भारतीय राज्य और प्रशासन: वितरण, सीमा और प्रशासनिक ढांचा
भारतीय राज्य और प्रशासन: वितरण, सीमा और प्रशासनिक ढांचा

भारतीय राज्य और प्रशासन: वितरण, सीमा और प्रशासनिक ढांचा

विषय सूची (Table of Contents)

परिचय: भारत का प्रशासनिक भूगोल

भारत की विविधता का प्रतिबिंब

भारत, जिसे आधिकारिक तौर पर भारतीय गणराज्य के रूप में जाना जाता है, अपनी विशाल भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यह विविधता केवल परिदृश्यों, भाषाओं या परंपराओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के प्रशासनिक ढांचे में भी गहराई से झलकती है। भारत को 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी पहचान, इतिहास और प्रशासनिक प्रणाली है। यह विभाजन शासन को सुव्यवस्थित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि विकास देश के हर कोने तक पहुंचे।

एक ‘राज्यों का संघ’

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को ‘राज्यों के संघ’ (Union of States) के रूप में वर्णित किया गया है। यह वाक्यांश भारत की संघीय प्रकृति को दर्शाता है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। हालाँकि, भारतीय संघवाद में केंद्र की ओर एक मजबूत झुकाव है, जो इसे एक अर्ध-संघीय (quasi-federal) प्रणाली बनाता है। इस प्रणाली को समझना किसी भी छात्र के लिए महत्वपूर्ण है जो भारतीय राजनीति और प्रशासन की जटिलताओं को समझना चाहता है।

प्रशासनिक ढांचे का महत्व

किसी भी देश की प्रगति उसके प्रशासनिक ढांचे की प्रभावशीलता पर बहुत अधिक निर्भर करती है। भारत का प्रशासनिक ढांचा केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों जैसे पंचायती राज संस्थानों तक फैला हुआ है। यह बहु-स्तरीय शासन मॉडल सुनिश्चित करता है कि नीतियां जमीनी स्तर पर लागू हों और नागरिकों की जरूरतों को पूरा किया जा सके। इस ब्लॉग पोस्ट में, हम भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के वितरण, उनकी सीमाओं और जटिल प्रशासनिक ढांचे का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

छात्रों के लिए प्रासंगिकता

सिविल सेवा, राज्य पीसीएस, या किसी अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए, भारतीय राज्य और प्रशासन एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इस विषय की गहन समझ न केवल उन्हें परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने में मदद करती है, बल्कि उन्हें एक सूचित और जिम्मेदार नागरिक भी बनाती है। यह पोस्ट विशेष रूप से छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जिसमें जटिल विषयों को सरल और सुलभ भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

भारत में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का विकास

स्वतंत्रता के समय की स्थिति

1947 में जब भारत को स्वतंत्रता मिली, तो देश राजनीतिक रूप से खंडित था। इसमें ब्रिटिश भारत के प्रांत और 550 से अधिक रियासतें शामिल थीं। इन रियासतों को भारत में एकीकृत करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसका श्रेय काफी हद तक सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है। प्रारंभिक एकीकरण के बाद, इन इकाइयों को प्रशासनिक सुविधा के लिए भाग A, B, C और D राज्यों में वर्गीकृत किया गया था, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं थी।

भाषाई आधार पर राज्यों की मांग

स्वतंत्रता के बाद, देश के विभिन्न हिस्सों से भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की जोरदार मांग उठी। लोगों का मानना था कि समान भाषा और संस्कृति वाले क्षेत्रों का अपना अलग राज्य होना चाहिए, जिससे प्रशासन और संचार आसान हो जाएगा। इस मांग के कारण कई आंदोलन हुए, जिनमें आंध्र प्रदेश के गठन के लिए पोट्टी श्रीरामुलु का आमरण अनशन सबसे प्रमुख था, जिसके कारण 1953 में मद्रास राज्य से तेलुगु भाषी क्षेत्रों को अलग करके आंध्र प्रदेश का गठन हुआ।

राज्य पुनर्गठन आयोग, 1953

भाषाई राज्यों की बढ़ती मांग को देखते हुए, भारत सरकार ने 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) का गठन किया। इस आयोग के अन्य सदस्य के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंजरू थे। आयोग ने पूरे देश का दौरा किया और विभिन्न समूहों से परामर्श के बाद 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग ने भाषा को राज्यों के पुनर्गठन का मुख्य आधार स्वीकार किया लेकिन ‘एक भाषा, एक राज्य’ के सिद्धांत को खारिज कर दिया।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956

