भारत के जल स्रोत: प्रमुख नदियाँ, झीलें, और भूमिगत जल का विस्तृत अवलोकन
भारत के जल स्रोत: प्रमुख नदियाँ, झीलें, और भूमिगत जल का विस्तृत अवलोकन

भारत के जल स्रोत: प्रमुख नदियाँ, झीलें, और भूमिगत जल का विस्तृत अवलोकन

विषय सूची (Table of Contents)

1. परिचय: भारत के जल स्रोतों का महत्व

जल: जीवन का आधार

जल पृथ्वी पर जीवन का सबसे मौलिक और आवश्यक तत्व है। भारत, अपनी विशाल जनसंख्या और विविध भौगोलिक संरचना के साथ, जल संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर है। यह न केवल पीने, स्वच्छता और घरेलू उपयोग के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि कृषि, उद्योग, ऊर्जा उत्पादन और पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए भी अनिवार्य है। भारत के जल स्रोत देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास की रीढ़ हैं, इसलिए उनका अध्ययन और संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत की भौगोलिक विविधता और जल स्रोत

भारत की भौगोलिक विविधता इसके जल स्रोतों में भी झलकती है। उत्तर में हिमालय के विशाल ग्लेशियरों से निकलने वाली सदानीरा नदियाँ, दक्षिण के पठारों पर बहने वाली मौसमी नदियाँ, विशाल तटीय क्षेत्र, और भूमि के नीचे छिपे भूमिगत जल के भंडार, ये सभी मिलकर भारत की जल संपदा का निर्माण करते हैं। मानसूनी जलवायु इन स्रोतों को भरने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन यह वर्षा का असमान वितरण भी पैदा करती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में बाढ़ और कुछ में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

छात्रों के लिए जल स्रोतों का अध्ययन

एक छात्र के दृष्टिकोण से, भारत के जल स्रोतों को समझना न केवल भूगोल के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण और भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी दर्शाता है। यह ज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि पानी कहाँ से आता है, इसका उपयोग कैसे होता है, और हम इसके संरक्षण में कैसे योगदान दे सकते हैं। इस लेख में, हम भारत के प्रमुख जल स्रोतों – नदियों, झीलों, और भूमिगत जल – का एक विस्तृत और गहन अवलोकन करेंगे।

2. भारत में जल स्रोतों का वर्गीकरण

जल स्रोतों के मुख्य प्रकार

भारत के जल संसाधनों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहला है सतही जल (Surface Water), जो हमें नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों के रूप में दिखाई देता है। दूसरा है भूमिगत जल (Groundwater), जो पृथ्वी की सतह के नीचे चट्टानों और मिट्टी की परतों में संग्रहीत होता है। ये दोनों स्रोत एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मिलकर जल चक्र (Water Cycle) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।

सतही जल (Surface Water)

सतही जल भारत में जल आपूर्ति का सबसे प्रमुख स्रोत है, खासकर कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए। इसमें देश भर में फैला नदियों का विशाल नेटवर्क शामिल है, जो हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार से निकलती हैं। इसके अलावा, प्राकृतिक और मानव निर्मित झीलें और जलाशय भी सतही जल के महत्वपूर्ण भंडार हैं, जो सिंचाई, पीने के पानी और बिजली उत्पादन में मदद करते हैं। भारत में औसत वार्षिक सतही जल उपलब्धता लगभग 1,869 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) अनुमानित है।

भूमिगत जल (Groundwater)

भूमिगत जल भारत की पेयजल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण आधार है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। देश की लगभग 85% ग्रामीण और 50% शहरी जल आपूर्ति भूमिगत जल पर निर्भर है। यह सिंचाई के लिए भी एक विश्वसनीय स्रोत माना जाता है क्योंकि यह सूखे के समय भी उपलब्ध रहता है। हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में इसके अत्यधिक दोहन से जल स्तर में भारी गिरावट आई है, जो एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

