कल्पना कीजिए, 1999 की बर्फीली ऊंचाइयों की, जब भारतीय सेना कारगिल की चोटियों पर दुश्मन की घुसपैठ का सामना कर रही थी। उस दुर्गम इलाके में, सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी दुश्मन की सटीक स्थिति का पता लगाना और उन पर सटीक हमला करना। उस समय, हमारे सैनिकों का शौर्य और पराक्रम तो अद्वितीय था, लेकिन तकनीकी बढ़त की कमी महसूस हो रही थी। आज, दो दशक बाद, तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हमारे पास उपग्रह हैं जो दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखते हैं, ड्रोन हैं जो बिना किसी मानवीय क्षति के जानकारी जुटा सकते हैं, और गाइडेड मिसाइलें हैं जो बंकरों को भी सटीकता से भेद सकती हैं। यह अद्भुत परिवर्तन ही रक्षा प्रौद्योगिकी (Defence Technology) की शक्ति का प्रमाण है। रक्षा प्रौद्योगिकी केवल हथियार बनाने तक सीमित नहीं है; यह एक राष्ट्र की संप्रभुता, सुरक्षा और वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति को परिभाषित करने वाला एक जटिल और बहुआयामी क्षेत्र है। यह विज्ञान, इंजीनियरिंग और नवाचार का वह संगम है जो किसी भी देश को बाहरी खतरों से बचाकर उसे ‘अजेय’ बनाने की क्षमता रखता है।
विषय-सूची (Table of Contents)
- 1. रक्षा प्रौद्योगिकी का परिचय (Introduction to Defence Technology)
- 2. भारत में रक्षा प्रौद्योगिकी का ऐतिहासिक विकास (Historical Development of Defence Technology in India)
- 3. भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी के प्रमुख स्तंभ (Key Pillars of Indian Defence Technology)
- 4. उभरती हुई रक्षा प्रौद्योगिकियां और भारत (Emerging Defence Technologies and India)
- 5. रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Self-Reliance in Defence Technology: ‘Make in India’ and ‘Atmanirbhar Bharat’)
- 6. रक्षा प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (Socio-Economic Impacts of Defence Technology)
- 7. भारत की प्रमुख रक्षा अनुसंधान संस्थाएं (India’s Key Defence Research Institutions)
- 8. निष्कर्ष: अजेय भारत की ओर एक कदम (Conclusion: A Step Towards Invincible India)
- 9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
1. रक्षा प्रौद्योगिकी का परिचय (Introduction to Defence Technology)
रक्षा प्रौद्योगिकी क्या है? (What is Defence Technology?)
रक्षा प्रौद्योगिकी, जिसे सैन्य प्रौद्योगिकी भी कहा जाता है, उन उपकरणों, प्रणालियों, संरचनाओं और तकनीकों का एक व्यापक समूह है जिनका उपयोग युद्ध और सैन्य अभियानों में किया जाता है। इसमें केवल हथियार ही नहीं, बल्कि संचार, निगरानी, लॉजिस्टिक्स, साइबर सुरक्षा और खुफिया जानकारी एकत्र करने वाली प्रणालियाँ भी शामिल हैं। सरल शब्दों में, यह विज्ञान और इंजीनियरिंग का वह अनुप्रयोग है जो एक देश की सेना को उसकी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करने के लिए आवश्यक उपकरण और क्षमताएं प्रदान करता है। यह एक निरंतर विकसित होने वाला क्षेत्र है, जहाँ हर दिन नए नवाचार पुरानी रणनीतियों को चुनौती देते हैं।
इसका महत्व क्यों है? (Why is it Important?)
आधुनिक विश्व में किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी जनसंख्या या अर्थव्यवस्था के आकार से नहीं, बल्कि उसकी तकनीकी क्षमता से भी आंकी जाती है। रक्षा प्रौद्योगिकी का महत्व कई गुना है:
- राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा: यह किसी भी देश को बाहरी आक्रमण से अपनी सीमाओं की रक्षा करने और अपनी संप्रभुता (sovereignty) बनाए रखने में सक्षम बनाती है।
- निवारक क्षमता (Deterrence): एक मजबूत रक्षा प्रौद्योगिकी क्षमता संभावित दुश्मनों को किसी भी तरह की आक्रामकता से रोकती है। परमाणु हथियार इसका एक चरम उदाहरण हैं।
- कूटनीतिक बढ़त: जिन देशों के पास उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी होती है, उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बढ़त मिलती है।
- आंतरिक सुरक्षा: इसका उपयोग आतंकवाद, उग्रवाद और अन्य आंतरिक सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए भी किया जाता है।
- आर्थिक विकास: एक स्वदेशी रक्षा उद्योग रोजगार पैदा करता है, तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देता है और निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित कर सकता है।
भारत के लिए रक्षा प्रौद्योगिकी का सामरिक महत्व (Strategic Importance of Defence Technology for India)
भारत की भौगोलिक स्थिति (geographical location) और पड़ोस की जटिलताएँ इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती हैं। दो परमाणु-सशस्त्र पड़ोसियों और एक लंबी, चुनौतीपूर्ण सीमा के साथ, भारत के लिए एक मजबूत और आत्मनिर्भर रक्षा प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना अनिवार्य है। आत्मनिर्भरता हमें न केवल रणनीतिक स्वायत्तता देती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करती है कि संकट के समय हम किसी अन्य देश पर महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों के लिए निर्भर न रहें। ‘आत्मनिर्भर भारत’ का दृष्टिकोण इसी रणनीतिक आवश्यकता से प्रेरित है, जहाँ भारत रक्षा उपकरणों का आयातक होने के बजाय एक प्रमुख निर्माता और निर्यातक बनने की आकांक्षा रखता है। यह यात्रा भारत को वास्तव में ‘अजेय’ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
