उग्रवाद: अदृश्य दुश्मन? (Extremism: Invisible Enemy?)
उग्रवाद: अदृश्य दुश्मन? (Extremism: Invisible Enemy?)

उग्रवाद: अदृश्य दुश्मन? (Extremism: Invisible Enemy?)

विषय-सूची (Table of Contents)

1. प्रस्तावना: उग्रवाद की अदृश्य जड़ें (Introduction: The Invisible Roots of Extremism)

एक छोटे से शहर में रहने वाला, 19 वर्षीय रोहन, अपने भविष्य को लेकर उत्साहित था। वह कॉलेज में पढ़ता था और सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहता था। धीरे-धीरे, ऑनलाइन गेमिंग ग्रुप्स और कुछ विशेष मंचों पर उसकी दोस्ती कुछ ऐसे लोगों से हुई, जो उसे एक ‘महान उद्देश्य’ के लिए लड़ने की बातें बताते थे। वे उसे समझाते थे कि कैसे व्यवस्था ने उसके समुदाय के साथ अन्याय किया है और अब बदला लेने का समय आ गया है। शुरू में रोहन को यह सब अजीब लगा, लेकिन लगातार भेजे जाने वाले वीडियो, लेख और संदेशों ने उसके मन में जहर घोलना शुरू कर दिया। कुछ ही महीनों में, वह अपने परिवार और दोस्तों से कट गया और एक ऐसी विचारधारा में विश्वास करने लगा जो हिंसा को सही ठहराती थी। यह कहानी दर्शाती है कि उग्रवाद कोई दूर की कौड़ी नहीं है, बल्कि यह एक अदृश्य दुश्मन की तरह हमारे समाज में, खासकर युवाओं के दिमाग में अपनी जगह बना रहा है।

उग्रवाद (Extremism) एक जटिल और बहुआयामी समस्या है जो किसी भी देश की आंतरिक सुरक्षा (internal security) के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। यह केवल हिंसा या आतंकवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सोच है जो किसी भी सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा के चरमपंथी संस्करण को अपनाती है और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए लोकतंत्र, संवाद और सहिष्णुता के रास्ते को नकार देती है। आज के डिजिटल युग में, जब सूचनाएं तेजी से फैलती हैं, तब उग्रवाद का खतरा और भी बढ़ गया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि उग्रवाद क्यों और कैसे फैलता है, ताकि हम एक समाज के रूप में इसका मुकाबला कर सकें। इस लेख में, हम उग्रवाद के विभिन्न पहलुओं, इसके कारणों, प्रभावों और इससे निपटने के उपायों पर गहराई से चर्चा करेंगे।

2. उग्रवाद क्या है? – एक विस्तृत समझ (What is Extremism? – A Detailed Understanding)

उग्रवाद की परिभाषा (Definition of Extremism)

उग्रवाद को समझना उसकी औपचारिक परिभाषा से शुरू होता है। सामान्य शब्दों में, उग्रवाद का अर्थ है किसी भी विचारधारा, चाहे वह राजनीतिक, धार्मिक या सामाजिक हो, के ‘चरम’ या ‘अतिवादी’ रूप को अपनाना। यह एक ऐसी मानसिकता है जो उदारवादी या मध्यममार्गी विचारों को अस्वीकार करती है और मानती है कि उसके अपने विचार ही एकमात्र सत्य हैं।

  • विचारों की कठोरता: उग्रवादी व्यक्ति या समूह अपने विचारों को लेकर बेहद कठोर होते हैं और किसी भी प्रकार के समझौते या संवाद के लिए तैयार नहीं होते।
  • ‘हम बनाम वे’ की मानसिकता: वे दुनिया को दो हिस्सों में देखते हैं – एक ‘हम’ (जो सही हैं) और दूसरे ‘वे’ (जो गलत हैं और दुश्मन हैं)। यह मानसिकता समाज में ध्रुवीकरण (polarization) पैदा करती है।
  • हिंसा का समर्थन: हालांकि हर उग्रवादी हिंसक नहीं होता, लेकिन उग्रवाद अक्सर हिंसा को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के एक वैध उपकरण के रूप में देखता है और उसका समर्थन करता है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों का अनादर: उग्रवाद लोकतंत्र, मानवाधिकार, कानून के शासन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का सम्मान नहीं करता।

उग्रवाद और आतंकवाद में अंतर (Difference between Extremism and Terrorism)

अक्सर लोग ‘उग्रवाद’ और ‘आतंकवाद’ (Terrorism) शब्दों का इस्तेमाल एक दूसरे के स्थान पर करते हैं, लेकिन इनमें एक महत्वपूर्ण अंतर है। इन दोनों के बीच के संबंध को समझना इस मुद्दे की गहराई में जाने के लिए आवश्यक है।

  • उग्रवाद एक ‘विचारधारा’ है, जबकि आतंकवाद एक ‘कार्रवाई’ है। उग्रवाद एक सोच है, एक मानसिकता है। कोई व्यक्ति हिंसक हुए बिना भी उग्रवादी विचारों का हो सकता है।
  • आतंकवाद, उग्रवाद का हिंसक रूप है। जब कोई उग्रवादी समूह या व्यक्ति अपने राजनीतिक या वैचारिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आम नागरिकों या समाज में भय पैदा करने के इरादे से गैर-कानूनी हिंसा का उपयोग करता है, तो उसे आतंकवाद कहा जाता है।
  • सभी आतंकवादी उग्रवादी होते हैं, लेकिन सभी उग्रवादी आतंकवादी नहीं होते। एक व्यक्ति कट्टरपंथी विचार रख सकता है, नफरत फैला सकता है, लेकिन जब तक वह हिंसा का सहारा नहीं लेता, उसे आतंकवादी नहीं कहा जा सकता। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उग्रवादी विचारधारा ही आतंकवाद की जड़ है।

