कल्पना कीजिए, उत्तराखंड के एक छोटे से गाँव में रात का समय है। लोग अपने घरों में सो रहे हैं और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है। अचानक, एक कान फाड़ देने वाली आवाज़ आती है और नदी का पानी गाँव में घुस जाता है। घर, खेत, सब कुछ पानी में डूबने लगता है। लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊँची जगहों की ओर भाग रहे हैं। सुबह तक, पूरा गाँव तबाह हो चुका है। ऐसे विनाशकारी क्षणों में, जब लोगों के पास कुछ नहीं बचता, तत्काल सहायता और राहत की आवश्यकता होती है। यहीं पर भारत की एक महत्वपूर्ण वित्तीय व्यवस्था, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (National Disaster Response Fund), एक जीवनरक्षक के रूप में सामने आता है। यह सिर्फ एक सरकारी खजाना नहीं है, बल्कि आपदा की घड़ी में लाखों लोगों के लिए उम्मीद की एक किरण है, जो उन्हें तत्काल राहत और पुनर्निर्माण के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करता है।
विषयसूची (Table of Contents)
- 1. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) का परिचय
- 2. NDRF का ऐतिहासिक विकास: एक कोष का जन्म
- 3. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की संरचना और कार्यप्रणाली
- 4. NDRF के उपयोग की जटिल प्रक्रिया
- 5. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का विश्लेषण: फायदे और नुकसान
- 6. NDRF और SDRF में महत्वपूर्ण अंतर
- 7. हाल की आपदाओं में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की भूमिका
- 8. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का भविष्य और सुधार के सुझाव
- 9. निष्कर्ष: भारत की आपदा प्रबंधन की रीढ़
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) का परिचय (Introduction to National Disaster Response Fund)
आपदाएं, चाहे वे प्राकृतिक हों या मानव निर्मित, अपने पीछे विनाश का एक लंबा निशान छोड़ जाती हैं। भारत की विशाल और विविध भौगोलिक संरचना (geographical structure) इसे बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूकंप और भूस्खलन जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है। इन संकटों से निपटने के लिए एक मजबूत वित्तीय तंत्र की आवश्यकता होती है जो तत्काल और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित कर सके। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की स्थापना की गई।
NDRF क्या है? (What is NDRF?)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष, जिसे अंग्रेजी में National Disaster Response Fund (NDRF) कहा जाता है, भारत सरकार द्वारा प्रबंधित एक विशेष कोष है। इसका प्राथमिक उद्देश्य किसी गंभीर प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्यों के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है। यह कोष केवल आपातकालीन प्रतिक्रिया, राहत और तत्काल पुनर्वास के लिए है, न कि आपदा के बाद के दीर्घकालिक पुनर्निर्माण के लिए। यह भारत के आपदा प्रबंधन (Disaster Management) ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो यह सुनिश्चित करता है कि धन की कमी के कारण राहत कार्यों में कोई बाधा न आए।
कानूनी आधार: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Legal Basis: Disaster Management Act, 2005)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की कानूनी नींव आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 46 में रखी गई है। इस अधिनियम ने भारत में आपदा प्रबंधन के प्रति दृष्टिकोण को पूरी तरह से बदल दिया, इसे एक प्रतिक्रिया-केंद्रित मॉडल से एक सक्रिय, समग्र और एकीकृत मॉडल में परिवर्तित कर दिया।
