है। इस नीति का उद्देश्य सभी के लिए पीने के पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना, जल संसाधनों के विकास में सभी हितधारकों को शामिल करना, और जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना है। यह नीति जल के पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग पर भी जोर देती है ताकि जल की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके।
ऊर्जा स्रोत: विकास का इंजन
ऊर्जा संसाधनों का महत्व
ऊर्जा किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए एक मूलभूत आवश्यकता है। कृषि, उद्योग, परिवहन और घरेलू क्षेत्रों में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा संसाधनों को पारंपरिक (Conventional) और गैर-पारंपरिक (Non-conventional) स्रोतों में वर्गीकृत किया जाता है। पारंपरिक स्रोतों में कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और जलविद्युत शामिल हैं, जबकि गैर-पारंपरिक स्रोतों में सौर, पवन, ज्वारीय, भूतापीय ऊर्जा और बायोगैस आते हैं।
पारंपरिक ऊर्जा स्रोत: कोयला
भारत अपनी वाणिज्यिक ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा करता है। कोयले का उपयोग मुख्य रूप से बिजली उत्पादन और उद्योगों में, विशेषकर लोहा और इस्पात उद्योग में किया जाता है। भारत में कोयला मुख्य रूप से दो भूवैज्ञानिक युगों की चट्टानों में पाया जाता है: गोंडवाना (लगभग 200 मिलियन वर्ष पुराना) और टर्शियरी (लगभग 55 मिलियन वर्ष पुराना)। गोंडवाना कोयला, जो धातुशोधन कोयला है, मुख्य रूप से दामोदर घाटी (पश्चिम बंगाल-झारखंड) में स्थित है।
कोयले के प्रकार और प्रमुख क्षेत्र
कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयले को चार प्रकारों में बांटा जाता है: एन्थ्रेसाइट (सर्वोत्तम गुणवत्ता), बिटुमिनस, लिग्नाइट और पीट। भारत में बिटुमिनस कोयला सबसे अधिक पाया जाता है। प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्रों में झारखंड (झरिया, बोकारो), ओडिशा (तलचर), छत्तीसगढ़ (कोरबा), और मध्य प्रदेश (सिंगरौली) शामिल हैं। लिग्नाइट कोयले के विशाल भंडार तमिलनाडु के नेवेली में पाए जाते हैं।
पारंपरिक ऊर्जा स्रोत: पेट्रोलियम
पेट्रोलियम या खनिज तेल भारत में कोयले के बाद ऊर्जा का दूसरा प्रमुख स्रोत है। यह परिवहन क्षेत्र के लिए ईंधन, और कई उद्योगों जैसे कि पेट्रोकेमिकल, सिंथेटिक फाइबर और उर्वरक के लिए कच्चा माल प्रदान करता है। भारत में अधिकांश पेट्रोलियम टर्शियरी युग की चट्टानों की अपनति (anticlines) और भ्रंश ट्रैप (fault traps) में पाया जाता है। मुंबई हाई (अपतटीय क्षेत्र), गुजरात (अंकलेश्वर) और असम (डिगबोई, नहरकटिया) भारत के प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र हैं।
पारंपरिक ऊर्जा स्रोत: प्राकृतिक गैस
प्राकृतिक गैस एक महत्वपूर्ण और स्वच्छ ऊर्जा संसाधन है जो पेट्रोलियम के साथ या अलग से पाई जाती है। इसका उपयोग ऊर्जा क्षेत्र में बिजली उत्पादन के लिए और पेट्रोकेमिकल उद्योग में एक औद्योगिक कच्चे माल के रूप में किया जाता है। कृष्णा-गोदावरी बेसिन, मुंबई हाई और खंभात की खाड़ी में प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार पाए गए हैं। हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) गैस पाइपलाइन भारत की प्रमुख गैस पाइपलाइन है।
परमाणु ऊर्जा
परमाणु ऊर्जा यूरेनियम और थोरियम जैसे रेडियोधर्मी खनिजों के विखंडन से प्राप्त होती है। यह ऊर्जा का एक शक्तिशाली स्रोत है, लेकिन इसके उत्पादन में सुरक्षा एक बड़ी चिंता का विषय है। भारत में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम डॉ. होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में शुरू हुआ। भारत में यूरेनियम के भंडार झारखंड और राजस्थान में पाए जाते हैं, जबकि थोरियम के विशाल भंडार केरल के तटीय रेत में मोनाजाइट से प्राप्त होते हैं। तारापुर (महाराष्ट्र), रावतभाटा (राजस्थान), और कुडनकुलम (तमिलनाडु) भारत के कुछ प्रमुख परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं।
गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत
पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के सीमित भंडार और उनके कारण होने वाले पर्यावरण प्रदूषण ने हमें गैर-पारंपरिक या नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर देखने के लिए मजबूर किया है। भारत में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोगैस और ज्वारीय ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। ये स्रोत पर्यावरण के अनुकूल हैं और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं।
सौर ऊर्जा (Solar Energy)
