इस लेख में हम क्या जानेंगे (Table of Contents)
- 1. परमाणु संरचना का परिचय (Introduction to Atomic Structure)
- 2. परमाणु संरचना के ऐतिहासिक मॉडल (Historical Models of Atomic Structure)
- 3. आधुनिक परमाणु संरचना – क्वांटम मैकेनिकल मॉडल (Modern Atomic Structure – The Quantum Mechanical Model)
- 4. परमाणु के मौलिक कण (Fundamental Particles of an Atom)
- 5. परमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्या (Atomic Number and Mass Number)
- 6. समस्थानिक, समभारिक और समन्यूट्रॉनिक (Isotopes, Isobars, and Isotones)
- 7. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और संयोजकता (Electronic Configuration and Valency)
- 8. दैनिक जीवन में परमाणु संरचना का महत्व (Importance of Atomic Structure in Daily Life)
- 9. निष्कर्ष (Conclusion)
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
कल्पना कीजिए कि आप समुद्र तट पर खड़े हैं और अपने हाथ में रेत का एक छोटा सा कण उठाते हैं। वह कण कितना छोटा है! अब सोचिए, क्या हम उस कण को और छोटे टुकड़ों में तोड़ सकते हैं? और अगर तोड़ सकते हैं, तो सबसे छोटा टुकड़ा क्या होगा जिसे और नहीं तोड़ा जा सकता? यही सवाल सदियों से वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को परेशान करता रहा है। इसी सवाल का जवाब हमें विज्ञान की एक बेहद आकर्षक दुनिया में ले जाता है, जिसे हम परमाणु संरचना (atomic structure) कहते हैं। हमारे आस-पास मौजूद हर चीज़ – हवा, पानी, आपका कंप्यूटर, और यहाँ तक कि आप खुद भी – इन्हीं छोटे-छोटे कणों से मिलकर बने हैं जिन्हें हम परमाणु कहते हैं। इन परमाणुओं की बनावट और व्यवहार को समझना ही ब्रह्मांड के मूलभूत रहस्यों को खोलना है। इस लेख में, हम परमाणु संरचना की गहराई में उतरेंगे और इसके रहस्यों को परत-दर-परत उजागर करेंगे।
1. परमाणु संरचना का परिचय (Introduction to Atomic Structure)
परमाणु संरचना को समझना विज्ञान के सबसे बुनियादी स्तंभों में से एक है। यह हमें बताता है कि पदार्थ किस चीज से बना है और यह विभिन्न तरीकों से व्यवहार क्यों करता है। चलिए, इस रोमांचक यात्रा की शुरुआत करते हैं और परमाणु की दुनिया के दरवाज़े खोलते हैं।
परमाणु क्या है? (What is an Atom?)
यूनानी दार्शनिक डेमोक्रिटस ने लगभग 2500 साल पहले ‘एटमॉस’ (Atomos) शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसका अर्थ है ‘अविभाज्य’ या ‘जिसे और न काटा जा सके’।
- परिभाषा (Definition): परमाणु किसी भी रासायनिक तत्व की सबसे छोटी इकाई है जिसमें उस तत्व के गुण मौजूद होते हैं। यह पदार्थ का मूलभूत निर्माण खंड (fundamental building block) है।
- आकार (Size): परमाणु अविश्वसनीय रूप से छोटे होते हैं। आप एक पिन की नोक पर खरबों परमाणु रख सकते हैं। इनका आकार इतना छोटा होता है कि इन्हें सामान्य माइक्रोस्कोप से भी नहीं देखा जा सकता।
- महत्व (Importance): परमाणु संरचना ही यह तय करती है कि कोई तत्व ठोस, तरल या गैस होगा, वह धातु होगा या अधातु, और वह दूसरे तत्वों के साथ कैसे प्रतिक्रिया करेगा।
परमाणु के मूलभूत घटक (Fundamental Components of an Atom)
पहले माना जाता था कि परमाणु अविभाज्य हैं, लेकिन बाद की खोजों ने साबित कर दिया कि परमाणु और भी छोटे कणों से मिलकर बने होते हैं, जिन्हें उप-परमाणु कण (subatomic particles) कहा जाता है।
- इलेक्ट्रॉन (Electron): ये ऋणात्मक (negatively) आवेशित कण होते हैं जो परमाणु के केंद्र के चारों ओर बहुत तेज गति से घूमते हैं। इनकी खोज जे.जे. थॉमसन ने 1897 में की थी।
- प्रोटॉन (Proton): ये धनात्मक (positively) आवेशित कण होते हैं और परमाणु के केंद्र में स्थित होते हैं। इनका द्रव्यमान इलेक्ट्रॉन से बहुत अधिक होता है।
- न्यूट्रॉन (Neutron): इन कणों पर कोई आवेश नहीं होता (ये उदासीन होते हैं) और ये भी प्रोटॉन के साथ परमाणु के केंद्र में पाए जाते हैं। जेम्स चैडविक ने 1932 में इनकी खोज की थी।
- नाभिक (Nucleus): परमाणु का केंद्रीय, सघन भाग जहाँ प्रोटॉन और न्यूट्रॉन एक साथ बंधे होते हैं, नाभिक कहलाता है। परमाणु का लगभग सारा द्रव्यमान (mass) इसी नाभिक में केंद्रित होता है।
संक्षेप में, एक परमाणु की मूल संरचना एक छोटे, सघन, धनावेशित नाभिक और उसके चारों ओर चक्कर लगाते ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों से बनी होती है। यही सरल लेकिन शक्तिशाली परमाणु संरचना हमारे चारों ओर के भौतिक जगत का आधार है।
2. परमाणु संरचना के ऐतिहासिक मॉडल (Historical Models of Atomic Structure)
आज हम जो परमाणु संरचना के बारे में जानते हैं, वह किसी एक वैज्ञानिक की देन नहीं है, बल्कि यह सदियों के शोध, प्रयोग और बौद्धिक बहस का परिणाम है। वैज्ञानिकों ने समय-समय पर विभिन्न मॉडल प्रस्तावित किए, जिनमें से प्रत्येक पिछले मॉडल की कमियों को दूर करने और नए प्रयोगात्मक सबूतों को समझाने का प्रयास करता था।
डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (Dalton’s Atomic Theory – 1808)
जॉन डाल्टन, एक अंग्रेज रसायनज्ञ, ने परमाणु के बारे में पहला वैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके सिद्धांत ने रसायन विज्ञान की नींव रखी।
- मुख्य बिंदु (Key Points):
- सभी पदार्थ परमाणुओं नामक बहुत छोटे कणों से बने होते हैं।
- परमाणु अविभाज्य कण होते हैं, जिन्हें रासायनिक अभिक्रिया में न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।
- एक ही तत्व के सभी परमाणुओं का द्रव्यमान और रासायनिक गुण समान होते हैं।
- अलग-अलग तत्वों के परमाणु द्रव्यमान और गुणों में भिन्न होते हैं।
- परमाणु छोटी पूर्ण संख्याओं के अनुपात में मिलकर यौगिक (compounds) बनाते हैं।
- योगदान (Contribution): डाल्टन के सिद्धांत ने पहली बार रासायनिक संयोजन के नियमों (laws of chemical combination) की सफलतापूर्वक व्याख्या की। इसने हमें परमाणु संरचना की यात्रा का शुरुआती बिंदु दिया।
थॉमसन का प्लम पुडिंग मॉडल (Thomson’s Plum Pudding Model – 1904)
इलेक्ट्रॉन की खोज के बाद, जे.जे. थॉमसन ने यह समझाने की कोशिश की कि ये ऋणावेशित कण परमाणु के अंदर कैसे व्यवस्थित होते हैं।
- मॉडल का विवरण (Model Description):
- थॉमसन ने प्रस्तावित किया कि परमाणु एक धनावेशित गोला है, और इलेक्ट्रॉन तरबूज में बीज की तरह या पुडिंग में प्लम की तरह उसमें धंसे हुए हैं।
- परमाणु का धनात्मक और ऋणात्मक आवेश परिमाण में समान होता है, इसलिए परमाणु समग्र रूप से विद्युत उदासीन (electrically neutral) होता है।
- कमियां (Limitations): यह मॉडल रदरफोर्ड के अल्फा-कण प्रकीर्णन प्रयोग के परिणामों की व्याख्या करने में विफल रहा। यह एक स्थिर परमाणु संरचना का वर्णन नहीं कर सका।
रदरफोर्ड का नाभिकीय मॉडल (Rutherford’s Nuclear Model – 1911)
अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने अपने प्रसिद्ध सोने की पन्नी (gold foil) प्रयोग के माध्यम से परमाणु की संरचना के बारे में हमारी समझ में क्रांति ला दी।
- प्रयोग (The Experiment):
- उन्होंने सोने की एक बहुत पतली पन्नी पर धनावेशित अल्फा-कणों की बौछार की।
- उन्होंने पाया कि अधिकांश अल्फा-कण सीधे पन्नी से होकर निकल गए, कुछ कण छोटे कोणों पर विक्षेपित हुए, और बहुत कम (लगभग 20,000 में से 1) 180 डिग्री पर वापस लौट आए।
- निष्कर्ष (Conclusions):
- परमाणु का अधिकांश भाग खाली है, क्योंकि अधिकांश अल्फा-कण बिना विक्षेपित हुए निकल गए।
- परमाणु का संपूर्ण धनावेश और लगभग सारा द्रव्यमान एक बहुत छोटे आयतन में केंद्रित होता है, जिसे उन्होंने नाभिक (nucleus) कहा।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर निश्चित कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। इसलिए इसे ‘ग्रहीय मॉडल’ (planetary model) भी कहा जाता है।
रदरफोर्ड मॉडल के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Pros and Cons of Rutherford’s Model)
सकारात्मक पहलू (Pros)
- इसने पहली बार एक परमाणु में नाभिक के अस्तित्व का प्रस्ताव रखा।
- इसने सफलतापूर्वक समझाया कि परमाणु का अधिकांश भाग क्यों खाली होता है।
- यह परमाणु संरचना की एक स्पष्ट तस्वीर प्रदान करने वाला पहला मॉडल था, जिसमें एक केंद्रीय कोर और परिक्रमा करने वाले इलेक्ट्रॉन थे।
नकारात्मक पहलू (Cons)
- यह परमाणु के स्थायित्व (stability) की व्याख्या नहीं कर सका। मैक्सवेल के विद्युत चुंबकत्व सिद्धांत के अनुसार, कोई भी त्वरित आवेशित कण (जैसे परिक्रमा करता हुआ इलेक्ट्रॉन) ऊर्जा विकीर्ण करेगा और अंततः नाभिक में गिर जाएगा, जिससे परमाणु नष्ट हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है।
- यह तत्वों के रेखीय स्पेक्ट्रम (line spectra) की व्याख्या करने में भी विफल रहा।
रदरफोर्ड के मॉडल ने परमाणु संरचना की समझ में एक बड़ी छलांग लगाई, लेकिन इसकी कमियों ने एक बेहतर मॉडल की आवश्यकता को जन्म दिया।
बोर का मॉडल (Bohr’s Model – 1913)
नील्स बोर ने रदरफोर्ड के मॉडल की कमियों को दूर करने के लिए मैक्स प्लैंक के क्वांटम सिद्धांत का उपयोग किया।
- मुख्य अभिधारणाएं (Key Postulates):
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर केवल कुछ निश्चित वृत्ताकार कक्षाओं में ही घूम सकते हैं, जिन्हें ‘ऊर्जा स्तर’ (energy levels) या ‘कोश’ (shells) कहा जाता है।
- जब तक एक इलेक्ट्रॉन एक निश्चित कक्षा में रहता है, तब तक वह ऊर्जा का विकिरण नहीं करता है। इससे परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या हुई।