- अधिनियम का महत्व: इस कानून ने राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (Disaster Management Authorities) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
- कोष की स्थापना: इसी अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार को एक ‘राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष’ स्थापित करने का अधिकार दिया गया ताकि आपदा प्रतिक्रिया के लिए एक समर्पित நிதி स्रोत (financial source) उपलब्ध हो सके।
- स्पष्ट परिभाषा: अधिनियम स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है कि इस कोष का उपयोग केवल अधिसूचित आपदाओं के लिए तत्काल राहत प्रदान करने के उद्देश्य से किया जाएगा।
कोष का उद्देश्य और लक्ष्य (Purpose and Objective of the Fund)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का मूल उद्देश्य बहुत स्पष्ट और केंद्रित है। यह केवल एक वित्तीय भंडार नहीं है, बल्कि इसके पीछे मानवीय पीड़ा को कम करने का एक महान लक्ष्य छिपा है।
- तत्काल राहत: इसका सबसे प्रमुख उद्देश्य आपदा प्रभावित लोगों को तत्काल राहत सामग्री जैसे भोजन, पानी, दवाएं, और अस्थायी आश्रय प्रदान करना है।
- बचाव अभियान: कोष का उपयोग खोज और बचाव अभियानों (search and rescue operations) में लगे कर्मियों और उपकरणों के खर्चों को पूरा करने के लिए किया जाता है।
- राज्य सरकारों को सहायता: जब कोई आपदा इतनी गंभीर होती है कि राज्य सरकार अपने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से उससे निपटने में असमर्थ होती है, तो राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- वित्तीय स्थिरता: यह सुनिश्चित करता है कि आपदा प्रतिक्रिया के लिए एक स्थिर और पूर्वानुमानित वित्तीय स्रोत हमेशा उपलब्ध रहे, जिससे अनिश्चितता कम हो।
2. NDRF का ऐतिहासिक विकास: एक कोष का जन्म (Historical Evolution of NDRF: Birth of a Fund)
आज हम जिस सुव्यवस्थित राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष को जानते हैं, वह हमेशा से ऐसा नहीं था। इसका विकास भारत के आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण में हुए क्रमिक सुधारों का परिणाम है। इस विकास को समझना यह जानने के लिए महत्वपूर्ण है कि हमने आपदाओं से वित्तीय रूप से निपटने में कितनी लंबी यात्रा तय की है।
2005 से पहले का परिदृश्य: राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता निधि (NCCF) (Pre-2005 Scenario: National Calamity Contingency Fund)
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के लागू होने से पहले, आपदा राहत के लिए प्राथमिक केंद्रीय कोष को ‘राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता निधि’ (National Calamity Contingency Fund – NCCF) के रूप में जाना जाता था। इसे 11वें वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर 2000-01 में स्थापित किया गया था।
- संरचना: NCCF की संरचना आज के NDRF से थोड़ी अलग थी। यह मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा वस्तुओं पर लगाए गए राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता शुल्क (National Calamity Contingent Duty) और केंद्र सरकार के बजटीय समर्थन से वित्तपोषित होता था।
- सीमाएं: NCCF का दायरा अपेक्षाकृत सीमित था और इसकी प्रक्रियाएं कभी-कभी जटिल और धीमी होती थीं। धन जारी करने में अक्सर देरी होती थी, जिससे राहत कार्यों की प्रभावशीलता प्रभावित होती थी।
- प्रतिक्रिया-आधारित दृष्टिकोण: यह प्रणाली मुख्य रूप से आपदा के बाद की राहत पर केंद्रित थी और इसमें आपदा की तैयारी या शमन (mitigation) के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं था।
एक महत्वपूर्ण मोड़: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (A Turning Point: The Disaster Management Act, 2005)