विचारधारा की भूमिका (The Role of Ideology)

विचारधारा (Ideology) उग्रवाद की रीढ़ है। यह उन विश्वासों, विचारों और मूल्यों का एक समूह है जो दुनिया को देखने का एक विशेष तरीका प्रदान करता है। उग्रवादी विचारधाराएं अक्सर बहुत सरल और आकर्षक होती हैं, जो जटिल समस्याओं का आसान समाधान प्रस्तुत करती हैं। p>

  • पहचान का निर्माण: विचारधारा लोगों को एक पहचान और एक समूह से संबंधित होने की भावना देती है। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से आकर्षक हो सकता है जो समाज में खुद को अलग-थलग या हाशिए पर महसूस करते हैं।
  • कार्यों को औचित्य प्रदान करना: यह विचारधारा हिंसक कार्यों सहित किसी भी कार्रवाई को एक ‘महान उद्देश्य’ के लिए आवश्यक बताकर नैतिक रूप से सही ठहराती है। वे अपने अनुयायियों को विश्वास दिलाते हैं कि वे उत्पीड़ितों के लिए लड़ रहे हैं।
  • दुश्मन का निर्माण: उग्रवादी विचारधाराएं एक स्पष्ट ‘दुश्मन’ को परिभाषित करती हैं, जिस पर सभी समस्याओं का दोष मढ़ दिया जाता है। यह दुश्मन कोई विशेष समुदाय, सरकार, या कोई अन्य देश हो सकता है। यह नफरत और हिंसा के लिए एक लक्ष्य प्रदान करता है, जिससे उग्रवाद को बढ़ावा मिलता है।

3. उग्रवाद का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (Historical Perspective of Extremism)

वैश्विक इतिहास में उग्रवाद (Extremism in Global History)

उग्रवाद कोई नई घटना नहीं है। इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां समूहों ने अपनी चरमपंथी विचारधाराओं को लागू करने के लिए हिंसा और جبر का सहारा लिया।

  • प्राचीन काल: रोमन साम्राज्य में ज़ीलॉट्स जैसे समूहों ने अपनी धार्मिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए चरमपंथी तरीकों का इस्तेमाल किया। मध्य युग में, धर्मयुद्ध (Crusades) भी एक प्रकार के धार्मिक उग्रवाद का उदाहरण थे।
  • आधुनिक काल: 20वीं सदी में, यूरोप में नाजीवाद और फासीवाद जैसे राजनीतिक उग्रवाद का उदय हुआ, जिसके कारण द्वितीय विश्व युद्ध और लाखों लोगों का नरसंहार हुआ। इसी तरह, कम्युनिस्ट क्रांतियों ने भी अपने विरोधियों के खिलाफ अत्यधिक हिंसा का इस्तेमाल किया।
  • समकालीन इतिहास: शीत युद्ध के बाद, धार्मिक और जातीय पहचान पर आधारित उग्रवाद ने जोर पकड़ा है। अल-कायदा और ISIS जैसे संगठनों ने वैश्विक स्तर पर धार्मिक उग्रवाद का एक नया और खतरनाक रूप प्रस्तुत किया है।

भारत में उग्रवाद का उदय (The Rise of Extremism in India)

भारत, अपनी विशाल विविधता के साथ, ऐतिहासिक रूप से विभिन्न प्रकार के उग्रवादी आंदोलनों का सामना करता रहा है। भारत में उग्रवाद की जड़ें औपनिवेशिक काल से ही खोजी जा सकती हैं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसने कई नए रूप धारण किए।

  • औपनिवेशिक काल: ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में कुछ क्रांतिकारी समूहों ने हिंसक तरीकों को अपनाया, जिन्हें उस समय की सरकार ‘उग्रवादी’ मानती थी। हालांकि, उनका उद्देश्य विदेशी शासन से मुक्ति पाना था।
  • स्वतंत्रता के बाद: आजादी के बाद, भारत में उग्रवाद के कारण बदल गए। अब यह मुख्य रूप से क्षेत्रीय स्वायत्तता, जातीय पहचान, आर्थिक असमानता और राजनीतिक अन्याय जैसे मुद्दों से जुड़ा हुआ है।

स्वतंत्रता के बाद के प्रमुख उग्रवादी आंदोलन (Major Extremist Movements Post-Independence)

स्वतंत्रता के बाद भारत ने कई गंभीर उग्रवादी चुनौतियों का सामना किया है, जिन्होंने देश की एकता और अखंडता को चुनौती दी है।

  • नक्सलवाद (Naxalism): 1960 के दशक के अंत में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन, जिसे वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism) भी कहा जाता है, भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए एक हिंसक सशस्त्र संघर्ष है।
  • उत्तर-पूर्व में उग्रवाद: भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई जातीय समूहों ने अपनी अनूठी पहचान और कथित उपेक्षा के कारण स्वायत्तता या पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हुए हथियार उठाए।
  • पंजाब में उग्रवाद: 1980 के दशक में, पंजाब ने एक अलग सिख राष्ट्र ‘खालिस्तान’ की मांग को लेकर एक हिंसक अलगाववादी आंदोलन देखा, जिसे बाहरी शक्तियों का भी समर्थन प्राप्त था।
  • जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद: 1980 के दशक के अंत से, जम्मू और कश्मीर सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद और अलगाववादी उग्रवाद से जूझ रहा है, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना हुआ है।

4. उग्रवाद के विभिन्न प्रकार और चेहरे (Different Types and Faces of Extremism)

उग्रवाद का कोई एक चेहरा नहीं होता। यह विभिन्न रूपों में प्रकट होता है, जो इसकी विचारधारा और लक्ष्यों पर निर्भर करता है। इन प्रकारों को समझना हमें इस समस्या की जटिलता को समझने में मदद करता है।