2. भारत में रक्षा प्रौद्योगिकी का ऐतिहासिक विकास (Historical Development of Defence Technology in India)
स्वतंत्रता-पूर्व युग और प्रारंभिक नींव (Pre-Independence Era and Early Foundations)
भारत में रक्षा प्रौद्योगिकी की जड़ें प्राचीन काल तक जाती हैं, जहाँ धनुष-बाण, तलवारें और किलों की रणनीतिक वास्तुकला युद्ध कौशल का प्रमाण थीं। ब्रिटिश शासन के दौरान, भारत में कुछ आयुध कारखानों (Ordnance Factories) की स्थापना हुई, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की जरूरतों को पूरा करना था। प्रौद्योगिकी का विकास और नियंत्रण पूरी तरह से अंग्रेजों के हाथ में था। स्वतंत्रता के समय, भारत को एक बहुत ही सीमित रक्षा औद्योगिक आधार विरासत में मिला, जो मुख्य रूप से बुनियादी हथियारों और गोला-बारूद का उत्पादन करता था।
स्वतंत्रता के बाद का प्रारंभिक चरण (Early Post-Independence Phase)
आजादी के बाद, भारत के पहले प्रधानमंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर बहुत जोर दिया। 1950 के दशक में, रक्षा उत्पादन के लिए एक संगठित दृष्टिकोण अपनाया गया। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Undertakings) को मजबूत किया गया। हालांकि, इस शुरुआती दौर में भारत अपनी अधिकांश उन्नत सैन्य जरूरतों के लिए आयात पर बहुत अधिक निर्भर था, मुख्य रूप से ब्रिटेन और सोवियत संघ जैसे देशों से। इस दौर में स्वदेशी अनुसंधान और विकास पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता को महसूस किया जाने लगा था।
1962 के युद्ध के बाद का दौर और DRDO की भूमिका (Post-1962 War Era and the Role of DRDO)
1962 में चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत की रक्षा तैयारियों की कमजोरियों को उजागर कर दिया। इस युद्ध ने एक कड़वा सबक सिखाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भरता कितनी महत्वपूर्ण है। इस घटना के बाद, भारत ने अपनी रक्षा प्रौद्योगिकी क्षमताओं को गंभीरता से विकसित करने का निर्णय लिया। 1958 में स्थापित रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) को एक नई गति और दिशा मिली। DRDO को अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों के डिजाइन और विकास का काम सौंपा गया। यह भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने भविष्य के स्वदेशी कार्यक्रमों की नींव रखी।
परमाणु कार्यक्रम और मिसाइल युग की शुरुआत (Nuclear Program and the Dawn of the Missile Age)
1974 में ‘स्माइलिंग बुद्धा’ और 1998 में ‘ऑपरेशन शक्ति’ के साथ भारत के सफल परमाणु परीक्षणों ने दुनिया को इसकी तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया। यह केवल एक हथियार का परीक्षण नहीं था, बल्कि भारत की वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग शक्ति का एक सशक्त प्रदर्शन था। इसके समानांतर, 1980 के दशक में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) शुरू किया गया। इस कार्यक्रम ने भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया और पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग जैसी मिसाइलों की एक श्रृंखला विकसित की। यह कार्यक्रम भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी यात्रा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
21वीं सदी और आत्मनिर्भर भारत का दृष्टिकोण (21st Century and the Vision of Atmanirbhar Bharat)
21वीं सदी में प्रवेश करते हुए, भारत ने रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। LCA तेजस जैसे स्वदेशी लड़ाकू विमान, INS विक्रांत जैसे विमानवाहक पोत, और अर्जुन जैसे मुख्य युद्धक टैंक हमारी बढ़ती क्षमताओं का प्रमाण हैं। हाल के वर्षों में, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को और बढ़ावा दिया है। सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित कर रही है और रक्षा निर्यात को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। आज की रक्षा प्रौद्योगिकी केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष युद्ध जैसे भविष्य के क्षेत्रों तक फैली हुई है।
3. भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी के प्रमुख स्तंभ (Key Pillars of Indian Defence Technology)
भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी की इमारत कई मजबूत स्तंभों पर खड़ी है, जो हमारी सशस्त्र सेनाओं को जमीन, समुद्र और हवा में ताकत प्रदान करते हैं। इन स्तंभों ने दशकों के अथक अनुसंधान, विकास और नवाचार के माध्यम से आकार लिया है। आइए, इन प्रमुख क्षेत्रों में भारत की उपलब्धियों पर एक विस्तृत नजर डालें।
मिसाइल प्रौद्योगिकी: अचूक शक्ति का प्रतीक (Missile Technology: A Symbol of Precision Power)
मिसाइल प्रौद्योगिकी भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास कार्यक्रम का मुकुटमणि है। इसने भारत को उन चुनिंदा देशों के क्लब में शामिल कर दिया है जिनके पास बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों की एक विस्तृत श्रृंखला है।
- एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP): 1983 में शुरू हुए इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम ने भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता प्रदान की। इसके तहत पांच प्रमुख मिसाइल प्रणालियाँ विकसित की गईं:
