विषयसूची (Table of Contents)
- 1. परिचय: भारत की जनसंख्या का विशाल परिदृश्य
- 2. जनसंख्या वितरण: भारत में लोगों का फैलाव
- 3. जनसंख्या वृद्धि: गति, चरण और प्रभाव
- 4. जनसंख्या घनत्व: प्रति वर्ग किलोमीटर में जीवन
- 5. शहरीकरण: गांवों से शहरों की ओर एक बढ़ता चलन
- 6. ग्रामीण और शहरी जीवन: दो भारत की कहानी
- 7. मानव प्रवास: एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा
- 8. निष्कर्ष: भविष्य की राह और चुनौतियां
1. परिचय: भारत की जनसंख्या का विशाल परिदृश्य
भूगोल और मानव का संबंध
भूगोल केवल पहाड़ों, नदियों और मैदानों का अध्ययन नहीं है, बल्कि यह मानव और उसके पर्यावरण के बीच के जटिल संबंधों का विज्ञान भी है। किसी भी देश के विकास और उसकी पहचान में वहां के निवासियों, यानी जनसंख्या (Population) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जनसंख्या का आकार, उसका वितरण, वृद्धि दर और संरचना देश के संसाधनों, सामाजिक-आर्थिक विकास और भविष्य की नीतियों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
भारत की जनांकिकीय विशेषता
भारत, चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है, और जल्द ही पहले स्थान पर पहुँचने का अनुमान है। यह विशाल जनसंख्या भारत के लिए एक बड़ी चुनौती भी है और एक बड़ा अवसर भी। इस जनसंख्या का अध्ययन, जिसे जनांकिकी (Demography) कहते हैं, हमें यह समझने में मदद करता है कि लोग कहाँ रहते हैं, उनकी संख्या क्यों बढ़ रही है, और वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर क्यों जाते हैं।
आवास का महत्व
जनसंख्या के साथ-साथ आवास (Settlement) का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है। आवास वे स्थान हैं जहाँ लोग रहते हैं और अपनी आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ करते हैं। ये आवास ग्रामीण (Rural) या शहरी (Urban) हो सकते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, ग्रामीण और शहरी बस्तियों की अपनी-अपनी विशेषताएं, समस्याएं और अवसर हैं, जो देश के समग्र विकास की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
इस लेख का उद्देश्य
इस लेख में, हम भारतीय भूगोल के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक – ‘भारतीय जनसंख्या और आवास’ पर विस्तार से चर्चा करेंगे। हम जनसंख्या के वितरण, घनत्व, वृद्धि और प्रवास (Migration) के पैटर्न को समझेंगे। साथ ही, हम शहरीकरण की प्रक्रिया, ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच के अंतर और इन सभी कारकों के भारत के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण करेंगे। यह लेख छात्रों को इस विषय की गहरी और स्पष्ट समझ प्रदान करने के उद्देश्य से लिखा गया है।
2. जनसंख्या वितरण: भारत में लोगों का फैलाव
जनसंख्या वितरण का अर्थ
जनसंख्या वितरण (Population Distribution) का तात्पर्य यह है कि किसी देश या क्षेत्र में लोग किस प्रकार फैले हुए हैं। क्या वे कुछ ही स्थानों पर केंद्रित हैं या समान रूप से बसे हुए हैं? भारत में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है। कुछ क्षेत्र, जैसे उत्तरी मैदान और तटीय इलाके, बहुत घनी आबादी वाले हैं, जबकि हिमालय के पहाड़ी इलाके, थार का मरुस्थल और पूर्वोत्तर के घने जंगलों वाले क्षेत्रों में बहुत कम लोग रहते हैं।
जनसंख्या वितरण को प्रभावित करने वाले कारक
किसी भी स्थान पर लोगों के बसने या न बसने के पीछे कई कारण होते हैं। इन कारणों को हम मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं:
- भौतिक या भौगोलिक कारक (Physical or Geographical Factors): ये प्रकृति से जुड़े कारक हैं।
- आर्थिक कारक (Economic Factors): ये रोजगार और आजीविका से संबंधित कारक हैं।
- सामाजिक और ऐतिहासिक कारक (Social and Historical Factors): ये समाज, संस्कृति और इतिहास से जुड़े कारक हैं।
भौतिक कारक: भू-आकृति (Relief)
जमीन की बनावट जनसंख्या के वितरण पर गहरा प्रभाव डालती है। समतल और उपजाऊ मैदान, जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान, कृषि, परिवहन और उद्योगों के लिए आदर्श होते हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे मैदानी राज्यों में भारत की एक बड़ी आबादी निवास करती है। इसके विपरीत, ऊबड़-खाबड़ और पहाड़ी इलाके, जैसे हिमालय क्षेत्र, रहने और खेती करने के लिए कठिन होते हैं, इसलिए वहां जनसंख्या विरल होती है।
भौतिक कारक: जलवायु (Climate)
जलवायु लोगों के रहने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है। अत्यधिक गर्म (जैसे थार मरुस्थल), अत्यधिक ठंडे (जैसे लद्दाख) या अत्यधिक वर्षा वाले (जैसे मेघालय के कुछ हिस्से) क्षेत्रों में जीवनयापन मुश्किल होता है, इसलिए वहां कम लोग रहते हैं। वहीं, समशीतोष्ण और सुखद जलवायु वाले क्षेत्र, जैसे तटीय मैदान और दक्षिणी पठार के कुछ हिस्से, लोगों को बसने के लिए आकर्षित करते हैं।
