रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे: क्या है सच? (What's Real?)
रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे: क्या है सच? (What's Real?)

रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे: परमाणु नीति, मिसाइल रक्षा, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, समुद्री सुरक्षा

विषय-सूची (Table of Contents)

  1. परिचय: रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे क्या हैं? (Introduction: What are Strategic and Security Issues?)
  2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: सुरक्षा मुद्दों का विकास (Historical Perspective: The Evolution of Security Issues)
  3. रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों के प्रकार (Types of Strategic and Security Issues)
  4. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में प्रमुख सिद्धांत और दृष्टिकोण (Key Theories and Approaches in International Relations)
  5. भू-राजनीति और शक्ति संतुलन की भूमिका (The Role of Geopolitics and Balance of Power)
  6. भारत के प्रमुख रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे (India’s Key Strategic and Security Issues)
  7. अंतर्राष्ट्रीय संगठन और उनकी भूमिका (International Organizations and Their Role)
  8. 21वीं सदी के उभरते रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे (Emerging Strategic and Security Issues of the 21st Century)
  9. भविष्य की दिशा और निष्कर्ष (Future Direction and Conclusion)
  10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

कल्पना कीजिए कि दो पड़ोसी देश हैं, अमनपुर और जंगिस्तान। अमनपुर शांति, व्यापार और विकास पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि जंगिस्तान अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने और पड़ोसी क्षेत्रों पर प्रभाव डालने की कोशिश करता है। एक दिन, जंगिस्तान अपनी सीमा पर मिसाइलें तैनात कर देता है। यह कार्रवाई अमनपुर के लिए तुरंत एक गंभीर चिंता का विषय बन जाती है। यह सिर्फ एक सैन्य खतरा नहीं है; यह एक ऐसा कदम है जो दोनों देशों के बीच व्यापार, लोगों की आवाजाही और भविष्य के संबंधों को प्रभावित कर सकता है। यह स्थिति हमें सीधे तौर पर रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे (Strategic and Security Issues) की जटिल दुनिया में ले जाती है। ये केवल सेनाओं या हथियारों के बारे में नहीं हैं, बल्कि ये उन सभी कारकों के बारे में हैं जो एक देश की संप्रभुता (sovereignty), स्थिरता और अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में, इन मुद्दों को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे देशों के व्यवहार, उनकी नीतियों और वैश्विक शांति के भविष्य को आकार देते हैं।

1. परिचय: रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे क्या हैं? (Introduction: What are Strategic and Security Issues?)

रणनीति और सुरक्षा की परिभाषा (Defining Strategy and Security)

रणनीति का अर्थ है किसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की कला और विज्ञान। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में, यह लक्ष्य राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना होता है। सुरक्षा का अर्थ खतरों से मुक्ति है। जब हम इन दोनों को मिलाते हैं, तो रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे वे सभी विषय बन जाते हैं जो एक राष्ट्र के अस्तित्व, अखंडता और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इनमें सैन्य खतरों से लेकर आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और यहां तक कि जलवायु परिवर्तन जैसे विषय भी शामिल हैं।

  • रणनीति (Strategy): यह एक दीर्घकालिक योजना है जो सैन्य, आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक साधनों का उपयोग करके राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बनाई जाती है।
  • सुरक्षा (Security): यह केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक कल्याण, और राष्ट्रीय मूल्यों की सुरक्षा भी शामिल है।
  • राष्ट्रीय हित (National Interest): यह उन लक्ष्यों और महत्वाकांक्षाओं का समूह है जिन्हें एक देश अपनी विदेश नीति के माध्यम से प्राप्त करना चाहता है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में इनका महत्व (Importance in International Relations)

अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations) देशों के बीच बातचीत का अध्ययन है। इस अध्ययन के केंद्र में रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे होते हैं। कोई भी देश शांति और स्थिरता के बिना प्रगति नहीं कर सकता। यदि किसी देश को लगातार बाहरी आक्रमण या आंतरिक विद्रोह का डर हो, तो वह अपने नागरिकों के लिए विकास और कल्याण सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसलिए, हर देश अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। यह समझना कि देश अपने सुरक्षा हितों को कैसे देखते हैं और उन्हें कैसे सुरक्षित करते हैं, यह वैश्विक राजनीति को समझने की कुंजी है। ये मुद्दे तय करते हैं कि कौन से देश दोस्त हैं और कौन दुश्मन, व्यापारिक मार्ग कहाँ से गुजरेंगे, और वैश्विक शक्ति संतुलन कैसे बना रहेगा।

उदाहरण के लिए, दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति न केवल उसके पड़ोसी देशों के लिए, बल्कि भारत, अमेरिका और जापान जैसे देशों के लिए भी एक प्रमुख रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा है। यह मुद्दा केवल सैन्य नहीं है, बल्कि यह व्यापार मार्गों, समुद्री संसाधनों और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के पालन से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए, रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों का अध्ययन हमें वैश्विक घटनाओं के पीछे की गहरी प्रेरणाओं को समझने में मदद करता है।

2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: सुरक्षा मुद्दों का विकास (Historical Perspective: The Evolution of Security Issues)

प्राचीन काल से वेस्टफेलिया तक (From Ancient Times to Westphalia)