3. भारत की प्रमुख नदी प्रणालियाँ: हिमालयी नदियाँ

हिमालयी नदियों की विशेषताएँ

हिमालय से निकलने वाली नदियाँ अपनी कुछ विशिष्ट विशेषताओं के लिए जानी जाती हैं। ये नदियाँ सदानीरा (Perennial) होती हैं, जिसका अर्थ है कि इनमें साल भर पानी रहता है। इसका कारण यह है कि इन्हें न केवल मानसून की वर्षा से, बल्कि गर्मियों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से भी जल प्राप्त होता है। ये नदियाँ अपने उद्गम से समुद्र तक एक लंबा मार्ग तय करती हैं और अपने साथ भारी मात्रा में गाद (silt) और तलछट लाती हैं, जो उत्तरी मैदानों को उपजाऊ बनाती हैं।

3.1 गंगा नदी प्रणाली: भारत की जीवन रेखा

गंगा का उद्गम और मार्ग

गंगा नदी, जिसे भारत की सबसे पवित्र नदी माना जाता है, का उद्गम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री ग्लेशियर के पास गोमुख नामक स्थान से होता है। यहाँ इसे भागीरथी के नाम से जाना जाता है। देवप्रयाग में जब भागीरथी और अलकनंदा नदियाँ मिलती हैं, तो संयुक्त धारा को ‘गंगा’ कहा जाता है। गंगा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, और पश्चिम बंगाल से होकर बहती हुई बांग्लादेश में प्रवेश करती है और अंत में बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 2,525 किलोमीटर है।

गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ

गंगा नदी प्रणाली भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है। इसकी कई महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं जो इसके विशाल बेसिन का निर्माण करती हैं। उत्तर से मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियों में रामगंगा, गोमती, घाघरा, गंडक और कोसी शामिल हैं। दक्षिण के पठार से आकर गंगा में मिलने वाली प्रमुख नदियों में यमुना, सोन, चंबल और बेतवा हैं। यमुना इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी है जो प्रयागराज (इलाहाबाद) में गंगा से मिलती है।

सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व

गंगा नदी का भारत में अत्यधिक सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक महत्व है। इसके तट पर हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और पटना जैसे कई पवित्र शहर बसे हुए हैं। यह करोड़ों लोगों को पीने का पानी और सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराती है, जिससे यह उत्तरी भारत के कृषि आधारित जीवन का आधार बनती है। हालाँकि, बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण गंगा नदी गंभीर प्रदूषण की समस्या का सामना कर रही है, जिसके समाधान के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं।

3.2 यमुना नदी: गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी

यमुना का स्रोत और यात्रा

यमुना नदी का उद्गम उत्तराखंड में बंदरपूँछ चोटी पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर से होता है। यह गंगा की सबसे लंबी और महत्वपूर्ण सहायक नदी है। अपनी यात्रा के दौरान, यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश राज्यों से होकर गुजरती है। अंत में, यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर गंगा नदी में विलीन हो जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 1,376 किलोमीटर है।

यमुना की सहायक नदियाँ

यमुना नदी की भी अपनी एक महत्वपूर्ण नदी प्रणाली है, जिसमें कई सहायक नदियाँ शामिल हैं। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में चंबल, सिंध, बेतवा और केन शामिल हैं, जो प्रायद्वीपीय पठार से निकलकर इसके दाहिने किनारे पर मिलती हैं। ये नदियाँ मालवा क्षेत्र के पानी को यमुना तक लाती हैं। इसके बाएं किनारे पर मिलने वाली सहायक नदियों में हिंडन, टोंस और सेंगर प्रमुख हैं।

प्रदूषण की गंभीर चुनौती

यमुना नदी भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है, खासकर दिल्ली और आगरा जैसे बड़े शहरों से गुजरने के बाद। इसमें औद्योगिक कचरा, अनुपचारित सीवेज और कृषि अपवाह सीधे डाल दिए जाते हैं, जिससे इसका पानी जहरीला हो गया है। दिल्ली में वजीराबाद बैराज के बाद नदी लगभग एक ‘मृत’ नाले में बदल जाती है। यमुना की सफाई के लिए कई योजनाएँ बनाई गई हैं, लेकिन अभी भी स्थिति गंभीर बनी हुई है।

3.3 ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली: वेग और विस्तार

ब्रह्मपुत्र का तिब्बत से भारत तक का सफर

ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रृंखला के पास चेमायुंगडुंग ग्लेशियर से होता है। तिब्बत में इसे ‘सांगपो’ (Tsangpo) के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है ‘शोधक’। यह तिब्बत के शुष्क पठार पर पूर्व की ओर बहती है और नामचा बरवा पर्वत के पास एक गहरा गॉर्ज बनाते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल में इसे ‘दिहांग’ या ‘सियांग’ कहा जाता है।