धार्मिक उग्रवाद (Religious Extremism)

यह उग्रवाद का सबसे आम और खतरनाक रूपों में से एक है। इसमें व्यक्ति या समूह अपने धर्म की कट्टरपंथी व्याख्या करते हैं और इसे दूसरों पर थोपने के लिए हिंसा का सहारा लेते हैं।

  • लक्ष्य: इसका मुख्य लक्ष्य अक्सर एक ‘धर्म आधारित राज्य’ (Theocratic State) की स्थापना करना या अपने धार्मिक कानूनों को लागू करना होता है।
  • तरीके: वे अन्य धर्मों या अपने ही धर्म के उदारवादी अनुयायियों को ‘काफिर’ या ‘धर्मद्रोही’ मानते हैं और उनके खिलाफ हिंसा को जायज ठहराते हैं।
  • उदाहरण: वैश्विक स्तर पर ISIS और अल-कायदा जैसे संगठन इसके प्रमुख उदाहरण हैं। भारत ने भी समय-समय पर विभिन्न धार्मिक उग्रवादी समूहों की गतिविधियों का सामना किया है। यह एक गंभीर प्रकार का उग्रवाद है।

राजनीतिक उग्रवाद (Political Extremism)

यह उग्रवाद एक विशेष राजनीतिक विचारधारा पर आधारित होता है और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को हिंसक रूप से बदलने का प्रयास करता है। इसे मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

  • वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism): यह मार्क्सवादी-लेनिनवादी-माओवादी विचारधारा से प्रेरित है और पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर एक वर्गहीन समाज स्थापित करना चाहता है। भारत में नक्सलवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • दक्षिणपंथी उग्रवाद (Right-Wing Extremism): यह अक्सर नस्लीय या राष्ट्रीय श्रेष्ठता, आप्रवासी विरोधी भावनाओं और पारंपरिक मूल्यों की कट्टर रक्षा पर आधारित होता है। यह मौजूदा सरकार को कमजोर करने और एक सत्तावादी शासन स्थापित करने का लक्ष्य रख सकता है।

जातीय और नस्लीय उग्रवाद (Ethnic and Racial Extremism)

इस प्रकार का उग्रवाद किसी विशेष जातीय या नस्लीय समूह की श्रेष्ठता के विश्वास पर आधारित होता है। यह दूसरे समूहों के प्रति गहरी घृणा और भेदभाव को बढ़ावा देता है।

  • पहचान की राजनीति: यह अक्सर तब उभरता है जब कोई जातीय समूह महसूस करता है कि उसकी पहचान, संस्कृति या संसाधनों को दूसरे समूह से खतरा है।
  • हिंसा का रूप: यह नरसंहार (Genocide), जातीय सफाई (Ethnic Cleansing) और घृणा अपराधों (Hate Crimes) जैसे भयानक रूपों में प्रकट हो सकता है।
  • उदाहरण: रवांडा नरसंहार और पूर्व यूगोस्लाविया में हुए जातीय संघर्ष इसके दुखद ऐतिहासिक उदाहरण हैं।

क्षेत्रीय उग्रवाद (Regional Extremism)

क्षेत्रीय उग्रवाद, जिसे अक्सर अलगाववादी उग्रवाद भी कहा जाता है, तब उत्पन्न होता है जब किसी देश के एक विशेष क्षेत्र के लोग भाषाई, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक कारणों से खुद को बाकी देश से अलग महसूस करते हैं और एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करते हैं।

  • कारण: इसके पीछे अक्सर आर्थिक उपेक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी और सांस्कृतिक पहचान के दमन की भावना होती है।
  • भारत में संदर्भ: भारत ने उत्तर-पूर्व के कई राज्यों और कुछ हद तक जम्मू-कश्मीर में इस प्रकार के उग्रवाद का सामना किया है। इन आंदोलनों का उद्देश्य अक्सर हिंसक तरीकों से केंद्र सरकार के अधिकार को चुनौती देना होता है।

5. उग्रवाद के मूल कारण: क्यों पनपता है यह अदृश्य दुश्मन? (Root Causes of Extremism: Why Does this Invisible Enemy Thrive?)

उग्रवाद अचानक पैदा नहीं होता। यह उन गहरी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं का परिणाम है जो लंबे समय से समाज में मौजूद रहती हैं। इन मूल कारणों को समझना इस समस्या से निपटने के लिए पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है।

सामाजिक और आर्थिक कारक (Socio-economic Factors)

अक्सर, सामाजिक और आर्थिक असमानता उग्रवाद के लिए एक उपजाऊ जमीन तैयार करती है। जब लोगों को लगता है कि उनके पास जीवन जीने के बुनियादी अवसर नहीं हैं, तो वे वैकल्पिक और अक्सर हिंसक रास्तों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

  • गरीबी और बेरोजगारी: जब युवाओं के पास शिक्षा और रोजगार के अवसर नहीं होते, तो उग्रवादी संगठन उन्हें पैसे, शक्ति और एक उद्देश्य का लालच देकर आसानी से भर्ती कर सकते हैं।
  • अन्याय और असमानता: जब समाज के किसी विशेष वर्ग को लगता है कि न्याय प्रणाली, भूमि वितरण या संसाधनों के बंटवारे में उनके साथ लगातार भेदभाव हो रहा है, तो वे व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।
  • विकास की कमी: जिन क्षेत्रों में सड़क, स्कूल, अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है, वहां सरकार और लोगों के बीच एक खाई बन जाती है, जिसका फायदा उग्रवादी संगठन उठाते हैं।

राजनीतिक कारक (Political Factors)