2004 में आई विनाशकारी हिंद महासागर सुनामी और 2001 में गुजरात भूकंप जैसी बड़ी आपदाओं ने भारत को अपनी आपदा प्रबंधन रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। इन घटनाओं ने एक अधिक संरचित, कानूनी रूप से समर्थित और सक्रिय दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता को उजागर किया। इसी पृष्ठभूमि में, दिसंबर 2005 में भारतीय संसद द्वारा आपदा प्रबंधन अधिनियम पारित किया गया।
- समग्र दृष्टिकोण: इस अधिनियम ने आपदा प्रबंधन को केवल राहत और बचाव तक सीमित न रखकर, इसमें रोकथाम, शमन, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया।
- संस्थागत ढांचा: इसने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की स्थापना की।
- वित्तीय प्रावधान: इस अधिनियम की धारा 46 ने NCCF को एक नए और अधिक मजबूत कोष, यानी राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में पुनर्गठित करने का कानूनी आधार प्रदान किया।
NCCF को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) में कैसे पुनर्गठित किया गया (How NCCF was Restructured into NDRF)
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के लागू होने के बाद, NCCF को समाप्त नहीं किया गया, बल्कि इसे नए कानूनी ढांचे के तहत पुनर्गठित और पुनर्नामित किया गया। यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं था, बल्कि इसके दायरे, प्रबंधन और संचालन में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए।
- कानूनी समर्थन: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष को अब एक संसदीय अधिनियम का कानूनी समर्थन प्राप्त था, जिससे इसकी स्थिति और अधिक मजबूत हो गई।
- विस्तारित दायरा: नए कोष का दायरा थोड़ा और स्पष्ट किया गया, और इसे केवल “गंभीर प्रकृति” की आपदाओं के लिए आरक्षित किया गया, जहां राज्य के संसाधन अपर्याप्त हों।
- प्रबंधन में स्पष्टता: इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी पूरी तरह से केंद्र सरकार को सौंपी गई और गृह मंत्रालय को नोडल मंत्रालय बनाया गया, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक स्पष्टता आई। इस परिवर्तन ने सुनिश्चित किया कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष देश की आपदा प्रबंधन मशीनरी का एक अभिन्न अंग बन जाए।
3. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की संरचना और कार्यप्रणाली (Structure and Functioning of the National Disaster Response Fund)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की प्रभावशीलता इसकी सुविचारित संरचना और स्पष्ट कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस कोष में पैसा कहाँ से आता है, इसका प्रबंधन कौन करता है, और इसका उपयोग किन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। यह प्रणाली पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन की गई है।
कोष का प्रबंधन कैसे होता है? (How is the Fund Managed?)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का प्रबंधन केंद्र सरकार के स्तर पर होता है और इसकी देखरेख के लिए एक स्पष्ट पदानुक्रम है।
- सर्वोच्च प्राधिकरण: इसका समग्र नियंत्रण भारत सरकार के पास होता है। वित्त मंत्रालय धन के प्रवाह की निगरानी करता है, जबकि गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) आपदा प्रबंधन के लिए नोडल मंत्रालय के रूप में कार्य करता है और कोष के उपयोग से संबंधित निर्णयों का समन्वय करता है।
- लेखा और पारदर्शिता: यह कोष भारत के सार्वजनिक खाते (Public Account of India) में “आरक्षित निधि जो ब्याज नहीं देती” (Reserve Funds not bearing interest) के तहत रखा जाता है। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा इसके खातों का ऑडिट किया जाता है, जिससे वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