असम में ब्रह्मपुत्र का स्वरूप

जब दिहांग नदी असम की घाटी में प्रवेश करती है और इसमें दिबांग और लोहित जैसी अन्य प्रमुख नदियाँ मिलती हैं, तो इसे ‘ब्रह्मपुत्र’ के नाम से जाना जाता है। असम में यह नदी बहुत चौड़ी हो जाती है और कई नदीय द्वीपों का निर्माण करती है, जिनमें माजुली दुनिया का सबसे बड़ा नदीय द्वीप है। ब्रह्मपुत्र अपनी बाढ़ और मार्ग परिवर्तन की प्रवृत्ति के लिए जानी जाती है, जो हर साल असम में भारी तबाही का कारण बनती है।

बांग्लादेश में प्रवेश और विलय

असम से बहने के बाद, ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश में प्रवेश करती है जहाँ इसे ‘जमुना’ कहा जाता है। बांग्लादेश में यह पहले गंगा (जिसे वहाँ ‘पद्मा’ कहा जाता है) से मिलती है और फिर मेघना नदी से मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा, सुंदरबन डेल्टा, बनाती हुई बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 2,900 किलोमीटर है, हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा भारत के बाहर है।

3.4 सिंधु नदी प्रणाली: एक ऐतिहासिक धारा

सिंधु नदी का उद्गम और मार्ग

सिंधु नदी, जिसके नाम पर ‘इंडिया’ का नाम पड़ा, दुनिया की महानतम नदियों में से एक है। इसका उद्गम तिब्बत में कैलाश पर्वत श्रृंखला में बोखार चू ग्लेशियर के पास से होता है। यह लद्दाख में दमचोक के पास भारत में प्रवेश करती है और लद्दाख और जास्कर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक मनोरम घाटी से होकर बहती है। लेह शहर इसके तट पर बसा हुआ है। भारत में बहने के बाद यह पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अरब सागर में मिल जाती है।

पंचनद: सिंधु की पाँच सहायक नदियाँ

सिंधु नदी प्रणाली अपनी पाँच प्रमुख सहायक नदियों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘पंचनद’ कहा जाता है। ये पाँच नदियाँ हैं:

  • झेलम (Jhelum): इसका उद्गम कश्मीर घाटी में वेरीनाग झरने से होता है। श्रीनगर शहर इसी के तट पर है।
  • चिनाब (Chenab): यह हिमाचल प्रदेश में दो धाराओं, चंद्रा और भागा, के मिलने से बनती है। यह सिंधु की सबसे बड़ी सहायक नदी है।
  • रावी (Ravi): यह हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के पास से निकलती है।
  • ब्यास (Beas): इसका उद्गम भी रोहतांग दर्रे के पास ब्यास कुंड से होता है। यह एकमात्र ऐसी नदी है जो पूरी तरह से भारत में बहती है।
  • सतलुज (Satluj): यह तिब्बत में राकस ताल झील से निकलती है और शिपकी ला दर्रे से भारत में प्रवेश करती है। भाखड़ा-नांगल बांध इसी नदी पर बना है।

सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty)

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के जल के बंटवारे को लेकर 1960 में सिंधु जल समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत, तीन पूर्वी नदियों – रावी, ब्यास और सतलुज – का नियंत्रण भारत को दिया गया, जबकि तीन पश्चिमी नदियों – सिंधु, झेलम और चिनाब – का नियंत्रण पाकिस्तान को मिला। भारत इन पश्चिमी नदियों के पानी का उपयोग सिंचाई, बिजली उत्पादन और परिवहन जैसे गैर-उपभोग्य कार्यों के लिए कर सकता है।

4. प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ

प्रायद्वीपीय नदियों की प्रकृति

प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ हिमालयी नदियों से पुरानी हैं और उनकी प्रकृति भी भिन्न है। ये नदियाँ मौसमी (Seasonal) होती हैं क्योंकि इनका प्रवाह पूरी तरह से मानसून की वर्षा पर निर्भर करता है। गर्मी के मौसम में इनका जल स्तर काफी कम हो जाता है या कुछ छोटी नदियाँ सूख भी जाती हैं। ये नदियाँ कठोर चट्टानी सतहों पर बहती हैं, इसलिए इनकी घाटियाँ कम गहरी और चौड़ी होती हैं और ये हिमालयी नदियों की तरह अधिक गाद नहीं लाती हैं।