राजनीतिक अस्थिरता और कुशासन भी उग्रवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक कमजोर और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था लोगों में निराशा और क्रोध पैदा करती है।

  • राजनीतिक दमन: जब सरकारों द्वारा असहमति की आवाजों को दबाया जाता है और लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया जाता, तो वे हिंसक साधनों का सहारा ले सकते हैं।
  • प्रतिनिधित्व की कमी: जब किसी जातीय या धार्मिक अल्पसंख्यक समूह को लगता है कि राजनीतिक प्रक्रिया में उनकी कोई सुनवाई नहीं है और उनके हितों की अनदेखी की जा रही है, तो उनमें अलगाव की भावना पैदा होती है।
  • कमजोर शासन (Weak Governance): भ्रष्टाचार, न्याय मिलने में देरी और कानून के शासन की विफलता लोगों का व्यवस्था पर से विश्वास कम कर देती है, जिससे उग्रवादी समूहों को अपनी समानांतर सरकार चलाने का मौका मिल जाता है।

मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors)

उग्रवाद की ओर आकर्षित होने के पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। ये कारक व्यक्तिगत स्तर पर काम करते हैं और किसी व्यक्ति को कट्टरपंथी विचारधारा अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

  • पहचान का संकट (Identity Crisis): जो युवा अपनी पहचान को लेकर भ्रमित होते हैं या समाज में अपनी जगह नहीं बना पाते, वे उग्रवादी समूहों द्वारा प्रदान की गई एक मजबूत और स्पष्ट पहचान की ओर आकर्षित होते हैं।
  • जुड़ाव की भावना: उग्रवादी समूह अपने सदस्यों को एक परिवार या भाईचारे जैसी भावना प्रदान करते हैं। यह उन लोगों के लिए बहुत आकर्षक हो सकता है जो अकेलापन या सामाजिक अलगाव महसूस करते हैं।
  • अन्याय का बदला लेने की भावना: यदि किसी व्यक्ति या उसके समुदाय ने वास्तविक या कथित अन्याय का सामना किया है, तो बदला लेने की तीव्र इच्छा उसे उग्रवाद के रास्ते पर ले जा सकती है।

प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण की भूमिका (Role of Technology and Globalization)

आज के डिजिटल युग में, प्रौद्योगिकी और वैश्वीकरण ने उग्रवाद के प्रसार के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। इंटरनेट ने उग्रवादी समूहों को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली उपकरण प्रदान किए हैं।

  • ऑनलाइन कट्टरता (Online Radicalization): सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन फ़ोरम का उपयोग करके, उग्रवादी संगठन दुनिया भर में युवाओं तक आसानी से पहुँच सकते हैं, उन्हें कट्टरपंथी बना सकते हैं और भर्ती कर सकते हैं।
  • इको चैंबर (Echo Chambers): इंटरनेट पर एल्गोरिदम लोगों को वही सामग्री दिखाते हैं जो उनके मौजूदा विश्वासों से मेल खाती है। इससे ‘इको चैंबर’ बनते हैं, जहां व्यक्ति केवल उग्रवादी विचारों के संपर्क में आता है और वैकल्पिक दृष्टिकोण से पूरी तरह कट जाता है।
  • वैश्विक जुड़ाव: वैश्वीकरण ने उग्रवादी समूहों को सीमाओं के पार विचारों, धन और लड़ाकों का आदान-प्रदान करने में सक्षम बनाया है, जिससे यह एक स्थानीय समस्या से बढ़कर एक वैश्विक खतरा बन गया है। इस प्रकार का उग्रवाद अत्यंत चिंताजनक है।

6. भारत में उग्रवाद: एक विस्तृत विश्लेषण (Extremism in India: A Detailed Analysis)

भारत अपनी भौगोलिक संरचना (geographical structure), सामाजिक विविधता और राजनीतिक इतिहास के कारण कई प्रकार के उग्रवाद से प्रभावित रहा है। इन चुनौतियों को समझना भारत की आंतरिक सुरक्षा की जटिलताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism – LWE)

वामपंथी उग्रवाद, जिसे आमतौर पर नक्सलवाद या माओवाद के नाम से जाना जाता है, को भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक माना जाता है। यह आंदोलन देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों के आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय है, जिसे ‘लाल गलियारा’ (Red Corridor) भी कहा जाता है।

  • विचारधारा: ये समूह माओवादी विचारधारा का पालन करते हैं और उनका अंतिम लक्ष्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना और एक साम्यवादी शासन स्थापित करना है।
  • कारण: इसके मुख्य कारणों में भूमि सुधारों की विफलता, आदिवासियों का विस्थापन, गरीबी, शोषण और विकास की कमी शामिल है।
  • रणनीति: नक्सली अक्सर सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, सरकारी संपत्ति को नष्ट करते हैं और उन क्षेत्रों में एक समानांतर सरकार चलाते हैं जहां राज्य की उपस्थिति कमजोर होती है।

उत्तर-पूर्व में उग्रवाद (Extremism in the North-East)

भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, जिसमें आठ राज्य शामिल हैं, दशकों से जातीय और क्षेत्रीय उग्रवाद से त्रस्त रहा है। इस क्षेत्र में 200 से अधिक जातीय समूह हैं, और कई समूहों ने अपनी अनूठी पहचान और स्वायत्तता के लिए हथियार उठाए हैं।

  • विविध मांगें: यहां के उग्रवादी समूहों की मांगें अलग-अलग हैं। कुछ पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं, कुछ अधिक स्वायत्तता चाहते हैं, और कुछ अपने जातीय समूह के लिए एक अलग राज्य की मांग करते हैं।
  • कारक: इसके पीछे के कारणों में ऐतिहासिक शिकायतें, आर्थिक पिछड़ापन, पड़ोसी देशों से अवैध प्रवासन और केंद्र सरकार द्वारा कथित उपेक्षा की भावना शामिल है।
  • वर्तमान स्थिति: हालांकि पिछले कुछ वर्षों में शांति समझौतों और विकास कार्यों के कारण हिंसा में कमी आई है, फिर भी कुछ क्षेत्रों में उग्रवादी समूह सक्रिय हैं और उग्रवाद एक चुनौती बना हुआ है।

जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद (Extremism in Jammu and Kashmir)

जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद तीन दशकों से अधिक समय से भारत के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। यह एक जटिल मुद्दा है जिसमें अलगाववाद, धार्मिक उग्रवाद और सीमा पार आतंकवाद (cross-border terrorism) के तत्व शामिल हैं।

  • उत्पत्ति: 1980 के दशक के अंत में राजनीतिक असंतोष और पाकिस्तान द्वारा समर्थित अलगाववादी भावनाओं के कारण यहां सशस्त्र उग्रवाद शुरू हुआ।
  • स्वरूप: शुरू में यह एक अलगाववादी आंदोलन था, लेकिन धीरे-धीरे यह धार्मिक उग्रवाद से प्रभावित हो गया, जिसमें कई विदेशी आतंकवादी संगठन भी शामिल हो गए।
  • चुनौतियां: सुरक्षा बलों के लिए यहां की चुनौती दोहरी है – एक तरफ आतंकवादियों से निपटना और दूसरी तरफ स्थानीय आबादी का विश्वास जीतना। कट्टरता और युवाओं की भर्ती एक निरंतर चिंता का विषय है।

7. उग्रवाद का समाज और राष्ट्र पर प्रभाव (Impact of Extremism on Society and Nation)

उग्रवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं है; यह एक कैंसर की तरह है जो राष्ट्र के हर हिस्से को प्रभावित करता है। इसके परिणाम दूरगामी और विनाशकारी होते हैं।

सुरक्षा पर प्रभाव (Impact on Security)

उग्रवाद का सबसे सीधा और दिखाई देने वाला प्रभाव देश की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ता है।

  • जान-माल का नुकसान: हर साल हजारों नागरिक और सुरक्षाकर्मी उग्रवादी हिंसा में अपनी जान गंवाते हैं। यह मानव जीवन की एक अपूरणीय क्षति है।
  • आंतरिक विस्थापन: हिंसा और असुरक्षा के कारण लाखों लोगों को अपने घर-बार छोड़कर शरणार्थी के रूप में रहना पड़ता है, जिससे एक बड़ा मानवीय संकट पैदा होता है।
  • संसाधनों का विचलन: सरकार को सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों पर भारी मात्रा में धन खर्च करना पड़ता है, जिसे अन्यथा विकास कार्यों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च किया जा सकता था।

आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)

उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों का आर्थिक विकास लगभग रुक जाता है, जिससे गरीबी और पिछड़ापन और भी बढ़ जाता है।

  • निवेश में कमी: कोई भी कंपनी या निवेशक ऐसे क्षेत्र में पैसा नहीं लगाना चाहता जहां हिंसा और अस्थिरता का माहौल हो। इससे रोजगार के अवसर समाप्त हो जाते हैं।
  • बुनियादी ढांचे का विनाश: उग्रवादी समूह अक्सर स्कूल, सड़कें, पुल और संचार टावरों को नष्ट कर देते हैं, जिससे विकास प्रक्रिया दशकों पीछे चली जाती है।
  • अवैध अर्थव्यवस्था: कई उग्रवादी संगठन अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए जबरन वसूली, अपहरण और तस्करी जैसी अवैध आर्थिक गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं, जो क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को और कमजोर करता है। यह उग्रवाद का एक स्याह पक्ष है।

सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव (Impact on Social Fabric)

उग्रवाद का सबसे गहरा और स्थायी प्रभाव समाज के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। यह लोगों के बीच विश्वास और सद्भाव को नष्ट कर देता है।

  • ध्रुवीकरण और घृणा: उग्रवादी विचारधाराएं विभिन्न समुदायों के बीच नफरत और संदेह पैदा करती हैं, जिससे समाज धार्मिक या जातीय आधार पर बंट जाता है।
  • भय का माहौल: निरंतर हिंसा और धमकी के माहौल में लोग डर में जीते हैं। उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां सीमित हो जाती हैं, और समाज का समग्र विकास रुक जाता है।
  • पीढ़ियों का नुकसान: उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों और युवाओं का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और हिंसा के चक्र में फंसने का खतरा बना रहता है।

राजनीतिक प्रभाव (Political Impact)

उग्रवाद लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थानों को कमजोर करता है, जिससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती है।

  • लोकतंत्र का क्षरण: उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। लोग डर के कारण मतदान करने से बचते हैं, और उग्रवादी समूह चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश करते हैं।
  • कठोर कानूनों का उपयोग: उग्रवाद से निपटने के लिए, सरकारों को कभी-कभी कठोर कानूनों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे मानवाधिकारों के हनन की चिंताएं पैदा हो सकती हैं।
  • राजनीतिक अस्थिरता: निरंतर हिंसा और असुरक्षा के कारण सरकारें अस्थिर हो सकती हैं, और यह स्थिति देश की समग्र राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

8. सरकारी नीतियां और उग्रवाद से निपटने की रणनीतियां (Government Policies and Strategies to Counter Extremism)

उग्रवाद जैसी जटिल समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता होती है, जिसमें सुरक्षा उपायों के साथ-साथ विकासात्मक और राजनीतिक पहल भी शामिल हो। भारत सरकार ने समय के साथ एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए विभिन्न पहलों की जानकारी उपलब्ध है।

कानून और व्यवस्था का दृष्टिकोण (Law and Order Approach)