- एक इलेक्ट्रॉन ऊर्जा को अवशोषित करके एक निम्न ऊर्जा स्तर से उच्च ऊर्जा स्तर में कूद सकता है, और ऊर्जा उत्सर्जित करके उच्च से निम्न स्तर पर वापस आ सकता है। यह उत्सर्जित ऊर्जा एक विशिष्ट तरंग दैर्ध्य (wavelength) के प्रकाश के रूप में होती है, जो रेखीय स्पेक्ट्रम की व्याख्या करती है।
बोर मॉडल के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Pros and Cons of Bohr’s Model)
सकारात्मक पहलू (Pros)
- इसने सफलतापूर्वक परमाणु के स्थायित्व की व्याख्या की।
- यह हाइड्रोजन और हाइड्रोजन जैसे आयनों (जैसे He+, Li2+) के रेखीय स्पेक्ट्रम की सटीक भविष्यवाणी करने में सफल रहा।
- इसने ऊर्जा स्तरों के परिमाणीकरण (quantization) की अवधारणा पेश की, जो आधुनिक क्वांटम यांत्रिकी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नकारात्मक पहलू (Cons)
- यह मॉडल केवल एक-इलेक्ट्रॉन प्रणालियों पर लागू होता है। यह कई इलेक्ट्रॉनों वाले परमाणुओं के स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सका।
- यह ज़ीमन प्रभाव (Zeeman effect – चुंबकीय क्षेत्र में स्पेक्ट्रमी रेखाओं का विभाजन) और स्टार्क प्रभाव (Stark effect – विद्युत क्षेत्र में विभाजन) की व्याख्या करने में विफल रहा।
- यह इस बात का कोई कारण नहीं बताता कि कोणीय संवेग (angular momentum) क्यों परिमाणित होना चाहिए।
बोर का मॉडल क्लासिकल भौतिकी और क्वांटम भौतिकी के बीच एक पुल था। इसने परमाणु संरचना की हमारी समझ को और परिष्कृत किया, लेकिन यह अंतिम जवाब नहीं था।
3. आधुनिक परमाणु संरचना – क्वांटम मैकेनिकल मॉडल (Modern Atomic Structure – The Quantum Mechanical Model)
20वीं सदी के मध्य में, लुई डी ब्रोग्ली, वर्नर हाइजेनबर्ग और इरविन श्रोडिंगर जैसे वैज्ञानिकों के काम ने परमाणु संरचना के एक पूरी तरह से नए और अधिक सटीक मॉडल को जन्म दिया, जिसे क्वांटम मैकेनिकल मॉडल के रूप में जाना जाता है। यह मॉडल बोर के मॉडल की सीमाओं को पार करता है और इलेक्ट्रॉन के व्यवहार का अधिक यथार्थवादी विवरण प्रदान करता है।
डी ब्रोग्ली की द्वैत प्रकृति की परिकल्पना (De Broglie’s Dual Nature Hypothesis)
लुई डी ब्रोग्ली ने एक क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया कि जिस तरह प्रकाश में कण (फोटॉन) और तरंग दोनों के गुण होते हैं, उसी तरह इलेक्ट्रॉन जैसे गतिमान कणों में भी तरंग गुण होने चाहिए।
- मुख्य विचार (Main Idea): प्रत्येक गतिमान कण के साथ एक तरंग जुड़ी होती है। इस अवधारणा को पदार्थ की द्वैत प्रकृति (dual nature of matter) कहा जाता है।
- महत्व (Significance): इस विचार ने बोर के मॉडल की इस अभिधारणा को समझाया कि इलेक्ट्रॉन केवल निश्चित कक्षाओं में ही क्यों घूम सकते हैं। केवल वे कक्षाएँ ही संभव थीं जिनमें इलेक्ट्रॉन तरंग एक स्थिर तरंग (standing wave) बना सकती थी।
हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धांत (Heisenberg’s Uncertainty Principle)
वर्नर हाइजेनबर्ग ने 1927 में एक मौलिक सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसने बोर के निश्चित कक्षाओं के विचार को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
- सिद्धांत (The Principle): किसी भी गतिमान सूक्ष्म कण (जैसे इलेक्ट्रॉन) की स्थिति (position) और संवेग (momentum) दोनों को एक साथ पूरी सटीकता से निर्धारित करना असंभव है।
- प्रभाव (Implication): इसका मतलब है कि हम कभी भी यह ठीक-ठीक नहीं जान सकते कि एक इलेक्ट्रॉन एक निश्चित समय पर कहाँ है और वह किस रास्ते पर चल रहा है। इसलिए, बोर के मॉडल की तरह इलेक्ट्रॉन के लिए एक निश्चित वृत्ताकार पथ की बात करना निरर्थक है। हम केवल नाभिक के चारों ओर एक विशेष क्षेत्र में इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना (probability) के बारे में बात कर सकते हैं।
श्रोडिंगर का तरंग समीकरण और ऑर्बिटल की अवधारणा (Schrödinger’s Wave Equation and the Concept of Orbitals)
इरविन श्रोडिंगर ने इलेक्ट्रॉन की तरंग प्रकृति के आधार पर एक जटिल गणितीय समीकरण विकसित किया। इस समीकरण के समाधान से हमें क्वांटम संख्याएँ और ऑर्बिटल की अवधारणा मिलती है।
- ऑर्बिटल (Orbital): यह नाभिक के चारों ओर त्रि-आयामी (3D) क्षेत्र है जहाँ एक इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना सबसे अधिक (लगभग 90-95%) होती है। यह बोर की ‘कक्षा’ (orbit) की अवधारणा से बहुत अलग है, जो एक 2D पथ था।
- क्वांटम संख्याएँ (Quantum Numbers): ये चार संख्याओं का एक सेट है जो एक परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा और स्थिति (संभावित स्थान) का वर्णन करती हैं।
- मुख्य क्वांटम संख्या (n): यह ऑर्बिटल के आकार और ऊर्जा स्तर को बताती है (n=1, 2, 3, …)।