भारत एक उष्णकटिबंधीय देश होने के कारण यहाँ वर्ष के अधिकांश समय में धूप उपलब्ध रहती है, जिससे सौर ऊर्जा के उत्पादन की विशाल क्षमता है। फोटोवोल्टिक (Photovoltaic) तकनीक का उपयोग करके सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है। राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission) के तहत सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। राजस्थान और गुजरात सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त राज्य माने जाते हैं।
पवन ऊर्जा (Wind Energy)
भारत में पवन ऊर्जा उत्पादन की भी बहुत बड़ी क्षमता है, विशेषकर तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र, और कर्नाटक जैसे तटीय राज्यों में। पवन चक्कियों (Windmills) का उपयोग करके पवन की गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदला जाता है। भारत पवन ऊर्जा उत्पादन में विश्व के अग्रणी देशों में से एक है। तमिलनाडु में मुप्पंडल पवन फार्म देश के सबसे बड़े पवन फार्मों में से एक है।
ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण
ऊर्जा विकास की कुंजी है, लेकिन ऊर्जा की खपत और उत्पादन के बीच एक संतुलन बनाना आवश्यक है। ऊर्जा संरक्षण ही ऊर्जा उत्पादन है। हमें सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करना, बिजली के उपकरणों को अनावश्यक रूप से बंद रखना और ऊर्जा-कुशल उपकरणों (जैसे LED बल्ब) का उपयोग करके ऊर्जा की बचत करनी चाहिए। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाना ऊर्जा संरक्षण और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
वन्य जीव और जैव विविधता: प्रकृति की अनमोल धरोहर
भारत की जैव विविधता का परिचय
जैव विविधता (Biodiversity) का अर्थ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीवों की विविधता, जिसमें पौधे, जानवर, कवक और सूक्ष्मजीव शामिल हैं। भारत दुनिया के 17 मेगा-विविधता (Mega-diverse) वाले देशों में से एक है। यहाँ दुनिया की लगभग 8% ज्ञात प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यह विशाल जैव विविधता भारत की विभिन्न जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम है, जिसमें हिमालय के ऊंचे पहाड़ों से लेकर पश्चिमी घाट के वर्षावन और थार का रेगिस्तान शामिल है।
जैव विविधता का महत्व
जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। प्रत्येक प्रजाति की पारिस्थितिकी तंत्र में एक भूमिका होती है। जैव विविधता हमें भोजन, दवाइयाँ, और औद्योगिक उत्पाद प्रदान करती है। यह परागण, मृदा निर्माण और जलवायु विनियमन जैसी आवश्यक पारिस्थितिक सेवाएं भी प्रदान करती है। इसलिए, इसका संरक्षण मानव अस्तित्व के लिए अनिवार्य है।
भारत में वनस्पतियों की विविधता (Flora)
भारत में वनस्पतियों की लगभग 47,000 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो इसे पौधों की विविधता के मामले में दुनिया में दसवें और एशिया में चौथे स्थान पर रखती हैं। इनमें से लगभग 15,000 फूलों की प्रजातियाँ हैं। भारत में कई स्थानिक (Endemic) पौधों की प्रजातियाँ भी हैं, जो दुनिया में कहीं और नहीं पाई जाती हैं। हिमालय और पश्चिमी घाट स्थानिक प्रजातियों के प्रमुख केंद्र हैं।
भारत में जीवों की विविधता (Fauna)
भारत में जीवों की भी विशाल विविधता है। यहाँ जानवरों की 90,000 से अधिक प्रजातियाँ हैं, जिनमें स्तनधारियों की लगभग 400 प्रजातियाँ, पक्षियों की 1,300 से अधिक प्रजातियाँ, और मछलियों की 2,500 से अधिक प्रजातियाँ शामिल हैं। रॉयल बंगाल टाइगर, एशियाई शेर, एक सींग वाला गैंडा, और एशियाई हाथी भारत के कुछ प्रमुख और प्रतिष्ठित वन्यजीव हैं।
जैव विविधता के हॉटस्पॉट
बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot) वे क्षेत्र होते हैं जहाँ बहुत अधिक संख्या में स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं और जिनके आवास पर गंभीर खतरा मंडरा रहा होता है। भारत में चार प्रमुख बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट हैं:
- हिमालय: इसमें पूर्वी और पश्चिमी हिमालय दोनों शामिल हैं, जो पौधों और जानवरों की अनूठी प्रजातियों का घर है।
- पश्चिमी घाट: यह भारत के पश्चिमी तट के समानांतर फैला हुआ है और यहाँ उभयचरों और पौधों की कई स्थानिक प्रजातियाँ हैं।
- इंडो-बर्मा क्षेत्र: इसमें उत्तर-पूर्वी भारत का अधिकांश भाग शामिल है।
- सुंडालैंड: इसमें भारत का निकोबार द्वीप समूह शामिल है।
वन्यजीवों के विलुप्त होने के कारण