- पृथ्वी (Prithvi): सतह से सतह पर मार करने वाली कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल।
- अग्नि (Agni): सतह से सतह पर मार करने वाली मध्यम से अंतरमहाद्वीपीय रेंज की बैलिस्टिक मिसाइलों की एक श्रृंखला। अग्नि-V की रेंज 5000 किमी से अधिक है, जो भारत को एक विश्वसनीय निवारक क्षमता प्रदान करती है।
- आकाश (Akash): सतह से हवा में मार करने वाली मध्यम दूरी की मिसाइल प्रणाली, जो दुश्मन के विमानों और ड्रोनों को निशाना बना सकती है।
- नाग (Nag): तीसरी पीढ़ी की ‘दागो और भूल जाओ’ (fire-and-forget) एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल।
- त्रिशूल (Trishul): सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइल।
- ब्रह्मोस (BrahMos): यह भारत और रूस का एक संयुक्त उद्यम है और दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक है। इसे जमीन, हवा, और समुद्र से लॉन्च किया जा सकता है, जो इसे एक अत्यंत घातक और बहुमुखी हथियार बनाता है। ब्रह्मोस की सफलता भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- भविष्य की प्रौद्योगिकियां: भारत अब हाइपरसोनिक मिसाइल प्रौद्योगिकी (Hypersonic Missile Technology) और एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइलों जैसे ‘मिशन शक्ति’ पर भी काम कर रहा है, जो हमारी निवारक क्षमताओं को और मजबूत करेगा।
नौसेना प्रौद्योगिकी: समुद्री सीमाओं का प्रहरी (Naval Technology: Guardian of the Maritime Borders)
भारत की विशाल तटरेखा और हिंद महासागर में इसकी रणनीतिक स्थिति को देखते हुए, एक मजबूत और आधुनिक नौसेना अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वदेशी नौसैनिक रक्षा प्रौद्योगिकी ने इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
- विमानवाहक पोत (Aircraft Carriers): INS विक्रांत का निर्माण भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह भारत में डिजाइन और निर्मित पहला विमानवाहक पोत है, जो भारत को उन कुछ देशों में से एक बनाता है जिनके पास ऐसी जटिल युद्धपोतों को बनाने की क्षमता है। यह हमारी नौसेना की शक्ति प्रक्षेपण (power projection) क्षमताओं को कई गुना बढ़ा देता है।
- परमाणु पनडुब्बियां (Nuclear Submarines): INS अरिहंत के साथ, भारत ने अपनी परमाणु त्रयी (Nuclear Triad) – जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हमला करने की क्षमता – को पूरा कर लिया है। ये पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकती हैं और दुश्मन को पता चले बिना जवाबी हमले की गारंटी देती हैं। यह हमारी रक्षा प्रौद्योगिकी का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
- स्वदेशी युद्धपोत: भारत अब कोलकाता-श्रेणी के डिस्ट्रॉयर, शिवालिक-श्रेणी के फ्रिगेट्स और कामोर्ता-श्रेणी के कॉर्वेट्स जैसे उन्नत युद्धपोतों का निर्माण कर रहा है। ये जहाज अत्याधुनिक हथियारों और सेंसर से लैस हैं और भारतीय नौसेना को ‘ब्लू वाटर नेवी’ बनने में मदद कर रहे हैं।
वायु सेना प्रौद्योगिकी: आकाश का रक्षक (Air Force Technology: Protector of the Skies)
आधुनिक युद्धों में हवाई श्रेष्ठता (air superiority) जीत के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय वायु सेना अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए स्वदेशी और विदेशी दोनों तरह की उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रही है।
- हल्का लड़ाकू विमान (LCA) तेजस: तेजस भारत का स्वदेशी रूप से विकसित चौथी पीढ़ी का, सुपरसोनिक, मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। दशकों के विकास के बाद, यह अब भारतीय वायु सेना का एक अभिन्न अंग है। यह ‘मेक इन इंडिया’ का एक चमकदार उदाहरण है और इसने भारत के एयरोस्पेस इकोसिस्टम को एक नई दिशा दी है।
- उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान (AMCA): भारत अब पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान, AMCA के विकास पर काम कर रहा है। यह एक अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना है जो भारत को लड़ाकू विमान प्रौद्योगिकी में दुनिया के अग्रणी देशों के बराबर ला खड़ा करेगी।
- ड्रोन और UAVs: निगरानी, लक्ष्यीकरण और खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए मानव रहित हवाई वाहन (UAVs) या ड्रोन तेजी से महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। DRDO ने रुस्तम और घातक जैसे स्वदेशी ड्रोन विकसित किए हैं, जो हमारी सेना की क्षमताओं को बढ़ा रहे हैं।
- हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली (AEW&C): ‘नेत्र’ AEW&C प्रणाली, जिसे एक एम्ब्रेयर जेट पर लगाया गया है, भारतीय वायु सेना को आसमान में ‘आंख’ प्रदान करती है। यह दुश्मन की गतिविधियों पर गहरी नजर रखने और हवाई अभियानों को प्रभावी ढंग से निर्देशित करने में मदद करती है।
थल सेना प्रौद्योगिकी: भूमि पर अजेय बल (Army Technology: Invincible Force on Land)
भारतीय सेना, जो दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, को विभिन्न प्रकार के इलाकों में काम करने के लिए आधुनिक उपकरणों की आवश्यकता होती है। स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी इस जरूरत को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
- मुख्य युद्धक टैंक (MBT) अर्जुन: MBT अर्जुन DRDO द्वारा विकसित एक तीसरी पीढ़ी का मुख्य युद्धक टैंक है। अपने शक्तिशाली इंजन, उन्नत कवच और सटीक मारक क्षमता के साथ, यह भारतीय सेना की बख्तरबंद क्षमताओं का एक प्रमुख हिस्सा है।