आयोग की सिफारिशों के आधार पर, भारतीय संसद ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 पारित किया। इस अधिनियम ने भाग A, B, C और D राज्यों के वर्गीकरण को समाप्त कर दिया और 1 नवंबर, 1956 को 14 राज्यों और 6 केंद्र शासित प्रदेशों का निर्माण किया। यह भारतीय प्रशासनिक मानचित्र में एक ऐतिहासिक क्षण था। इस अधिनियम ने भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखते हुए भाषाई और सांस्कृतिक आकांक्षाओं को समायोजित करने का प्रयास किया।

1956 के बाद का पुनर्गठन

1956 के बाद भी राज्यों का पुनर्गठन जारी रहा। 1960 में, बॉम्बे राज्य को महाराष्ट्र और गुजरात में विभाजित किया गया। 1963 में, नागालैंड को असम से अलग करके एक अलग राज्य बनाया गया। 1966 में, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत पंजाब को पंजाब, हरियाणा और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में विभाजित किया गया। बाद के वर्षों में, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा को भी राज्य का दर्जा मिला।

21वीं सदी में नए राज्य

वर्ष 2000 में, तीन नए राज्यों का गठन किया गया: मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड (तब उत्तरांचल), और बिहार से झारखंड। इन राज्यों का गठन बेहतर प्रशासन और क्षेत्रीय विकास की मांगों के आधार पर किया गया था। सबसे हालिया राज्य गठन 2014 में हुआ, जब आंध्र प्रदेश को विभाजित करके तेलंगाना को भारत के 29वें राज्य के रूप में बनाया गया। यह दर्शाता है कि भारत का प्रशासनिक मानचित्र गतिशील है और बदलती जरूरतों के अनुसार विकसित होता रहता है।

जम्मू और कश्मीर का पुनर्गठन, 2019

एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और प्रशासनिक कदम में, अगस्त 2019 में, भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया, जिसने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था। इसके साथ ही, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 पारित किया गया, जिसने जम्मू और कश्मीर राज्य को दो नए केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया: (1) जम्मू और कश्मीर (विधानमंडल के साथ) और (2) लद्दाख (बिना विधानमंडल के)। इस परिवर्तन के बाद, भारत में राज्यों की संख्या 29 से घटकर 28 हो गई और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 7 से बढ़कर 9 हो गई।

केंद्र शासित प्रदेशों का विलय

प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए, दिसंबर 2019 में, संसद ने दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव (केंद्र शासित प्रदेशों का विलय) विधेयक, 2019 पारित किया। इस अधिनियम के तहत, 26 जनवरी, 2020 से इन दोनों केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर एक एकल केंद्र शासित प्रदेश ‘दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव’ बना दिया गया। इस विलय के बाद, भारत में केंद्र शासित प्रदेशों की कुल संख्या 9 से घटकर 8 हो गई।

भारत के राज्य और उनकी राजधानियाँ (28 राज्य)

राज्यों का भौगोलिक वितरण

भारत के 28 राज्य देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में फैले हुए हैं, जो उत्तर में शक्तिशाली हिमालय से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर तक फैले हुए हैं। प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएं, जलवायु, संस्कृति और अर्थव्यवस्था है। यह विविधता भारत की ताकत है और इसके संघीय ढांचे को अद्वितीय बनाती है। नीचे सभी 28 राज्यों और उनकी राजधानियों की सूची दी गई है।

उत्तर भारत के राज्य

उत्तर भारत अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, उपजाऊ मैदानों और हिमालयी श्रृंखलाओं के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र के राज्य भारत की राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • हिमाचल प्रदेश – शिमला (ग्रीष्मकालीन), धर्मशाला (शीतकालीन)
  • पंजाब – चंडीगढ़ (हरियाणा के साथ साझा)
  • उत्तराखंड – देहरादून (शीतकालीन), गैरसैंण (ग्रीष्मकालीन)
  • हरियाणा – चंडीगढ़ (पंजाब के साथ साझा)
  • उत्तर प्रदेश – लखनऊ
  • राजस्थान – जयपुर

पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के राज्य

पूर्वी भारत खनिज संसाधनों से समृद्ध है, जबकि पूर्वोत्तर भारत अपनी जैव विविधता और अद्वितीय जनजातीय संस्कृतियों के लिए प्रसिद्ध है, जिसे ‘सात बहनों’ (Seven Sisters) के नाम से भी जाना जाता है।