प्रवाह की दिशा के आधार पर वर्गीकरण

प्रायद्वीपीय नदियों को उनकी प्रवाह की दिशा के आधार पर दो मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है। पहला समूह उन नदियों का है जो पश्चिमी घाट से निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं और बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये नदियाँ बड़ी होती हैं और डेल्टा बनाती हैं। दूसरा समूह उन नदियों का है जो पश्चिम की ओर बहती हैं और अरब सागर में गिरती हैं। ये नदियाँ अपेक्षाकृत छोटी होती हैं और डेल्टा के बजाय ज्वारनदमुख (Estuary) का निर्माण करती हैं।

4.1 पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ

पूर्व-प्रवाहित नदियों की सामान्य विशेषताएँ

बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ अपने लंबे प्रवाह पथ और विस्तृत बेसिन के लिए जानी जाती हैं। ये नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलती हैं, जो कि प्रायद्वीपीय भारत का मुख्य जल-विभाजक है। अपने मुहाने पर पहुँचने से पहले ये नदियाँ उपजाऊ डेल्टाओं का निर्माण करती हैं, जो कृषि के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। इस समूह की प्रमुख नदियों में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी शामिल हैं।

4.2 गोदावरी नदी: दक्षिण गंगा

गोदावरी का उद्गम और विस्तार

गोदावरी प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है, जिसकी लंबाई लगभग 1,465 किलोमीटर है। इसके विशाल आकार और विस्तार के कारण इसे ‘दक्षिण गंगा’ भी कहा जाता है। इसका उद्गम महाराष्ट्र में नासिक जिले के पास त्र्यंबकेश्वर की पहाड़ियों से होता है। यह महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में एक बड़ा डेल्टा बनाती है।

गोदावरी की सहायक नदियाँ

गोदावरी का बेसिन भारत के सबसे बड़े नदी बेसिनों में से एक है। इसकी कई महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं जो इसके जल प्रवाह को बढ़ाती हैं। उत्तर से आकर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियों में पूर्णा, प्राणहिता, इंद्रावती और सबरी शामिल हैं। प्राणहिता नदी तीन नदियों – पेंगांगा, वर्धा और वैनगंगा – का संयुक्त रूप है। दक्षिण से मिलने वाली प्रमुख सहायक नदी मंजरा है।

4.3 कृष्णा नदी: एक प्रमुख प्रायद्वीपीय धारा

कृष्णा नदी का प्रवाह क्षेत्र

कृष्णा नदी प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी सबसे बड़ी पूर्व-प्रवाहित नदी है। इसकी लंबाई लगभग 1,400 किलोमीटर है। इसका उद्गम महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट पर महाबलेश्वर के पास से होता है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों से होकर बहती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गोदावरी और कृष्णा नदियों का डेल्टा आपस में लगभग मिल जाता है।

कृष्णा की सहायक नदियाँ और बांध

कृष्णा नदी की प्रमुख सहायक नदियों में तुंगभद्रा, कोयना, भीमा, घटप्रभा, मालप्रभा और मुसी शामिल हैं। तुंगभद्रा इसकी सबसे बड़ी सहायक नदी है। इस नदी पर कई महत्वपूर्ण बांध बनाए गए हैं, जैसे श्रीशैलम बांध और नागार्जुन सागर बांध, जो सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। हैदराबाद शहर मुसी नदी के तट पर स्थित है।

अन्य पूर्व-प्रवाहित नदियाँ

गोदावरी और कृष्णा के अलावा, कई अन्य महत्वपूर्ण नदियाँ भी पूर्व की ओर बहती हैं। इनमें महानदी शामिल है, जो छत्तीसगढ़ के सिहावा से निकलती है और ओडिशा से होकर बहती है। इस पर दुनिया का सबसे लंबा बांध, हीराकुंड बांध, बना है। दक्षिण में, कावेरी नदी है, जो कर्नाटक के कोडागु जिले में ब्रह्मगिरी पहाड़ियों से निकलती है। इसे ‘दक्षिण भारत की गंगा’ कहा जाता है और इसके जल के बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद रहा है।