- तोपखाना प्रणाली (Artillery Systems): बोफोर्स घोटाले के बाद, भारत ने तोपखाने के स्वदेशीकरण पर जोर दिया। इसका परिणाम ‘धनुष’ हॉवित्जर और एडवांस्ड टोड आर्टिलरी गन सिस्टम (ATAGS) के रूप में सामने आया है, जो दुनिया की सबसे लंबी दूरी की तोपों में से एक है।
- व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण: भारत अब अपने सैनिकों के लिए स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट और अन्य सुरक्षात्मक गियर का उत्पादन कर रहा है। यह न केवल हमारे सैनिकों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है बल्कि आयात पर निर्भरता को भी कम करता है। यह जमीनी स्तर पर रक्षा प्रौद्योगिकी के महत्व को दर्शाता है।
4. उभरती हुई रक्षा प्रौद्योगिकियां और भारत (Emerging Defence Technologies and India)
युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज की लड़ाई केवल टैंकों, जहाजों और विमानों तक सीमित नहीं है। भविष्य के युद्धक्षेत्र अदृश्य होंगे, जो डेटा, एल्गोरिदम और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर लड़े जाएंगे। भारत इस बदलाव को समझता है और इन उभरती हुई रक्षा प्रौद्योगिकियों में अपनी क्षमताओं को विकसित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स (Artificial Intelligence (AI) and Robotics)
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) रक्षा प्रौद्योगिकी में क्रांति लाने की क्षमता रखती है। यह भविष्य की सैन्य प्रणालियों का मस्तिष्क होगी।
- AI के अनुप्रयोग: भारत रक्षा में AI के उपयोग की खोज कर रहा है, जिसमें शामिल हैं:
- खुफिया विश्लेषण (Intelligence Analysis): बड़ी मात्रा में डेटा (जैसे सैटेलाइट इमेज, संचार) का तेजी से विश्लेषण करके पैटर्न और खतरों की पहचान करना।
- स्वायत्त प्रणाली (Autonomous Systems): बिना मानवीय हस्तक्षेप के काम करने वाले ड्रोन, वाहन और रोबोट विकसित करना।
- लक्ष्य पहचान (Target Recognition): युद्ध के मैदान में दुश्मन के लक्ष्यों को स्वचालित रूप से पहचानने और प्राथमिकता देने में सैनिकों की मदद करना।
- लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन प्रबंधन: सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को अधिक कुशल और प्रभावी बनाना।
- भारत की पहल: रक्षा मंत्रालय ने रक्षा में AI के लिए एक रोडमैप तैयार किया है और डिफेंस AI काउंसिल (DAIC) का गठन किया है। DRDO की युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं (Young Scientist Labs) विशेष रूप से AI जैसी भविष्य की प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
साइबर सुरक्षा और साइबर युद्ध (Cyber Security and Cyber Warfare)
आज के डिजिटल युग में, साइबरस्पेस एक नया युद्धक्षेत्र बन गया है। एक साइबर हमला किसी देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे (critical infrastructure) – जैसे पावर ग्रिड, बैंकिंग सिस्टम और संचार नेटवर्क – को पंगु बना सकता है।
- साइबर युद्ध का खतरा: दुश्मन देश सैन्य नेटवर्क में घुसपैठ कर सकते हैं, संवेदनशील जानकारी चुरा सकते हैं, और कमांड और कंट्रोल सिस्टम को बाधित कर सकते हैं। यह पारंपरिक युद्ध की तरह ही विनाशकारी हो सकता है।
- भारत की तैयारी: भारत ने इस खतरे से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं:
- डिफेंस साइबर एजेंसी (DCA): तीनों सेनाओं की साइबर क्षमताओं को एकीकृत करने के लिए एक त्रि-सेवा एजेंसी का गठन किया गया है।
- राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति: देश के साइबरस्पेस को सुरक्षित करने के लिए एक व्यापक नीति लागू की गई है।
- CERT-In (Indian Computer Emergency Response Team): यह साइबर सुरक्षा की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाली राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है।
- एक मजबूत साइबर रक्षा प्रौद्योगिकी का विकास हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सर्वोपरि है।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और सैन्य अनुप्रयोग (Space Technology and Military Applications)
अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज के लिए नहीं है; यह आधुनिक सैन्य अभियानों का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है। उपग्रह संचार, नेविगेशन, मौसम की भविष्यवाणी और सबसे महत्वपूर्ण, खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही (ISR) के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- भारत की अंतरिक्ष शक्ति: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने देश को एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति के रूप में स्थापित किया है। हमारी सैन्य क्षमताएं भी ISRO की विशेषज्ञता का लाभ उठा रही हैं।
- मिशन शक्ति (Mission Shakti): 2019 में, भारत ने एक एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल का सफलतापूर्वक परीक्षण किया, जिसने एक लाइव सैटेलाइट को नष्ट कर दिया। इस मिशन ने भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में अपने संसाधनों की रक्षा करने की क्षमता रखने वाले चौथे देश के रूप में स्थापित किया। यह भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी में एक बड़ी छलांग थी।
- रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA): सशस्त्र बलों की अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं को बढ़ाने के लिए इस एजेंसी का गठन किया गया है। यह हमारी सेनाओं को अंतरिक्ष से मिलने वाली खुफिया जानकारी का बेहतर उपयोग करने में मदद करेगी।
क्वांटम कंप्यूटिंग और निर्देशित-ऊर्जा हथियार (Quantum Computing and Directed-Energy Weapons)
ये प्रौद्योगिकियां अभी भी विकास के प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन भविष्य में युद्ध के नियमों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती हैं।
- क्वांटम कंप्यूटिंग (Quantum Computing): क्वांटम कंप्यूटर आज के सुपर कंप्यूटरों की तुलना में अकल्पनीय गति से गणना कर सकते हैं। रक्षा में, इसका उपयोग एन्क्रिप्शन को तोड़ने, नए पदार्थ डिजाइन करने (जैसे बेहतर कवच), और जटिल सैन्य सिमुलेशन चलाने के लिए किया जा सकता है।
- निर्देशित-ऊर्जा हथियार (Directed-Energy Weapons – DEWs): ये लेजर, माइक्रोवेव या पार्टिकल बीम का उपयोग करके लक्ष्यों को नष्ट करते हैं। वे ड्रोन, मिसाइलों और अन्य खतरों से बचाव के लिए एक लागत प्रभावी और तेज समाधान प्रदान कर सकते हैं। DRDO DEWs पर सक्रिय रूप से शोध कर रहा है और उसने कुछ प्रोटोटाइप भी विकसित किए हैं।
- भारत इन भविष्य की रक्षा प्रौद्योगिकियों में निवेश कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह भविष्य के युद्धक्षेत्रों के लिए तैयार है।
5. रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता: ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Self-Reliance in Defence Technology: ‘Make in India’ and ‘Atmanirbhar Bharat’)
दशकों तक, भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में से एक रहा है। यह निर्भरता न केवल हमारी विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी पड़ती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक रणनीतिक कमजोरी है। संकट के समय, आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है या आपूर्तिकर्ता देश राजनीतिक दबाव डाल सकते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए, भारत सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी महत्वाकांक्षी पहलों के माध्यम से रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता हासिल करने पर जोर दिया है।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का उद्देश्य (Objectives of ‘Make in India’ and ‘Atmanirbhar Bharat’)
इन पहलों का मुख्य उद्देश्य भारत को एक वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र (global defence manufacturing hub) में बदलना है। इसके कई प्रमुख लक्ष्य हैं:
- आयात पर निर्भरता कम करना: रक्षा उपकरणों के आयात को कम करना और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना।
- स्वदेशी डिजाइन और विकास को बढ़ावा देना: DRDO, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और निजी क्षेत्र को अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- एक मजबूत रक्षा औद्योगिक आधार बनाना: एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना जहाँ सरकारी और निजी कंपनियां मिलकर काम कर सकें।
- रक्षा निर्यात को बढ़ावा देना: मित्र देशों को भारत में बने रक्षा उपकरण और प्रणालियाँ बेचकर एक प्रमुख निर्यातक बनना।
- रोजगार सृजन और आर्थिक विकास: रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में लाखों नौकरियां पैदा करना और अर्थव्यवस्था को गति देना।
प्रमुख नीतिगत सुधार (Key Policy Reforms)
आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, सरकार ने कई महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार किए हैं:
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure – DAP): DAP को स्वदेशी खरीद को प्राथमिकता देने के लिए संशोधित किया गया है। अब ‘बाय इंडियन (IDDM – Indigenously Designed, Developed and Manufactured)’ श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
- सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची (Positive Indigenisation Lists): सरकार ने कई सूचियाँ जारी की हैं जिनमें 100 से अधिक रक्षा उपकरणों को शामिल किया गया है, जिनके आयात पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध लगाया जाएगा। यह घरेलू उद्योग को इन वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए एक निश्चित बाजार प्रदान करता है।
- रक्षा क्षेत्र में FDI: रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को स्वचालित मार्ग से 74% तक बढ़ा दिया गया है, ताकि विदेशी कंपनियां भारत में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित हों।
- रक्षा औद्योगिक गलियारे (Defence Industrial Corridors): उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किए जा रहे हैं। इनका उद्देश्य रक्षा विनिर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा और आपूर्ति श्रृंखला नेटवर्क प्रदान करना है।
चुनौतियां और अवसर (Challenges and Opportunities)
रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता का मार्ग चुनौतियों से भरा है, लेकिन यह अपार अवसर भी प्रदान करता है।
- चुनौतियां:
- लंबी विकास अवधि: रक्षा परियोजनाओं को विकसित होने में अक्सर वर्षों या दशकों लग जाते हैं, जिससे वे महंगी हो जाती हैं।
- प्रौद्योगिकी की खाई: कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों (जैसे जेट इंजन) में भारत अभी भी उन्नत देशों से पीछे है।