सुरक्षा की चिंता मानव सभ्यता जितनी ही पुरानी है। प्राचीन काल में, राज्यों और साम्राज्यों के लिए सुरक्षा का मतलब मुख्य रूप से सैन्य शक्ति और सीमाओं की रक्षा करना था। रोमन साम्राज्य ने अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए विशाल दीवारें और किले बनवाए, जो उस समय के सुरक्षा दृष्टिकोण को दर्शाता है। मध्य युग में, सुरक्षा का विचार धर्म और वंशवाद से जुड़ा था। राजाओं और सामंतों के बीच युद्ध आम थे, और सुरक्षा व्यक्तिगत वफादारी और सैन्य गठबंधनों पर निर्भर करती थी।

आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली की शुरुआत 1648 की वेस्टफेलिया की संधि (Treaty of Westphalia) से मानी जाती है। इस संधि ने संप्रभु राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को जन्म दिया, जिसका अर्थ था कि प्रत्येक राज्य अपने आंतरिक मामलों में स्वतंत्र है और कोई बाहरी शक्ति उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस संधि के बाद, रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे मुख्य रूप से राष्ट्र-राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और सैन्य गठबंधनों पर केंद्रित हो गए।

विश्व युद्ध और शीत युद्ध का युग (The Era of World Wars and the Cold War)

20वीं सदी में दो विश्व युद्धों ने रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे की समझ को पूरी तरह से बदल दिया। प्रथम विश्व युद्ध ने दिखाया कि कैसे जटिल गठबंधन प्रणाली और राष्ट्रवाद पूरे महाद्वीप को विनाशकारी संघर्ष में खींच सकते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध ने परमाणु हथियारों का उदय देखा, जिसने सुरक्षा की परिभाषा को हमेशा के लिए बदल दिया। अब, सुरक्षा का मतलब केवल युद्ध जीतना नहीं था, बल्कि पूर्ण विनाश से बचना भी था।

  • शीत युद्ध (Cold War): यह अमेरिका और सोवियत संघ के बीच एक वैचारिक, राजनीतिक और सैन्य टकराव का दौर था। इस दौरान, सुरक्षा की पूरी अवधारणा परमाणु Abschreckung (deterrence) पर आधारित थी। दोनों महाशक्तियों ने इतने परमाणु हथियार जमा कर लिए थे कि कोई भी पक्ष दूसरे पर हमला करने का जोखिम नहीं उठा सकता था, क्योंकि इसका मतलब “पारस्परिक सुनिश्चित विनाश” (Mutually Assured Destruction – MAD) होता।
  • छद्म युद्ध (Proxy Wars): इस युग में, महाशक्तियां सीधे टकराव से बचती थीं और वियतनाम, कोरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों में छद्म युद्ध लड़ती थीं। ये स्थानीय संघर्ष वैश्विक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों का हिस्सा बन गए।

शीत युद्ध के बाद का युग (The Post-Cold War Era)

1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीत युद्ध समाप्त हो गया। कई लोगों का मानना ​​था कि अब शांति और सहयोग का एक नया युग शुरू होगा। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे और भी जटिल हो गए। अब खतरा किसी एक महाशक्ति से नहीं, बल्कि विभिन्न स्रोतों से था। जातीय संघर्ष, आतंकवाद, विफल राज्य (failed states), और संगठित अपराध जैसी नई चुनौतियां सामने आईं। 9/11 के आतंकवादी हमलों ने दुनिया को दिखाया कि गैर-राज्य कर्ता (non-state actors) भी राष्ट्रों के लिए एक बड़ा सुरक्षा खतरा पैदा कर सकते हैं। इसने सुरक्षा की पारंपरिक राज्य-केंद्रित समझ को चुनौती दी।

इस दौर में, सुरक्षा की अवधारणा का विस्तार हुआ और इसमें ‘मानव सुरक्षा’ (human security) का विचार शामिल हुआ, जो कहता है कि सुरक्षा का केंद्र बिंदु राज्य नहीं, बल्कि व्यक्ति होना चाहिए। इसका मतलब है कि गरीबी, बीमारी, और मानवाधिकारों के हनन से सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सैन्य खतरों से सुरक्षा।

3. रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों के प्रकार (Types of Strategic and Security Issues)

आधुनिक दुनिया में, रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है: पारंपरिक और गैर-पारंपरिक। यह विभाजन हमें विभिन्न प्रकार के खतरों और चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है जिनका सामना आज देश कर रहे हैं।

पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे (Traditional Security Issues)

पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे मुख्य रूप से राज्य-केंद्रित होते हैं और सैन्य खतरों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इनका संबंध एक राज्य द्वारा दूसरे राज्य की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए उत्पन्न किए गए खतरों से है।

  • सैन्य आक्रमण (Military Aggression): यह सबसे सीधा और पारंपरिक सुरक्षा खतरा है। जब एक देश दूसरे देश पर हमला करता है, तो यह उसकी संप्रभुता का सीधा उल्लंघन होता है। उदाहरण के लिए, रूस का यूक्रेन पर आक्रमण एक क्लासिक पारंपरिक सुरक्षा मुद्दा है।
  • सीमा विवाद (Border Disputes): दुनिया भर में कई देशों के बीच सीमा विवाद हैं, जो अक्सर तनाव और सैन्य संघर्ष का कारण बनते हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक प्रमुख रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा है जो दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित करता है।
  • हथियारों की दौड़ (Arms Race): जब प्रतिस्पर्धी देश अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं, तो इसे हथियारों की दौड़ कहा जाता है। यह अक्सर अस्थिरता पैदा करता है और युद्ध के जोखिम को बढ़ाता है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की दौड़ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • जासूसी और खुफियागीरी (Espionage and Intelligence): देश अक्सर एक-दूसरे के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के लिए जासूसी का सहारा लेते हैं। यह जानकारी सैन्य योजनाओं, राजनीतिक इरादों या तकनीकी रहस्यों से संबंधित हो सकती है, जो एक देश को दूसरे पर रणनीतिक लाभ दे सकती है।

गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे (Non-Traditional Security Issues)

गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे वे खतरे हैं जो राज्यों की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं और अक्सर गैर-राज्य कर्ताओं या प्राकृतिक घटनाओं से उत्पन्न होते हैं। ये मुद्दे सीधे तौर पर सैन्य प्रकृति के नहीं होते, लेकिन वे राज्य और उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।

  • आतंकवाद (Terrorism): यह गैर-राज्य कर्ताओं द्वारा राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हिंसा का उपयोग है। 9/11, मुंबई 26/11, और दुनिया भर में हुए अनगिनत हमलों ने आतंकवाद को 21वीं सदी का एक प्रमुख रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा बना दिया है।
  • साइबर सुरक्षा (Cyber Security): डिजिटल युग में, साइबर हमले एक बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। हैकर्स और विदेशी सरकारें महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (जैसे बिजली ग्रिड, बैंकिंग सिस्टम), सरकारी वेबसाइटों और रक्षा प्रणालियों को निशाना बना सकती हैं, जिससे देश में अराजकता फैल सकती है।
  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change): यह एक दीर्घकालिक सुरक्षा खतरा है। समुद्र के स्तर में वृद्धि, चरम मौसम की घटनाएं, और संसाधनों की कमी से बड़े पैमाने पर विस्थापन, सामाजिक अशांति और यहां तक कि देशों के बीच संघर्ष भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, जल संसाधनों को लेकर देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है।
  • महामारी और स्वास्थ्य सुरक्षा (Pandemics and Health Security): COVID-19 महामारी ने दिखाया है कि कैसे एक स्वास्थ्य संकट तेजी से एक वैश्विक सुरक्षा संकट में बदल सकता है। यह अर्थव्यवस्थाओं को ठप कर सकता है, सामाजिक व्यवस्था को बाधित कर सकता है और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को कमजोर कर सकता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): देशों को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा स्रोतों (जैसे तेल और गैस) पर नियंत्रण या उनकी आपूर्ति में बाधा डालना एक शक्तिशाली भू-राजनीतिक हथियार हो सकता है। यह ऊर्जा-आयातक देशों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा है।
  • संगठित अपराध (Organized Crime): ड्रग्स तस्करी, मानव तस्करी और अवैध हथियारों का व्यापार जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध नेटवर्क राज्यों की स्थिरता और कानून-व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती पेश करते हैं।

4. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में प्रमुख सिद्धांत और दृष्टिकोण (Key Theories and Approaches in International Relations)

रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को समझने के लिए, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विभिन्न सिद्धांतों को जानना आवश्यक है। ये सिद्धांत हमें यह समझाने में मदद करते हैं कि देश जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा क्यों करते हैं, और वे सुरक्षा खतरों का जवाब कैसे देते हैं।

यथार्थवाद (Realism)

यथार्थवाद अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का सबसे पुराना और प्रभावशाली सिद्धांतों में से एक है। यथार्थवादी मानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली अराजक (anarchic) है, जिसका अर्थ है कि राज्यों के ऊपर कोई केंद्रीय सत्ता नहीं है जो उन्हें नियंत्रित कर सके।

  • मुख्य मान्यताएं:
    • राज्य अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मुख्य अभिनेता हैं।
    • राज्य अपने अस्तित्व को सुनिश्चित करने के लिए शक्ति (power) की तलाश करते हैं।
    • राज्य तर्कसंगत अभिनेता हैं जो अपने राष्ट्रीय हितों को अधिकतम करने की कोशिश करते हैं।
    • सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित है, और इसे प्राप्त करने का सबसे अच्छा तरीका सैन्य शक्ति बढ़ाना है।
  • सुरक्षा पर दृष्टिकोण: यथार्थवादियों के लिए, रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे शक्ति संघर्ष का परिणाम हैं। वे मानते हैं कि स्थायी शांति असंभव है और देशों को हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए। वे शक्ति संतुलन (balance of power) और सैन्य गठबंधनों को शांति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण मानते हैं।

उदारवाद (Liberalism)

उदारवाद यथार्थवाद के निराशावादी दृष्टिकोण को चुनौती देता है। उदारवादी मानते हैं कि अराजक अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के बावजूद, सहयोग और शांति संभव है।

  • मुख्य मान्यताएं:
    • राज्य के अलावा, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, गैर-सरकारी संगठन (NGOs) और बहुराष्ट्रीय निगम भी महत्वपूर्ण अभिनेता हैं।
    • देशों के बीच आर्थिक निर्भरता (economic interdependence) और साझा लोकतांत्रिक मूल्य सहयोग को बढ़ावा देते हैं।
    • अंतर्राष्ट्रीय कानून और संगठन (जैसे संयुक्त राष्ट्र) संघर्षों को सुलझाने और शांति को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।
  • सुरक्षा पर दृष्टिकोण: उदारवादियों के लिए, सुरक्षा केवल सैन्य शक्ति से नहीं आती है। वे सामूहिक सुरक्षा (collective security) की अवधारणा पर जोर देते हैं, जहां देश एक-दूसरे की सुरक्षा की गारंटी देने के लिए मिलकर काम करते हैं। वे मानते हैं कि व्यापार, लोकतंत्र और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों को बढ़ावा देकर दीर्घकालिक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को हल किया जा सकता है।

रचनावाद (Constructivism)