- दिगंशी (एज़िमुथल) क्वांटम संख्या (l): यह ऑर्बिटल के आकार (shape) को बताती है (l=0 से n-1 तक)। l=0 (s ऑर्बिटल, गोलाकार), l=1 (p ऑर्बिटल, डंबल के आकार का), l=2 (d ऑर्बिटल, डबल डंबल), आदि।
- चुंबकीय क्वांटम संख्या (m): यह अंतरिक्ष में ऑर्बिटल के अभिविन्यास (orientation) को बताती है (m = -l से +l तक)।
- प्रचक्रण (स्पिन) क्वांटम संख्या (s): यह इलेक्ट्रॉन के आंतरिक कोणीय संवेग या ‘स्पिन’ को बताती है, जो या तो +1/2 (‘अप’) या -1/2 (‘डाउन’) हो सकता है।
क्वांटम मैकेनिकल मॉडल वर्तमान में परमाणु संरचना का सबसे स्वीकृत और व्यापक मॉडल है। यह जटिल है, लेकिन यह प्रयोगात्मक डेटा की एक विशाल श्रृंखला की सफलतापूर्वक व्याख्या करता है और आधुनिक रसायन विज्ञान और भौतिकी का आधार है।
4. परमाणु के मौलिक कण (Fundamental Particles of an Atom)
जैसा कि हमने पहले चर्चा की, परमाणु तीन मुख्य प्रकार के उप-परमाणु कणों से बना है: प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। ये कण मिलकर परमाणु के अद्वितीय गुणों को परिभाषित करते हैं। आइए, इनमें से प्रत्येक को और अधिक विस्तार से समझें।
इलेक्ट्रॉन (Electron)
इलेक्ट्रॉन परमाणु का सबसे हल्का और सबसे बाहरी घटक है, जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- खोजकर्ता (Discoverer): जे.जे. थॉमसन (1897)।
- आवेश (Charge): ऋणात्मक (-1.602 x 10-19 कूलम्ब)। इसे सापेक्ष इकाई में -1 माना जाता है।
- द्रव्यमान (Mass): 9.109 x 10-31 किलोग्राम। यह प्रोटॉन के द्रव्यमान का लगभग 1/1837वां हिस्सा है, इसलिए इसे लगभग नगण्य माना जाता है।
- स्थान (Location): नाभिक के चारों ओर विशिष्ट ऊर्जा स्तरों या ऑर्बिटल्स में पाया जाता है।
- भूमिका (Role): इलेक्ट्रॉन रासायनिक बंधन (chemical bonding) बनाने और तोड़ने के लिए जिम्मेदार होते हैं। किसी परमाणु द्वारा इलेक्ट्रॉनों का खोना, पाना या साझा करना ही रासायनिक अभिक्रियाओं का आधार है। यही सही परमाणु संरचना की समझ को महत्वपूर्ण बनाता है।
प्रोटॉन (Proton)
प्रोटॉन परमाणु के नाभिक में पाए जाने वाले धनावेशित कण हैं और किसी तत्व की पहचान को परिभाषित करते हैं।
- खोजकर्ता (Discoverer): अर्नेस्ट रदरफोर्ड (1919)।
- आवेश (Charge): धनात्मक (+1.602 x 10-19 कूलम्ब)। इसे सापेक्ष इकाई में +1 माना जाता है।
- द्रव्यमान (Mass): 1.672 x 10-27 किलोग्राम।
- स्थान (Location): परमाणु के नाभिक (nucleus) के अंदर।
- भूमिका (Role): किसी परमाणु में प्रोटॉनों की संख्या उसकी परमाणु संख्या (atomic number) कहलाती है और यही तय करती है कि वह कौन सा तत्व है। उदाहरण के लिए, 6 प्रोटॉन वाला प्रत्येक परमाणु कार्बन है, और 8 प्रोटॉन वाला प्रत्येक परमाणु ऑक्सीजन है।
न्यूट्रॉन (Neutron)
न्यूट्रॉन उदासीन कण हैं जो नाभिक में प्रोटॉनों के साथ पाए जाते हैं और परमाणु के द्रव्यमान में योगदान करते हैं।
- खोजकर्ता (Discoverer): जेम्स चैडविक (1932)।
- आवेश (Charge): शून्य (0)। यह विद्युत रूप से उदासीन होता है।
- द्रव्यमान (Mass): 1.674 x 10-27 किलोग्राम। यह प्रोटॉन के द्रव्यमान से थोड़ा अधिक है।
- स्थान (Location): परमाणु के नाभिक के अंदर।
- भूमिका (Role): न्यूट्रॉन नाभिक को एक साथ बांधे रखने में मदद करते हैं। धनावेशित प्रोटॉन एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (repel) करते हैं; न्यूट्रॉन इस प्रतिकर्षण बल को संतुलित करने के लिए मजबूत नाभिकीय बल (strong nuclear force) प्रदान करते हैं, जिससे नाभिक स्थिर रहता है। न्यूट्रॉनों की संख्या बदलने से समस्थानिक (isotopes) बनते हैं। एक अच्छी परमाणु संरचना में इन सभी कणों का संतुलन होता है।
5. परमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्या (Atomic Number and Mass Number)
आवर्त सारणी (periodic table) में प्रत्येक तत्व को दो महत्वपूर्ण संख्याओं द्वारा विशिष्ट रूप से पहचाना जाता है: परमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्या। ये संख्याएँ हमें किसी भी परमाणु की परमाणु संरचना के बारे में मौलिक जानकारी देती हैं।
परमाणु संख्या (Z) – (Atomic Number)
परमाणु संख्या किसी तत्व की सबसे मौलिक पहचान है। यह हमें बताती है कि हम किस तत्व के साथ काम कर रहे हैं।
- परिभाषा (Definition): किसी परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों की कुल संख्या को उसकी परमाणु संख्या कहते हैं। इसे ‘Z’ प्रतीक से दर्शाया जाता है।
- महत्व (Significance): चूंकि प्रत्येक तत्व में प्रोटॉनों की एक अद्वितीय संख्या होती है, इसलिए परमाणु संख्या उस तत्व की पहचान होती है। उदाहरण के लिए, Z=1 हाइड्रोजन के लिए, Z=6 कार्बन के लिए, और Z=92 यूरेनियम के लिए है।
- उदासीन परमाणु (Neutral Atom): एक विद्युत रूप से उदासीन परमाणु में, इलेक्ट्रॉनों की संख्या हमेशा प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है। इसलिए, Z हमें उदासीन परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या भी बताता है।
