भारत की जलवायु: मौसम, मानसून, और वर्षा वितरण का विश्लेषण

भारत की जलवायु: मौसम, मानसून, और वर्षा वितरण का विश्लेषण

1. परिचय: जलवायु और मौसम के बीच अंतर

जलवायु और मौसम की आधारभूत समझ

अक्सर हम जलवायु (Climate) और मौसम (Weather) शब्दों का इस्तेमाल एक दूसरे के स्थान पर कर देते हैं, लेकिन भूगोल और विज्ञान की दृष्टि से इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। एक छात्र के रूप में, इस अंतर को समझना भारत की भौगोलिक विशेषताओं को समझने की पहली सीढ़ी है। मौसम किसी स्थान के वायुमंडल की तात्कालिक या अल्पकालिक स्थिति को दर्शाता है, जैसे कि आज का तापमान, आर्द्रता या बारिश की संभावना।

मौसम की परिवर्तनशील प्रकृति

मौसम बहुत ही परिवर्तनशील होता है और यह घंटे-दर-घंटे और दिन-प्रतिदिन बदल सकता है। उदाहरण के लिए, सुबह धूप खिली हो सकती है, दोपहर में बादल छा सकते हैं और शाम को बारिश हो सकती है। यह वायुमंडलीय दबाव, हवा की गति, तापमान और नमी जैसे कई कारकों के जटिल मेलजोल का परिणाम है। मौसम का पूर्वानुमान अल्प अवधि के लिए किया जाता है।

जलवायु की दीर्घकालिक अवधारणा

इसके विपरीत, जलवायु किसी क्षेत्र के मौसम का दीर्घकालिक औसत पैटर्न है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, किसी स्थान की जलवायु का निर्धारण करने के लिए कम से कम 30-35 वर्षों के मौसम के आंकड़ों का औसत निकाला जाता है। जलवायु हमें बताती है कि किसी विशेष स्थान पर साल के किसी विशेष समय में किस तरह के मौसम की उम्मीद की जा सकती है। यह अधिक स्थिर और पूर्वानुमानित होती है।

भारत के संदर्भ में उदाहरण

इसे भारत के उदाहरण से समझें। जब हम कहते हैं कि “आज दिल्ली में बारिश होगी,” तो हम मौसम की बात कर रहे हैं। लेकिन जब हम कहते हैं कि “भारत में मानसून के दौरान भारी वर्षा होती है” या “थार मरुस्थल की जलवायु शुष्क और गर्म है,” तो हम जलवायु की बात कर रहे होते हैं। यह एक व्यापक और दीर्घकालिक अवलोकन है जो उस क्षेत्र की विशेषता बन चुका है।

परीक्षा के दृष्टिकोण से महत्व

यह बुनियादी अंतर समझना प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की जलवायु का अध्ययन करते समय, हम उन स्थायी कारकों पर ध्यान केंद्रित करेंगे जो देश के विभिन्न हिस्सों में तापमान, वर्षा और हवा के पैटर्न को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करते हैं। यह हमें भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था और जीवन शैली को समझने में भी मदद करता है।

2. भारत की जलवायु को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

कारक 1: अक्षांशीय स्थिति (Latitudinal Extent)

भारत की अक्षांशीय स्थिति इसकी जलवायु को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कर्क रेखा (Tropic of Cancer), जो 23.5° N अक्षांश पर है, देश के लगभग मध्य से होकर गुजरती है। यह भारत को दो प्रमुख जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करती है: दक्षिणी भाग जो उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्र में आता है, और उत्तरी भाग जो उपोष्णकटिबंधीय (Sub-tropical) क्षेत्र में आता है।

कर्क रेखा का प्रभाव

कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित क्षेत्रों में वर्ष भर उच्च तापमान बना रहता है और दिन और रात के तापमान में बहुत कम अंतर होता है। वहीं, कर्क रेखा के उत्तर में स्थित क्षेत्रों में मौसमी विविधता अधिक होती है, जहाँ ग्रीष्मकाल गर्म और शीतकाल ठंडा होता है। इस प्रकार, अक्षांश सीधे तौर पर किसी स्थान पर प्राप्त होने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा को नियंत्रित करता है।

कारक 2: हिमालय पर्वत श्रृंखला की भूमिका

उत्तर में स्थित विशाल हिमालय पर्वत श्रृंखला भारत की जलवायु के लिए एक शक्तिशाली नियंत्रक के रूप में कार्य करती है। यह एक विशाल दीवार की तरह खड़ी है जो मध्य एशिया से आने वाली बर्फीली और ठंडी ध्रुवीय हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करने से रोकती है। इसी कारण से, समान अक्षांशों पर स्थित अन्य क्षेत्रों की तुलना में भारत में सर्दियाँ कम कठोर होती हैं।

मानसून पर हिमालय का प्रभाव

इसके अतिरिक्त, हिमालय पर्वत मानसून की पवनों के लिए भी एक अवरोधक का काम करता है। जब दक्षिण-पश्चिम मानसून की आर्द्रता से भरी हवाएँ उत्तर की ओर बढ़ती हैं, तो वे हिमालय से टकराती हैं और ऊपर उठने के लिए मजबूर हो जाती हैं। इस प्रक्रिया में हवा ठंडी होती है और अपनी नमी को वर्षा के रूप में छोड़ देती है, जिससे उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में भारी बारिश होती है।

कारक 3: समुद्र से दूरी (Distance from the Sea)

समुद्र से दूरी भी किसी स्थान की जलवायु को बहुत प्रभावित करती है। तटीय क्षेत्रों, जैसे मुंबई, चेन्नई और कोलकाता, की जलवायु समकारी (Maritime) होती है। इसका अर्थ है कि यहाँ साल भर तापमान में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव नहीं होता है। समुद्र के पानी के धीरे-धीरे गर्म और ठंडा होने के गुण के कारण, तटीय इलाकों में न तो बहुत अधिक गर्मी पड़ती है और न ही बहुत अधिक सर्दी।