भौतिक कारक: जल की उपलब्धता (Availability of Water)
जल जीवन का आधार है। लोग हमेशा उन क्षेत्रों में बसना पसंद करते हैं जहाँ पीने, सिंचाई और उद्योगों के लिए पर्याप्त मात्रा में ताजा पानी उपलब्ध हो। यही कारण है कि भारत की अधिकांश घनी आबादी नदियों के किनारे बसी है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों की घाटियों में जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक है।
भौतिक कारक: मृदा (Soil)
उपजाऊ मिट्टी कृषि के लिए आवश्यक है, और भारत की अधिकांश जनसंख्या आज भी कृषि पर निर्भर है। उत्तरी मैदानों की जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) और तटीय क्षेत्रों की उपजाऊ मिट्टी गहन कृषि का समर्थन करती है, जिससे बड़ी आबादी का भरण-पोषण संभव हो पाता है। इसलिए, इन क्षेत्रों में जनसंख्या का जमाव अधिक है। इसके विपरीत, कम उपजाऊ मिट्टी वाले क्षेत्रों में जनसंख्या कम पाई जाती है।
आर्थिक कारक: खनिज संसाधन (Mineral Resources)
खनिज संपदा से भरपूर क्षेत्र उद्योगों को आकर्षित करते हैं, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। छोटानागपुर का पठार, जो झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में फैला है, कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिजों से समृद्ध है। इस क्षेत्र में खनन और औद्योगिक गतिविधियों के कारण कई औद्योगिक नगर बसे हैं और यहाँ जनसंख्या का घनत्व मध्यम से उच्च है।
आर्थिक कारक: औद्योगीकरण (Industrialization)
औद्योगिक विकास रोजगार के बड़े अवसर पैदा करता है और लोगों को अपनी ओर खींचता है। मुंबई-पुणे औद्योगिक क्षेत्र, बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, अहमदाबाद-वडोदरा क्षेत्र और चेन्नई जैसे औद्योगिक केंद्र बड़ी संख्या में प्रवासियों को आकर्षित करते हैं। इन क्षेत्रों में कारखानों, कार्यालयों और सेवा क्षेत्र में काम करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं, जिससे ये इलाके घनी आबादी वाले बन जाते हैं।
आर्थिक कारक: शहरीकरण (Urbanization)
शहर बेहतर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और आधुनिक जीवन शैली के केंद्र होते हैं। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ता है, लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं, जिससे शहरों और उनके आसपास के क्षेत्रों में जनसंख्या का दबाव बढ़ जाता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में जनसंख्या का विशाल जमाव शहरीकरण का ही परिणाम है।
सामाजिक और ऐतिहासिक कारक: सांस्कृतिक महत्व
कुछ स्थान अपने धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित करते हैं। वाराणसी, प्रयागराज, मथुरा, अजमेर और अमृतसर जैसे धार्मिक केंद्र सदियों से बसे हुए हैं और यहाँ स्थायी आबादी के साथ-साथ बड़ी संख्या में तीर्थयात्री भी आते हैं। इन शहरों का एक लंबा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रहा है, जिसने इनके विकास में योगदान दिया है।
ऐतिहासिक कारक: प्रारंभिक बसावट
इतिहास में, बस्तियां अक्सर नदियों के किनारे विकसित हुईं क्योंकि वहां पानी और उपजाऊ भूमि उपलब्ध थी। सिंधु घाटी सभ्यता और बाद में गंगा के मैदानों में विकसित हुई सभ्यताएं इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। ये क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से बसे हुए हैं और आज भी भारत के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से हैं।
भारत में वितरण का पैटर्न: उच्च घनत्व वाले क्षेत्र
भारत में जनसंख्या का उच्चतम घनत्व उत्तरी मैदानों (पंजाब से पश्चिम बंगाल तक), केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के तटीय मैदानों में पाया जाता है। इन क्षेत्रों में समतल भूमि, उपजाऊ मिट्टी, अनुकूल जलवायु, जल की उपलब्धता और विकसित कृषि व उद्योग जैसी सभी अनुकूल दशाएं मौजूद हैं, जो बड़ी आबादी का समर्थन करती हैं।
भारत में वितरण का पैटर्न: मध्यम घनत्व वाले क्षेत्र
प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश हिस्सों, जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा में जनसंख्या का घनत्व मध्यम है। इन क्षेत्रों में कृषि की संभावनाएं उत्तरी मैदानों की तुलना में कम हैं, लेकिन खनिज संसाधनों, सिंचाई के विकास और औद्योगिक विकास ने यहाँ मध्यम स्तर की आबादी को बनाए रखा है।
भारत में वितरण का पैटर्न: निम्न घनत्व वाले क्षेत्र
हिमालय के पर्वतीय राज्य (जैसे अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड), पश्चिमी राजस्थान का थार मरुस्थल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वनाच्छादित क्षेत्र तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में जनसंख्या बहुत विरल है। यहाँ की कठोर जलवायु, दुर्गम भू-भाग और सीमित संसाधनों के कारण जीवनयापन चुनौतीपूर्ण है, जिससे ये क्षेत्र कम आबादी वाले हैं।