यह रणनीति का सबसे तात्कालिक और आवश्यक हिस्सा है। इसका उद्देश्य उग्रवादी समूहों की हिंसा करने की क्षमता को समाप्त करना और कानून का शासन स्थापित करना है।

  • सुरक्षा बलों की तैनाती: उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस, अर्धसैनिक बलों और कभी-कभी सेना की तैनाती की जाती है ताकि वे उग्रवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चला सकें और नागरिकों की रक्षा कर सकें।
  • विशेष कानून: सरकार ने उग्रवादी गतिविधियों से निपटने के लिए UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम) जैसे विशेष कानून बनाए हैं।
  • खुफिया तंत्र को मजबूत करना: खुफिया जानकारी एकत्र करना और उसका विश्लेषण करना उग्रवादी हमलों को रोकने और उनके नेटवर्क को नष्ट करने के लिए महत्वपूर्ण है।

विकासात्मक दृष्टिकोण (Developmental Approach)

यह समझना महत्वपूर्ण है कि केवल बल प्रयोग से उग्रवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके मूल कारणों को संबोधित करना आवश्यक है, और इसके लिए विकास एक महत्वपूर्ण उपकरण है।

  • बुनियादी ढांचे का निर्माण: उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सड़कें, स्कूल, अस्पताल, बिजली और संचार सुविधाएं प्रदान करने से लोगों का जीवन स्तर सुधरता है और वे मुख्यधारा से जुड़ते हैं।
  • रोजगार के अवसर: कौशल विकास कार्यक्रम और रोजगार योजनाएं युवाओं को उग्रवाद के रास्ते पर जाने से रोकती हैं और उन्हें एक सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान करती हैं।
  • अधिकारों का संरक्षण: विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में, वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करना महत्वपूर्ण है ताकि स्थानीय समुदायों को यह महसूस न हो कि उनके अधिकारों का हनन हो रहा है।

संवाद और पुनर्वास की नीतियां (Dialogue and Rehabilitation Policies)

हिंसा के चक्र को तोड़ने के लिए, उन उग्रवादियों को मुख्यधारा में वापस लाने का अवसर देना भी महत्वपूर्ण है जो हथियार छोड़ना चाहते हैं।

  • आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियां (Surrender and Rehabilitation Policies): कई राज्य सरकारें ऐसी नीतियां चलाती हैं जिनके तहत आत्मसमर्पण करने वाले उग्रवादियों को वित्तीय सहायता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और कानूनी मामलों में मदद प्रदान की जाती है ताकि वे एक सामान्य जीवन शुरू कर सकें।
  • शांति वार्ता: सरकार अक्सर उन उग्रवादी समूहों के साथ बातचीत करने का प्रयास करती है जो हिंसा छोड़ने और संवैधानिक ढांचे के भीतर समाधान खोजने के लिए तैयार होते हैं। कई उत्तर-पूर्वी राज्यों में शांति समझौते इसी दृष्टिकोण का परिणाम हैं।

इस दृष्टिकोण का विश्लेषण: सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Analysis of this Approach: Positive and Negative Aspects)

सरकार की बहुआयामी रणनीति के मिश्रित परिणाम रहे हैं। इसके कुछ सकारात्मक पहलू हैं, तो कुछ चुनौतियां और नकारात्मक पहलू भी हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सकारात्मक पहलू (Pros)

  • हिंसा में कमी: समग्र रूप से, देश के कई हिस्सों, विशेष रूप से उत्तर-पूर्व और पंजाब में, उग्रवादी हिंसा में काफी कमी आई है। वामपंथी उग्रवाद का भौगोलिक प्रसार भी कम हुआ है।
  • विकास कार्यों में तेजी: सरकार ने उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया है, जिससे वहां के लोगों के जीवन में कुछ सुधार आया है।
  • शांति समझौतों की सफलता: कई पूर्वोत्तर राज्यों में हुए शांति समझौतों ने दशकों पुराने संघर्षों को समाप्त किया है और वहां शांति और स्थिरता लाने में मदद की है।

नकारात्मक पहलू (Cons)

  • मानवाधिकारों का हनन: सुरक्षा अभियानों के दौरान कभी-कभी मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगते हैं, जिससे स्थानीय आबादी और सुरक्षा बलों के बीच अविश्वास पैदा होता है।
  • विकास का असंतुलित होना: विकास का लाभ अक्सर सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पाता, जिससे कुछ समुदायों में असंतोष बना रहता है। भ्रष्टाचार भी एक बड़ी समस्या है।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: कभी-कभी, जटिल मुद्दों पर स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने के लिए आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी होती है, जिससे समस्याएं बनी रहती हैं। यह उग्रवाद को फिर से पनपने का मौका देता है।

9. कट्टरता और उग्रवाद: एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण (Radicalization and Extremism: A Psychological Perspective)

उग्रवाद की यात्रा कट्टरता (Radicalization) की प्रक्रिया से शुरू होती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि एक सामान्य व्यक्ति कैसे धीरे-धीरे चरमपंथी विचारों को अपनाता है और हिंसा के मार्ग पर चल पड़ता है।

कट्टरता की प्रक्रिया क्या है? (What is the Process of Radicalization?)