  • बिहार – पटना
  • झारखंड – रांची
  • पश्चिम बंगाल – कोलकाता
  • ओडिशा – भुवनेश्वर
  • सिक्किम – गंगटोक
  • अरुणाचल प्रदेश – ईटानगर
  • नागालैंड – कोहिमा
  • मणिपुर – इंफाल
  • मिजोरम – आइजोल
  • त्रिपुरा – अगरतला
  • मेघालय – शिलांग
  • असम – দিসপুর (Dispur)

मध्य भारत के राज्य

मध्य भारत, जिसे अक्सर ‘भारत का हृदय’ कहा जाता है, अपने घने जंगलों, राष्ट्रीय उद्यानों और जनजातीय आबादी के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र देश के मध्य में स्थित होने के कारण रणनीतिक महत्व रखता है।

  • मध्य प्रदेश – भोपाल
  • छत्तीसगढ़ – रायपुर

पश्चिम भारत के राज्य

पश्चिम भारत एक आर्थिक रूप से गतिशील क्षेत्र है, जिसमें भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई भी शामिल है। यह क्षेत्र अपने औद्योगिक विकास, व्यापार और जीवंत संस्कृति के लिए जाना जाता है।

  • गुजरात – गांधीनगर
  • महाराष्ट्र – मुंबई
  • गोवा – पणजी

दक्षिण भारत के राज्य

दक्षिण भारत अपनी समृद्ध द्रविड़ संस्कृति, ऐतिहासिक मंदिरों, सुंदर समुद्र तटों और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में भारत के कुछ सबसे प्रगतिशील और शिक्षित राज्य शामिल हैं।

  • कर्नाटक – बेंगलुरु
  • केरल – तिरुवनंतपुरम
  • तमिलनाडु – चेन्नई
  • आंध्र प्रदेश – अमरावती
  • तेलंगाना – हैदराबाद

भारत के केंद्र शासित प्रदेश और उनकी राजधानियाँ (8 केंद्र शासित प्रदेश)

केंद्र शासित प्रदेशों की अवधारणा

केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories – UTs) वे प्रशासनिक इकाइयाँ हैं जो सीधे केंद्र सरकार द्वारा शासित होती हैं। इनका गठन विभिन्न कारणों से किया गया है, जैसे कि रणनीतिक महत्व (अंडमान और निकोबार), सांस्कृतिक विशिष्टता (पुडुचेरी), या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रशासन (दिल्ली)। इनका प्रशासनिक ढांचा राज्यों से भिन्न होता है और इन्हें सीमित स्वायत्तता प्राप्त होती है।

विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश

भारत के कुछ केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी निर्वाचित विधानसभा और मंत्रिपरिषद रखने की अनुमति है, जो उन्हें राज्यों के समान कुछ शक्तियाँ प्रदान करता है। हालाँकि, इन पर भी अंतिम नियंत्रण केंद्र सरकार का ही होता है।

  • दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) – नई दिल्ली
  • पुडुचेरी – पुडुचेरी
  • जम्मू और कश्मीर – श्रीनगर (ग्रीष्मकालीन), जम्मू (शीतकालीन)

बिना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश

अधिकांश केंद्र शासित प्रदेशों में कोई निर्वाचित विधानसभा नहीं होती है और इनका प्रशासन सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक प्रशासक (Administrator) या उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) के माध्यम से किया जाता है।

  • लद्दाख – लेह
  • चंडीगढ़ – चंडीगढ़
  • दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव – दमन
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह – पोर्ट ब्लेयर
  • लक्षद्वीप – कवरत्ती

राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में मुख्य अंतर

शासन की प्रकृति

एक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के बीच सबसे मौलिक अंतर शासन की प्रकृति में निहित है। एक राज्य एक स्वायत्त इकाई है जिसकी अपनी चुनी हुई सरकार होती है जो राज्य सूची और समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बनाने के लिए स्वतंत्र होती है। राज्य का केंद्र के साथ एक संघीय संबंध होता है, जहाँ शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा निर्धारित होता है।

प्रशासनिक प्रमुख

राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल (Governor) होता है, जो राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है, लेकिन वास्तविक कार्यकारी शक्ति मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के पास होती है। इसके विपरीत, केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन सीधे भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, जो एक उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) या प्रशासक (Administrator) की नियुक्ति करते हैं। विधानमंडल वाले UTs (जैसे दिल्ली) में भी उपराज्यपाल के पास राज्यों के राज्यपालों की तुलना में अधिक विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं।