3. जनसंख्या वृद्धि: गति, चरण और प्रभाव
जनसंख्या वृद्धि को समझना
जनसंख्या वृद्धि (Population Growth) का अर्थ है किसी निश्चित समय अवधि के दौरान किसी क्षेत्र के निवासियों की संख्या में होने वाला परिवर्तन। यह परिवर्तन सकारात्मक (वृद्धि) या नकारात्मक (कमी) हो सकता है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। भारत की जनसंख्या पिछले कई दशकों से लगातार बढ़ रही है, जिसे जनसंख्या वृद्धि के रूप में जाना जाता है।
जनसंख्या वृद्धि के घटक
किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि तीन मुख्य घटकों पर निर्भर करती है:
- जन्म दर (Birth Rate): प्रति हजार जनसंख्या पर एक वर्ष में जीवित जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या।
- मृत्यु दर (Death Rate): प्रति हजार जनसंख्या पर एक वर्ष में मरने वाले लोगों की संख्या।
- प्रवास (Migration): लोगों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बसना।
प्राकृतिक वृद्धि (Natural Growth) जन्म दर और मृत्यु दर के अंतर से निर्धारित होती है। वास्तविक वृद्धि (Actual Growth) में प्राकृतिक वृद्धि के साथ-साथ प्रवास को भी शामिल किया जाता है।
भारत में जनसंख्या वृद्धि के चरण
भारत की जनसंख्या वृद्धि के इतिहास को हम चार स्पष्ट चरणों में विभाजित कर सकते हैं। प्रत्येक चरण की अपनी विशिष्ट विशेषताएं हैं जो उस समय की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को दर्शाती हैं। यह विभाजन जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत (Demographic Transition Theory) के अनुरूप है और भारत के विकास की कहानी बताता है।
चरण I: 1901-1921 (स्थिर या मंद वृद्धि की अवधि)
इस अवधि को भारत की जनसंख्या वृद्धि की ‘स्थिर अवस्था’ कहा जाता है। इस दौरान जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही बहुत अधिक थीं। उच्च जन्म दर के कारण जनसंख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन महामारियों (जैसे प्लेग, हैजा), अकाल और खराब स्वास्थ्य सेवाओं के कारण मृत्यु दर भी बहुत अधिक थी। इसलिए, कुल जनसंख्या वृद्धि बहुत धीमी या लगभग नगण्य थी। 1911-1921 के दशक में तो नकारात्मक वृद्धि (-0.31%) दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण 1918 की इन्फ्लूएंजा महामारी थी।
वर्ष 1921: महान जनांकिकीय विभाजक
वर्ष 1921 को भारत के जनांकिकीय इतिहास में ‘महान विभाजक वर्ष’ (Year of the Great Demographic Divide) कहा जाता है। इस वर्ष के बाद, भारत की जनसंख्या में लगातार वृद्धि होनी शुरू हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं में धीरे-धीरे सुधार होने लगा, जिससे मृत्यु दर में कमी आई, जबकि जन्म दर अभी भी ऊंची बनी हुई थी।
चरण II: 1921-1951 (नियमित वृद्धि की अवधि)
इस अवधि में, देश भर में स्वास्थ्य और स्वच्छता सुविधाओं में सुधार हुआ, जिससे महामारियों पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया गया। परिणामस्वरूप, मृत्यु दर में गिरावट आई। हालांकि, जन्म दर अभी भी उच्च बनी रही क्योंकि सामाजिक-आर्थिक विकास धीमा था और परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता नहीं थी। उच्च जन्म दर और घटती मृत्यु दर के कारण जनसंख्या में नियमित रूप से वृद्धि हुई।
चरण III: 1951-1981 (जनसंख्या विस्फोट की अवधि)
स्वतंत्रता के बाद, भारत ने विकास के एक नए युग में प्रवेश किया। पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा और खाद्य सुरक्षा में अभूतपूर्व सुधार हुआ। इससे मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आई (विशेष रूप से शिशु मृत्यु दर में)। लेकिन, जन्म दर सामाजिक और धार्मिक कारणों से ऊंची बनी रही। इस उच्च जन्म दर और तेजी से घटती मृत्यु दर के बीच के बढ़ते अंतर ने ‘जनसंख्या विस्फोट’ (Population Explosion) की स्थिति पैदा कर दी। इस अवधि में भारत की जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई।
चरण IV: 1981 से अब तक (उच्च वृद्धि लेकिन धीमी होने के निश्चित संकेतों के साथ)
1981 के बाद, जनसंख्या वृद्धि दर ऊंची तो रही, लेकिन उसमें धीरे-धीरे गिरावट के संकेत दिखने लगे। इसका मुख्य कारण परिवार नियोजन कार्यक्रमों की सफलता, विवाह की औसत आयु में वृद्धि, महिला साक्षरता में सुधार और लोगों में छोटे परिवार के प्रति बढ़ती जागरूकता थी। जन्म दर में धीरे-धीरे कमी आने लगी, जबकि मृत्यु दर पहले से ही काफी कम हो चुकी थी। हालांकि वृद्धि दर कम हो रही है, लेकिन जनसंख्या का आधार (Base Population) इतना बड़ा है कि कुल जनसंख्या में अभी भी भारी वृद्धि हो रही है।