महाद्वीपीय जलवायु का अनुभव

इसके विपरीत, जो क्षेत्र समुद्र से बहुत दूर होते हैं, जैसे कि दिल्ली, भोपाल या लखनऊ, वे महाद्वीपीय (Continental) जलवायु का अनुभव करते हैं। यहाँ मौसमी और दैनिक तापमान में बहुत अधिक अंतर होता है। गर्मियों में तापमान बहुत अधिक हो जाता है (लू चलती है) और सर्दियों में बहुत कम हो जाता है। इसे ‘तापमान की चरम सीमा’ (Extreme range of temperature) कहा जाता है।

कारक 4: तुंगता या ऊँचाई (Altitude)

ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है। यह एक सामान्य नियम है कि वायुमंडल में प्रत्येक 165 मीटर की ऊँचाई पर तापमान में लगभग 1°C की कमी आती है। यही कारण है कि हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र, जैसे शिमला, मसूरी और दार्जिलिंग, मैदानी इलाकों की तुलना में गर्मियों में भी ठंडे रहते हैं। ऊँचाई वर्षा के पैटर्न को भी प्रभावित करती है।

ऊँचाई का वर्षा पर प्रभाव

पहाड़ों के पवनमुखी ढलान (windward side) पर, जहाँ हवा ऊपर उठती है, भारी वर्षा होती है। इसके विपरीत, पहाड़ों के पवनविमुखी ढलान (leeward side), जिसे वृष्टि-छाया प्रदेश (rain-shadow area) भी कहा जाता है, में बहुत कम वर्षा होती है। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण पश्चिमी घाट है, जिसके पश्चिमी ढलानों पर भारी बारिश होती है, जबकि पूर्वी ढलानों पर स्थित दक्कन का पठार अपेक्षाकृत सूखा रहता है।

कारक 5: उच्चावच (Relief Features)

भारत की भौतिक विशेषताएँ, जैसे पर्वत, पठार और मैदान, स्थानीय जलवायु को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। जैसा कि पहले बताया गया है, पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा को रोककर पश्चिमी तटीय मैदानों में भारी वर्षा कराता है। इसी तरह, अरावली पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा के समानांतर स्थित है, इसलिए यह इन हवाओं को रोकने में असमर्थ है, जिसके कारण राजस्थान का अधिकांश भाग शुष्क रह जाता है।

कारक 6: ऊपरी वायु परिसंचरण (Upper Air Circulation)

क्षोभमंडल (Troposphere) के ऊपरी भाग में चलने वाली तेज हवाएँ, जिन्हें जेट स्ट्रीम (Jet Streams) कहा जाता है, भी भारत की जलवायु को प्रभावित करती हैं। सर्दियों के मौसम में, उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Sub-tropical Westerly Jet Stream) हिमालय के दक्षिण में बहती है और देश में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) लाने में मदद करती है, जिससे उत्तर-पश्चिम भारत में सर्दियों में बारिश होती है।

जेट स्ट्रीम का ग्रीष्मकालीन प्रभाव

गर्मियों में, सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, यह जेट स्ट्रीम हिमालय के उत्तर में खिसक जाती है। इसकी जगह एक उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream) विकसित होती है जो प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर से बहती है। माना जाता है कि यह पूर्वी जेट स्ट्रीम भारत में मानसून के विस्फोट (Monsoon Burst) के लिए जिम्मेदार उष्णकटिबंधीय अवदाबों को लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

3. भारतीय मानसून: एक विस्तृत विश्लेषण

मानसून की परिभाषा

‘मानसून’ शब्द अरबी भाषा के शब्द ‘मौसिम’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘ऋतु’। मानसून मूल रूप से हवाओं का एक मौसमी उत्क्रमण (Seasonal Reversal) है, जिसमें हवाएँ छह महीने एक दिशा में और अगले छह महीने विपरीत दिशा में चलती हैं। भारतीय मानसून विश्व की सबसे प्रमुख और प्रभावशाली मौसमी घटनाओं में से एक है, जो देश की अर्थव्यवस्था, कृषि और संस्कृति की जीवन रेखा है।

मानसून की पारंपरिक अवधारणा

मानसून की उत्पत्ति की पारंपरिक अवधारणा स्थल और जल के विभेदक तापन (Differential heating of land and water) पर आधारित है। गर्मियों में, भारतीय भूभाग, विशेष रूप से तिब्बत का पठार, आसपास के समुद्रों (हिंद महासागर) की तुलना में बहुत अधिक गर्म हो जाता है। इस अत्यधिक गर्मी के कारण, भारतीय उपमहाद्वीप पर एक तीव्र निम्न दाब (Low Pressure) का क्षेत्र बन जाता है।

उच्च दाब और पवन प्रवाह

उसी समय, हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिससे वहाँ उच्च दाब (High Pressure) का क्षेत्र बना रहता है। हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है। इसलिए, हिंद महासागर के ऊपर से नमी से भरी हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के निम्न दाब क्षेत्र की ओर आकर्षित होती हैं। यह प्रवाह ही दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों का निर्माण करता है।

कोरियोलिस बल की भूमिका

जब ये हवाएँ भूमध्य रेखा (Equator) को पार करती हैं, तो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न कोरियोलिस बल (Coriolis Force) के प्रभाव से वे अपनी दाईं ओर मुड़ जाती हैं। यही कारण है कि हिंद महासागर से उत्तर की ओर आने वाली हवाएँ भारत में दक्षिण-पश्चिम दिशा से प्रवेश करती हैं, और इसीलिए इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है।

मानसून की आधुनिक अवधारणा: आईटीसीजेड (ITCZ) की भूमिका

आधुनिक मौसम विज्ञानी मानसून की व्याख्या के लिए अंतः-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (Inter-Tropical Convergence Zone – ITCZ) की अवधारणा का उपयोग करते हैं। ITCZ भूमध्य रेखा के पास एक निम्न दाब वाली पट्टी है जहाँ उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें मिलती हैं। गर्मियों में, सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, यह ITCZ पट्टी उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदानों पर स्थित हो जाती है।