- कोई प्रत्यक्ष व्यय नहीं: यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से सीधे कोई व्यय नहीं किया जाता है। धन पहले राज्यों को जारी किया जाता है, और फिर वे इसे अनुमोदित राहत कार्यों पर खर्च करते हैं।
वित्तपोषण के स्रोत (Sources of Funding)
एक समर्पित कोष को निरंतर वित्तीय प्रवाह की आवश्यकता होती है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के लिए धन कई स्रोतों से आता है ताकि यह हर समय पर्याप्त रूप से भरा रहे।
- राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता शुल्क (NCCD): इसका एक प्रमुख स्रोत कुछ चुनिंदा वस्तुओं (जैसे पान मसाला, तंबाकू उत्पाद आदि) पर लगाया जाने वाला एक विशेष उपकर (cess) है, जिसे NCCD कहा जाता है। इस उपकर से प्राप्त राजस्व सीधे कोष में जमा होता है।
- बजटीय आवंटन: केंद्र सरकार अपने वार्षिक बजट में भी इस कोष के लिए एक निश्चित राशि का प्रावधान करती है। यदि उपकर से होने वाली आय अपर्याप्त होती है, तो बजटीय आवंटन उस कमी को पूरा करता है।
- अन्य स्रोत: कभी-कभी, इस कोष में व्यक्तियों या संस्थानों से स्वैच्छिक योगदान भी स्वीकार किया जा सकता है, हालांकि यह इसका मुख्य स्रोत नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की वित्तीय सुदृढ़ता इसे प्रभावी बनाती है।
धन का प्रवाह: केंद्र से राज्यों तक (The Flow of Funds: From Center to States)
आपदा के समय धन का त्वरित प्रवाह महत्वपूर्ण होता है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से राज्यों तक धन पहुंचने की एक निर्धारित प्रक्रिया है।
- राज्य की भूमिका: आपदा की स्थिति में, पहला वित्तीय प्रतिसाद राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से आता है।
- केंद्र से अनुरोध: यदि आपदा की भयावहता इतनी अधिक है कि SDRF के संसाधन अपर्याप्त पड़ जाते हैं, तो राज्य सरकार केंद्र सरकार से राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के तहत अतिरिक्त सहायता के लिए एक विस्तृत ज्ञापन (memorandum) सौंपती है।
- मूल्यांकन और अनुमोदन: केंद्र सरकार एक अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम (IMCT) भेजकर नुकसान का आकलन करती है। IMCT की रिपोर्ट के आधार पर, एक उच्च-स्तरीय समिति (HLC) अतिरिक्त सहायता की मात्रा पर अंतिम निर्णय लेती है।
- धन जारी करना: HLC की मंजूरी के बाद, वित्त मंत्रालय द्वारा संबंधित राज्य सरकार को धनराशि जारी की जाती है।
किन खर्चों को कवर किया जाता है? (What Expenses are Covered?)
यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का पैसा किन कार्यों पर खर्च किया जा सकता है। इसका उपयोग बहुत विशिष्ट और तत्काल राहत गतिविधियों के लिए सीमित है।
- खोज और बचाव अभियान: फंसे हुए लोगों को निकालने और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए किए गए खर्च।
- राहत सामग्री का वितरण: भोजन, पीने का पानी, दवाएं, कंबल, कपड़े और तिरपाल जैसी आवश्यक वस्तुओं का वितरण।
- अस्थायी आश्रय: बेघर हुए लोगों के लिए अस्थायी राहत शिविरों की स्थापना और प्रबंधन।
- आपातकालीन संचार और परिवहन: प्रभावित क्षेत्रों में संचार लाइनों को अस्थायी रूप से बहाल करना और राहत सामग्री के परिवहन का खर्च।
- मृतकों के परिवारों को अनुग्रह राशि: सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार मृतकों के निकटतम Angehörigen को वित्तीय सहायता।
- गंभीर रूप से घायलों का इलाज: आपदा में घायल हुए लोगों के तत्काल चिकित्सा उपचार का खर्च।
क्या कवर नहीं किया जाता है? (What is NOT Covered?)