विधायी और कार्यकारी शक्तियाँ

राज्यों को अपने क्षेत्र के लिए कानून बनाने की व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं। वे अपने वित्त का प्रबंधन करते हैं और अपनी नीतियों को लागू करते हैं। दूसरी ओर, केंद्र शासित प्रदेशों की विधायी और कार्यकारी शक्तियाँ सीमित होती हैं। संसद किसी भी केंद्र शासित प्रदेश के लिए किसी भी विषय पर कानून बना सकती है। दिल्ली और पुडुचेरी जैसे UTs को कुछ विधायी शक्तियाँ दी गई हैं, लेकिन पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि जैसे महत्वपूर्ण विषय केंद्र के नियंत्रण में रहते हैं।

वित्तीय स्वायत्तता

राज्यों के पास कर लगाने और राजस्व एकत्र करने के अपने स्रोत होते हैं, और वे वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार केंद्रीय करों में भी हिस्सा प्राप्त करते हैं। इससे उन्हें वित्तीय स्वायत्तता मिलती है। इसके विपरीत, केंद्र शासित प्रदेशों को अपने बजट और व्यय के लिए सीधे केंद्र सरकार से धन प्राप्त होता है। उनकी वित्तीय शक्तियाँ बहुत सीमित होती हैं और वे केंद्र पर बहुत अधिक निर्भर रहते हैं।

भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ: एक विस्तृत अवलोकन

भारत की स्थलीय सीमाएँ

भारत एक विशाल देश है जिसकी स्थलीय सीमा लगभग 15,106.7 किलोमीटर है। यह सीमा सात पड़ोसी देशों के साथ लगती है। ये सीमाएँ न केवल भौगोलिक विभाजक हैं, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन सीमाओं की सुरक्षा और प्रबंधन भारत की विदेश और रक्षा नीति का एक प्रमुख घटक है।

बांग्लादेश के साथ सीमा

भारत बांग्लादेश के साथ अपनी सबसे लंबी स्थलीय सीमा साझा करता है, जिसकी लंबाई लगभग 4,096.7 किलोमीटर है। यह दुनिया की पांचवीं सबसे लंबी भूमि सीमा है। भारतीय राज्य जो बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करते हैं, वे हैं – पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम। यह सीमा घनी आबादी वाले क्षेत्रों, नदियों और कृषि भूमि से होकर गुजरती है, जिससे इसका प्रबंधन जटिल हो जाता है।

चीन के साथ सीमा

भारत और चीन के बीच की सीमा, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual Control – LAC) के रूप में भी जाना जाता है, लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी है। यह सीमा लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से लगती है। यह सीमा काफी हद तक विवादित है और दोनों देशों के बीच तनाव का एक प्रमुख स्रोत रही है। मैकमोहन रेखा (McMahon Line) पूर्वी क्षेत्र में सीमा का निर्धारण करती है, जिसे चीन मान्यता नहीं देता।

पाकिस्तान के साथ सीमा

भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा लगभग 3,323 किलोमीटर लंबी है। यह सीमा जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, पंजाब, राजस्थान और गुजरात से लगती है। इस सीमा को अंतर्राष्ट्रीय सीमा (IB) और नियंत्रण रेखा (Line of Control – LOC) में विभाजित किया गया है। रैडक्लिफ रेखा (Radcliffe Line) गुजरात से लेकर जम्मू में अंतर्राष्ट्रीय सीमा के अंत तक फैली हुई है, जबकि LOC जम्मू और कश्मीर में विवादित क्षेत्र को अलग करती है। यह दुनिया की सबसे अधिक सैन्यीकृत सीमाओं में से एक है।

नेपाल के साथ सीमा

भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी एक खुली सीमा है। यह सीमा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम राज्यों से लगती है। दोनों देशों के बीच गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के कारण, नागरिक बिना वीजा के इस सीमा को पार कर सकते हैं। हालांकि, इस खुली सीमा का उपयोग कभी-कभी अवैध गतिविधियों के लिए भी किया जाता है, जो एक सुरक्षा चिंता का विषय है।

म्यांमार के साथ सीमा

भारत और म्यांमार के बीच की सीमा लगभग 1,643 किलोमीटर लंबी है। यह सीमा पूर्वोत्तर के चार राज्यों – अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से लगती है। यह क्षेत्र घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों से युक्त है, जो सीमा प्रबंधन को चुनौतीपूर्ण बनाता है। दोनों देशों ने सीमा पार आवाजाही को विनियमित करने के लिए एक मुक्त आवाजाही व्यवस्था (Free Movement Regime) स्थापित की है।