रचनावाद एक अपेक्षाकृत नया सिद्धांत है जो इस बात पर जोर देता है कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध केवल भौतिक कारकों (जैसे सैन्य शक्ति) से नहीं, बल्कि सामाजिक कारकों (जैसे विचारों, मानदंडों और पहचान) से भी आकार लेते हैं।

  • मुख्य मान्यताएं:
    • “अराजकता वह है जो राज्य बनाते हैं” (Anarchy is what states make of it)। इसका मतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली की प्रकृति देशों के बीच की बातचीत और उनकी साझा समझ पर निर्भर करती है।
    • राष्ट्रीय हित स्थिर नहीं होते, बल्कि वे समय के साथ बदलते हैं और सामाजिक रूप से निर्मित होते हैं।
    • पहचान (identity) और मानदंड (norms) देशों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
  • सुरक्षा पर दृष्टिकोण: रचनावादी तर्क देते हैं कि ‘खतरे’ वस्तुनिष्ठ नहीं होते, बल्कि उन्हें सामाजिक रूप से बनाया जाता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका कनाडा के परमाणु हथियारों से खतरा महसूस नहीं करता, लेकिन उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों से करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिका और कनाडा की साझा पहचान और दोस्ती का इतिहास है। रचनावादियों के लिए, रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को हल करने के लिए देशों के बीच विश्वास बनाना और साझा पहचान विकसित करना महत्वपूर्ण है।

5. भू-राजनीति और शक्ति संतुलन की भूमिका (The Role of Geopolitics and Balance of Power)

भू-राजनीति क्या है? (What is Geopolitics?)

भू-राजनीति (Geopolitics) इस बात का अध्ययन है कि भूगोल (geography) अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और संबंधों को कैसे प्रभावित करता है। किसी देश का स्थान, आकार, स्थलाकृति और प्राकृतिक संसाधन उसकी विदेश नीति और सुरक्षा चिंताओं को गहराई से प्रभावित करते हैं।

  • स्थान का महत्व: एक देश जो महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों पर स्थित है (जैसे मिस्र और स्वेज नहर) या जो शक्तिशाली पड़ोसियों से घिरा है (जैसे पोलैंड, जो जर्मनी और रूस के बीच स्थित है), उसकी सुरक्षा चिंताएं एक द्वीपीय राष्ट्र (जैसे ऑस्ट्रेलिया) से बहुत अलग होंगी।
  • प्राकृतिक संसाधन: तेल, गैस, पानी और खनिजों जैसे संसाधनों की उपलब्धता या कमी देशों के बीच सहयोग या संघर्ष का कारण बन सकती है। मध्य पूर्व के रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे काफी हद तक उसके विशाल तेल भंडार से जुड़े हुए हैं।
  • भौगोलिक संरचना: हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है। इसी तरह, हिंद महासागर भारत को एक महत्वपूर्ण समुद्री राष्ट्र बनाता है, जिससे उसकी समुद्री सुरक्षा (maritime security) एक प्रमुख प्राथमिकता बन जाती है।

शक्ति संतुलन की अवधारणा (The Concept of Balance of Power)

शक्ति संतुलन एक ऐसी स्थिति है जिसमें कोई भी एक देश या देशों का समूह इतना शक्तिशाली नहीं हो पाता कि वह दूसरों पर हावी हो सके। यह अंतर्राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए एक प्रमुख तंत्र माना जाता है। देश दो मुख्य तरीकों से शक्ति संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं:

  • आंतरिक संतुलन (Internal Balancing): इसमें एक देश अपनी सैन्य और आर्थिक क्षमताओं को बढ़ाकर अपनी शक्ति बढ़ाता है।
  • बाहरी संतुलन (External Balancing): इसमें देश एक शक्तिशाली या आक्रामक देश का मुकाबला करने के लिए दूसरे देशों के साथ गठबंधन बनाते हैं। नाटो (NATO) का गठन सोवियत संघ के खिलाफ बाहरी संतुलन का एक क्लासिक उदाहरण है।

शक्ति संतुलन की नीति यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी देश वैश्विक या क्षेत्रीय व्यवस्था को एकतरफा रूप से बदलने की कोशिश न करे। जब शक्ति संतुलन बिगड़ता है, तो अक्सर युद्ध और अस्थिरता का खतरा बढ़ जाता है।

शक्ति संतुलन: सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Balance of Power: Positive and Negative Aspects)

सकारात्मक पहलू (Positive Aspects)

  • स्थिरता और शांति: शक्ति संतुलन आक्रामक देशों को रोक सकता है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि उनके खिलाफ एक शक्तिशाली गठबंधन बन जाएगा। यह एक प्रकार की Abschreckung (deterrence) प्रदान करता है, जिससे बड़े युद्धों की संभावना कम हो जाती है।
  • छोटे राज्यों की सुरक्षा: यह छोटे राज्यों को शक्तिशाली पड़ोसियों द्वारा निगले जाने से बचाता है। छोटे राज्य बड़े राज्यों के साथ गठबंधन करके अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।
  • कूटनीति को बढ़ावा: शक्ति संतुलन की राजनीति देशों को लगातार कूटनीति, बातचीत और गठबंधन बनाने में संलग्न रहने के लिए मजबूर करती है, जिससे संवाद के रास्ते खुले रहते हैं।

नकारात्मक पहलू (Negative Aspects)