तीव्र जनसंख्या वृद्धि के परिणाम
तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के संसाधनों और विकास पर भारी दबाव डालती है। इसके कुछ प्रमुख नकारात्मक परिणाम इस प्रकार हैं:
- संसाधनों पर दबाव: भूमि, जल, वन और खनिजों जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है।
- बेरोजगारी: अर्थव्यवस्था रोजगार के उतने अवसर पैदा नहीं कर पाती जितनी तेजी से कार्यशील जनसंख्या बढ़ती है।
- गरीबी: प्रति व्यक्ति आय कम हो जाती है और जीवन स्तर में गिरावट आती है।
- खाद्य असुरक्षा: बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन करना एक चुनौती बन जाता है।
- पर्यावरणीय समस्याएं: वनों की कटाई, प्रदूषण और शहरी क्षेत्रों में भीड़भाड़ जैसी समस्याएं बढ़ती हैं।
- सामाजिक अवसंरचना पर दबाव: शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और परिवहन जैसी सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकारी नीतियां
भारत सरकार ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर कई नीतियां और कार्यक्रम लागू किए हैं। 1952 में, भारत परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू करने वाला दुनिया का पहला देश बना। इसका उद्देश्य लोगों को छोटे परिवार के लाभों के बारे में शिक्षित करना और गर्भनिरोधक साधनों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना था।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000
यह भारत की सबसे व्यापक जनसंख्या नीति है। इसका तात्कालिक उद्देश्य गर्भनिरोध, स्वास्थ्य देखभाल और बुनियादी ढांचे की जरूरतों को पूरा करना था। इसका मध्यकालिक उद्देश्य 2010 तक कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate – TFR) को 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) पर लाना था। दीर्घकालिक उद्देश्य 2045 तक जनसंख्या को स्थिर करना है। इस नीति में महिला सशक्तिकरण, शिशु मृत्यु दर कम करने और शिक्षा को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।
4. जनसंख्या घनत्व: प्रति वर्ग किलोमीटर में जीवन
जनसंख्या घनत्व की परिभाषा
जनसंख्या घनत्व (Population Density) भूमि और जनसंख्या के बीच के अनुपात को मापने का एक तरीका है। इसे प्रति इकाई क्षेत्र (आमतौर पर प्रति वर्ग किलोमीटर) में रहने वाले व्यक्तियों की संख्या के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसका सूत्र है: जनसंख्या घनत्व = कुल जनसंख्या / कुल क्षेत्रफल। यह हमें बताता है कि कोई क्षेत्र कितना सघन या विरल बसा हुआ है।
भारत का जनसंख्या घनत्व
भारत दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले देशों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत का जनसंख्या घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर था, जो 1951 में मात्र 117 था। यह आंकड़ा समय के साथ लगातार बढ़ रहा है, जो भूमि पर बढ़ते जनसंख्या दबाव को दर्शाता है। यह वैश्विक औसत घनत्व से कई गुना अधिक है।
राज्य-स्तरीय भिन्नता: एक असमान तस्वीर
भारत में जनसंख्या घनत्व में बहुत अधिक क्षेत्रीय भिन्नता पाई जाती है। यह भिन्नता भौतिक और सामाजिक-आर्थिक कारकों के कारण है जिनकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। कुछ राज्य अत्यंत सघन हैं, जबकि कुछ अत्यंत विरल हैं। यह असमानता भारत की विविधता और विकास के विभिन्न स्तरों को दर्शाती है।
उच्चतम घनत्व वाले राज्य
भारत में सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्य मुख्य रूप से उत्तरी मैदानों और तटीय क्षेत्रों में स्थित हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, बिहार (1106 व्यक्ति/वर्ग किमी) भारत का सबसे सघन आबादी वाला राज्य है। इसके बाद पश्चिम बंगाल (1028), केरल (860) और उत्तर प्रदेश (829) का स्थान आता है। इन राज्यों में उपजाऊ भूमि, जल की उपलब्धता और गहन कृषि प्रमुख कारण हैं।
न्यूनतम घनत्व वाले राज्य
सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाले राज्य वे हैं जहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ जीवनयापन के लिए चुनौतीपूर्ण हैं। अरुणाचल प्रदेश (केवल 17 व्यक्ति/वर्ग किमी) भारत का सबसे विरल आबादी वाला राज्य है। इसके बाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (46), मिजोरम (52) और सिक्किम (86) का स्थान है। इन क्षेत्रों में पहाड़ी भू-भाग, घने जंगल और सीमित आर्थिक अवसर जनसंख्या के कम घनत्व के लिए जिम्मेदार हैं।
केंद्र शासित प्रदेशों में घनत्व
केंद्र शासित प्रदेशों में, विशेषकर शहरी क्षेत्रों में, जनसंख्या घनत्व अत्यधिक उच्च है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (11,320 व्यक्ति/वर्ग किमी) का घनत्व भारत में सबसे अधिक है। इसके बाद चंडीगढ़ (9,258), पुडुचेरी (2,547) और दमन और दीव (2,191) आते हैं। यह इन क्षेत्रों में अत्यधिक शहरीकरण और प्रवासियों के आगमन को दर्शाता है।
घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक
जैसा कि जनसंख्या वितरण में चर्चा की गई है, वही कारक घनत्व को भी प्रभावित करते हैं। उपजाऊ मैदान, औद्योगिक केंद्र और शहरी क्षेत्र उच्च घनत्व को बढ़ावा देते हैं, जबकि दुर्गम पहाड़, शुष्क मरुस्थल और घने जंगल निम्न घनत्व का कारण बनते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली का उच्च घनत्व इसके एक प्रमुख महानगरीय, प्रशासनिक और आर्थिक केंद्र होने के कारण है।
कायिक घनत्व (Physiological Density)
कायिक घनत्व एक अधिक परिष्कृत माप है। यह कुल जनसंख्या और कुल कृषि योग्य भूमि (Net Cultivated Area) के बीच का अनुपात है। इसका सूत्र है: कायिक घनत्व = कुल जनसंख्या / शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्र। यह माप कृषि भूमि पर जनसंख्या के वास्तविक दबाव को दर्शाता है। भारत में उच्च कायिक घनत्व यह इंगित करता है कि कृषि भूमि पर भोजन उपलब्ध कराने का भारी दबाव है।
कृषि घनत्व (Agricultural Density)
कृषि घनत्व का सूत्र है: कृषि घनत्व = कुल कृषि जनसंख्या / शुद्ध कृषि योग्य क्षेत्र। इसमें केवल कृषि पर निर्भर जनसंख्या (किसान और खेतिहर मजदूर) को शामिल किया जाता है। यह प्रति इकाई कृषि भूमि पर किसानों के दबाव को मापता है। भारत जैसे देश में, जहाँ बड़ी संख्या में लोग कृषि पर निर्भर हैं, कृषि घनत्व भी बहुत अधिक है।
5. शहरीकरण: गांवों से शहरों की ओर एक बढ़ता चलन
शहरीकरण का अर्थ
शहरीकरण (Urbanization) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी देश की जनसंख्या का एक बढ़ता हुआ हिस्सा शहरों और कस्बों में रहने लगता है। यह केवल जनसंख्या के स्थानांतरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लोगों की जीवन शैली, व्यवसाय और सामाजिक मूल्यों में होने वाले परिवर्तन भी शामिल हैं। शहरीकरण को आमतौर पर कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या के प्रतिशत के रूप में मापा जाता है।
भारत में शहरीकरण की प्रवृत्ति
आजादी के समय, भारत मुख्य रूप से एक ग्रामीण देश था, जिसकी केवल 17% आबादी शहरों में रहती थी। तब से, शहरीकरण की प्रक्रिया लगातार जारी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की 31.16% आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास करती थी। हालांकि यह विश्व के कई विकसित देशों की तुलना में कम है, लेकिन भारत की विशाल जनसंख्या के कारण, शहरी आबादी का कुल आकार बहुत बड़ा है।
शहरीकरण के कारण: ग्रामीण क्षेत्रों से विकर्षण (Push Factors)
कई कारक लोगों को ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़ने के लिए मजबूर करते हैं। इन्हें ‘पुश फैक्टर्स’ या विकर्षण कारक कहा जाता है। इनमें शामिल हैं:
- कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और भूमि का छोटा आकार।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी और मौसमी बेरोजगारी।
- गरीबी और निम्न जीवन स्तर।
- बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव।
- जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक पिछड़ापन।
शहरीकरण के कारण: शहरी क्षेत्रों का आकर्षण (Pull Factors)
शहर कई कारणों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हें ‘पुल फैक्टर्स’ या आकर्षण कारक कहा जाता है। इनमें शामिल हैं:
- उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र में रोजगार के बेहतर अवसर।
- उच्च आय और बेहतर जीवन स्तर की संभावना।
- उच्च शिक्षा और विशेष स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता।
- मनोरंजन के साधन और आधुनिक जीवन शैली।
- सामाजिक गतिशीलता और गुमनामी का अवसर।
भारत में नगरों का वर्गीकरण
भारत की जनगणना नगरों को उनकी जनसंख्या के आकार के आधार पर वर्गीकृत करती है।
- कक्षा I नगर (Class I Town): 1,00,000 से अधिक जनसंख्या वाले शहर। इन्हें ‘शहर’ (City) भी कहा जाता है।
- महानगर (Metropolitan City): 10 लाख (1 मिलियन) से 50 लाख (5 मिलियन) के बीच की आबादी वाले शहर।
- मेगा सिटी (Mega City): 50 लाख (5 मिलियन) से अधिक आबादी वाले शहर। 2011 में, मुंबई, दिल्ली और कोलकाता मेगा सिटी थे।
अधिकांश शहरी आबादी इन्हीं बड़े शहरों में केंद्रित है।
शहरीकरण की समस्याएं: आवास और झुग्गी-झोपड़ियां
तेजी से शहरीकरण के कारण शहरों में आवास की भारी कमी हो गई है। मकानों की कीमतें और किराए आसमान छू रहे हैं, जिससे गरीब प्रवासियों के लिए घर खरीदना या किराए पर लेना मुश्किल हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, बड़ी संख्या में लोग अवैध और अनियोजित बस्तियों, जिन्हें झुग्गी-झोपड़ियां (Slums) कहते हैं, में रहने को मजबूर हैं। मुंबई की धारावी एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक है।