‘मानसून गर्त’ का निर्माण

ITCZ के इस उत्तरी खिसकाव से गंगा के मैदानों पर एक ‘मानसून गर्त’ (Monsoon Trough) का निर्माण होता है। यह गर्त दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों को आकर्षित करता है, जिससे पूरे भारत में वर्षा होती है। ITCZ की स्थिति में परिवर्तन से वर्षा के वितरण में भी बदलाव आता है। जब यह गर्त हिमालय की तलहटी में होता है, तो मैदानों में सूखा पड़ता है और पहाड़ों में भारी बारिश होती है।

मानसून का आगमन और ‘मानसून प्रस्फोट’ (Burst of Monsoon)

दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर 1 जून के आसपास केरल के तट पर पहुँचता है। इसके आगमन को ‘मानसून प्रस्फोट’ या ‘मानसून का फटना’ (Burst of the Monsoon) कहा जाता है। यह अचानक होता है, जिसमें सामान्य वर्षा में अचानक वृद्धि हो जाती है और यह कई दिनों तक लगातार जारी रहती है। यह घटना गरज और बिजली के साथ होती है।

मानसून की दो शाखाएँ: अरब सागर और बंगाल की खाड़ी

भारतीय प्रायद्वीप की त्रिभुजाकार आकृति के कारण, दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत में प्रवेश करते ही दो शाखाओं में विभाजित हो जाता है:

  • अरब सागर शाखा (Arabian Sea Branch)
  • बंगाल की खाड़ी शाखा (Bay of Bengal Branch)

ये दोनों शाखाएँ देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षा के लिए जिम्मेदार हैं और अलग-अलग दिशाओं से आगे बढ़ती हैं।

अरब सागर शाखा का मार्ग

अरब सागर शाखा अधिक शक्तिशाली होती है। इसकी एक उप-शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदानों और सह्याद्री के पश्चिमी ढलानों पर 250 से 400 सेंटीमीटर तक की भारी वर्षा करती है। दूसरी उप-शाखा नर्मदा-तापी घाटियों से होकर मध्य भारत में प्रवेश करती है और छोटानागपुर पठार तक वर्षा करती है। तीसरी उप-शाखा सौराष्ट्र-कच्छ से टकराकर अरावली के समानांतर आगे बढ़ती है, जिससे राजस्थान में कम वर्षा होती है।

बंगाल की खाड़ी शाखा का मार्ग

बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर और उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ती है। यह सबसे पहले म्यांमार के अराकान योमा पहाड़ों और मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों से टकराती है। खासी पहाड़ियों पर स्थित मासिनराम (Mawsynram) विश्व में सर्वाधिक औसत वार्षिक वर्षा वाला स्थान है। इसके बाद, यह शाखा हिमालय के प्रभाव में पश्चिम की ओर मुड़ जाती है और गंगा के मैदानों में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हुए वर्षा की मात्रा को कम करती जाती है।

मानसून का निवर्तन (Retreating Monsoon)

सितंबर की शुरुआत में, सूर्य के दक्षिणायन होने के साथ, भारतीय उपमहाद्वीप पर बना निम्न दाब का क्षेत्र कमजोर होने लगता है और धीरे-धीरे हिंद महासागर की ओर खिसकने लगता है। इसके परिणामस्वरूप, दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनें कमजोर पड़ने लगती हैं और पीछे हटने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ‘मानसून का निवर्तन’ या ‘लौटता हुआ मानसून’ कहा जाता है। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है जो उत्तर-पश्चिम भारत से शुरू होकर दिसंबर की शुरुआत तक पूरे देश से समाप्त हो जाती है।

उत्तर-पूर्वी मानसून

लौटते हुए मानसून के दौरान, हवा की दिशा बदलकर उत्तर-पूर्व हो जाती है। ये हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, इसलिए वे शुष्क होती हैं और अधिकांश भारत में वर्षा नहीं करतीं। लेकिन जब ये हवाएँ बंगाल की खाड़ी के ऊपर से गुजरती हैं, तो वे नमी ग्रहण कर लेती हैं और तमिलनाडु के कोरोमंडल तट, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कुछ हिस्सों में सर्दियों में भारी वर्षा करती हैं। इसे उत्तर-पूर्वी मानसून भी कहा जाता है।

4. भारत की चार प्रमुख ऋतुएँ (The Four Seasons)

1. शीत ऋतु (The Cold Weather Season)

भारत में शीत ऋतु मध्य नवंबर से शुरू होकर फरवरी तक रहती है। इस दौरान, सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है, जिससे उत्तरी भारत में तापमान काफी कम हो जाता है। जनवरी सबसे ठंडा महीना होता है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में औसत तापमान 10°C से 15°C के बीच रहता है, जबकि रात में यह और भी गिर सकता है। दक्षिण भारत में समुद्र के समकारी प्रभाव के कारण सर्दी हल्की होती है।

शीत ऋतु की विशेषताएँ

इस मौसम में आसमान आमतौर पर साफ रहता है, आर्द्रता कम होती है और हवाएँ धीमी गति से चलती हैं। उत्तर भारत में उच्च दाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है, जिससे हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर बहती हैं। इस ऋतु की एक प्रमुख विशेषता पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) का आगमन है, जो भूमध्य सागर से उत्पन्न होते हैं।

पश्चिमी विक्षोभ और वर्षा

ये शीतोष्ण चक्रवात (Temperate Cyclones) पश्चिमी जेट स्ट्रीम के साथ बहकर भारत में प्रवेश करते हैं। इनके कारण उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानी इलाकों (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली) में हल्की शीतकालीन वर्षा होती है, जो रबी की फसलों, विशेषकर गेहूँ के लिए बहुत फायदेमंद होती है। हिमालय के उच्च क्षेत्रों में इन विक्षोभों के कारण भारी हिमपात होता है।