द्रव्यमान संख्या (A) – (Mass Number)
द्रव्यमान संख्या हमें परमाणु के नाभिक के कुल द्रव्यमान का अनुमान देती है, क्योंकि इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान लगभग नगण्य होता है।
- परिभाषा (Definition): किसी परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या के योग को उसकी द्रव्यमान संख्या कहते हैं। इसे ‘A’ प्रतीक से दर्शाया जाता है।
- सूत्र (Formula): द्रव्यमान संख्या (A) = प्रोटॉनों की संख्या (Z) + न्यूट्रॉनों की संख्या (N)
- प्रतिनिधित्व (Representation): किसी तत्व (X) को आमतौर पर इस प्रकार दर्शाया जाता है: AZX। उदाहरण के लिए, कार्बन का एक समस्थानिक 126C के रूप में लिखा जाता है, जिसका अर्थ है कि इसमें 6 प्रोटॉन और 12 – 6 = 6 न्यूट्रॉन हैं।
न्यूट्रॉनों की संख्या की गणना कैसे करें (How to Calculate the Number of Neutrons)
उपरोक्त सूत्र का उपयोग करके, हम किसी भी परमाणु में न्यूट्रॉनों की संख्या की गणना आसानी से कर सकते हैं।
- गणना (Calculation): न्यूट्रॉनों की संख्या (N) = द्रव्यमान संख्या (A) – परमाणु संख्या (Z)
- उदाहरण (Example): यूरेनियम के एक समस्थानिक (23592U) पर विचार करें।
- परमाणु संख्या (Z) = 92 (इसलिए 92 प्रोटॉन हैं)
- द्रव्यमान संख्या (A) = 235
- न्यूट्रॉनों की संख्या (N) = A – Z = 235 – 92 = 143
- अतः, यूरेनियम-235 के एक परमाणु में 92 प्रोटॉन, 92 इलेक्ट्रॉन (यदि उदासीन है), और 143 न्यूट्रॉन होते हैं। यह गणना परमाणु संरचना की समझ के लिए मौलिक है।
परमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्या को समझना किसी भी तत्व की रासायनिक और भौतिक विशेषताओं को समझने की कुंजी है।
6. समस्थानिक, समभारिक और समन्यूट्रॉनिक (Isotopes, Isobars, and Isotones)
सभी एक ही तत्व के परमाणु बिल्कुल समान नहीं होते हैं। उनमें न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न हो सकती है। इसी तरह, अलग-अलग तत्वों के परमाणुओं में कुछ समानताएँ हो सकती हैं। इन संबंधों को समझने के लिए समस्थानिक, समभारिक और समन्यूट्रॉनिक की अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं।
समस्थानिक (Isotopes)
समस्थानिक एक ही तत्व के विभिन्न रूप हैं। ‘आइसोटोप’ शब्द का अर्थ है ‘समान स्थान’, जो आवर्त सारणी में उनके समान स्थान को संदर्भित करता है।
- परिभाषा (Definition): एक ही तत्व के वे परमाणु जिनकी परमाणु संख्या (Z) समान होती है, लेकिन द्रव्यमान संख्या (A) भिन्न होती है, समस्थानिक कहलाते हैं।
- कारण (Reason): इनमें प्रोटॉनों की संख्या समान होती है, लेकिन न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है।
- गुण (Properties):
- चूंकि प्रोटॉनों (और इलेक्ट्रॉनों) की संख्या समान होती है, इसलिए समस्थानिकों के रासायनिक गुण लगभग समान होते हैं।
- चूंकि न्यूट्रॉनों की संख्या भिन्न होती है, इसलिए उनके भौतिक गुण (जैसे घनत्व, क्वथनांक) और नाभिकीय गुण (जैसे रेडियोधर्मिता) भिन्न हो सकते हैं।
- उदाहरण (Example): हाइड्रोजन के तीन प्रसिद्ध समस्थानिक हैं:
- प्रोटियम (1H): 1 प्रोटॉन, 0 न्यूट्रॉन
- ड्यूटेरियम (2H या D): 1 प्रोटॉन, 1 न्यूट्रॉन (भारी हाइड्रोजन)
- ट्राइटियम (3H या T): 1 प्रोटॉन, 2 न्यूट्रॉन (रेडियोधर्मी)
समभारिक (Isobars)
समभारिक विभिन्न तत्वों के परमाणु होते हैं जिनका द्रव्यमान समान होता है। ‘आइसोबार’ का अर्थ है ‘समान भार’।
- परिभाषा (Definition): विभिन्न तत्वों के वे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या (A) समान होती है, लेकिन परमाणु संख्या (Z) भिन्न होती है, समभारिक कहलाते हैं।
- कारण (Reason): इनमें प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या समान होती है, लेकिन प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की व्यक्तिगत संख्या भिन्न होती है।
- गुण (Properties):
- चूंकि परमाणु संख्या भिन्न होती है, इसलिए समभारिक पूरी तरह से अलग-अलग तत्व होते हैं जिनके रासायनिक गुण पूरी तरह से भिन्न होते हैं।
- उदाहरण (Example):
- 4018Ar (आर्गन) और 4020Ca (कैल्शियम) समभारिक हैं। दोनों की द्रव्यमान संख्या 40 है, लेकिन आर्गन में 18 प्रोटॉन और 22 न्यूट्रॉन हैं, जबकि कैल्शियम में 20 प्रोटॉन और 20 न्यूट्रॉन हैं।
समन्यूट्रॉनिक (Isotones)
समन्यूट्रॉनिक विभिन्न तत्वों के परमाणु होते हैं जिनमें न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है।
- परिभाषा (Definition): विभिन्न तत्वों के वे परमाणु जिनमें न्यूट्रॉनों की संख्या (N) समान होती है, समन्यूट्रॉनिक कहलाते हैं।
- गुण (Properties): समभारिकों की तरह, ये भी अलग-अलग तत्व होते हैं और इनके रासायनिक गुण पूरी तरह से भिन्न होते हैं। इनकी परमाणु संरचना में केवल न्यूट्रॉनों की संख्या समान होती है।