  • हथियारों की दौड़: शक्ति बनाए रखने की होड़ में, देश अक्सर हथियारों की दौड़ में शामिल हो जाते हैं, जिससे संसाधनों की बर्बादी होती है और तनाव बढ़ता है।
  • अस्थिरता: गठबंधन अक्सर अस्थायी और अविश्वसनीय हो सकते हैं। एक सहयोगी का पक्ष बदलना पूरे संतुलन को बिगाड़ सकता है और अचानक संघर्ष को जन्म दे सकता है।
  • नैतिकता की उपेक्षा: शक्ति संतुलन की राजनीति में, राष्ट्रीय हित अक्सर नैतिक सिद्धांतों पर हावी हो जाते हैं। देश मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले शासनों के साथ भी गठबंधन कर सकते हैं, यदि यह उनके रणनीतिक हितों के अनुकूल हो।

6. भारत के प्रमुख रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे (India’s Key Strategic and Security Issues)

भारत अपनी अद्वितीय भौगोलिक स्थिति, विशाल जनसंख्या और बढ़ती आर्थिक शक्ति के कारण कई जटिल रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे का सामना करता है। इन मुद्दों को समझना भारत की विदेश और घरेलू नीतियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

पड़ोसी देशों के साथ संबंध (Relations with Neighboring Countries)

भारत की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौतियां उसके पड़ोस से ही उत्पन्न होती हैं।

  • पाकिस्तान: आजादी के बाद से ही पाकिस्तान के साथ संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। कश्मीर विवाद, सीमा पार आतंकवाद, और परमाणु हथियारों की मौजूदगी इसे भारत के लिए सबसे गंभीर रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा बनाती है। दोनों देशों के बीच कई युद्ध हो चुके हैं और छद्म युद्ध आज भी जारी है।
  • चीन: चीन के साथ भारत का एक लंबा और विवादित सीमा क्षेत्र है। 1962 का युद्ध और हाल के वर्षों में गलवान घाटी जैसी झड़पों ने तनाव को बढ़ाया है। चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति, हिंद महासागर में उसकी उपस्थिति, और पाकिस्तान के साथ उसकी गहरी दोस्ती भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती है। चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) भी भारत के लिए चिंता का विषय है क्योंकि यह भारत के पड़ोस में चीन के प्रभाव को बढ़ाता है।
  • अन्य पड़ोसी: नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, और म्यांमार जैसे अन्य पड़ोसियों के साथ संबंधों में भी चुनौतियां हैं। इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता, चीन का बढ़ता प्रभाव और अवैध प्रवासन जैसे मुद्दे भारत की सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।

समुद्री सुरक्षा (Maritime Security)

भारत की एक लंबी तटरेखा है और इसका अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। हिंद महासागर क्षेत्र (Indian Ocean Region) भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • हिंद महासागर में चीन की उपस्थिति: चीन अपनी नौसेना का तेजी से आधुनिकीकरण कर रहा है और हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। उसने श्रीलंका, पाकिस्तान और जिबूती जैसे देशों में बंदरगाहों का विकास किया है, जिसे भारत ‘मोतियों की माला’ (String of Pearls) की रणनीति के रूप में देखता है, जिसका उद्देश्य भारत को घेरना है।
  • समुद्री डकैती और आतंकवाद: सोमालिया के तट पर समुद्री डकैती और समुद्र के रास्ते आतंकवादी हमलों (जैसे मुंबई 26/11) का खतरा भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण समुद्री सुरक्षा चुनौती है।
  • व्यापार मार्गों की सुरक्षा: भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि हिंद महासागर में समुद्री संचार लाइनों (Sea Lines of Communication – SLOCs) की सुरक्षा पर निर्भर करती है। इन मार्गों में कोई भी बाधा भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा बन सकती है।

आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां (Internal Security Challenges)

भारत को कई गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, जो अक्सर बाहरी ताकतों द्वारा समर्थित होती हैं।

  • वामपंथी उग्रवाद (Left-Wing Extremism): नक्सलवाद भारत के कई राज्यों में एक गंभीर समस्या है, जो विकास को बाधित करता है और सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती है।
  • उत्तर-पूर्व में उग्रवाद (Insurgency in the Northeast): भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में कई जातीय उग्रवादी समूह सक्रिय हैं जो अलग राज्य या स्वतंत्रता की मांग करते हैं। इन समूहों को अक्सर पड़ोसी देशों से समर्थन मिलता है।
  • साइबर अपराध और दुष्प्रचार: भारत में इंटरनेट के बढ़ते उपयोग के साथ, साइबर अपराध, ऑनलाइन कट्टरता और दुष्प्रचार (disinformation) अभियान एक नई और गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौती के रूप में उभरे हैं। ये सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकते हैं।

भारत इन सभी रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपना रहा है, जिसमें सैन्य आधुनिकीकरण, कूटनीतिक जुड़ाव (diplomatic engagement), और आर्थिक सहयोग शामिल हैं। भारत सरकार की नीतियों के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप विदेश मंत्रालय, भारत सरकार की वेबसाइट देख सकते हैं।

7. अंतर्राष्ट्रीय संगठन और उनकी भूमिका (International Organizations and Their Role)

अंतर्राष्ट्रीय संगठन (International Organizations) जैसे संयुक्त राष्ट्र, नाटो, और आसियान, वैश्विक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे देशों को सहयोग करने, संघर्षों को सुलझाने और सामान्य नियमों और मानदंडों को स्थापित करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN)

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में स्थापित, संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना है। यह अपने विभिन्न अंगों के माध्यम से काम करता है:

  • सुरक्षा परिषद (Security Council): यह संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली अंग है, जिसके पास शांति और सुरक्षा से संबंधित बाध्यकारी प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है। इसके पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, यूके) हैं, जिनके पास वीटो शक्ति है। सुरक्षा परिषद शांति अभियानों को अधिकृत कर सकती है और आक्रामक देशों पर प्रतिबंध लगा सकती है।
  • महासभा (General Assembly): इसमें सभी सदस्य देश शामिल हैं और यह वैश्विक मुद्दों पर चर्चा के लिए एक मंच के रूप में कार्य करती है। इसके प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होते, लेकिन वे विश्व जनमत को दर्शाते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice): यह देशों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है।

संयुक्त राष्ट्र ने कई संघर्षों को रोकने और शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन वीटो शक्ति के कारण यह अक्सर महाशक्तियों के बीच टकराव में अप्रभावी हो जाता है।

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO)

नाटो एक सैन्य गठबंधन है जिसकी स्थापना 1949 में सोवियत संघ के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए की गई थी। इसका मूल सिद्धांत अनुच्छेद 5 है, जो कहता है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।

  • शीत युद्ध के दौरान भूमिका: नाटो ने पश्चिमी यूरोप को सोवियत आक्रमण से बचाने में एक महत्वपूर्ण निवारक भूमिका निभाई।
  • शीत युद्ध के बाद की भूमिका: शीत युद्ध के बाद, नाटो ने अपनी भूमिका का विस्तार किया है और बाल्कन और अफगानिस्तान जैसे क्षेत्रों में संकट प्रबंधन अभियानों में शामिल हुआ है। रूस के यूक्रेन पर आक्रमण के बाद नाटो की प्रासंगिकता फिर से बढ़ गई है, और स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश भी इसमें शामिल हो गए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की भूमिका: सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Role of IOs: Positive and Negative Aspects)

सकारात्मक पहलू (Positive Aspects)

  • संघर्ष समाधान: ये संगठन देशों को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं, जिससे युद्ध का खतरा कम होता है।
  • नियम-आधारित व्यवस्था: वे अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानदंडों को बढ़ावा देते हैं, जो एक अधिक अनुमानित और स्थिर विश्व व्यवस्था बनाने में मदद करते हैं।
  • सामूहिक सुरक्षा: सैन्य गठबंधन छोटे देशों को शक्तिशाली पड़ोसियों के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
  • मानवीय सहायता: संयुक्त राष्ट्र और अन्य संगठन संघर्ष और आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मानवीय सहायता प्रदान करते हैं।

नकारात्मक पहलू (Negative Aspects)

  • संप्रभुता का क्षरण: कुछ लोगों का तर्क है कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन राष्ट्रीय संप्रभुता को कमजोर करते हैं क्योंकि वे देशों को ऐसे नियमों का पालन करने के लिए मजबूर कर सकते हैं जिनसे वे सहमत नहीं हैं।
  • शक्तिशाली देशों का प्रभुत्व: अक्सर, ये संगठन अपने सबसे शक्तिशाली सदस्यों के हितों की सेवा करते हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो स्थायी सदस्यों को किसी भी कार्रवाई को रोकने की अनुमति देती है जो उनके हितों के खिलाफ हो।
  • नौकरशाही और अक्षमता: अंतर्राष्ट्रीय संगठन अक्सर धीमी, नौकरशाही और अक्षम प्रक्रियाओं से ग्रस्त होते हैं, जिससे वे संकटों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने में विफल रहते हैं।
  • प्रतिनिधित्व का अभाव: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाएं 1945 की शक्ति वास्तविकताओं को दर्शाती हैं और भारत, ब्राजील, और जर्मनी जैसी उभरती शक्तियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देती हैं।

8. 21वीं सदी के उभरते रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे (Emerging Strategic and Security Issues of the 21st Century)

21वीं सदी ने कई नए और जटिल रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे को जन्म दिया है जो पारंपरिक सुरक्षा की समझ को चुनौती देते हैं। ये मुद्दे अक्सर वैश्विक, अंतर-संबंधित होते हैं और किसी एक देश द्वारा अकेले हल नहीं किए जा सकते।

साइबर सुरक्षा (Cyber Security)

हमारी दुनिया तेजी से डिजिटल होती जा रही है, जिससे साइबरस्पेस सुरक्षा का एक नया और महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। साइबर हमले विभिन्न रूपों में हो सकते हैं:

  • महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले: राज्य या गैर-राज्य कर्ता बिजली ग्रिड, वित्तीय प्रणालियों, परिवहन नेटवर्क और संचार प्रणालियों को निशाना बना सकते हैं, जिससे देश में व्यापक व्यवधान और अराजकता पैदा हो सकती है।
  • जासूसी और डेटा चोरी: सरकारें और कंपनियां संवेदनशील सरकारी, कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत डेटा चोरी करने के लिए साइबर जासूसी का उपयोग करती हैं।
  • दुष्प्रचार और प्रभाव अभियान: विदेशी शक्तियां चुनावों को प्रभावित करने, सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने और किसी देश के संस्थानों में विश्वास को कम करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग कर सकती हैं।
  • साइबर युद्ध: भविष्य के संघर्षों में, साइबर हमले पारंपरिक सैन्य अभियानों के साथ-साथ एक प्रमुख घटक हो सकते हैं, जिसका उद्देश्य दुश्मन की कमान और नियंत्रण प्रणाली को पंगु बनाना है।

साइबरस्पेस में हमलों की पहचान करना और उनका मुकाबला करना मुश्किल है, जिससे यह एक विशेष रूप से खतरनाक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा बन जाता है।

जलवायु परिवर्तन (Climate Change)