2. ग्रीष्म ऋतु (The Hot Weather Season)

मार्च से मई तक भारत में ग्रीष्म ऋतु होती है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ, पूरे देश में तापमान बढ़ने लगता है। मई का महीना सबसे गर्म होता है, जब उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में दिन का तापमान 45°C से 48°C तक पहुँच जाता है। इस समय, भारतीय उपमहाद्वीप पर एक तीव्र निम्न दाब का क्षेत्र विकसित हो जाता है, जो थार मरुस्थल से लेकर छोटानागपुर पठार तक फैला होता है।

‘लू’ का प्रभाव

ग्रीष्म ऋतु की एक प्रमुख विशेषता उत्तर भारत के मैदानों में चलने वाली गर्म, शुष्क और पीड़ादायक हवाएँ हैं, जिन्हें ‘लू’ कहा जाता है। यह हवाएँ दिन के समय चलती हैं और सीधे संपर्क में आने पर घातक भी हो सकती हैं। इस मौसम के अंत तक, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानसून-पूर्व वर्षा (Pre-monsoon showers) होती है।

मानसून-पूर्व स्थानीय वर्षा

ये स्थानीय वर्षाएँ अलग-अलग नामों से जानी जाती हैं। केरल में इन्हें ‘आम्र वर्षा’ (Mango Showers) कहा जाता है क्योंकि यह आमों को जल्दी पकने में मदद करती है। कर्नाटक में इसे ‘कॉफी वर्षा’ (Coffee Showers) या ‘चेरी ब्लॉसम’ (Cherry Blossoms) कहते हैं क्योंकि यह कॉफी के फूलों के लिए अच्छी होती है। पश्चिम बंगाल और असम में होने वाली ऐसी तीव्र गरज वाली बौछारों को ‘काल बैसाखी’ (Kal Baisakhi) के नाम से जाना जाता है।

3. दक्षिण-पश्चिम मानसून की ऋतु (The Advancing Monsoon Season)

यह वर्षा ऋतु है, जो जून से सितंबर तक चलती है। इस समय तक, उत्तर भारत के मैदानों पर निम्न दाब की स्थिति और तीव्र हो जाती है, जो दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक पवनों को आकर्षित करती है। ये पवनें हिंद महासागर के ऊपर से गुजरते हुए भारी मात्रा में नमी ग्रहण कर लेती हैं और भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के रूप में प्रवेश करती हैं।

वर्षा का प्रभाव

यह ऋतु भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की लगभग 75% से 90% वार्षिक वर्षा इसी दौरान होती है। यह वर्षा कृषि गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो भारत की अधिकांश आबादी के लिए आजीविका का स्रोत है। मानसून का आगमन देश को भीषण गर्मी से राहत दिलाता है। इस मौसम में आर्द्रता बहुत अधिक होती है और आसमान में बादल छाए रहते हैं।

मानसून में विराम (Breaks in the Monsoon)

मानसून की वर्षा लगातार नहीं होती है। इसमें कुछ शुष्क दौर भी आते हैं, जिन्हें ‘मानसून में विराम’ कहा जाता है। ये विराम मानसून गर्त (Monsoon Trough) की स्थिति में बदलाव के कारण होते हैं। जब मानसून गर्त अपनी सामान्य स्थिति से उत्तर की ओर हिमालय की तलहटी में खिसक जाता है, तो मैदानी इलाकों में वर्षा रुक जाती है और पहाड़ी क्षेत्रों में भारी वर्षा होती है।

4. मानसून के निवर्तन की ऋतु (The Retreating Monsoon Season)

अक्टूबर और नवंबर के महीने मानसून के निवर्तन या लौटते हुए मानसून की ऋतु के रूप में जाने जाते हैं। सितंबर के अंत तक, सूर्य के दक्षिण की ओर खिसकने के साथ, गंगा के मैदानों पर बना निम्न दाब का गर्त कमजोर पड़ जाता है। इसे धीरे-धीरे एक उच्च दाब प्रणाली द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, जिससे मानसून पवनें पीछे हटने लगती हैं।

‘अक्टूबर हीट’ (October Heat)

मानसून के लौटने से आसमान साफ हो जाता है और तापमान में फिर से वृद्धि होने लगती है। लेकिन जमीन अभी भी नम होती है। उच्च तापमान और उच्च आर्द्रता के कारण, दिन का मौसम काफी दमनकारी और उमस भरा हो जाता है। इस स्थिति को सामान्यतः ‘अक्टूबर की गर्मी’ या ‘क्वार की उमस’ (October Heat) के नाम से जाना जाता है।

चक्रवातीय वर्षा

इस मौसम में, निम्न दाब की स्थितियाँ बंगाल की खाड़ी में स्थानांतरित हो जाती हैं, जिससे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (Tropical Cyclones) की उत्पत्ति होती है। ये चक्रवात बहुत विनाशकारी होते हैं और भारत के पूर्वी तट, विशेषकर ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भारी वर्षा और तबाही लाते हैं। लौटता हुआ मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) कोरोमंडल तट पर मुख्य वर्षा ऋतु होता है।

5. भारत में वर्षा का वितरण (Rainfall Distribution)

वर्षा वितरण की असमानता

भारत में होने वाली वर्षा का वितरण अत्यधिक असमान है। कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक वर्षा होती है, जबकि अन्य क्षेत्र लगभग सूखे रहते हैं। यह असमानता देश के उच्चावच, समुद्र से दूरी और मानसून पवनों के मार्ग जैसे कारकों से नियंत्रित होती है। वर्षा वितरण के आधार पर भारत को चार प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है।

1. अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (More than 200 cm)

इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 200 सेंटीमीटर से अधिक होती है। इसमें पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलान, उत्तर-पूर्व भारत (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड), और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं। मेघालय की खासी पहाड़ियों में स्थित मासिनराम और चेरापूंजी विश्व के सबसे नम स्थानों में से हैं, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 1100 सेंटीमीटर से भी अधिक होती है।

अत्यधिक वर्षा का कारण

इन क्षेत्रों में भारी वर्षा का मुख्य कारण भौगोलिक अवरोध है। पश्चिमी घाट दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा को सीधे रोकता है, जिससे पवनमुखी ढलानों पर भारी वर्षा होती है। इसी प्रकार, उत्तर-पूर्व भारत की पहाड़ियाँ बंगाल की खाड़ी शाखा को रोककर भारी वर्षा कराती हैं। यहाँ घने सदाबहार वन पाए जाते हैं।

2. अधिक वर्षा वाले क्षेत्र (100 to 200 cm)

इन क्षेत्रों में मध्यम से अधिक वर्षा होती है। इसमें पश्चिमी घाट के पूर्वी ढलान, गंगा के मध्य और निचले मैदान (बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा), पूर्वी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश का कुछ हिस्सा और पूर्वोत्तर भारत के कुछ आंतरिक भाग शामिल हैं। इन क्षेत्रों में पर्याप्त वर्षा होती है जो सघन कृषि के लिए उपयुक्त है। यहाँ पर्णपाती वन पाए जाते हैं।

मानसून गर्त की भूमिका

गंगा के मैदानों में वर्षा पूर्व से पश्चिम की ओर घटती जाती है। पश्चिम बंगाल में लगभग 150 सेंटीमीटर वर्षा होती है, जो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम होकर दिल्ली तक पहुँचते-पहुँचते लगभग 60 सेंटीमीटर रह जाती है। इसका कारण यह है कि बंगाल की खाड़ी की मानसून शाखा जैसे-जैसे पश्चिम की ओर बढ़ती है, उसकी नमी कम होती जाती है।

3. कम वर्षा वाले क्षेत्र (50 to 100 cm)

इन क्षेत्रों में अपर्याप्त वर्षा होती है, जो कृषि के लिए अक्सर सिंचाई पर निर्भर करती है। इसमें ऊपरी गंगा का मैदान (पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब), दक्कन के पठार का आंतरिक भाग (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना का वृष्टि-छाया प्रदेश), और पूर्वी राजस्थान शामिल हैं। ये क्षेत्र अक्सर सूखा प्रवण होते हैं।

वृष्टि-छाया प्रदेश का प्रभाव

दक्कन के पठार का अधिकांश भाग पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया प्रदेश (Rain-shadow Area) में पड़ता है। अरब सागर से आने वाली नमी युक्त हवाएँ पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढलानों पर अपनी अधिकांश नमी खो देती हैं, और जब वे पठार के ऊपर से गुजरती हैं तो शुष्क हो जाती हैं, जिससे यहाँ कम वर्षा होती है। यह क्षेत्र कृषि संकट का सामना करता है।

4. बहुत कम वर्षा वाले क्षेत्र (Less than 50 cm)

इन क्षेत्रों में बहुत ही कम वर्षा होती है, जिसके कारण ये शुष्क या अर्ध-शुष्क मरुस्थल हैं। इसमें पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल), गुजरात का कच्छ क्षेत्र, हरियाणा का दक्षिणी भाग और लद्दाख का ठंडा मरुस्थल शामिल हैं। यहाँ की वनस्पति कंटीली झाड़ियों और कैक्टस तक सीमित होती है।

कम वर्षा के भौगोलिक कारण

पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा का कारण अरावली पहाड़ियों का मानसून पवनों के समानांतर होना है, जो उन्हें रोक नहीं पातीं। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी के कारण हवा की नमी धारण करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे संघनन नहीं हो पाता। लद्दाख एक ठंडा मरुस्थल है क्योंकि यह हिमालय के वृष्टि-छाया क्षेत्र में स्थित है, जहाँ मानसून पवनें पहुँच ही नहीं पातीं।

6. भारत के प्रमुख जलवायु प्रदेश (Climatic Regions of India)

जलवायु वर्गीकरण का आधार

भारत की जलवायु में व्यापक क्षेत्रीय विविधताएँ हैं। इन विविधताओं को समझने के लिए, भूगोलवेत्ताओं ने देश को विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया है। सबसे प्रसिद्ध वर्गीकरणों में से एक कोपेन (Koppen’s Classification) का है, जो तापमान और वर्षा के मासिक औसत मानों पर आधारित है। छात्रों की सुविधा के लिए, हम यहाँ एक सरलीकृत वर्गीकरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

1. उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु (Amw – Tropical Monsoon Rainforest)

यह जलवायु प्रकार भारत के उन क्षेत्रों में पाया जाता है जहाँ बहुत भारी वर्षा होती है। इसमें पश्चिमी घाट का पश्चिमी तट, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और उत्तर-पूर्व भारत के कुछ हिस्से शामिल हैं। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी से अधिक होती है और एक बहुत छोटा शुष्क मौसम होता है। तापमान साल भर ऊँचा रहता है। इस जलवायु में घने उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन उगते हैं।

2. उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु (Aw – Tropical Savanna)

यह भारत के अधिकांश प्रायद्वीपीय पठार में पाई जाने वाली जलवायु है, जिसमें पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र भी शामिल हैं। यहाँ उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु की तुलना में वर्षा कम होती है (लगभग 70-100 सेमी) और शुष्क मौसम लंबा और अधिक स्पष्ट होता है। यहाँ पर्णपाती वन और सवाना जैसी घासभूमियाँ पाई जाती हैं।

3. शुष्क ग्रीष्म ऋतु के साथ मानसून जलवायु (As – Monsoon with Dry Summer)