- उदाहरण (Example):
- 146C (कार्बन-14) और 168O (ऑक्सीजन-16) समन्यूट्रॉनिक हैं। कार्बन-14 में N = 14 – 6 = 8 न्यूट्रॉन हैं, और ऑक्सीजन-16 में N = 16 – 8 = 8 न्यूट्रॉन हैं। दोनों में 8 न्यूट्रॉन हैं।
इन अवधारणाओं को समझना नाभिकीय रसायन विज्ञान (nuclear chemistry) और भौतिकी में अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर जब रेडियोधर्मी क्षय और नाभिकीय प्रतिक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
7. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और संयोजकता (Electronic Configuration and Valency)
किसी परमाणु के रासायनिक व्यवहार को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उसके इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर कैसे व्यवस्थित होते हैं। इलेक्ट्रॉनों की इस व्यवस्था को इलेक्ट्रॉनिक विन्यास कहा जाता है। यह विन्यास कुछ नियमों द्वारा नियंत्रित होता है और सीधे तौर पर एक तत्व की संयोजकता, यानी उसकी संयोजन क्षमता को निर्धारित करता है।
इलेक्ट्रॉनों को भरने के नियम (Rules for Filling Electrons)
इलेक्ट्रॉन यादृच्छिक रूप से ऑर्बिटल्स में नहीं भरते हैं। वे कुछ सिद्धांतों का पालन करते हैं जो परमाणु की सबसे स्थिर, निम्नतम-ऊर्जा अवस्था सुनिश्चित करते हैं।
- ऑफबाऊ सिद्धांत (Aufbau Principle):
- जर्मन में ‘Aufbau’ का अर्थ है ‘निर्माण’। यह सिद्धांत कहता है कि इलेक्ट्रॉन सबसे पहले सबसे कम ऊर्जा वाले ऑर्बिटल में प्रवेश करते हैं। एक बार जब वह ऑर्बिटल भर जाता है, तो इलेक्ट्रॉन अगले उच्च ऊर्जा वाले ऑर्बिटल में प्रवेश करते हैं।
- ऑर्बिटल्स की ऊर्जा का क्रम आम तौर पर होता है: 1s, 2s, 2p, 3s, 3p, 4s, 3d, 4p, …
- पॉली का अपवर्जन सिद्धांत (Pauli Exclusion Principle):
- यह सिद्धांत कहता है कि किसी भी परमाणु में किन्हीं भी दो इलेक्ट्रॉनों की चारों क्वांटम संख्याएँ (n, l, m, s) समान नहीं हो सकती हैं।
- इसका एक सीधा परिणाम यह है कि एक ऑर्बिटल में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन ही रह सकते हैं, और उनके स्पिन विपरीत (एक +1/2, दूसरा -1/2) होने चाहिए।
- हुंड का अधिकतम बहुलता का नियम (Hund’s Rule of Maximum Multiplicity):
- यह नियम समान ऊर्जा वाले ऑर्बिटल्स (जैसे p, d, या f ऑर्बिटल्स) में इलेक्ट्रॉनों के भरने से संबंधित है।
- नियम कहता है कि इन ऑर्बिटल्स में इलेक्ट्रॉनों का युग्मन (pairing) तब तक शुरू नहीं होता जब तक कि प्रत्येक ऑर्बिटल में एक-एक इलेक्ट्रॉन न भर जाए, और इन अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों का स्पिन समान (समानांतर) होता है।
इन नियमों का पालन करते हुए, हम किसी भी तत्व का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिख सकते हैं। उदाहरण के लिए, ऑक्सीजन (Z=8) का विन्यास 1s2 2s2 2p4 होगा।
संयोजकता की अवधारणा (Concept of Valency)
संयोजकता एक तत्व के रासायनिक व्यवहार का दिल है। यह हमें बताता है कि एक परमाणु दूसरे परमाणुओं के साथ कितने बंधन बना सकता है।
- परिभाषा (Definition): किसी तत्व की संयोजकता उसके परमाणु के सबसे बाहरी कोश (valence shell) में मौजूद इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है। यह एक स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (आमतौर पर बाहरी कोश में 8 इलेक्ट्रॉन, जिसे अष्टक नियम कहते हैं) प्राप्त करने के लिए किसी परमाणु द्वारा खोए, प्राप्त किए गए या साझा किए गए इलेक्ट्रॉनों की संख्या है।
- संयोजी इलेक्ट्रॉन (Valence Electrons): किसी परमाणु के सबसे बाहरी ऊर्जा कोश में मौजूद इलेक्ट्रॉनों को संयोजी इलेक्ट्रॉन कहा जाता है। यही वे इलेक्ट्रॉन हैं जो रासायनिक प्रतिक्रियाओं में भाग लेते हैं।
- संयोजकता का निर्धारण (Determining Valency):
- यदि संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या 1, 2, 3 या 4 है, तो संयोजकता आमतौर पर उन इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है (जैसे, सोडियम के बाहरी कोश में 1 इलेक्ट्रॉन है, संयोजकता 1 है)।
- यदि संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या 5, 6 या 7 है, तो संयोजकता आमतौर पर 8 में से उस संख्या को घटाकर प्राप्त की जाती है (जैसे, ऑक्सीजन के बाहरी कोश में 6 इलेक्ट्रॉन हैं, संयोजकता 8 – 6 = 2 है)।
परमाणु संरचना, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, यह समझने के लिए आधार प्रदान करती है कि तत्व क्यों और कैसे मिलकर यौगिक बनाते हैं, जिससे हमारे चारों ओर की दुनिया का निर्माण होता है।
8. दैनिक जीवन में परमाणु संरचना का महत्व (Importance of Atomic Structure in Daily Life)