मानवीय गतिविधियों के कारण भारत में वन्यजीवों और उनकी जैव विविधता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वनों की कटाई, शहरीकरण, कृषि भूमि का विस्तार, और अवैध शिकार (Poaching) वन्यजीवों के आवास के विनाश और उनके विलुप्त होने के प्रमुख कारण हैं। प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और आक्रामक विदेशी प्रजातियों (Invasive Alien Species) का प्रसार भी जैव विविधता के लिए गंभीर खतरे हैं।
भारत में वन्यजीव संरक्षण
भारत सरकार ने वन्यजीवों और उनकी जैव विविधता के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, वन्यजीवों के अवैध शिकार और व्यापार पर रोक लगाने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा प्रदान करता है। इस अधिनियम के तहत, राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना की गई है।
राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य
राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) वे संरक्षित क्षेत्र होते हैं जहाँ किसी भी प्रकार की मानवीय गतिविधि की अनुमति नहीं होती है और वे मुख्य रूप से वन्यजीवों के संरक्षण पर केंद्रित होते हैं। जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखंड) भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान है। वन्यजीव अभयारण्यों (Wildlife Sanctuaries) में कुछ मानवीय गतिविधियों की अनुमति दी जा सकती है, जब तक कि वे वन्यजीवों के संरक्षण में बाधा न डालें। भारत में 100 से अधिक राष्ट्रीय उद्यान और 550 से अधिक वन्यजीव अभयारण्य हैं।
बायोस्फीयर रिजर्व (Biosphere Reserves)
बायोस्फीयर रिजर्व यूनेस्को (UNESCO) के “मैन एंड बायोस्फीयर” (MAB) कार्यक्रम के तहत स्थापित बड़े संरक्षित क्षेत्र हैं। इनका उद्देश्य जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के सतत विकास को बढ़ावा देना है। भारत में 18 बायोस्फीयर रिजर्व हैं, जिनमें से नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व भारत का पहला बायोस्फीयर रिजर्व था। सुंदरबन, नंदा देवी और मन्नार की खाड़ी भी प्रमुख बायोस्फीयर रिजर्व हैं।
विशिष्ट संरक्षण परियोजनाएं
सरकार ने कुछ विशिष्ट और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए विशेष परियोजनाएं भी शुरू की हैं। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (1973) बाघों की आबादी को बचाने के लिए शुरू की गई एक सफल परियोजना है। इसी तरह, ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ (1992) हाथियों और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए चलाया जा रहा है। अन्य परियोजनाओं में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना, गैंडा संरक्षण परियोजना आदि शामिल हैं।
प्रदूषण और संरक्षण: भविष्य की चुनौती
प्रदूषण का अर्थ और प्रकार
प्रदूषण का अर्थ है पर्यावरण में अवांछनीय पदार्थों का प्रवेश, जिससे हवा, पानी और मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता में गिरावट आती है और यह मानव स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए हानिकारक हो जाता है। तेजी से औद्योगीकरण, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि ने भारत में प्रदूषण की समस्या को गंभीर बना दिया है। प्रदूषण के मुख्य प्रकार वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण हैं।
वायु प्रदूषण (Air Pollution)
वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, और जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल) का जलना वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहर गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। वायु प्रदूषण से श्वसन संबंधी बीमारियाँ, जैसे अस्थमा और ब्रोंकाइटिस, तथा हृदय रोग होते हैं। सरकार ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानकों को लागू किया है और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) शुरू किया है।
जल प्रदूषण (Water Pollution)
औद्योगिक अपशिष्टों, अनुपचारित सीवेज, और कृषि में उपयोग होने वाले कीटनाशकों और उर्वरकों का नदियों और झीलों में मिलना जल प्रदूषण का मुख्य कारण है। भारत की कई पवित्र नदियाँ, जैसे गंगा और यमुना, आज गंभीर रूप से प्रदूषित हैं। प्रदूषित जल पीने से हैजा, टाइफाइड और पीलिया जैसी जल-जनित बीमारियाँ होती हैं। ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम गंगा नदी को साफ करने के लिए एक प्रमुख सरकारी पहल है।
मृदा प्रदूषण (Soil Pollution)
अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग, औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान, और प्लास्टिक कचरा मृदा प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। यह मिट्टी की उर्वरता को कम करता है और खाद्य श्रृंखला (Food Chain) के माध्यम से हानिकारक रसायनों को हमारे शरीर तक पहुंचाता है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) और जैविक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा देना मृदा प्रदूषण को कम करने के उपाय हैं।
ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution)
वाहनों का शोर, लाउडस्पीकर, और औद्योगिक मशीनरी ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं, खासकर शहरी क्षेत्रों में। ध्वनि प्रदूषण से तनाव, उच्च रक्तचाप, सुनने की क्षमता में कमी और नींद संबंधी विकार हो सकते हैं। ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए साइलेंस जोन (जैसे अस्पतालों और स्कूलों के पास) बनाना और अनावश्यक हॉर्न बजाने पर रोक लगाना जैसे नियम बनाए गए हैं।
पर्यावरण संरक्षण का महत्व
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ों को बचाना या प्रदूषण कम करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हम प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह से उपयोग करें कि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी उपलब्ध रहें। सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा इसी सिद्धांत पर आधारित है।
भारत में प्रमुख पर्यावरण आंदोलन
भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण जन आंदोलन हुए हैं। 1970 के दशक में उत्तराखंड में हुआ ‘चिपको आंदोलन’ पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए एक प्रसिद्ध आंदोलन था, जिसमें महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उनकी रक्षा की। इसी तरह, ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ सरदार सरोवर बांध के निर्माण से होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों के खिलाफ एक लंबा संघर्ष रहा है। इन आंदोलनों ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पर्यावरणीय कानून और नीतियां
भारत सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कानून और नीतियां बनाई हैं। 1986 का ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम’ एक व्यापक कानून है जो केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार देता है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) की स्थापना 2010 में की गई थी, जो पर्यावरण से संबंधित मामलों का त्वरित निपटारा करता है।
नागरिकों की भूमिका
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है। पानी और बिजली की बचत करना, कचरे को कम करना और उसका सही निपटान करना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना कुछ ऐसे छोटे कदम हैं जो हम सभी उठा सकते हैं। पर्यावरण के प्रति जागरूक और जिम्मेदार बनकर ही हम एक स्वच्छ और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।
निष्कर्ष: सतत विकास की ओर एक कदम
संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग
हमने इस लेख में भारत के पर्यावरण और विभिन्न प्रकार के संसाधनों पर विस्तार से चर्चा की। यह स्पष्ट है कि भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन ये संसाधन असीमित नहीं हैं। बढ़ती जनसंख्या और विकास की तेज गति ने इन संसाधनों पर भारी दबाव डाला है। इसलिए, यह अनिवार्य है कि हम इन अनमोल संपदाओं का उपयोग विवेकपूर्ण और योजनाबद्ध तरीके से करें ताकि वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों का भी सम्मान हो।
विकास और पर्यावरण में संतुलन
विकास आवश्यक है, लेकिन यह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हमें विकास के ऐसे मॉडल अपनाने होंगे जो पर्यावरण के अनुकूल हों। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, जल संरक्षण की तकनीकों को अपनाना, वनीकरण को प्रोत्साहित करना, और प्रदूषण को नियंत्रित करना सतत विकास के प्रमुख स्तंभ हैं। प्रौद्योगिकी और नवाचार इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, जिससे हम संसाधनों का अधिक कुशलता से उपयोग कर सकते हैं।
एक सामूहिक जिम्मेदारी
अंततः, पर्यावरण का संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार, उद्योग, और नागरिक समाज सभी को मिलकर काम करना होगा। छात्रों और युवाओं की इसमें एक विशेष भूमिका है, क्योंकि वे भविष्य के निर्माता हैं। पर्यावरण के मुद्दों के बारे में ज्ञान प्राप्त करना और दूसरों को जागरूक करना एक शक्तिशाली कदम है। यदि हम सब मिलकर प्रयास करें, तो हम निश्चित रूप से भारत की प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए एक समृद्ध और टिकाऊ भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।


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