जितना यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्या कवर होता है, उतना ही यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का उपयोग किन चीजों के लिए नहीं किया जा सकता है।
- दीर्घकालिक पुनर्निर्माण: क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे जैसे सड़कों, पुलों, स्कूलों या अस्पतालों का स्थायी पुनर्निर्माण इस कोष के दायरे से बाहर है। इसके लिए अलग योजनाएं और बजट होते हैं।
- आर्थिक नुकसान की भरपाई: किसानों की फसलों के नुकसान या व्यापारियों के व्यावसायिक नुकसान जैसे आर्थिक नुकसान की भरपाई सीधे इस कोष से नहीं की जाती है।
- आपदा शमन परियोजनाएं: बाढ़ नियंत्रण बांधों या भूकंपरोधी इमारतों के निर्माण जैसी निवारक परियोजनाओं के लिए इस कोष का उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके लिए राष्ट्रीय आपदा शमन कोष (National Disaster Mitigation Fund) का प्रावधान है।
- राज्य सरकार के कर्मचारियों का वेतन: राहत कार्यों में लगे सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्ते इस कोष से नहीं दिए जाते हैं।
4. NDRF के उपयोग की जटिल प्रक्रिया (The Complex Process of Utilizing the NDRF)
आपदा प्रभावित राज्य तक राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से सहायता पहुंचाना एक सीधी प्रक्रिया नहीं है। यह एक बहु-चरणीय और व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसे यह सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि धन का उपयोग केवल वास्तविक और गंभीर मामलों में ही हो। इस प्रक्रिया में राज्य और केंद्र सरकारों के बीच घनिष्ठ समन्वय शामिल है।
आपदा को “गंभीर” कब माना जाता है? (When is a Disaster Considered “Severe”?)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से सहायता केवल “गंभीर प्रकृति की आपदा” (calamity of a severe nature) के लिए ही उपलब्ध है। लेकिन “गंभीर” का क्या अर्थ है? इसका कोई एक निश्चित पैमाना नहीं है, लेकिन आमतौर पर निम्नलिखित कारकों पर विचार किया जाता है:
- प्रभाव का पैमाना: आपदा ने कितने बड़े भौगोलिक क्षेत्र और कितनी आबादी को प्रभावित किया है।
- मानव जीवन की हानि: आपदा के कारण हुई मौतों और गंभीर रूप से घायलों की संख्या।
- बुनियादी ढांचे को नुकसान: घरों, सड़कों, पुलों, और अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों को हुई क्षति का स्तर।
- राज्य की क्षमता: क्या आपदा का पैमाना इतना बड़ा है कि राज्य सरकार अपने राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) और अन्य संसाधनों से प्रभावी ढंग से निपटने में असमर्थ है। केवल जब राज्य के संसाधन समाप्त हो जाते हैं, तब राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की भूमिका शुरू होती है।
राज्य सरकार की भूमिका: अनुरोध ज्ञापन (Role of the State Government: Request Memorandum)
प्रक्रिया की शुरुआत प्रभावित राज्य सरकार द्वारा की जाती है। जब राज्य को लगता है कि वह अकेले आपदा का सामना नहीं कर सकता, तो वह केंद्र सरकार से सहायता का अनुरोध करता है।
- ज्ञापन तैयार करना: राज्य सरकार एक विस्तृत ज्ञापन (detailed memorandum) तैयार करती है जिसमें आपदा की प्रकृति, प्रभावित क्षेत्रों, हुए नुकसान (मानव, पशु, संपत्ति) और राहत कार्यों पर अब तक किए गए खर्च का पूरा ब्योरा होता है।
- सहायता का अनुरोध: इस ज्ञापन में, राज्य सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से एक विशिष्ट राशि की वित्तीय सहायता का अनुरोध करती है, जिसमें विभिन्न राहत मदों के लिए आवश्यक धन का विस्तृत विवरण होता है।
- केंद्र को प्रस्तुति: यह ज्ञापन गृह मंत्रालय, भारत सरकार को प्रस्तुत किया जाता है, जो आगे की कार्रवाई के लिए नोडल एजेंसी है।
अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल (IMCT) का मूल्यांकन (Assessment by the Inter-Ministerial Central Team)
राज्य सरकार से ज्ञापन प्राप्त होने के बाद, केंद्र सरकार जमीनी हकीकत का आकलन करने के लिए एक ‘अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल’ (Inter-Ministerial Central Team – IMCT) का गठन करती है।