परमाणु संरचना केवल एक अकादमिक अवधारणा नहीं है; यह हमारे दैनिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है। चिकित्सा से लेकर प्रौद्योगिकी तक, और ऊर्जा से लेकर पर्यावरण तक, परमाणु की समझ ने मानवता के लिए अनगिनत दरवाजे खोले हैं।
चिकित्सा और स्वास्थ्य (Medicine and Health)
परमाणु और नाभिकीय भौतिकी ने चिकित्सा निदान और उपचार में क्रांति ला दी है।
- एक्स-रे (X-rays): जब उच्च-ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन किसी धातु के लक्ष्य से टकराते हैं, तो वे एक्स-रे उत्पन्न करते हैं। इन किरणों का उपयोग शरीर के अंदर की हड्डियों और ऊतकों की छवियां बनाने के लिए किया जाता है, जिससे डॉक्टरों को फ्रैक्चर और बीमारियों का निदान करने में मदद मिलती है।
- एमआरआई (MRI – Magnetic Resonance Imaging): यह तकनीक शरीर में मौजूद हाइड्रोजन परमाणुओं (मुख्य रूप से पानी में) के नाभिक के चुंबकीय गुणों का उपयोग करती है। यह शरीर के कोमल ऊतकों की विस्तृत छवियां बनाने के लिए एक शक्तिशाली और सुरक्षित तरीका है।
- रेडियोथेरेपी (Radiotherapy): कोबाल्ट-60 जैसे रेडियोधर्मी समस्थानिकों से निकलने वाले गामा विकिरण का उपयोग कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
ऊर्जा उत्पादन (Energy Production)
परमाणु के नाभिक में संग्रहीत विशाल ऊर्जा का उपयोग बिजली पैदा करने के लिए किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा के अपने फायदे और नुकसान हैं। अधिक जानकारी के लिए आप भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग की वेबसाइट देख सकते हैं।
परमाणु ऊर्जा के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू (Pros and Cons of Nuclear Energy)
सकारात्मक पहलू (Pros)
- स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy): परमाणु ऊर्जा संयंत्र ग्रीनहाउस गैसों (जैसे CO2) का उत्सर्जन नहीं करते हैं, जिससे यह जलवायु परिवर्तन से लड़ने में एक महत्वपूर्ण उपकरण बन जाता है।
- उच्च ऊर्जा घनत्व (High Energy Density): यूरेनियम की एक छोटी मात्रा कोयले या तेल की बहुत बड़ी मात्रा की तुलना में बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर सकती है।
- विश्वसनीयता (Reliability): सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, परमाणु ऊर्जा संयंत्र 24/7 लगातार बिजली प्रदान कर सकते हैं।
नकारात्मक पहलू (Cons)
- परमाणु कचरा (Nuclear Waste): प्रयुक्त परमाणु ईंधन अत्यधिक रेडियोधर्मी होता है और इसे हजारों वर्षों तक सुरक्षित रूप से संग्रहित करने की आवश्यकता होती है, जो एक बड़ी तकनीकी और नैतिक चुनौती है।
- दुर्घटना का जोखिम (Risk of Accidents): हालांकि दुर्लभ, चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं के विनाशकारी मानवीय और पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं।
- उच्च प्रारंभिक लागत (High Initial Cost): परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण बहुत महंगा होता है और इसमें लंबा समय लगता है।
प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स (Technology and Electronics)
हमारे स्मार्टफोन, कंप्यूटर और लगभग सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण परमाणु संरचना की हमारी समझ पर आधारित हैं।
- अर्धचालक (Semiconductors): सिलिकॉन जैसे तत्वों की परमाणु संरचना और इलेक्ट्रॉनिक गुणों को समझकर, वैज्ञानिक अर्धचालक बनाने में सक्षम हुए। ये ट्रांजिस्टर और माइक्रोचिप्स के निर्माण खंड हैं, जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स की रीढ़ हैं।
- लेजर (Lasers): लेजर इस सिद्धांत पर काम करते हैं कि जब इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर पर जाते हैं तो वे एक विशिष्ट तरंग दैर्ध्य का प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। इनका उपयोग सीडी प्लेयर से लेकर सर्जरी तक हर चीज में होता है।
रसायन विज्ञान और सामग्री विज्ञान (Chemistry and Materials Science)
परमाणु संरचना की समझ के बिना रसायन विज्ञान का अस्तित्व ही नहीं होता।
- रासायनिक अभिक्रियाएँ (Chemical Reactions): यह हमें बताता है कि परमाणु कैसे बंधन बनाते हैं, जिससे हम नई दवाएं, प्लास्टिक, उर्वरक और अनगिनत अन्य उत्पाद बना सकते हैं।
- नई सामग्री (New Materials): परमाणुओं को विशिष्ट संरचनाओं में व्यवस्थित करके, वैज्ञानिक अद्वितीय गुणों वाली नई सामग्री बना सकते हैं, जैसे सुपरकंडक्टर्स, हल्के मिश्र धातु और उन्नत पॉलिमर।
स्पष्ट रूप से, परमाणु संरचना का अध्ययन केवल एक सैद्धांतिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह उस दुनिया को आकार देने की कुंजी है जिसमें हम रहते हैं।
9. निष्कर्ष (Conclusion)