4.4 पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ

पश्चिम-प्रवाहित नदियों की विशेषताएँ

अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ आमतौर पर छोटी और तीव्र गति वाली होती हैं। इनमें से अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों से निकलती हैं और एक छोटे मार्ग के बाद समुद्र में मिल जाती हैं। ये नदियाँ कठोर चट्टानों पर बहती हैं और खड़ी ढलानों के कारण ज्वारनदमुख (Estuary) बनाती हैं, न कि डेल्टा। नर्मदा और तापी इस समूह की दो सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण नदियाँ हैं।

4.5 नर्मदा नदी: दरार घाटी की जीवनधारा

नर्मदा का अद्वितीय प्रवाह पथ

नर्मदा प्रायद्वीपीय भारत की सबसे बड़ी पश्चिम-प्रवाहित नदी है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश में अमरकंटक पठार से होता है। यह नदी एक अनूठी विशेषता प्रदर्शित करती है – यह विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक दरार घाटी (Rift Valley) से होकर बहती है। यह पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली प्रायद्वीपीय भारत की सबसे लंबी नदी है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 1,312 किलोमीटर है।

नर्मदा पर प्रमुख जलप्रपात और परियोजनाएँ

अपनी यात्रा के दौरान, नर्मदा कई सुंदर स्थानों का निर्माण करती है। जबलपुर के पास, यह संगमरमर की चट्टानों के बीच से बहती है और प्रसिद्ध धुआँधार जलप्रपात बनाती है। इस नदी पर कई बहुउद्देशीय परियोजनाएँ विकसित की गई हैं, जिनमें सरदार सरोवर बांध और इंदिरा सागर बांध प्रमुख हैं। ये परियोजनाएँ गुजरात और मध्य प्रदेश के लिए सिंचाई, पेयजल और बिजली का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

4.6 तापी नदी: नर्मदा की समानांतर बहती धारा

तापी नदी का मार्ग

तापी (या ताप्ती) नदी दूसरी प्रमुख पश्चिम-प्रवाहित नदी है जो नर्मदा के समानांतर एक दरार घाटी में बहती है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में सतपुड़ा श्रृंखला की मुलताई पहाड़ियों से होता है। यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर बहती है और खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में गिरती है। सूरत शहर इसी नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी लंबाई लगभग 724 किलोमीटर है।

अन्य पश्चिमी नदियाँ

नर्मदा और तापी के अलावा, कई अन्य छोटी नदियाँ भी पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलती हैं। इनमें गुजरात की साबरमती और माही नदियाँ शामिल हैं। गोवा में मांडवी और जुआरी, कर्नाटक में शरावती (जिस पर प्रसिद्ध जोग जलप्रपात है), और केरल में पेरियार और भरतपूजा अन्य महत्वपूर्ण पश्चिम-प्रवाहित नदियाँ हैं। ये नदियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में स्थानीय महत्व रखती हैं।

5. भारत की प्रमुख झीलें और जलाशय

झीलों का पारिस्थितिक महत्व

नदियों के अलावा, झीलें और जलाशय भी भारत के जल संसाधनों का एक अभिन्न अंग हैं। झीलें न केवल प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाती हैं और पर्यटन को आकर्षित करती हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे भूजल को रिचार्ज करने, बाढ़ को नियंत्रित करने और जलीय जीवन को आश्रय प्रदान करने में मदद करती हैं। भारत में विभिन्न प्रकार की झीलें पाई जाती हैं, जो अपने निर्माण की प्रक्रिया और पानी की प्रकृति में भिन्न होती हैं।

5.1 झीलों के प्रकार और उनका महत्व

मीठे पानी की झीलें (Freshwater Lakes)

मीठे पानी की झीलें आमतौर पर नदियों, वर्षा या पिघलते ग्लेशियरों से जल प्राप्त करती हैं। ये पीने के पानी, सिंचाई और मछली पकड़ने के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील जम्मू और कश्मीर में स्थित वुलर झील है, जो झेलम नदी के मार्ग में बनती है। कश्मीर की डल झील, मणिपुर की लोकटक झील और आंध्र प्रदेश की कोलेरू झील मीठे पानी की झीलों के अन्य प्रसिद्ध उदाहरण हैं।

खारे पानी की झीलें (Saltwater Lakes)