- निजी क्षेत्र का विश्वास: निजी कंपनियों को अक्सर लालफीताशाही और अनिश्चित आदेशों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- गुणवत्ता और विश्वसनीयता: यह सुनिश्चित करना कि स्वदेशी उत्पाद सशस्त्र बलों की सख्त गुणवत्ता आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, एक बड़ी चुनौती है।
- अवसर:
- विशाल घरेलू बाजार: भारत की सशस्त्र सेनाएं दुनिया में सबसे बड़ी हैं, जो घरेलू उद्योग के लिए एक विशाल और सुनिश्चित बाजार प्रदान करती हैं।
- प्रतिभाशाली मानव संसाधन: भारत के पास बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली इंजीनियर और वैज्ञानिक हैं जो इस क्षेत्र में योगदान दे सकते हैं।
- निर्यात क्षमता: भारत अब ब्रह्मोस मिसाइल, तेजस विमान और अन्य रक्षा प्रणालियों का निर्यात शुरू कर रहा है, जिससे एक बड़ा आर्थिक अवसर पैदा हो रहा है।
- स्टार्टअप इकोसिस्टम: भारत का बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम रक्षा क्षेत्र में नवाचार और नई तकनीक लाने में मदद कर सकता है।
आत्मनिर्भरता एक रात में हासिल नहीं की जा सकती, लेकिन सही नीतियों, निरंतर निवेश और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ, भारत निश्चित रूप से रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक वैश्विक शक्ति बन सकता है।
6. रक्षा प्रौद्योगिकी के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव (Socio-Economic Impacts of Defence Technology)
रक्षा प्रौद्योगिकी का प्रभाव केवल युद्ध के मैदान तक ही सीमित नहीं होता है। यह एक देश के समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा और व्यापक प्रभाव डालता है। किसी भी अन्य बड़ी तकनीकी पहल की तरह, इसके भी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू होते हैं। एक संतुलित दृष्टिकोण हमें इसकी पूरी तस्वीर को समझने में मदद करता है।
सकारात्मक पहलू (Positive Aspects)
- तकनीकी नवाचार और स्पिन-ऑफ (Technological Innovation and Spin-offs):
- रक्षा अनुसंधान अक्सर अत्याधुनिक नवाचारों को जन्म देता है जो बाद में नागरिक उपयोग के लिए अपनाए जाते हैं। इसे ‘स्पिन-ऑफ’ तकनीक कहा जाता है।
- इंटरनेट (ARPANET के रूप में), जीपीएस, माइक्रोवेव ओवन, और यहां तक कि डक्ट टेप जैसी कई प्रौद्योगिकियों की जड़ें सैन्य अनुसंधान में हैं।
- भारत में, DRDO द्वारा विकसित हल्के कंपोजिट का उपयोग अब नागरिक उड्डयन और प्रोस्थेटिक्स में किया जा रहा है। इसी तरह, परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम से विकसित तकनीकें चिकित्सा और कृषि में क्रांति ला रही हैं।
- रोजगार सृजन (Job Creation):
- एक मजबूत रक्षा औद्योगिक आधार उच्च-कौशल वाले रोजगार के अवसर पैदा करता है। इसमें इंजीनियर, वैज्ञानिक, तकनीशियन, और कुशल श्रमिक शामिल होते हैं।
- जब भारत में एक लड़ाकू विमान या युद्धपोत बनाया जाता है, तो यह न केवल मुख्य निर्माता कंपनी में, बल्कि सैकड़ों छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) में भी रोजगार पैदा करता है जो पुर्जे और सेवाएं प्रदान करते हैं।
- आर्थिक विकास को बढ़ावा (Boost to Economic Growth):
- रक्षा पर किया गया खर्च, खासकर जब यह घरेलू उद्योग में निवेश किया जाता है, तो अर्थव्यवस्था में एक गुणक प्रभाव (multiplier effect) डालता है।
- रक्षा निर्यात से देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, जो व्यापार घाटे को कम करने में मदद करती है। भारत का लक्ष्य 2025 तक 5 बिलियन डॉलर का रक्षा निर्यात हासिल करना है।
- बुनियादी ढांचे का विकास (Infrastructure Development):
- रक्षा परियोजनाओं के लिए अक्सर रणनीतिक सड़कों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और संचार नेटवर्क के निर्माण की आवश्यकता होती है। यह बुनियादी ढांचा बाद में नागरिक और वाणिज्यिक उपयोग के लिए भी उपलब्ध होता है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों का विकास होता है।
नकारात्मक पहलू (Negative Aspects)
- उच्च लागत और बजट पर दबाव (High Cost and Budgetary Pressure):
- रक्षा प्रौद्योगिकी का विकास और खरीद बहुत महंगी होती है। एक आधुनिक लड़ाकू विमान या पनडुब्बी की लागत अरबों डॉलर हो सकती है।
- रक्षा पर भारी खर्च का मतलब है कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और गरीबी उन्मूलन जैसे अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों के लिए कम धन उपलब्ध हो सकता है। इसे ‘गन्स बनाम बटर’ (guns versus butter) बहस के रूप में जाना जाता है।
- हथियारों की होड़ का खतरा (Risk of Arms Race):
- जब एक देश अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाता है, तो उसके पड़ोसी देश खतरा महसूस कर सकते हैं और अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं।
- इससे एक खतरनाक हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है, जो क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाती है और संघर्ष के जोखिम को जन्म देती है।
- नैतिक और मानवीय चिंताएँ (Ethical and Humanitarian Concerns):
- रक्षा प्रौद्योगिकी का अंतिम उद्देश्य विनाशकारी शक्ति बनाना है। स्वायत्त हथियार प्रणालियों (autonomous weapon systems), जिन्हें ‘किलर रोबोट’ भी कहा जाता है, के विकास ने गंभीर नैतिक सवाल खड़े किए हैं कि क्या एक मशीन को जीवन और मृत्यु का निर्णय लेने की अनुमति दी जानी चाहिए।