पहले एक पर्यावरणीय मुद्दा माना जाने वाला जलवायु परिवर्तन अब व्यापक रूप से एक प्रमुख सुरक्षा खतरे के रूप में पहचाना जाता है। इसके सुरक्षा निहितार्थ कई हैं:

  • संसाधन संघर्ष: जैसे-जैसे पानी और कृषि योग्य भूमि जैसे संसाधन कम होते जाएंगे, देशों के भीतर और उनके बीच संघर्ष का खतरा बढ़ जाएगा।
  • बड़े पैमाने पर विस्थापन: समुद्र के स्तर में वृद्धि और मरुस्थलीकरण लाखों लोगों को अपने घरों से विस्थापित कर सकता है, जिससे ‘जलवायु शरणार्थी’ (climate refugees) का संकट पैदा हो सकता है जो मेजबान देशों में सामाजिक और राजनीतिक तनाव पैदा कर सकता है।
  • आर्कटिक में नई भू-राजनीति: आर्कटिक की बर्फ पिघलने से नए शिपिंग मार्ग और संसाधनों तक पहुंच खुल रही है, जिससे रूस, अमेरिका, चीन और अन्य देशों के बीच एक नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है।
  • चरम मौसम की घटनाएं: तूफान, बाढ़ और सूखे जैसी चरम मौसम की घटनाएं सैन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकती हैं और राहत अभियानों के लिए सैन्य संसाधनों को मोड़ सकती हैं।

महामारी और स्वास्थ्य सुरक्षा (Pandemics and Health Security)

COVID-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्वास्थ्य सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का एक अभिन्न अंग है। एक संक्रामक बीमारी तेजी से सीमाओं को पार कर सकती है और एक वैश्विक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा बन सकती है।

  • आर्थिक पतन: लॉकडाउन और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे सामाजिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
  • भू-राजनीतिक तनाव: महामारी ने देशों के बीच तनाव को बढ़ा दिया, जिसमें टीकों के वितरण (vaccine nationalism) और बीमारी की उत्पत्ति के बारे में आरोप-प्रत्यारोप शामिल थे।
  • जैव-आतंकवाद का खतरा: यह चिंता भी है कि आतंकवादी समूह या दुष्ट राज्य जानबूझकर खतरनाक रोगजनकों को हथियार के रूप में फैला सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security)

आधुनिक अर्थव्यवस्थाएं ऊर्जा पर निर्भर हैं, और ऊर्जा स्रोतों तक विश्वसनीय और सस्ती पहुंच सुनिश्चित करना एक प्रमुख सुरक्षा चिंता है।

  • आपूर्ति पर निर्भरता: जो देश ऊर्जा के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर हैं, वे आपूर्तिकर्ता देशों द्वारा राजनीतिक दबाव या आपूर्ति में व्यवधान के प्रति संवेदनशील होते हैं। यूरोप की रूस की गैस पर निर्भरता इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
  • ऊर्जा बुनियादी ढांचे की सुरक्षा: पाइपलाइनों, तेल टैंकरों और रिफाइनरियों जैसे ऊर्जा बुनियादी ढांचे आतंकवादी हमलों या सैन्य कार्रवाई के लिए आसान लक्ष्य हो सकते हैं।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण: नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy) की ओर संक्रमण ऊर्जा सुरक्षा में सुधार कर सकता है, लेकिन यह नई चुनौतियां भी पैदा करता है, जैसे कि सौर पैनलों और बैटरी के लिए आवश्यक खनिजों पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा।

9. भविष्य की दिशा और निष्कर्ष (Future Direction and Conclusion)

सुरक्षा की बदलती प्रकृति (The Changing Nature of Security)

हमने देखा है कि रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे की अवधारणा समय के साथ काफी विकसित हुई है। यह अब केवल सैन्य शक्ति और सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है। आज, सुरक्षा एक बहुआयामी अवधारणा है जिसमें आर्थिक, पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और साइबर पहलू भी शामिल हैं। खतरे अब केवल अन्य राज्यों से नहीं, बल्कि गैर-राज्य कर्ताओं, प्राकृतिक घटनाओं और वैश्विक प्रवृत्तियों से भी आते हैं। इस बदलती प्रकृति का अर्थ है कि देशों को अपनी सुरक्षा रणनीतियों को अनुकूलित करने की आवश्यकता है।

भविष्य में, एक सफल सुरक्षा रणनीति वह होगी जो पारंपरिक सैन्य तैयारी को गैर-पारंपरिक खतरों से निपटने की क्षमता के साथ संतुलित करती है। इसमें साइबर रक्षा में निवेश करना, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए तैयार रहना और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना शामिल है।

सहयोग और बहुपक्षवाद का महत्व (The Importance of Cooperation and Multilateralism)

21वीं सदी के कई रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी और आतंकवाद, वैश्विक प्रकृति के हैं। कोई भी देश इन चुनौतियों का अकेले सामना नहीं कर सकता। इसलिए, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बहुपक्षवाद (multilateralism) पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

  • साझा खुफिया जानकारी: आतंकवादी नेटवर्क और साइबर खतरों से निपटने के लिए देशों को खुफिया जानकारी साझा करने की आवश्यकता है।
  • वैश्विक नियम और मानक: साइबरस्पेस और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) जैसी नई प्रौद्योगिकियों के लिए वैश्विक नियमों और मानकों को स्थापित करने के लिए सहयोग आवश्यक है।
  • संसाधनों का एकीकरण: वैश्विक स्वास्थ्य संकटों या मानवीय आपदाओं से निपटने के लिए संसाधनों और विशेषज्ञता को एकत्रित करने की आवश्यकता है।

हालांकि राष्ट्रवाद और महाशक्ति प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि जटिल वैश्विक समस्याओं के लिए वैश्विक समाधानों की आवश्यकता होती है।

अंतिम विचार: क्या है सच? (Final Thoughts: What’s Real?)