खारे पानी की झीलें अक्सर तटीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जहाँ समुद्र का पानी भूमि पर आ जाता है और एक लैगून का निर्माण करता है। भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील ओडिशा में स्थित चिल्का झील है। यह प्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित पुलिकट झील एक और प्रमुख लैगून है। राजस्थान की सांभर झील भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारे पानी की झील है, जिससे नमक का उत्पादन किया जाता है।

अन्य प्रकार की झीलें

इनके अलावा भी कई अन्य प्रकार की झीलें भारत में पाई जाती हैं।

  • हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes): ये झीलें ग्लेशियरों की क्रिया से बनती हैं और मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती हैं, जैसे उत्तराखंड की रूपकुंड झील।
  • विवर्तनिक झीलें (Tectonic Lakes): इनका निर्माण पृथ्वी की प्लेटों में हलचल के कारण होता है। कश्मीर की वुलर झील इसका एक उदाहरण है।
  • ज्वालामुखी झीलें (Crater Lakes): ये ज्वालामुखी के मुहाने (क्रेटर) में पानी भरने से बनती हैं। महाराष्ट्र की लोनार झील इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जो एक उल्कापिंड के टकराने से बनी मानी जाती है।
  • मानव निर्मित झीलें (Man-made Lakes): ये झीलें बांधों के पीछे बने जलाशय होते हैं, जैसे पंजाब में भाखड़ा-नांगल बांध के पीछे बनी गोबिंद सागर झील

5.2 भारत की कुछ प्रसिद्ध झीलें

लोकटक झील, मणिपुर

लोकटक झील पूर्वोत्तर भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है। यह अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी के द्वीपों के लिए प्रसिद्ध है, जिन्हें ‘फुम्डी’ (Phumdis) कहा जाता है। दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान, केइबुल लामजाओ नेशनल पार्क, इसी झील पर स्थित है। यह पार्क संगाई हिरण (डांसिंग डियर) का अंतिम प्राकृतिक आवास है, जो एक लुप्तप्राय प्रजाति है।

चिल्का झील, ओडिशा

चिल्का झील भारत की सबसे बड़ी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी तटीय लैगून है। यह प्रवासी पक्षियों के लिए एशिया का सबसे बड़ा शीतकालीन मैदान है, जहाँ साइबेरिया और मध्य एशिया से हजारों पक्षी आते हैं। यह एक महत्वपूर्ण मछली पकड़ने का केंद्र भी है और यहाँ इरावदी डॉल्फ़िन भी पाई जाती हैं। इसे रामसर कन्वेंशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि (Wetland) घोषित किया गया है।

पैंगोंग त्सो, लद्दाख

पैंगोंग त्सो (Pangong Tso) लद्दाख में स्थित एक आश्चर्यजनक और सुंदर खारे पानी की झील है। यह लगभग 134 किलोमीटर लंबी है और भारत से लेकर चीन तक फैली हुई है। इस झील की खासियत यह है कि यह दिन के अलग-अलग समय पर अपना रंग बदलती है, जो नीले से हरे और फिर लाल तक हो सकता है। इसकी ऊंचाई और अद्वितीय सुंदरता इसे पर्यटकों के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बनाती है।

6. भारत में भूमिगत जल: एक अदृश्य संसाधन

भूमिगत जल का महत्व

भूमिगत जल वह पानी है जो बारिश और नदियों से रिसकर जमीन के नीचे चट्टानों और मिट्टी की परतों (जिन्हें जलभृत या Aquifer कहा जाता है) में जमा हो जाता है। यह भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण जल स्रोत है। यह देश की 85% से अधिक ग्रामीण पेयजल आपूर्ति और 50% शहरी पेयजल आपूर्ति को पूरा करता है। इसके अतिरिक्त, भारत की सिंचित कृषि का लगभग 60% हिस्सा भूमिगत जल पर ही निर्भर है।

भारत में भूमिगत जल का वितरण

भारत में भूमिगत जल की उपलब्धता एक समान नहीं है। यह क्षेत्र की भूवैज्ञानिक संरचना और वर्षा की मात्रा पर निर्भर करती है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के विशाल मैदानी इलाकों में नरम जलोढ़ मिट्टी होने के कारण भूमिगत जल के विशाल भंडार हैं। इसके विपरीत, प्रायद्वीपीय भारत के कठोर चट्टानी पठारों में भूमिगत जल की उपलब्धता कम है और यह चट्टानों की दरारों और दरारों में पाया जाता है।