- दल की संरचना: IMCT में विभिन्न मंत्रालयों जैसे कृषि, वित्त, गृह, जल शक्ति, ग्रामीण विकास आदि के विशेषज्ञ अधिकारी शामिल होते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि नुकसान का मूल्यांकन बहु-आयामी दृष्टिकोण से किया जाए।
- क्षेत्र का दौरा: यह टीम प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करती है, राज्य के अधिकारियों के साथ बैठक करती है, और नुकसान का प्रत्यक्ष मूल्यांकन करती है। वे राज्य सरकार द्वारा ज्ञापन में किए गए दावों का सत्यापन करते हैं।
- रिपोर्ट तैयार करना: दौरे के बाद, IMCT अपनी निष्कर्षों और सिफारिशों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करती है और इसे राष्ट्रीय कार्यकारी समिति (National Executive Committee) की उप-समिति को सौंपती है। यह रिपोर्ट राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से सहायता राशि तय करने का आधार बनती है।
अंतिम अनुमोदन प्रक्रिया: उच्च-स्तरीय समिति (HLC) (The Final Approval Process: High-Level Committee)
IMCT की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद, मामला अंतिम निर्णय के लिए एक ‘उच्च-स्तरीय समिति’ (High-Level Committee – HLC) के पास जाता है।
- HLC की अध्यक्षता: HLC की अध्यक्षता आमतौर पर केंद्रीय गृह मंत्री करते हैं, और इसमें वित्त मंत्री, कृषि मंत्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
- निर्णय प्रक्रिया: HLC, IMCT की रिपोर्ट, मौजूदा मानदंडों और राज्य की जरूरतों पर विचार करके राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से दी जाने वाली सहायता की अंतिम राशि को मंजूरी देती है।
- निर्णय की बाध्यता: HLC का निर्णय अंतिम होता है। इसके अनुमोदन के बाद, वित्त मंत्रालय संबंधित राज्य को धनराशि जारी करने की प्रक्रिया शुरू करता है। यह एक लंबी लेकिन पूरी तरह से जांच-परख वाली प्रक्रिया है।
पारदर्शिता और जवाबदेही तंत्र (Transparency and Accountability Mechanisms)
इतनी बड़ी राशि के लेन-देन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए कई तंत्र मौजूद हैं।
- उपयोगिता प्रमाण पत्र: राज्य सरकारों को केंद्र से प्राप्त धन के उपयोग का विवरण देते हुए एक ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (Utilization Certificate) जमा करना होता है।
- CAG ऑडिट: जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष और राज्यों द्वारा इसके उपयोग दोनों का ऑडिट कर सकते हैं।
- निर्धारित मानदंड: राहत सहायता के लिए मानदंड (Norms of assistance) केंद्र सरकार द्वारा पूर्व-निर्धारित होते हैं, जो मनमाने निर्णयों की गुंजाइश को कम करते हैं। अधिक जानकारी के लिए, आप राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
5. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का विश्लेषण: फायदे और नुकसान (Analysis of NDRF: Pros and Cons)
किसी भी प्रणाली की तरह, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की भी अपनी ताकत और कमजोरियां हैं। एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने के लिए, इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं का मूल्यांकन करना आवश्यक है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि यह कोष कितना प्रभावी है और इसमें सुधार की गुंजाइश कहाँ है।
सकारात्मक पहलू (Positive Aspects / Pros)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष ने भारत की आपदा प्रतिक्रिया क्षमताओं में निश्चित रूप से क्रांति ला दी है। इसके कई महत्वपूर्ण फायदे हैं।
- समर्पित और सुनिश्चित कोष: इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह एक समर्पित कोष है। आपदा आने पर सरकार को धन के लिए इधर-उधर नहीं देखना पड़ता। एक सुनिश्चित वित्तीय स्रोत की उपलब्धता राहत कार्यों की योजना बनाने और उन्हें तेजी से लागू करने में मदद करती है।
- प्रतिक्रिया में तेजी: एक समर्पित कोष होने से, राहत कार्यों के लिए धन जारी करने में होने वाली नौकरशाही देरी कम हो जाती है। हालांकि प्रक्रिया लंबी है, फिर भी यह एक तदर्थ (ad-hoc) प्रणाली से कहीं बेहतर और तेज है।