यह एक अद्वितीय जलवायु प्रकार है जो केवल तमिलनाडु के कोरोमंडल तट पर पाया जाता है। इस क्षेत्र में अधिकांश वर्षा शीत ऋतु में लौटते हुए मानसून (उत्तर-पूर्वी मानसून) से होती है। ग्रीष्म ऋतु अपेक्षाकृत शुष्क रहती है। यह भारत के बाकी हिस्सों के वर्षा पैटर्न के ठीक विपरीत है, जहाँ गर्मियों में मानसून से वर्षा होती है।

4. अर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायु (BShw – Semi-arid Steppe)

यह जलवायु उन क्षेत्रों में पाई जाती है जो शुष्क मरुस्थलों और आर्द्र जलवायु क्षेत्रों के बीच एक संक्रमणकालीन क्षेत्र बनाते हैं। इसमें राजस्थान का पूर्वी भाग, गुजरात, हरियाणा और दक्कन के पठार के वृष्टि-छाया क्षेत्र शामिल हैं। यहाँ वर्षा बहुत कम (30-60 सेमी) और अविश्वसनीय होती है, जो केवल छोटी घास और कंटीली झाड़ियों के विकास का समर्थन करती है।

5. उष्ण मरुस्थलीय जलवायु (BWhw – Hot Desert)

यह जलवायु पश्चिमी राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र की विशेषता है। यहाँ वार्षिक वर्षा 30 सेमी से भी कम होती है। गर्मियों में दिन का तापमान बहुत अधिक होता है, जबकि सर्दियों में रातें बहुत ठंडी हो सकती हैं। अत्यधिक जल की कमी के कारण यहाँ प्राकृतिक वनस्पति बहुत विरल होती है, जिसमें मुख्य रूप से कैक्टस और कंटीले पौधे शामिल हैं।

6. शुष्क शीत ऋतु के साथ मानसून जलवायु (Cwg – Monsoon with Dry Winter)

यह जलवायु उत्तरी भारत के विशाल मैदानों (गंगा के मैदान) की विशेषता है। यहाँ गर्मियाँ गर्म और आर्द्र होती हैं, और सर्दियाँ ठंडी और शुष्क होती हैं। अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान होती है। यह भारत का सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्र है, जहाँ गेहूँ, चावल और गन्ने जैसी फसलें उगाई जाती हैं।

7. ठंडी आर्द्र शीत ऋतु के साथ जलवायु (Dfc – Cold Humid Winter)

यह जलवायु उत्तर-पूर्वी भारत के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों, विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में पाई जाती है। यहाँ ग्रीष्मकाल छोटा और हल्का होता है, जबकि शीतकाल लंबा, ठंडा और बर्फीला होता है। इन क्षेत्रों में शंकुधारी (Coniferous) वन पाए जाते हैं, जैसे कि पाइन, देवदार और फर।

8. ध्रुवीय प्रकार की जलवायु (E – Polar Type)

यह जलवायु हिमालय के उच्चतम क्षेत्रों, जैसे जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी भागों में पाई जाती है। यहाँ तापमान पूरे वर्ष बहुत कम रहता है और अधिकांश क्षेत्र स्थायी रूप से बर्फ से ढके रहते हैं। यहाँ वनस्पति का लगभग अभाव है और केवल लाइकेन और मॉस जैसी वनस्पतियाँ ही उग पाती हैं।

7. जलवायु संबंधी महत्वपूर्ण घटनाएँ

एल नीनो और भारतीय मानसून (El Niño and Indian Monsoon)

एल नीनो (El Niño) एक जटिल मौसमी घटना है जो प्रशांत महासागर में घटित होती है, लेकिन इसका प्रभाव दुनिया भर की जलवायु पर पड़ता है, जिसमें भारतीय मानसून भी शामिल है। सामान्य परिस्थितियों में, पूर्वी प्रशांत (पेरू के तट के पास) का पानी ठंडा होता है और पश्चिमी प्रशांत (इंडोनेशिया के पास) का पानी गर्म होता है। एल नीनो के दौरान यह स्थिति उलट जाती है।

एल नीनो का प्रभाव

एल नीनो के वर्षों में, पूर्वी प्रशांत महासागर असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इस सतह के गर्म पानी के कारण, वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न बदल जाता है। इसका सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है। अध्ययनों से पता चला है कि एल नीनो की घटनाओं और भारत में सूखा या कम वर्षा के बीच एक मजबूत संबंध है। यह भारत में कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

ला नीना और भारतीय मानसून (La Niña and Indian Monsoon)

ला नीना (La Niña) एल नीनो के विपरीत घटना है। ला नीना के दौरान, पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। यह स्थिति भारतीय मानसून के लिए अनुकूल मानी जाती है। ला नीना के वर्षों में, भारत में सामान्य से अधिक वर्षा होने की प्रवृत्ति होती है, जिससे कभी-कभी बाढ़ की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है।

दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation)

एल नीनो और ला नीना एक बड़ी परिघटना का हिस्सा हैं जिसे ENSO (El Niño-Southern Oscillation) कहा जाता है। दक्षिणी दोलन प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वायुदाब में होने वाले आवधिक परिवर्तनों को संदर्भित करता है। जब पूर्वी प्रशांत में उच्च दाब होता है और पश्चिमी प्रशांत में निम्न दाब होता है (ला नीना की स्थिति), तो भारतीय मानसून मजबूत होता है। इसके विपरीत होने पर (एल नीनो की स्थिति) मानसून कमजोर हो जाता है।

हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD)

IOD, जिसे कभी-कभी ‘इंडियन नीनो’ भी कहा जाता है, हिंद महासागर की अपनी आंतरिक जलवायु घटना है। यह अरब सागर (पश्चिमी हिंद महासागर) और इंडोनेशिया के दक्षिण में पूर्वी हिंद महासागर के बीच समुद्र की सतह के तापमान में अंतर को संदर्भित करता है। IOD के तीन चरण होते हैं: सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ।