शहरीकरण की समस्याएं: भीड़भाड़ और यातायात
शहरों में जनसंख्या का अत्यधिक घनत्व भीड़भाड़ को जन्म देता है। सड़कें वाहनों से भरी रहती हैं, जिससे ट्रैफिक जाम एक दैनिक समस्या बन जाती है। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, जैसे बसें और ट्रेनें, अक्सर अपनी क्षमता से अधिक भरी होती हैं। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि वायु और ध्वनि प्रदूषण भी बढ़ता है।
शहरीकरण की समस्याएं: जल और स्वच्छता
बढ़ती शहरी आबादी के लिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। कई शहरों में पानी की आपूर्ति अनियमित और अपर्याप्त है। इसके अलावा, अपशिष्ट जल और कचरे का प्रबंधन भी एक गंभीर समस्या है। कई शहरों में उचित सीवेज सिस्टम और कचरा निपटान सुविधाओं का अभाव है, जिससे नदियां और भूमि प्रदूषित हो रही हैं और बीमारियां फैल रही हैं।
शहरीकरण की समस्याएं: सामाजिक तनाव
शहरों में विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग एक साथ रहते हैं, लेकिन यह हमेशा सामंजस्यपूर्ण नहीं होता है। सीमित संसाधनों और अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धा से सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है। अपराध दर, विशेष रूप से चोरी, लूट और महिलाओं के खिलाफ अपराध, अक्सर शहरों में अधिक होती है। गुमनामी और सामाजिक समर्थन की कमी भी लोगों में अकेलेपन और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है।
शहरी विकास के लिए सरकारी पहल
सरकार ने शहरीकरण की चुनौतियों से निपटने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। ‘स्मार्ट सिटीज मिशन’ का उद्देश्य 100 शहरों को बेहतर बुनियादी ढांचे, स्वच्छ वातावरण और स्मार्ट समाधानों के साथ विकसित करना है। ‘अमृत’ (AMRUT – Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation) योजना का लक्ष्य 500 शहरों में पानी की आपूर्ति, सीवेज नेटवर्क और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार करना है।
6. ग्रामीण और शहरी जीवन: दो भारत की कहानी
ग्रामीण और शहरी बस्तियों में अंतर
ग्रामीण (Rural) और शहरी (Urban) बस्तियां केवल जनसंख्या के आकार में ही भिन्न नहीं होतीं, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था, समाज और जीवन शैली में भी गहरा अंतर होता है। ग्रामीण बस्तियों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ने और वानिकी जैसी प्राथमिक गतिविधियों पर आधारित होती है। इसके विपरीत, शहरी बस्तियों में उद्योग, व्यापार, परिवहन और विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रमुख आर्थिक गतिविधियां हैं।
ग्रामीण जीवन की विशेषताएं
भारत की आत्मा आज भी इसके गांवों में बसती है। ग्रामीण जीवन की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं:
- कृषि आधारित अर्थव्यवस्था: अधिकांश लोग अपनी आजीविका के लिए सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं।
- घनिष्ठ सामाजिक संबंध: गांव छोटे होते हैं, और लोग एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं। समुदाय की भावना मजबूत होती है।
- परंपरागत जीवन शैली: रीति-रिवाज, परंपराएं और सामाजिक मानदंड जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- धीमी जीवन गति: शहरी जीवन की भागदौड़ की तुलना में ग्रामीण जीवन शांत और सरल होता है।
ग्रामीण क्षेत्रों की चुनौतियां
ग्रामीण भारत कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। इनमें गरीबी, छिपी हुई बेरोजगारी, कृषि का मानसून पर निर्भर होना, और भूमिहीनता प्रमुख हैं। इसके अलावा, गांवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, बिजली, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का अक्सर अभाव होता है। ये समस्याएं ही लोगों को शहरों की ओर पलायन करने के लिए प्रेरित करती हैं।
शहरी जीवन की विशेषताएं
शहरी जीवन अवसरों और चुनौतियों का एक अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है। इसकी कुछ विशेषताएं हैं:
- विविध रोजगार के अवसर: शहरों में विभिन्न प्रकार के कौशल और शिक्षा के लिए नौकरियां उपलब्ध होती हैं।
- जटिल सामाजिक संरचना: शहर में विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोग एक साथ रहते हैं। सामाजिक संबंध अधिक औपचारिक होते हैं।
- आधुनिक सुविधाएं: बेहतर स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, शॉपिंग मॉल और मनोरंजन के साधन उपलब्ध होते हैं।
- तेज गति वाला जीवन: शहरी जीवन व्यस्त और प्रतिस्पर्धी होता है, जहाँ समय का बहुत महत्व होता है।
शहरी जीवन की चुनौतियां