कट्टरता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्यक्ति या समूह तेजी से चरमपंथी राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक विचारों को अपनाता है जो मुख्यधारा के समाज के विचारों को अस्वीकार करते हैं या उनका खंडन करते हैं। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके कई चरण हो सकते हैं।

  • पूर्व-कट्टरता (Pre-Radicalization): इस चरण में, व्यक्ति अपने सामान्य जीवन में होता है, लेकिन कुछ घटनाओं (जैसे व्यक्तिगत संकट, भेदभाव का अनुभव) के कारण वह नई विचारधाराओं की तलाश में हो सकता है।
  • पहचान और जुड़ाव (Identification and Indoctrination): व्यक्ति एक उग्रवादी विचारधारा या समूह के संपर्क में आता है। यह समूह उसे एक नई पहचान, उद्देश्य और अपनेपन की भावना प्रदान करता है।
  • प्रतिबद्धता और कार्रवाई (Commitment and Action): अंतिम चरण में, व्यक्ति पूरी तरह से विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध हो जाता है और समूह के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अवैध या हिंसक गतिविधियों में शामिल होने के लिए तैयार हो जाता है।

ऑनलाइन कट्टरता: एक नया खतरा (Online Radicalization: A New Threat)

इंटरनेट ने कट्टरता की प्रक्रिया को बहुत तेज और खतरनाक बना दिया है। अब किसी को कट्टरपंथी बनाने के लिए शारीरिक संपर्क की आवश्यकता नहीं है; यह किसी के बेडरूम में, स्मार्टफोन के माध्यम से हो सकता है।

  • लक्षित प्रचार (Targeted Propaganda): उग्रवादी समूह सोशल मीडिया पर कमजोर और प्रभावशाली युवाओं की पहचान करते हैं और उन्हें विशेष रूप से तैयार की गई सामग्री (वीडियो, मीम्स, लेख) भेजकर लक्षित करते हैं।
  • गुमनामी का लाभ: इंटरनेट पर गुमनाम रहने की क्षमता लोगों को बिना किसी डर के चरमपंथी विचारों को व्यक्त करने और अपनाने की अनुमति देती है।
  • गेमिंग प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग: कुछ उग्रवादी समूह ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग युवाओं से जुड़ने और उन्हें अपनी विचारधारा से परिचित कराने के लिए एक भर्ती मैदान के रूप में कर रहे हैं। इस प्रकार का उग्रवाद भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।

युवाओं को उग्रवाद से कैसे बचाएं? (How to Protect Youth from Extremism?)

युवाओं को उग्रवाद के चंगुल से बचाने के लिए एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है जिसमें परिवार, समाज, शिक्षण संस्थान और सरकार सभी की भूमिका है।

  • आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना (Promoting Critical Thinking): बच्चों को स्कूल से ही आलोचनात्मक सोच सिखाना महत्वपूर्ण है ताकि वे ऑनलाइन देखी जाने वाली हर चीज पर आंख मूंदकर विश्वास न करें और प्रोपेगेंडा को पहचान सकें।
  • खुला संवाद: माता-पिता और शिक्षकों को युवाओं के साथ एक खुला और भरोसेमंद रिश्ता बनाना चाहिए ताकि वे अपनी चिंताओं, संदेहों और असुरक्षाओं को साझा कर सकें।
  • सकारात्मक विकल्प प्रदान करना: युवाओं को खेल, कला, सामुदायिक सेवा जैसी सकारात्मक गतिविधियों में शामिल करना उन्हें एक उद्देश्य और दिशा देता है, जिससे वे नकारात्मक प्रभावों से दूर रहते हैं।
  • डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy): युवाओं को इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग और ऑनलाइन खतरों से खुद को बचाने के बारे में शिक्षित करना आवश्यक है।

10. उग्रवाद का भविष्य और वैश्विक चुनौतियाँ (The Future of Extremism and Global Challenges)

जैसे-जैसे दुनिया बदल रही है, उग्रवाद के तरीके और चेहरे भी बदल रहे हैं। भविष्य में हमें नई और अधिक जटिल चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

प्रौद्योगिकी-सक्षम उग्रवाद (Technology-Enabled Extremism)

उभरती हुई प्रौद्योगिकियां उग्रवादी समूहों को और भी खतरनाक बना सकती हैं।

  • ड्रोन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): ड्रोन का उपयोग हमलों के लिए किया जा सकता है, और AI का उपयोग प्रोपेगेंडा फैलाने या हमलों की योजना बनाने के लिए किया जा सकता है।
  • क्रिप्टोकरेंसी: उग्रवादी समूह अपनी गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग कर सकते हैं, जिससे उनके पैसे के स्रोत का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
  • डार्क वेब: डार्क वेब का उपयोग हथियारों की खरीद-फरोख्त, भर्ती और संचार के लिए एक सुरक्षित मंच के रूप में किया जा सकता है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता (The Need for International Cooperation)

उग्रवाद एक वैश्विक समस्या है और कोई भी देश अकेले इसका मुकाबला नहीं कर सकता। उग्रवादी संगठन सीमाओं के पार काम करते हैं, इसलिए उनसे निपटने के लिए देशों के बीच मजबूत सहयोग आवश्यक है।

  • खुफिया जानकारी साझा करना: देशों को संभावित खतरों और आतंकवादी नेटवर्क के बारे में वास्तविक समय में खुफिया जानकारी साझा करनी चाहिए।
  • वित्तीय प्रवाह पर रोक: उग्रवादी समूहों के वित्तपोषण के स्रोतों को रोकने के लिए संयुक्त अंतरराष्ट्रीय प्रयास आवश्यक हैं।
  • प्रत्यर्पण संधियाँ (Extradition Treaties): अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए देशों के बीच मजबूत प्रत्यर्पण संधियाँ होनी चाहिए ताकि वे दूसरे देशों में शरण न ले सकें।

एक समावेशी समाज का निर्माण (Building an Inclusive Society)

अंततः, उग्रवाद का सबसे प्रभावी और स्थायी समाधान एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जो न्यायपूर्ण, सहिष्णु और समावेशी हो।