IOD का मानसून पर प्रभाव

एक ‘सकारात्मक IOD’ घटना के दौरान, अरब सागर सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और पूर्वी हिंद महासागर सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। यह स्थिति भारतीय मानसून के लिए बहुत अनुकूल होती है और इससे अच्छी वर्षा होती है। इसके विपरीत, ‘नकारात्मक IOD’ के दौरान, अरब सागर ठंडा हो जाता है, जो मानसून को कमजोर करता है और वर्षा में कमी लाता है।

पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances)

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, पश्चिमी विक्षोभ भूमध्य सागर क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले बाह्य-उष्णकटिबंधीय तूफान (extra-tropical storms) हैं। ये शीत ऋतु के दौरान पश्चिमी जेट स्ट्रीम के साथ पूर्व की ओर यात्रा करते हैं और भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों को प्रभावित करते हैं। ये इस क्षेत्र में सर्दियों की वर्षा और बर्फबारी का मुख्य स्रोत हैं।

पश्चिमी विक्षोभ का महत्व

यह शीतकालीन वर्षा रबी की फसलों, विशेष रूप से गेहूँ के लिए जीवनदायिनी होती है, जो इस क्षेत्र की मुख्य फसल है। पहाड़ों पर होने वाला हिमपात ग्लेशियरों को पोषित करता है, जो गर्मियों में उत्तरी भारत की नदियों के लिए पानी का स्रोत बनते हैं। हालांकि, कभी-कभी तीव्र पश्चिमी विक्षोभ ओलावृष्टि, पाला और शीतलहर का कारण भी बन सकते हैं, जिससे फसलों को नुकसान होता है।

8. चरम मौसमी घटनाएँ: सूखा और बाढ़

सूखा: एक आवर्ती समस्या

सूखा (Drought) एक ऐसी स्थिति है जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक औसत से कम वर्षा होती है, जिससे जल की गंभीर कमी हो जाती है। भारतीय कृषि मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है, इसलिए मानसून की विफलता का सीधा परिणाम सूखा होता है। भारत का लगभग एक-तिहाई क्षेत्र सूखा प्रवण है, जिसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र का विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र, और कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के आंतरिक भाग प्रमुख हैं।

सूखे के प्रकार

सूखे को कई प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • मौसमी सूखा: जब वर्षा एक विस्तारित अवधि के लिए अपर्याप्त होती है।
  • जलविज्ञानीय सूखा: जब नदियों, झीलों और भूजल जैसे जल स्रोतों का स्तर काफी नीचे चला जाता है।
  • कृषि सूखा: जब मिट्टी में नमी की कमी के कारण फसलें मुरझाने लगती हैं।
  • सामाजिक-आर्थिक सूखा: जब जल की कमी से भोजन, चारा और आजीविका प्रभावित होने लगती है।

सूखे के परिणाम

सूखे के दूरगामी परिणाम होते हैं। इससे फसल बर्बाद हो जाती है, जिससे खाद्य असुरक्षा और अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। पशुओं के लिए चारे की कमी हो जाती है। पीने के पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो जाता है। लोगों को रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे सामाजिक और आर्थिक तनाव बढ़ता है।

बाढ़: एक और चरम घटना

बाढ़ (Flood) सूखे के बिल्कुल विपरीत है। यह तब होती है जब अत्यधिक वर्षा या अन्य कारणों से नदी का पानी अपने किनारों को तोड़कर आसपास के शुष्क क्षेत्रों में फैल जाता है। भारत में बाढ़ एक आम और विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। मानसून के दौरान कुछ दिनों के भीतर अत्यधिक तीव्र वर्षा (बादल फटना) बाढ़ का मुख्य कारण है।

भारत के प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्र

भारत के प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में असम, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान शामिल हैं। ब्रह्मपुत्र नदी, विशेष रूप से, अपनी विनाशकारी बाढ़ के लिए कुख्यात है। इसके अलावा, गुजरात, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र भी चक्रवातों के कारण आने वाली बाढ़ से प्रभावित होते हैं। शहरी क्षेत्रों में अनुचित जल निकासी प्रणाली के कारण ‘शहरी बाढ़’ (Urban Flooding) भी एक बड़ी समस्या बन गई है।

बाढ़ के कारण

प्राकृतिक कारणों के अलावा, मानवीय गतिविधियाँ भी बाढ़ की गंभीरता को बढ़ाती हैं। वनों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और नदियों में गाद जमा हो जाती है, जिससे उनकी जल धारण क्षमता कम हो जाती है। नदी के बाढ़ के मैदानों पर अनियोजित निर्माण और अतिक्रमण भी बाढ़ के खतरे को बढ़ाता है।

बाढ़ और सूखे का प्रबंधन

इन चरम घटनाओं से निपटने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सूखे के प्रबंधन के लिए वर्षा जल संचयन, जल-संभर प्रबंधन (Watershed Management), और ड्रिप सिंचाई जैसी जल-बचत तकनीकों को बढ़ावा देना आवश्यक है। बाढ़ के प्रबंधन के लिए तटबंधों का निर्माण, नदियों को आपस में जोड़ना, और एक प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) स्थापित करना महत्वपूर्ण है।

सरकार की भूमिका

सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के माध्यम से इन आपदाओं के लिए तैयारी, प्रतिक्रिया और शमन के लिए नीतियां और योजनाएं बनाती है। फसल बीमा योजनाएं और आपदा राहत कोष किसानों और प्रभावित लोगों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में मदद करते हैं। इन चरम घटनाओं का प्रभावी ढंग से सामना करने के लिए सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

9. भारत की जलवायु पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जलवायु परिवर्तन का परिचय

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पृथ्वी के औसत मौसम पैटर्न में दीर्घकालिक बदलाव को संदर्भित करता है। यह मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन) के उत्सर्जन में वृद्धि के कारण हो रहा है, जो मानवीय गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने और वनों की कटाई का परिणाम है। भारत, अपनी विशाल आबादी और विविध भूगोल के साथ, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।