शहरी जीवन की चमक-दमक के पीछे कई समस्याएं छिपी होती हैं। उच्च जीवन लागत, आवास की कमी, भीड़भाड़, प्रदूषण, यातायात जाम और उच्च अपराध दर आम समस्याएं हैं। इसके अलावा, तीव्र प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अलगाव के कारण मानसिक तनाव और अकेलापन भी शहरी जीवन का एक स्याह पक्ष है।
ग्रामीण-शहरी सातत्य (Rural-Urban Continuum)
आधुनिक समय में, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। परिवहन और संचार के बेहतर साधनों के कारण, विचार, वस्तुएं और लोग अब गांवों और शहरों के बीच आसानी से आ-जा रहे हैं। कई बड़े गांवों में अब शहरी सुविधाएं उपलब्ध हैं, और बड़े शहरों के बाहरी इलाकों में ग्रामीण विशेषताएं देखी जा सकती हैं। इस मिश्रित क्षेत्र को ‘ग्रामीण-शहरी सातत्य’ या ‘उपनगर’ (Suburb) कहा जाता है।
पारस्परिक निर्भरता
ग्रामीण और शहरी क्षेत्र एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि वे एक-दूसरे पर बहुत अधिक निर्भर हैं। शहर भोजन, कच्चे माल (जैसे कपास, गन्ना) और श्रम के लिए गांवों पर निर्भर करते हैं। वहीं, गांव औद्योगिक उत्पादों (जैसे ट्रैक्टर, उर्वरक), वित्तीय सेवाओं और रोजगार के अवसरों के लिए शहरों पर निर्भर करते हैं। यह पारस्परिक निर्भरता देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
7. मानव प्रवास: एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा
प्रवास की अवधारणा
मानव प्रवास (Human Migration) का अर्थ है लोगों का अपने मूल निवास स्थान को छोड़कर किसी नए स्थान पर जाकर स्थायी या अस्थायी रूप से बसना। यह प्रक्रिया जनसंख्या के पुनर्वितरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रवास देश के भीतर (आंतरिक प्रवास) या देशों के बीच (अंतर्राष्ट्रीय प्रवास) हो सकता है। यह जनसंख्या के आकार के साथ-साथ उसकी संरचना को भी बदल देता है।
प्रवास के प्रकार
प्रवास को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है:
- आंतरिक प्रवास (Internal Migration): जब लोग एक ही देश की सीमाओं के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, जैसे एक गांव से दूसरे गांव या एक राज्य से दूसरे राज्य में।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रवास (International Migration): जब लोग एक देश को छोड़कर दूसरे देश में जाकर बसते हैं।
- स्थायी प्रवास (Permanent Migration): जब लोग हमेशा के लिए नए स्थान पर बस जाते हैं।
- अस्थायी प्रवास (Temporary Migration): जब लोग काम, शिक्षा या अन्य कारणों से कुछ समय के लिए प्रवास करते हैं और फिर वापस लौट आते हैं।
भारत में आंतरिक प्रवास की धाराएं (Streams of Internal Migration)
भारत में आंतरिक प्रवास की चार मुख्य धाराएं देखी जाती हैं:
- ग्रामीण से ग्रामीण (Rural to Rural): यह धारा मुख्य रूप से महिलाओं के विवाह के कारण होती है, जो शादी के बाद अपने पति के गांव में चली जाती हैं। कुछ पुरुष भी कृषि मजदूरी के लिए एक गांव से दूसरे गांव जाते हैं।
- ग्रामीण से शहरी (Rural to Urban): यह प्रवास की सबसे प्रमुख धारा है। पुरुष रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश में गांवों से शहरों की ओर जाते हैं।
- शहरी से शहरी (Urban to Urban): लोग बेहतर अवसरों, उच्च वेतन या स्थानांतरण के लिए एक छोटे शहर से बड़े शहर की ओर प्रवास करते हैं।
- शहरी से ग्रामीण (Urban to Rural): यह धारा बहुत कम है, लेकिन कुछ लोग सेवानिवृत्ति के बाद या शहरों की भीड़भाड़ से बचने के लिए गांवों की ओर लौटते हैं।
प्रवास के कारण: प्रतिकर्ष कारक (Push Factors)
प्रतिकर्ष या विकर्षण कारक वे नकारात्मक स्थितियां हैं जो लोगों को अपना मूल स्थान छोड़ने के लिए मजबूर करती हैं। भारत में प्रमुख प्रतिकर्ष कारक हैं:
- ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी।
- कृषि भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव।
- प्राकृतिक आपदाएं जैसे सूखा, बाढ़ और चक्रवात।
- शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव।
- सामाजिक और राजनीतिक अशांति या संघर्ष।
प्रवास के कारण: अपकर्ष कारक (Pull Factors)
अपकर्ष या आकर्षण कारक वे सकारात्मक स्थितियां हैं जो लोगों को किसी नए स्थान की ओर आकर्षित करती हैं। भारत में प्रमुख अपकर्ष कारक हैं:
- शहरों में रोजगार के बेहतर और विविध अवसर।
- उच्च वेतन और बेहतर जीवन स्तर की संभावना।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता।
- मनोरंजन और आधुनिक जीवन शैली का आकर्षण।
- व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक उन्नति के अवसर।
प्रवास के परिणाम: गंतव्य स्थान पर (Consequences for Destination)