भूटान के साथ सीमा

भारत और भूटान के बीच लगभग 699 किलोमीटर लंबी एक शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण सीमा है। यह सीमा सिक्किम, पश्चिम बंगाल, असम और अरुणाचल प्रदेश राज्यों से लगती है। भारत और भूटान के बीच विशेष संबंध हैं, और भारत भूटानी सेना को प्रशिक्षण और सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सीमा दोनों देशों के बीच मजबूत सहयोग का प्रतीक है।

अफगानिस्तान के साथ सीमा

भारत अफगानिस्तान के साथ एक बहुत छोटी, लगभग 106 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। यह सीमा वर्तमान में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित है। डूरंड रेखा (Durand Line) इस सीमा का निर्धारण करती है। चूंकि यह क्षेत्र वर्तमान में भारत के सीधे नियंत्रण में नहीं है, इसलिए यह एक वास्तविक सीमा के बजाय एक दावा की गई सीमा है।

भारत की जलीय (समुद्री) सीमा

भारत की एक लंबी तटरेखा है, जिसकी मुख्य भूमि, अंडमान और निकोबार और लक्षद्वीप द्वीपों सहित कुल लंबाई लगभग 7,516.6 किलोमीटर है। भारत सात देशों – बांग्लादेश, इंडोनेशिया, म्यांमार, पाकिस्तान, थाईलैंड, श्रीलंका और मालदीव के साथ अपनी समुद्री सीमा साझा करता है। भारत का विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ) 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैला हुआ है, जो समुद्री संसाधनों के विशाल भंडार प्रदान करता है।

राज्यों का प्रशासनिक ढांचा: राज्य सरकार की कार्यप्रणाली

राज्य की कार्यपालिका (State Executive)

प्रत्येक राज्य की अपनी कार्यपालिका होती है, जो केंद्र की कार्यपालिका के समान ही संरचित होती है। राज्य की कार्यपालिका में राज्यपाल (Governor), मुख्यमंत्री (Chief Minister), मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) और राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) शामिल होते हैं। यह निकाय राज्य के कानूनों को लागू करने और प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार है।

राज्यपाल की भूमिका और शक्तियाँ

राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। उसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा पांच साल के कार्यकाल के लिए की जाती है। राज्यपाल की शक्तियों में कार्यकारी, विधायी, वित्तीय और न्यायिक शक्तियाँ शामिल हैं। वह मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है, राज्य विधानमंडल के सत्रों को आहूत और सत्रावसान करता है, और विधेयकों को अपनी सहमति देता है। हालांकि, वह आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है।

मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद

मुख्यमंत्री राज्य सरकार का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख होता है। वह राज्य विधानसभा में बहुमत दल का नेता होता है। मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति की जाती है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि यदि विधानसभा में सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना पड़ता है।

राज्य की विधायिका (State Legislature)

प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल होता है, जो या तो एकसदनीय (Unicameral) या द्विसदनीय (Bicameral) हो सकता है। एकसदनीय विधायिका में केवल एक सदन होता है, जिसे विधानसभा (Legislative Assembly) कहा जाता है। द्विसदनीय विधायिका में दो सदन होते हैं – विधानसभा (निचला सदन) और विधान परिषद (Legislative Council) (उच्च सदन)। वर्तमान में, केवल छह राज्यों – आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में द्विसदनीय विधायिका है।

विधानसभा और विधान परिषद की संरचना

विधानसभा के सदस्य (MLAs) सीधे राज्य के लोगों द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं। विधानसभा का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है। विधान परिषद एक स्थायी सदन है, जिसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं। इसके सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं, जिसमें स्थानीय निकायों, स्नातकों, शिक्षकों के प्रतिनिधि और राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य शामिल होते हैं।

राज्य की न्यायपालिका (State Judiciary)

राज्य की न्यायपालिका प्रणाली के शीर्ष पर उच्च न्यायालय (High Court) होता है। प्रत्येक राज्य का अपना उच्च न्यायालय हो सकता है, या दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय हो सकता है, जैसा कि संसद द्वारा निर्धारित किया गया हो। उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ न्यायालयों का एक पदानुक्रम होता है, जिसमें जिला न्यायालय, सत्र न्यायालय और अन्य निचली अदालतें शामिल हैं। उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों को लागू करने सहित विभिन्न मामलों पर व्यापक अधिकार क्षेत्र प्राप्त है।

केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासनिक ढांचा

प्रशासन का सामान्य मॉडल

संविधान के अनुच्छेद 239 के अनुसार, प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। राष्ट्रपति इस कार्य के लिए एक प्रशासक (Administrator) की नियुक्ति करता है, जिसे विभिन्न UTs में अलग-अलग पदनामों से जाना जाता है, जैसे उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) या मुख्य आयुक्त (Chief Commissioner)। यह प्रशासक राष्ट्रपति का एजेंट होता है और सीधे उसके प्रति उत्तरदायी होता है।

विधानमंडल वाले UTs की विशेष स्थिति

दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है, जहाँ एक निर्वाचित विधानसभा और मंत्रिपरिषद का प्रावधान है। इन UTs में, उपराज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होता है, ठीक वैसे ही जैसे राज्यों में राज्यपाल करते हैं। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि जैसे कुछ मामलों पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण होता है (विशेषकर दिल्ली के मामले में)। उपराज्यपाल और निर्वाचित सरकार के बीच शक्तियों का यह दोहराव अक्सर टकराव का कारण बनता है।

संसद की सर्वोच्च विधायी शक्ति

राज्यों के विपरीत, जहाँ केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन होता है, केंद्र शासित प्रदेशों के मामले में संसद सर्वोच्च होती है। संसद संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची सहित किसी भी सूची के किसी भी विषय पर केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कानून बना सकती है। यह शक्ति संसद को UTs के प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान करती है।

उच्च न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र

संसद कानून द्वारा किसी भी केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक उच्च न्यायालय का गठन कर सकती है या उसे किसी मौजूदा राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में रख सकती है। उदाहरण के लिए, दिल्ली का अपना उच्च न्यायालय है, जबकि चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के अधीन आता है। इसी तरह, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह कलकत्ता उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

स्थानीय स्वशासन: लोकतंत्र की नींव

स्थानीय स्वशासन का अर्थ और महत्व

स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) का अर्थ है स्थानीय मामलों का प्रबंधन स्थानीय लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से करना। यह लोकतंत्र का तीसरा स्तर है, जो केंद्र और राज्य सरकारों के बाद आता है। इसका महत्व इस बात में है कि यह जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करता है, लोगों को शासन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करता है, और यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय ज्ञान और संसाधनों का उपयोग करके किया जाए।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में स्थानीय स्वशासन की अवधारणा नई नहीं है। प्राचीन काल से ही गांवों में ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी संस्थाएं मौजूद थीं। ब्रिटिश शासन के दौरान, लॉर्ड रिपन ने 1882 में एक प्रस्ताव पारित किया जिसे ‘स्थानीय स्वशासन का मैग्ना कार्टा’ कहा जाता है। स्वतंत्रता के बाद, संविधान के अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत) में राज्यों को ग्राम पंचायतों को संगठित करने और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियां प्रदान करने का निर्देश दिया गया।

संवैधानिक दर्जा और 73वां/74वां संशोधन

लंबे समय तक, स्थानीय स्वशासन निकायों के पास संवैधानिक दर्जा नहीं था, जिसके कारण वे राज्य सरकारों की दया पर निर्भर थे। इस कमी को दूर करने के लिए, 1992 में संसद ने 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किए। 73वें संशोधन ने पंचायती राज (ग्रामीण स्थानीय शासन) को संवैधानिक दर्जा दिया, जबकि 74वें संशोधन ने नगर पालिकाओं (शहरी स्थानीय शासन) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया। इन संशोधनों ने स्थानीय निकायों के नियमित चुनाव, वित्त और शक्तियों को सुनिश्चित किया।

पंचायती राज व्यवस्था: ग्रामीण भारत का प्रशासन

73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992

यह अधिनियम 24 अप्रैल, 1993 को लागू हुआ, जिसे अब राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसने संविधान में एक नया भाग-IX जोड़ा, जिसमें अनुच्छेद 243 से 243-O तक के प्रावधान शामिल हैं। इसने एक नई ग्यारहवीं अनुसूची भी जोड़ी, जिसमें पंचायतों के 29 कार्यात्मक विषय शामिल हैं। इस अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) को एक संवैधानिक आधार प्रदान किया और पूरे देश में उनके लिए एक समान संरचना सुनिश्चित की।

त्रि-स्तरीय संरचना (Three-Tier Structure)