  • न्याय और समानता: यह सुनिश्चित करना कि सभी नागरिकों को, उनकी जाति, धर्म या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना, समान अवसर और न्याय मिले।
  • शिक्षा और जागरूकता: शिक्षा प्रणाली में लोकतांत्रिक मूल्यों, सहिष्णुता और मानवाधिकारों को बढ़ावा देना।
  • संवाद को बढ़ावा देना: विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और समझ को बढ़ावा देना ताकि अविश्वास और पूर्वाग्रह को दूर किया जा सके। जब लोग एक-दूसरे से बात करते हैं, तो उग्रवादी विचारधारा के लिए कोई जगह नहीं बचती।

11. निष्कर्ष (Conclusion)

उग्रवाद एक अदृश्य दुश्मन की तरह है जो हमारे समाज की नींव को चुपचाप खोखला करता है। यह केवल बम विस्फोटों और गोलियों की आवाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जहरीली विचारधारा है जो मन में पनपती है और समाज को विभाजित करती है। हमने इस लेख में देखा कि उग्रवाद के कई चेहरे हैं – धार्मिक, राजनीतिक, जातीय और क्षेत्रीय – और इसके पीछे गरीबी, अन्याय, पहचान का संकट और प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग जैसे गहरे कारण हैं। भारत ने दशकों से इस चुनौती का सामना किया है और इससे निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपनाई है, जिसमें सुरक्षा, विकास और संवाद शामिल हैं।

इस समस्या का कोई आसान या त्वरित समाधान नहीं है। केवल सैन्य कार्रवाई से उग्रवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता। हमें इसके मूल कारणों को संबोधित करना होगा। इसके लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, एक न्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था और एक सतर्क समाज की आवश्यकता है। एक नागरिक के रूप में, हमारी भी जिम्मेदारी है कि हम घृणा और विभाजनकारी विचारधाराओं को अस्वीकार करें, अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील रहें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें जो संवाद, सहिष्णुता और आपसी सम्मान पर आधारित हो। उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई केवल वर्दी में सैनिकों द्वारा नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक द्वारा लड़ी जानी है।

12. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: उग्रवाद और राष्ट्रवाद में क्या अंतर है? (What is the difference between extremism and nationalism?)

उत्तर: राष्ट्रवाद (Nationalism) अपने देश के प्रति प्रेम और निष्ठा की भावना है, जो आमतौर पर सकारात्मक होती है। यह देश की एकता और प्रगति को बढ़ावा देता है। दूसरी ओर, उग्रवाद एक चरमपंथी विचारधारा है। जब राष्ट्रवाद चरम रूप ले लेता है और अपने देश को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है और अन्य राष्ट्रों या अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा को बढ़ावा देता है, तो वह उग्र राष्ट्रवाद (Ultra-nationalism) या दक्षिणपंथी उग्रवाद का रूप ले सकता है।

प्रश्न 2: क्या गरीबी उग्रवाद का एकमात्र कारण है? (Is poverty the only cause of extremism?)

उत्तर: नहीं, गरीबी उग्रवाद का एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है, लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है। कई शिक्षित और धनी परिवारों के लोग भी उग्रवादी विचारधाराओं की ओर आकर्षित हुए हैं। इसके पीछे अन्याय की भावना, पहचान का संकट, राजनीतिक शिकायतें और मनोवैज्ञानिक कारण जैसे कई अन्य कारक भी होते हैं। उग्रवाद एक जटिल समस्या है जिसके कई कारण होते हैं।

प्रश्न 3: एक आम नागरिक उग्रवाद को रोकने में कैसे मदद कर सकता है? (How can a common citizen help in preventing extremism?)

उत्तर: एक आम नागरिक कई तरह से मदद कर सकता है। सबसे पहले, ऑनलाइन या ऑफलाइन किसी भी प्रकार की घृणास्पद या भड़काऊ सामग्री को बढ़ावा न दें और उसकी रिपोर्ट करें। दूसरा, अपने समुदाय में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोगों के साथ संवाद और सद्भाव को बढ़ावा दें। तीसरा, यदि आप किसी मित्र या परिवार के सदस्य के व्यवहार में कट्टरता के संकेत देखते हैं, तो उनसे बात करने की कोशिश करें या किसी विशेषज्ञ या अधिकारियों से मदद लें। Counter-extremism में सामुदायिक भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 4: डी-रेडिकलाइजेशन (de-radicalization) क्या है? (What is de-radicalization?)

उत्तर: डी-रेडिकलाइजेशन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक ऐसे व्यक्ति को, जो कट्टरपंथी उग्रवादी विचारधारा को अपना चुका है, उसे उस विचारधारा से बाहर निकालने और मुख्यधारा के सामाजिक मूल्यों को फिर से अपनाने में मदद की जाती है। इसमें मनोवैज्ञानिक परामर्श, धार्मिक विद्वानों द्वारा सही शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और सामाजिक पुनर्वास शामिल हो सकता है। यह उग्रवाद से लौटे लोगों को एक नया जीवन देने का एक प्रयास है।

प्रश्न 5: भारत सरकार की उग्रवाद के खिलाफ प्रमुख नीति क्या है? (What is the main policy of the Indian government against extremism?)

उत्तर: भारत सरकार की उग्रवाद के खिलाफ एक बहुआयामी नीति है, जिसे अक्सर ‘लौह आवरण में मखमली दस्ताना’ (Velvet glove in an iron fist) कहा जाता है। इसका मतलब है कि जो लोग हिंसा में शामिल हैं, उनके खिलाफ कड़ी सुरक्षा कार्रवाई (लौह आवरण) की जाती है, जबकि विकास, संवाद और पुनर्वास की नीतियों (मखमली दस्ताना) के माध्यम से उग्रवाद के मूल कारणों को संबोधित करने और गुमराह लोगों को मुख्यधारा में वापस लाने का भी प्रयास किया जाता है।

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