तापमान में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा प्रभाव तापमान में वृद्धि है। भारत में पिछले कुछ दशकों में औसत तापमान में लगातार वृद्धि देखी गई है। इसके परिणामस्वरूप, गर्म हवाएँ (लू) अधिक तीव्र, लगातार और लंबी अवधि की हो रही हैं। इससे गर्मी से संबंधित बीमारियों और मृत्यु दर में वृद्धि हुई है, साथ ही कृषि उत्पादकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

मानसून पैटर्न में बदलाव

जलवायु परिवर्तन भारतीय मानसून के पैटर्न को बदल रहा है, जो देश की जल सुरक्षा और कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। अध्ययनों से पता चलता है कि कुल वर्षा की मात्रा शायद न बदले, लेकिन इसका वितरण और तीव्रता बदल रही है। अब कम समय में अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाएँ (Extreme Rainfall Events) बढ़ रही हैं, जिसके बाद लंबे शुष्क दौर आते हैं।

चरम घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि

अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि से बाढ़, भूस्खलन और मिट्टी के कटाव का खतरा बढ़ गया है। वहीं, लंबे शुष्क दौर से सूखा पड़ने की आवृत्ति और गंभीरता भी बढ़ रही है। इसका मतलब है कि भारत को एक ही समय में या बारी-बारी से बाढ़ और सूखे जैसी दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो जल प्रबंधन को और भी जटिल बना रहा है।

हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना

बढ़ते तापमान के कारण हिमालय के ग्लेशियर खतरनाक दर से पिघल रहे हैं। ये ग्लेशियर गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी उत्तर भारत की बारहमासी नदियों के लिए पानी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। अल्पकाल में, ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ सकता है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन दीर्घावधि में, ग्लेशियरों के सिकुड़ने से गर्मियों के दौरान नदियों में पानी की उपलब्धता कम हो जाएगी, जिससे करोड़ों लोगों के लिए जल संकट पैदा हो सकता है।

समुद्र के स्तर में वृद्धि

वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण महासागरों का तापीय विस्तार हो रहा है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है। भारत की लंबी तटरेखा (लगभग 7500 किमी) है, और मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे कई प्रमुख शहर तटीय क्षेत्रों में स्थित हैं। समुद्र के स्तर में वृद्धि से तटीय कटाव, निचले इलाकों में बाढ़ और खारे पानी के मीठे पानी के स्रोतों में घुसपैठ का खतरा बढ़ गया है।

कृषि पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन का भारतीय कृषि पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। तापमान में वृद्धि, वर्षा पैटर्न में बदलाव और चरम मौसम की घटनाओं से फसल की पैदावार कम हो रही है। कुछ फसलें, जैसे गेहूँ, तापमान वृद्धि के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। इससे खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा पैदा हो गया है और किसानों की आजीविका पर संकट आ गया है।

अनुकूलन और शमन रणनीतियाँ

इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत को दोहरी रणनीति अपनाने की जरूरत है: अनुकूलन (Adaptation) और शमन (Mitigation)। अनुकूलन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के साथ तालमेल बिठाने के लिए कदम उठाना शामिल है, जैसे कि सूखा प्रतिरोधी फसलों का विकास करना, जल संरक्षण को बढ़ावा देना और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा करना। शमन में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के प्रयास शामिल हैं, जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) को अपनाना और ऊर्जा दक्षता में सुधार करना।

10. निष्कर्ष और भविष्य की राह

भारत की जलवायु की जटिलता

इस विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि भारत की जलवायु एक अत्यंत जटिल और विविध प्रणाली है। यह अक्षांश, हिमालय, समुद्र से दूरी और मानसून जैसी कई शक्तियों के परस्पर क्रिया का परिणाम है। यह विविधता ही भारत को एक अद्वितीय भौगोलिक इकाई बनाती है, जहाँ एक ओर विश्व के सबसे नम स्थान हैं तो दूसरी ओर शुष्क मरुस्थल। यह जलवायु देश की कृषि, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और जीवन शैली को गहराई से प्रभावित करती है।

मानसून की केंद्रीय भूमिका

भारतीय जलवायु के अध्ययन में मानसून की केंद्रीय भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। यह केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि देश की धड़कन है। एक अच्छा मानसून समृद्धि लाता है, जबकि एक कमजोर मानसून व्यापक संकट का कारण बनता है। इसलिए, मानसून की गतिशीलता को समझना और इसके पैटर्न में होने वाले परिवर्तनों की भविष्यवाणी करना भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती

आज, भारत की जलवायु एक अभूतपूर्व चुनौती का सामना कर रही है: जलवायु परिवर्तन। बढ़ते तापमान, अनिश्चित मानसून और चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति देश के सतत विकास के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। यह न केवल हमारी खाद्य और जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है, बल्कि हमारे पारिस्थितिक तंत्र और मानव स्वास्थ्य पर भी दबाव डाल रहा है।

आगे की राह: सतत विकास

भविष्य की राह एक सतत और जलवायु-लचीले विकास पथ को अपनाने में निहित है। हमें अपनी विकास नीतियों को जलवायु संबंधी विचारों के साथ एकीकृत करना होगा। इसमें जल संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रबंधन, कृषि पद्धतियों में सुधार, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश और आपदा प्रबंधन क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है।

छात्रों के लिए संदेश

छात्रों के रूप में, आप इस परिवर्तन के वाहक हैं। भारत की जलवायु की जटिलताओं को समझना केवल एक अकादमिक अभ्यास नहीं है, बल्कि यह आपको एक सूचित और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करेगा। जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूकता फैलाना, स्थायी जीवन शैली अपनाना और नीतिगत बदलावों की वकालत करना कुछ ऐसे तरीके हैं जिनसे आप एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य के निर्माण में योगदान दे सकते हैं। “`

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