73वें संशोधन ने सभी राज्यों (जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें छोड़कर) के लिए त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली को अनिवार्य बना दिया है। यह संरचना इस प्रकार है:

  • ग्राम पंचायत (Gram Panchayat): यह गांव के स्तर पर सबसे निचली इकाई है।
  • पंचायत समिति (Panchayat Samiti): यह ब्लॉक या तालुका स्तर पर मध्यवर्ती इकाई है।
  • जिला परिषद (Zila Parishad): यह जिले के स्तर पर सर्वोच्च इकाई है।

ग्राम सभा: प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उदाहरण

ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था की नींव है। इसमें गांव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं। यह एक ऐसा मंच है जहाँ लोग सीधे विकास योजनाओं और स्थानीय प्रशासन के बारे में निर्णय लेते हैं। ग्राम सभा ग्राम पंचायत के कार्यों की निगरानी और मूल्यांकन करती है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होती है। यह प्रत्यक्ष लोकतंत्र का एक शक्तिशाली उपकरण है।

पंचायतों के कार्य

ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों को 29 विषय सौंपे गए हैं। इनमें कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य पालन, ग्रामीण आवास, पेयजल, सड़कें, ग्रामीण विद्युतीकरण, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता, और महिला एवं बाल विकास जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। इन कार्यों का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है।

पंचायतों का चुनाव और आरक्षण

पंचायतों के सभी स्तरों पर सदस्यों का चुनाव सीधे लोगों द्वारा किया जाता है। प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। संविधान में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान है। इसके अलावा, महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटों का आरक्षण अनिवार्य है, जिसने ग्रामीण भारत में महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में क्रांति ला दी है।

राज्य वित्त आयोग

73वां संशोधन राज्यों के राज्यपालों के लिए हर पांच साल में एक राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) का गठन करना अनिवार्य बनाता है। इस आयोग का कार्य पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करना और राज्य द्वारा एकत्र किए गए करों, शुल्कों और शुल्कों के वितरण के संबंध में सिफारिशें करना है। यह पंचायतों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें अपने कार्यों को प्रभावी ढंग से करने में सक्षम बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र है।

शहरी स्थानीय निकाय: शहरों का प्रबंधन

74वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992

यह अधिनियम शहरी स्थानीय निकायों (Urban Local Bodies – ULBs), जिन्हें नगर पालिकाओं के रूप में भी जाना जाता है, को संवैधानिक दर्जा देने के लिए पारित किया गया था। इसने संविधान में एक नया भाग-IXA जोड़ा और एक नई बारहवीं अनुसूची जोड़ी, जिसमें नगर पालिकाओं के 18 कार्यात्मक विषय शामिल हैं। यह अधिनियम शहरी क्षेत्रों में प्रभावी शासन और योजना सुनिश्चित करने के लिए एक मील का पत्थर था।

शहरी स्थानीय निकायों के प्रकार

अधिनियम में तीन प्रकार के शहरी स्थानीय निकायों का प्रावधान है, जो क्षेत्र की जनसंख्या और आकार पर निर्भर करता है:

  • नगर पंचायत (Nagar Panchayat): उन क्षेत्रों के लिए जो ग्रामीण से शहरी क्षेत्र में परिवर्तित हो रहे हैं।
  • नगर पालिका परिषद (Municipal Council): छोटे शहरी क्षेत्रों या छोटे शहरों के लिए।
  • नगर निगम (Municipal Corporation): बड़े शहरी क्षेत्रों या बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता के लिए।

नगर पालिकाओं के कार्य

बारहवीं अनुसूची में नगर पालिकाओं के लिए 18 विषयों को सूचीबद्ध किया गया है। इनमें शहरी नियोजन, भूमि उपयोग का विनियमन, सड़कें और पुल, जल आपूर्ति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता, अग्निशमन सेवाएं, झुग्गी-बस्ती सुधार, शहरी गरीबी उन्मूलन, पार्कों और खेल के मैदानों का प्रावधान, और जन्म और मृत्यु का पंजीकरण जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं। ये कार्य शहरी जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए आवश्यक हैं।

वार्ड समितियाँ और जिला योजना समिति

74वें संशोधन में 3 लाख या उससे अधिक की आबादी वाले नगर पालिकाओं में वार्ड समितियों (Wards Committees) के गठन का प्रावधान है। यह नागरिकों की भागीदारी को और भी निचले स्तर पर ले जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिनियम में प्रत्येक जिले में एक जिला योजना समिति (District Planning Committee – DPC) के गठन को अनिवार्य किया गया है। DPC जिले में पंचायतों और नगर पालिकाओं द्वारा तैयार की गई योजनाओं को समेकित करती है और पूरे जिले के लिए एक मसौदा विकास योजना तैयार करती है।