तो, “रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दे: क्या है सच?” इस प्रश्न का उत्तर यह है कि ‘सच’ जटिल और लगातार विकसित हो रहा है। सच यह है कि पारंपरिक सैन्य खतरे अभी भी मौजूद हैं, और देशों को अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए मजबूत सेनाओं की आवश्यकता है। लेकिन सच यह भी है कि हमारी सुरक्षा अब उन ताकतों से भी जुड़ी है जिन्हें हम देख या छू नहीं सकते – एक कंप्यूटर वायरस, एक वैश्विक महामारी, या हमारे ग्रह का बदलता तापमान।

एक छात्र या एक सूचित नागरिक के रूप में, इन मुद्दों की बहुआयामी प्रकृति को समझना महत्वपूर्ण है। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की दुनिया काले और सफेद में नहीं है; यह ग्रे के कई रंगों से भरी है। यह समझना कि देश अपने हितों को कैसे परिभाषित करते हैं, वे खतरों को कैसे देखते हैं, और वे विभिन्न चुनौतियों का जवाब कैसे देते हैं, हमें एक अधिक सूचित, आलोचनात्मक और विश्व के बारे में जागरूक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करता है। अंतिम सच यह है कि एक अनिश्चित दुनिया में, ज्ञान और समझ ही हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हैं।

10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

प्रश्न 1: पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दों में मुख्य अंतर क्या है? (What is the main difference between traditional and non-traditional security issues?)

उत्तर: मुख्य अंतर खतरे के स्रोत और प्रकृति में है। पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे मुख्य रूप से राज्य-केंद्रित होते हैं और सैन्य खतरों से संबंधित होते हैं, जैसे एक देश का दूसरे पर आक्रमण। गैर-पारंपरिक सुरक्षा मुद्दे उन खतरों से संबंधित हैं जो अक्सर राज्य की सीमाओं को पार कर जाते हैं और गैर-सैन्य प्रकृति के होते हैं, जैसे आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, महामारी और साइबर हमले। ये खतरे अक्सर गैर-राज्य कर्ताओं या प्राकृतिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होते हैं।

प्रश्न 2: ‘मानव सुरक्षा’ (Human Security) की अवधारणा का क्या अर्थ है? (What does the concept of ‘Human Security’ mean?)

उत्तर: ‘मानव सुरक्षा’ एक दृष्टिकोण है जो सुरक्षा के केंद्र में राज्य के बजाय व्यक्ति को रखता है। यह तर्क देता है कि सच्ची सुरक्षा केवल सैन्य खतरों से मुक्ति नहीं है, बल्कि ‘भय से मुक्ति’ (freedom from fear) और ‘अभाव से मुक्ति’ (freedom from want) भी है। इसका मतलब है कि गरीबी, भुखमरी, बीमारी, मानवाधिकारों का हनन और पर्यावरणीय गिरावट भी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे हैं जिनका समाधान किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3: भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दा क्या है? (What is the biggest strategic and security issue for India?)

उत्तर: यह कहना मुश्किल है कि कोई एक “सबसे बड़ा” मुद्दा है, क्योंकि भारत कई मोर्चों पर जटिल चुनौतियों का सामना करता है। हालांकि, कई विशेषज्ञ दो प्रमुख चुनौतियों को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं:

  1. चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा: चीन की बढ़ती सैन्य और आर्थिक शक्ति, सीमा विवाद और हिंद महासागर में उसकी उपस्थिति भारत के लिए एक दीर्घकालिक और बहुआयामी चुनौती है।
  2. सीमा पार आतंकवाद: पाकिस्तान प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद दशकों से भारत के लिए एक लगातार और गंभीर सुरक्षा खतरा बना हुआ है।
इन बाहरी खतरों के अलावा, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 4: क्या अंतर्राष्ट्रीय संगठन जैसे संयुक्त राष्ट्र वास्तव में प्रभावी हैं? (Are international organizations like the United Nations really effective?)

उत्तर: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की प्रभावशीलता एक बहस का विषय है। एक ओर, उन्होंने कई संघर्षों को सुलझाने, शांति बनाए रखने, मानवीय सहायता प्रदान करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए मंच प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दूसरी ओर, वे अक्सर शक्तिशाली देशों के हितों से बाधित होते हैं (विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति के कारण) और धीमी नौकरशाही के कारण अप्रभावी हो सकते हैं। उनकी सफलता काफी हद तक सदस्य देशों के सहयोग करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5: एक आम नागरिक रणनीतिक व सुरक्षा मुद्दों में कैसे योगदान दे सकता है? (How can a common citizen contribute to strategic and security issues?)

उत्तर: एक आम नागरिक कई तरीकों से योगदान दे सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है सूचित रहना और इन जटिल मुद्दों की गहरी समझ विकसित करना। दुष्प्रचार और फेक न्यूज से बचकर और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझकर, आप एक सूचित मतदाता और नागरिक बन सकते हैं। इसके अलावा, साइबर स्वच्छता (good cyber hygiene) का अभ्यास करके, सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देकर, और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर स्वस्थ सार्वजनिक बहस में भाग लेकर, आप अप्रत्यक्ष रूप से देश की समग्र सुरक्षा और लचीलेपन में योगदान करते हैं।