अत्यधिक दोहन की समस्या

पिछले कुछ दशकों में, हरित क्रांति के बाद सिंचाई के लिए ट्यूबवेल और पंपों के बढ़ते उपयोग के कारण भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हुआ है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्यों में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है, जहाँ जल स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला गया है। अत्यधिक दोहन से न केवल पानी की कमी हो रही है, बल्कि भूमि धंसने और पानी की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।

गुणवत्ता संबंधी चिंताएँ

भूमिगत जल की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता भी एक बड़ी चिंता का विषय है। कई क्षेत्रों में, भूमिगत जल प्राकृतिक रूप से आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे हानिकारक तत्वों से दूषित है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, औद्योगिक कचरे और कृषि में उपयोग होने वाले कीटनाशकों और उर्वरकों के रिसाव से भी भूजल प्रदूषित हो रहा है, जिससे यह पीने के लिए असुरक्षित हो जाता है।

भूजल पुनर्भरण और प्रबंधन

भूमिगत जल के गिरते स्तर की समस्या से निपटने के लिए, भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) आवश्यक है। इसके लिए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting), चेक डैम, परकोलेशन टैंक और तालाबों का निर्माण जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। सरकार ने इस दिशा में अटल भूजल योजना जैसी पहलें भी शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भूजल संसाधनों का स्थायी प्रबंधन करना है।

7. समुद्र तट और तटीय जल संसाधन

भारत की विशाल तटरेखा

भारत तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है, जिसके कारण इसके पास लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी एक विशाल तटरेखा है। यह तटरेखा पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिंद महासागर तक फैली हुई है। इस विशाल तटीय क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बंदरगाह, मत्स्य पालन केंद्र और पर्यटन स्थल स्थित हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

पूर्वी और पश्चिमी तट

भारत के समुद्र तट को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा जा सकता है – पूर्वी तट और पश्चिमी तट।

  • पश्चिमी तट (Western Coast): यह गुजरात से कन्याकुमारी तक फैला है और यह एक संकीर्ण और चट्टानी तट है। इसे कोंकण तट (महाराष्ट्र, गोवा), कन्नड़ तट (कर्नाटक) और मालाबार तट (केरल) जैसे उप-भागों में विभाजित किया गया है। यहाँ कई प्राकृतिक बंदरगाह हैं जैसे मुंबई और कोच्चि।
  • पूर्वी तट (Eastern Coast): यह पश्चिम बंगाल से कन्याकुमारी तक फैला है और यह एक चौड़ा और समतल तट है। यहाँ बड़ी नदियाँ डेल्टा बनाती हैं। इसे कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) और उत्तरी सरकार तट (आंध्र प्रदेश, ओडिशा) में विभाजित किया गया है। यहाँ चेन्नई और विशाखापत्तनम जैसे बंदरगाह हैं।

मत्स्य पालन और समुद्री संसाधन

भारत की लंबी तटरेखा लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत है, जो सीधे तौर पर मत्स्य पालन (Fisheries) पर निर्भर हैं। भारत दुनिया के प्रमुख मछली उत्पादक देशों में से एक है। मछली के अलावा, समुद्र से अन्य महत्वपूर्ण संसाधन भी प्राप्त होते हैं, जैसे नमक, खनिज और समुद्री शैवाल। मुंबई के पास बॉम्बे हाई क्षेत्र अपतटीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का एक प्रमुख स्रोत है।

तटीय क्षेत्रों की चुनौतियाँ

तटीय क्षेत्रों को कई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। चक्रवात (Cyclones), सुनामी और समुद्र के जल स्तर में वृद्धि जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा यहाँ हमेशा बना रहता है। इसके अलावा, तटीय क्षरण (Coastal Erosion), मीठे पानी के स्रोतों में खारे पानी का प्रवेश (Salinity Ingress) और समुद्री प्रदूषण भी प्रमुख समस्याएं हैं जो तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और वहाँ रहने वाले लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं।

8. जल संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता

बढ़ती मांग और घटती आपूर्ति

भारत दुनिया की लगभग 18% आबादी का घर है, लेकिन इसके पास दुनिया के केवल 4% renouvelable जल संसाधन हैं। बढ़ती जनसंख्या, तेजी से होते शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण मीठे पानी की उपलब्धता कम होती जा रही है। यह मांग-आपूर्ति का असंतुलन भारत को एक गंभीर जल संकट की ओर धकेल रहा है।

जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके

भारत में जल संरक्षण की एक समृद्ध पारंपरिक विरासत रही है। सदियों से, हमारे पूर्वजों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जल संचयन के लिए विभिन्न तकनीकों का विकास किया था। राजस्थान में जोहड़ और बावड़ियां (Stepwells), महाराष्ट्र में ताल, लद्दाख में जिंग (Zing), और दक्षिण भारत में एरी (Eri) या टैंक प्रणाली, ये सभी पारंपरिक ज्ञान के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं और जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकें

पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ, आधुनिक तकनीकों को अपनाना भी आवश्यक है। कृषि, जो पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, में ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation) और स्प्रिंकलर सिंचाई (Sprinkler Irrigation) जैसी विधियों को बढ़ावा देना चाहिए, जो पानी की बर्बादी को 70% तक कम कर सकती हैं। शहरी क्षेत्रों में, हर घर में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) को अनिवार्य बनाना और अपशिष्ट जल के उपचार और पुन: उपयोग (Wastewater Treatment and Reuse) पर जोर देना महत्वपूर्ण है।

नदी जोड़ो परियोजना (River Interlinking Project)

नदी जोड़ो परियोजना एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसका उद्देश्य उन नदी बेसिनों से पानी को स्थानांतरित करना है जहाँ पानी की अधिकता है, उन बेसिनों की ओर जहाँ पानी की कमी है। इसके समर्थकों का मानना है कि यह बाढ़ और सूखे की दोहरी समस्याओं का समाधान कर सकता है और सिंचाई तथा पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ा सकता है। हालांकि, इस परियोजना से जुड़े भारी पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक लागतों को लेकर विशेषज्ञ चिंता भी व्यक्त करते हैं।

राष्ट्रीय जल नीति और सरकारी पहल

भारत सरकार ने जल संसाधनों के एकीकृत और टिकाऊ विकास और प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय जल नीति (National Water Policy) तैयार की है। यह नीति जल को एक दुर्लभ और कीमती राष्ट्रीय संसाधन के रूप में मान्यता देती है और इसके नियोजन, विकास और संरक्षण के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है। ‘जल जीवन मिशन’ जैसी योजनाओं का उद्देश्य 2024 तक हर ग्रामीण घर में नल से जल पहुंचाना है, जबकि ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम गंगा नदी के कायाकल्प पर केंद्रित है।

9. निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक स्थायी कदम

जल संसाधनों का समग्र दृष्टिकोण

भारत के जल स्रोत, चाहे वे हिमालय की शक्तिशाली नदियाँ हों, प्रायद्वीपीय पठार की मौसमी धाराएँ हों, शांत झीलें हों, या पृथ्वी के नीचे छिपा भूमिगत जल हो, सभी देश के जीवन और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन संसाधनों का अध्ययन हमें न केवल भारत के भूगोल को समझने में मदद करता है, बल्कि यह भी बताता है कि प्रकृति ने हमें कितनी उदारता से संपदा प्रदान की है। यह एक जटिल और परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

भविष्य की चुनौतियाँ और हमारी भूमिका

जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और प्रदूषण जैसी चुनौतियाँ हमारे जल संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव डाल रही हैं। आने वाले दशकों में जल की कमी एक बड़ी चुनौती बनने की संभावना है। एक छात्र और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में, यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम पानी के महत्व को समझें और इसके संरक्षण के लिए सक्रिय कदम उठाएं। पानी की हर बूंद को बचाना, प्रदूषण को कम करना और स्थायी जल प्रबंधन प्रथाओं का समर्थन करना आवश्यक है।

एक स्थायी भविष्य का संकल्प

भारत के जल संसाधनों का भविष्य हमारे आज के कार्यों पर निर्भर करता है। हमें एक ऐसे दृष्टिकोण को अपनाना होगा जो विकास की जरूरतों को पर्यावरण के संरक्षण के साथ संतुलित करे। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक प्रौद्योगिकी का एकीकरण करके, हम अपने जल स्रोतों का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। जल सुरक्षा सुनिश्चित करना केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति का कर्तव्य है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह अनमोल संसाधन उपलब्ध रहे। “`

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