प्रवास का गंतव्य स्थान, यानी जहाँ लोग जाकर बसते हैं, पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव पड़ते हैं। सकारात्मक रूप से, उद्योगों और सेवा क्षेत्र को सस्ता श्रम मिलता है। नकारात्मक रूप से, शहरों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता है, जिससे आवास, पानी, और परिवहन जैसी सुविधाओं पर बोझ पड़ता है। झुग्गी-झोपड़ियों का अनियंत्रित विकास और पर्यावरणीय समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं।
प्रवास के परिणाम: उद्गम स्थान पर (Consequences for Source)
प्रवास का उद्गम स्थान, यानी जहाँ से लोग जाते हैं, पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। एक बड़ा सकारात्मक प्रभाव यह है कि प्रवासी अपने घर पैसा भेजते हैं (जिसे प्रेषण या Remittance कहते हैं), जिससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है। नकारात्मक पक्ष यह है कि गांवों से युवा और कुशल लोगों के चले जाने से ‘ब्रेन ड्रेन’ (Brain Drain) की स्थिति बनती है और कृषि और अन्य स्थानीय कार्यों के लिए श्रमिकों की कमी हो जाती है।
प्रवास के सामाजिक परिणाम
प्रवास सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण वाहक है। प्रवासी अपने साथ नए विचार, तकनीक और कौशल लेकर आते हैं, जिससे विभिन्न संस्कृतियों का मिश्रण होता है। हालांकि, इससे सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है, क्योंकि स्थानीय लोग प्रवासियों को अपने रोजगार और संसाधनों के लिए खतरा मान सकते हैं। प्रवासियों को अक्सर नए समाज में घुलने-मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
प्रवासी महिलाएं
भारत में, पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक प्रवास करती हैं, लेकिन उनका प्रवास मुख्य रूप से विवाह के कारण ग्रामीण से ग्रामीण क्षेत्रों में होता है। हालांकि, अब रोजगार और शिक्षा के लिए भी महिलाओं का ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में प्रवास बढ़ रहा है। अकेली प्रवास करने वाली महिलाओं को अक्सर शोषण और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।
अंतर्राष्ट्रीय प्रवास: भारतीय डायस्पोरा
लाखों भारतीय काम, व्यवसाय और शिक्षा के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में जाकर बस गए हैं, जिन्हें ‘भारतीय डायस्पोरा’ (Indian Diaspora) कहा जाता है। वे संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, खाड़ी देशों और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ये प्रवासी न केवल भारत में बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजते हैं, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की छवि और प्रभाव को भी बढ़ाते हैं।
8. निष्कर्ष: भविष्य की राह और चुनौतियां
जनसंख्या: एक दोधारी तलवार
भारत की विशाल जनसंख्या एक साथ एक बड़ी संपत्ति भी है और एक गंभीर चुनौती भी। यदि हम अपनी युवा आबादी को उचित शिक्षा, कौशल और स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर सकें, तो यह ‘जनांकिकीय लाभांश’ (Demographic Dividend) देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकता है। लेकिन अगर हम ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो यही आबादी बेरोजगारी, गरीबी और सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है।
असमान वितरण की चुनौती
जनसंख्या और विकास का असमान वितरण एक बड़ी चुनौती है। कुछ क्षेत्र अत्यधिक विकसित और घनी आबादी वाले हैं, जबकि अन्य पिछड़े और विरल हैं। इस क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करने के लिए, हमें पिछड़े क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों का विकास करने की आवश्यकता है ताकि लोगों को प्रवास के लिए मजबूर न होना पड़े और संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित हो सके।
सतत शहरीकरण की आवश्यकता
शहरीकरण एक अपरिहार्य प्रक्रिया है जो विकास का सूचक है। लेकिन हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह शहरीकरण नियोजित और टिकाऊ हो। हमें केवल बड़े महानगरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय छोटे और मझोले शहरों के विकास पर भी जोर देना होगा। स्मार्ट सिटी की अवधारणा के साथ-साथ हमें रहने योग्य और समावेशी शहर बनाने की जरूरत है, जहाँ सभी को आवास, स्वच्छ पानी और सम्मानजनक जीवन का अधिकार हो।
भविष्य का मार्ग
अंततः, भारत की जनसंख्या और आवास की कहानी भारत के भविष्य की कहानी है। जनसंख्या वृद्धि को स्थिर करने, मानव संसाधन का विकास करने, क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और सतत शहरीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक एकीकृत और दूरदर्शी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और रोजगार सृजन पर निवेश करके ही हम अपनी जनसंख्या को एक बोझ के बजाय एक वरदान में बदल सकते हैं और एक समृद्ध और समावेशी भारत का निर्माण कर सकते हैं। “`


Pingback: Indian Geography Syllabus - mcqwale.in