- युद्ध में इन हथियारों के उपयोग से बड़े पैमाने पर मानवीय पीड़ा और विनाश होता है।
- पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact):
- हथियारों का उत्पादन, परीक्षण और उपयोग पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। सैन्य अभ्यास भूमि और जल को प्रदूषित कर सकते हैं, और युद्ध के अवशेष दशकों तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
यह स्पष्ट है कि रक्षा प्रौद्योगिकी एक दोधारी तलवार है। जबकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, इसके संभावित नकारात्मक परिणामों के प्रति सचेत रहना और एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
7. भारत की प्रमुख रक्षा अनुसंधान संस्थाएं (India’s Key Defence Research Institutions)
भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी की सफलता के पीछे कई समर्पित संगठनों का हाथ है, जो दशकों से देश को रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रहे हैं। ये संस्थान भारतीय रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं, जो अनुसंधान और विकास से लेकर उत्पादन तक हर चरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO – Defence Research and Development Organisation)
DRDO भारत की प्रमुख रक्षा अनुसंधान एजेंसी है। 1958 में स्थापित, यह रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करती है। इसका मिशन भारत को अत्याधुनिक रक्षा प्रौद्योगिकियों से लैस करना है।
- भूमिका और योगदान:
- DRDO मिसाइलों, लड़ाकू विमानों, टैंकों, रडार, सोनार और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली सहित विभिन्न प्रकार की रक्षा प्रणालियों के डिजाइन और विकास के लिए जिम्मेदार है।
- अग्नि और पृथ्वी मिसाइलें, LCA तेजस, अर्जुन टैंक, और नेत्र AEW&C प्रणाली DRDO की कुछ सबसे बड़ी उपलब्धियां हैं।
- DRDO की 50 से अधिक प्रयोगशालाओं का एक नेटवर्क है, जो विभिन्न प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखती हैं। अधिक जानकारी के लिए, आप उनकी आधिकारिक वेबसाइट www.drdo.gov.in पर जा सकते हैं।
- महत्व: DRDO ने भारत को कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भर बनाकर आयात पर निर्भरता को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL – Hindustan Aeronautics Limited)
HAL भारत की प्रमुख एयरोस्पेस और रक्षा कंपनी है। 1940 में स्थापित, यह विमान, हेलीकॉप्टर, जेट इंजन और उनके स्पेयर पार्ट्स के डिजाइन, निर्माण और असेंबली में शामिल है।
- भूमिका और योगदान:
- HAL भारतीय सशस्त्र बलों के लिए विमानों का मुख्य आपूर्तिकर्ता है। यह LCA तेजस, ध्रुव एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH), और सुखोई Su-30MKI जैसे विमानों का निर्माण करता है।
- यह भारतीय वायु सेना के विमानों के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) के लिए भी जिम्मेदार है।
- HAL भारत के एयरोस्पेस इकोसिस्टम के विकास में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है, जो कई छोटे आपूर्तिकर्ताओं का समर्थन करता है।
भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL – Bharat Electronics Limited)
BEL एक और महत्वपूर्ण रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है जो उन्नत इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और प्रणालियों का निर्माण करता है।
- भूमिका और योगदान:
- BEL भारतीय सशस्त्र बलों के लिए रडार, सोनार, संचार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और मिसाइल प्रणालियों के लिए इलेक्ट्रॉनिक घटकों का उत्पादन करता है।
- आकाश मिसाइल प्रणाली के लिए रडार और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVMs) BEL के कुछ प्रसिद्ध उत्पाद हैं।
- BEL भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी को इलेक्ट्रॉनिक ‘आंखें और कान’ प्रदान करने में महत्वपूर्ण है।
आयुध निर्माणी बोर्ड (OFB – Ordnance Factory Board) – अब निगमित
भारत में आयुध कारखानों का एक लंबा इतिहास है, जो 200 से अधिक वर्षों से सशस्त्र बलों को हथियार, गोला-बारूद और उपकरण प्रदान कर रहे हैं। हाल ही में, सरकार ने आयुध निर्माणी बोर्ड का पुनर्गठन कर इसे 7 नए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निगमित कर दिया है।
- भूमिका और योगदान:
- ये कंपनियां छोटे हथियारों, तोपखाने की तोपों, टैंकों, गोला-बारूद और सैन्य वाहनों के उत्पादन के लिए जिम्मेदार हैं।
- धनुष तोप और T-90 टैंकों का उत्पादन इसका उदाहरण है।
- इस पुनर्गठन का उद्देश्य दक्षता, स्वायत्तता और जवाबदेही को बढ़ाना है ताकि ये कंपनियां अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकें। यह रक्षा प्रौद्योगिकी उत्पादन में एक बड़ा सुधार है।
इन प्रमुख संगठनों के अलावा, कई अन्य निजी कंपनियां और स्टार्टअप भी अब भारतीय रक्षा प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करने में मदद कर रहे हैं।
8. निष्कर्ष: अजेय भारत की ओर एक कदम (Conclusion: A Step Towards Invincible India)
कारगिल की बर्फीली चोटियों से लेकर हिंद महासागर की गहराइयों तक और अंतरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों तक, भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी की यात्रा असाधारण रही है। हमने एक ऐसे देश से एक लंबा सफर तय किया है जो अपनी रक्षा जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर था, आज हम एक ऐसे राष्ट्र के रूप में खड़े हैं जो अपने स्वयं के लड़ाकू विमान, विमानवाहक पोत और बैलिस्टिक मिसाइलें डिजाइन और निर्माण कर सकता है। यह यात्रा केवल हथियारों और हार्डवेयर के बारे में नहीं है; यह भारत की बढ़ती वैज्ञानिक शक्ति, इंजीनियरिंग कौशल और रणनीतिक स्वायत्तता की कहानी है।