रेत के एक कण से शुरू हुई हमारी यात्रा हमें परमाणु के गहरे रहस्यों तक ले गई है। हमने देखा कि कैसे डाल्टन के सरल, अविभाज्य गोले के विचार से लेकर श्रोडिंगर के जटिल संभाव्यता बादलों तक, परमाणु संरचना की हमारी समझ विकसित हुई है। यह यात्रा मानव जिज्ञासा और वैज्ञानिक पद्धति की शक्ति का एक प्रमाण है। प्रत्येक मॉडल, भले ही बाद में अपूर्ण पाया गया हो, ने हमारी समझ की नींव में एक महत्वपूर्ण पत्थर रखा।
हमने सीखा कि एक परमाणु तीन मूलभूत कणों – प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन – से बना है, जिनकी व्यवस्था और संख्या एक तत्व के सभी गुणों को निर्धारित करती है। प्रोटॉन तत्व की पहचान तय करते हैं, न्यूट्रॉन नाभिक को स्थिर करते हैं, और इलेक्ट्रॉन रासायनिक प्रतिक्रियाओं की दुनिया पर शासन करते हैं। परमाणु संरचना को समझना केवल रसायन विज्ञान या भौतिकी के छात्रों के लिए ही नहीं, बल्कि हर किसी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें हमारे चारों ओर की दुनिया की कार्यप्रणाली को समझने में मदद करता है।
चिकित्सा में जीवन रक्षक तकनीकों से लेकर हमारे घरों को रोशन करने वाली ऊर्जा तक, परमाणु संरचना का ज्ञान हमारे समाज की आधारशिला है। यह हमें नई सामग्री बनाने, ब्रह्मांड के रहस्यों का पता लगाने और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देता है। परमाणु की दुनिया छोटी हो सकती है, लेकिन इसका प्रभाव असीम है। जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ेगा, निस्संदेह हम परमाणु संरचना के और भी गहरे रहस्यों को उजागर करेंगे, जिससे नई और रोमांचक संभावनाओं के द्वार खुलेंगे।
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: परमाणु उदासीन क्यों होता है? (Why is an atom electrically neutral?)
एक परमाणु विद्युत रूप से उदासीन होता है क्योंकि उसमें धनावेशित प्रोटॉनों की संख्या ऋणावेशित इलेक्ट्रॉनों की संख्या के बराबर होती है। प्रत्येक प्रोटॉन पर +1 का सापेक्ष आवेश होता है और प्रत्येक इलेक्ट्रॉन पर -1 का सापेक्ष आवेश होता है। जब इनकी संख्या बराबर होती है, तो कुल आवेश (+Z) + (-Z) = 0 हो जाता है, जिससे परमाणु पर कोई शुद्ध आवेश नहीं रहता।
प्रश्न 2: बोर के मॉडल और क्वांटम मैकेनिकल मॉडल में मुख्य अंतर क्या है? (What is the main difference between Bohr’s model and the Quantum Mechanical model?)
मुख्य अंतर इलेक्ट्रॉन की स्थिति का वर्णन करने के तरीके में है। बोर का मॉडल इलेक्ट्रॉन को एक निश्चित, 2D वृत्ताकार पथ या ‘कक्षा’ (orbit) में नाभिक के चारों ओर घूमता हुआ मानता है। इसके विपरीत, क्वांटम मैकेनिकल मॉडल कहता है कि हम इलेक्ट्रॉन के सटीक पथ को नहीं जान सकते (हाइजेनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत)। यह नाभिक के चारों ओर एक 3D क्षेत्र का वर्णन करता है जिसे ‘ऑर्बिटल’ (orbital) कहा जाता है, जहाँ इलेक्ट्रॉन के पाए जाने की संभावना सबसे अधिक होती है।
प्रश्न 3: परमाणु संख्या और द्रव्यमान संख्या में क्या अंतर है? (What is the difference between atomic number and mass number?)
परमाणु संख्या (Z) किसी परमाणु के नाभिक में केवल प्रोटॉनों की संख्या होती है और यह उस तत्व की पहचान होती है। वहीं, द्रव्यमान संख्या (A) नाभिक में प्रोटॉनों और न्यूट्रॉनों की कुल संख्या का योग होती है। परमाणु संख्या अद्वितीय होती है, जबकि एक ही तत्व के विभिन्न समस्थानिकों (isotopes) की द्रव्यमान संख्या भिन्न हो सकती है।
प्रश्न 4: संयोजी इलेक्ट्रॉन क्या हैं और वे महत्वपूर्ण क्यों हैं? (What are valence electrons and why are they important?)
संयोजी इलेक्ट्रॉन वे इलेक्ट्रॉन होते हैं जो किसी परमाणु के सबसे बाहरी ऊर्जा कोश (valence shell) में मौजूद होते हैं। वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे रासायनिक प्रतिक्रियाओं और रासायनिक बंधनों के निर्माण में सीधे भाग लेते हैं। किसी तत्व की रासायनिक प्रकृति, जैसे कि उसकी संयोजकता और वह अन्य तत्वों के साथ कैसे प्रतिक्रिया करेगा, काफी हद तक उसके संयोजी इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करती है।
प्रश्न 5: क्या परमाणु को विभाजित किया जा सकता है? (Can an atom be divided?)
हाँ, हालांकि ‘एटम’ शब्द का मूल अर्थ ‘अविभाज्य’ है, अब हम जानते हैं कि परमाणुओं को विभाजित किया जा सकता है। यह प्रक्रिया, जिसे नाभिकीय विखंडन (nuclear fission) कहा जाता है, में एक भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम-235) के नाभिक को न्यूट्रॉन से टकराकर छोटे नाभिकों में तोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है, जिसका उपयोग परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और परमाणु हथियारों में किया जाता है। अधिक जानकारी के लिए, आप विकिपीडिया पर परमाणु के बारे में पढ़ सकते हैं।