राज्यों के लिए विशेष प्रावधान और अंतर-राज्य संबंध

अनुच्छेद 371: विशेष राज्यों के लिए प्रावधान

भारतीय संविधान कुछ राज्यों की विशेष सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए विशेष प्रावधान करता है। अनुच्छेद 371 और इसके विभिन्न खंड (371-A से 371-J तक) महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा और कर्नाटक जैसे राज्यों के लिए विशेष व्यवस्थाएं करते हैं। ये प्रावधान इन राज्यों के जनजातीय लोगों के हितों की रक्षा करने, उनके पिछड़े क्षेत्रों के विकास को सुनिश्चित करने और उनकी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए हैं।

अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council)

संविधान का अनुच्छेद 263 केंद्र और राज्यों तथा विभिन्न राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए एक अंतर-राज्य परिषद के गठन का प्रावधान करता है। इस परिषद का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जांच करना, उन पर सलाह देना, और साझा हित के विषयों पर चर्चा करना है। इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक और कुछ केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।

क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)

क्षेत्रीय परिषदों का गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। ये वैधानिक निकाय हैं, संवैधानिक नहीं। देश को पांच क्षेत्रों – उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक क्षेत्र की अपनी क्षेत्रीय परिषद है। इनका उद्देश्य राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देना है। केंद्रीय गृह मंत्री इन सभी परिषदों के अध्यक्ष होते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक अलग पूर्वोत्तर परिषद भी है।

अंतर-राज्य जल विवाद

भारत में कई नदियाँ एक से अधिक राज्यों से होकर बहती हैं, जिससे उनके जल के बंटवारे को लेकर अक्सर विवाद उत्पन्न होते हैं। संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्य नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है। इसी शक्ति का उपयोग करते हुए, संसद ने अंतर-राज्य जल विवाद अधिनियम, 1956 पारित किया है। इस अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार विवादों को सुलझाने के लिए अस्थायी न्यायाधिकरण (Tribunals) स्थापित कर सकती है। कावेरी, कृष्णा और रावी-ब्यास जल विवाद इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

निष्कर्ष

विविधता में एकता का प्रशासनिक मॉडल

भारत का प्रशासनिक ढांचा, अपने राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और स्थानीय निकायों के साथ, देश की ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यह ढांचा न केवल विशाल भौगोलिक क्षेत्र पर शासन करने की चुनौती को संबोधित करता है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों की अनूठी सांस्कृतिक और सामाजिक आकांक्षाओं को भी समायोजित करता है। राज्यों का गठन और पुनर्गठन इस गतिशील प्रक्रिया का प्रमाण है, जो बदलती जरूरतों के साथ विकसित होती रहती है।

लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण

पंचायती राज और नगर पालिका प्रणालियों की स्थापना के माध्यम से, भारत ने शासन को जमीनी स्तर तक ले जाकर लोकतंत्र को गहरा किया है। इसने लाखों लोगों, विशेषकर महिलाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सशक्त बनाया है। हालांकि इन संस्थाओं के कामकाज में अभी भी कई चुनौतियां हैं, लेकिन उन्होंने स्थानीय विकास और शासन में एक महत्वपूर्ण बदलाव की नींव रखी है।

सहकारी संघवाद की ओर

भारत का संघीय ढांचा चुनौतियों से रहित नहीं है, जिसमें केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव और अंतर-राज्य विवाद शामिल हैं। हालांकि, अंतर-राज्य परिषद और क्षेत्रीय परिषदों जैसे संस्थान सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं। एक मजबूत और समृद्ध भारत के लिए यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक टीम के रूप में मिलकर काम करें।

छात्रों के लिए अंतिम संदेश

भारतीय राज्य और प्रशासन का अध्ययन केवल तथ्यों और आंकड़ों को याद करने के बारे में नहीं है; यह उस जटिल प्रणाली को समझने के बारे में है जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाती है। एक छात्र के रूप में, इस विषय की गहरी समझ आपको न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता दिलाएगी, बल्कि आपको अपने देश के शासन और विकास में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए ज्ञान और अंतर्दृष्टि से भी लैस करेगी। यह ज्ञान आपको एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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