DRDO, HAL, BEL और अनगिनत अन्य संस्थानों के अथक प्रयासों ने एक मजबूत स्वदेशी रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र की नींव रखी है। मिसाइल प्रौद्योगिकी में हमारी महारत, नौसेना के स्वदेशीकरण में हमारी सफलता, और वायु सेना के लिए तेजस जैसे विमानों का विकास इस बात का प्रमाण है कि भारत में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने इस यात्रा को एक नई गति दी है, जो निजी क्षेत्र के लिए दरवाजे खोल रही है और भारत को एक रक्षा विनिर्माण और निर्यात केंद्र में बदलने का मार्ग प्रशस्त कर रही है।
हालांकि, चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। हमें अभी भी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में अंतर को पाटना है, अपनी विकास प्रक्रियाओं को तेज करना है, और अपने उत्पादों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करनी है। भविष्य का युद्धक्षेत्र AI, साइबर युद्ध और अंतरिक्ष जैसे नए डोमेन में लड़ा जाएगा, और हमें इन उभरती हुई रक्षा प्रौद्योगिकियों में लगातार नवाचार और निवेश करना होगा। रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता केवल एक विकल्प नहीं है; यह 21वीं सदी की जटिल भू-राजनीतिक दुनिया में भारत की संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक परम आवश्यकता है। यह एक निरंतर यात्रा है, लेकिन हर स्वदेशी टैंक, हर सफल मिसाइल परीक्षण, और हर नया तकनीकी नवाचार हमें ‘अजेय भारत’ के उस अंतिम लक्ष्य के एक कदम और करीब ले जाता है।
9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: DRDO क्या है और इसका मुख्य कार्य क्या है? (What is DRDO and what is its main function?)
उत्तर: DRDO का पूरा नाम रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (Defence Research and Development Organisation) है। यह भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की एक प्रमुख एजेंसी है। इसका मुख्य कार्य भारत की सशस्त्र सेनाओं के लिए अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों का अनुसंधान, डिजाइन और विकास करना है। इसने अग्नि मिसाइल, तेजस लड़ाकू विमान और अर्जुन टैंक जैसी कई सफल परियोजनाएं पूरी की हैं।
प्रश्न 2: एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) क्या था? (What was the Integrated Guided Missile Development Programme – IGMDP?)
उत्तर: IGMDP 1980 के दशक में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नेतृत्व में शुरू किया गया एक महत्वाकांक्षी भारतीय कार्यक्रम था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को मिसाइल प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना था। इस कार्यक्रम के तहत, पांच प्रकार की मिसाइलें विकसित की गईं: पृथ्वी (सतह-से-सतह), अग्नि (बैलिस्टिक मिसाइल), आकाश (सतह-से-हवा), नाग (एंटी-टैंक), और त्रिशूल (सतह-से-हवा)। यह कार्यक्रम भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ।
प्रश्न 3: LCA तेजस की क्या खासियत है? (What is special about LCA Tejas?)
उत्तर: LCA तेजस भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित, चौथी पीढ़ी का, हल्का, सुपरसोनिक, मल्टी-रोल लड़ाकू विमान है। इसकी खासियत यह है कि यह बहुत हल्का है और इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा भारत में ही बनाया गया है। यह ‘मेक इन इंडिया’ पहल का एक प्रमुख उदाहरण है और इसने भारत को उन चुनिंदा देशों में शामिल कर दिया है जो अपने स्वयं के लड़ाकू विमान बना सकते हैं।
प्रश्न 4: ‘मिशन शक्ति’ क्या था और यह क्यों महत्वपूर्ण है? (What was ‘Mission Shakti’ and why is it important?)
उत्तर: ‘मिशन शक्ति’ 27 मार्च, 2019 को भारत द्वारा किया गया एक एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल परीक्षण था। इस परीक्षण में, भारत ने सफलतापूर्वक एक मिसाइल से पृथ्वी की निचली कक्षा में एक लाइव सैटेलाइट को नष्ट कर दिया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने भारत को अंतरिक्ष में अपने उपग्रहों और अन्य संपत्तियों की रक्षा करने की क्षमता का प्रदर्शन किया। इस सफलता के साथ, भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद ऐसी क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया, जिससे उसकी रक्षा प्रौद्योगिकी की प्रतिष्ठा में भारी वृद्धि हुई।
प्रश्न 5: रक्षा प्रौद्योगिकी में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का क्या अर्थ है? (What does ‘Atmanirbhar Bharat’ mean in defence technology?)
उत्तर: रक्षा प्रौद्योगिकी में ‘आत्मनिर्भर भारत’ का अर्थ है कि भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता को कम करे और अधिकांश हथियार, उपकरण और प्रणालियाँ देश के भीतर ही डिजाइन, विकसित और निर्मित करे। इसका उद्देश्य भारत को एक प्रमुख हथियार आयातक से एक प्रमुख रक्षा निर्माता और निर्यातक बनाना है। यह न केवल हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ाता है बल्कि आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को भी बढ़ावा देता है।