- मानकीकृत प्रक्रिया: इसने सहायता प्रदान करने के लिए एक मानकीकृत प्रक्रिया और मानदंड स्थापित किए हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सभी प्रभावित राज्यों के साथ निष्पक्ष व्यवहार हो और सहायता का वितरण मनमाने ढंग से न हो।
- संघीय सहयोग को मजबूती: यह केंद्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद (cooperative federalism) की भावना को मजबूत करता है। जब राज्य संकट में होता है, तो केंद्र इस कोष के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान करके अपनी जिम्मेदारी निभाता है।
- जवाबदेही में वृद्धि: ऑडिट और उपयोगिता प्रमाण पत्र जैसे तंत्रों के कारण, धन के उपयोग में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता आई है। यह सुनिश्चित करता है कि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का पैसा वास्तव में प्रभावित लोगों तक पहुंचे।
नकारात्मक पहलू (Negative Aspects / Cons)
कई फायदों के बावजूद, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की कार्यप्रणाली में कुछ चुनौतियां और आलोचनाएं भी हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
- लंबी और जटिल प्रक्रिया: इसकी सबसे बड़ी आलोचना इसकी लंबी अनुमोदन प्रक्रिया है। राज्य द्वारा ज्ञापन सौंपने से लेकर IMCT के दौरे और HLC की मंजूरी तक, इसमें कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं। इस देरी से तत्काल राहत की आवश्यकता प्रभावित हो सकती है।
- अपर्याप्त धन: बड़ी और बार-बार आने वाली आपदाओं के सामने, कोष में उपलब्ध धन कभी-कभी अपर्याप्त साबित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, जिससे राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष पर दबाव बढ़ रहा है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना: हालांकि प्रक्रिया मानकीकृत है, फिर भी कुछ आलोचकों का मानना है कि धन के आवंटन में राजनीतिक विचार भूमिका निभा सकते हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ दल के प्रति मित्रवत राज्य सरकारों को प्राथमिकता मिलने की आशंका बनी रहती है।
- शमन पर ध्यान का अभाव: जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एक “प्रतिक्रिया” कोष है। यह आपदा के बाद की राहत पर केंद्रित है, न कि आपदा की रोकथाम और शमन पर। हालांकि इसके लिए एक अलग शमन कोष है, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि प्रतिक्रिया और शमन के बीच बेहतर वित्तीय एकीकरण की आवश्यकता है।
- क्षति मूल्यांकन में विसंगतियां: IMCT द्वारा किए गए क्षति मूल्यांकन और राज्य सरकार के दावों के बीच अक्सर एक बड़ा अंतर होता है। इससे कभी-कभी विवाद और असंतोष पैदा होता है, क्योंकि राज्यों को लगता है कि उन्हें उनकी जरूरत से कम सहायता मिली है।
6. NDRF और SDRF में महत्वपूर्ण अंतर (Key Differences between NDRF and SDRF)
भारत के आपदा प्रबंधन वित्तीय ढांचे में दो प्रमुख कोष हैं: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF)। अक्सर लोग इन दोनों के बीच भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन उनकी भूमिकाएं, वित्तपोषण और संचालन का तरीका बिल्कुल अलग है। इन्हें समझना यह जानने के लिए महत्वपूर्ण है कि आपदा के समय कौन सा कोष पहले काम आता है।
प्राथमिक बनाम द्वितीयक प्रतिक्रियाकर्ता (Primary vs. Secondary Responder)
दोनों कोषों के बीच सबसे बुनियादी अंतर उनकी प्रतिक्रिया की प्राथमिकता में है।
- SDRF (राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष): यह आपदा प्रतिक्रिया का प्राथमिक स्रोत है। किसी भी अधिसूचित आपदा के बाद, राज्य सरकार सबसे पहले अपने SDRF से धन का उपयोग करके राहत और बचाव कार्य शुरू करती है। यह पहली वित्तीय रक्षा पंक्ति है।
- NDRF (राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष): यह द्वितीयक स्रोत है। इसकी भूमिका तब शुरू होती है जब आपदा इतनी गंभीर हो कि राज्य अपने SDRF और अन्य संसाधनों से उससे निपटने में असमर्थ हो। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष, SDRF का पूरक है, उसका विकल्प नहीं।
वित्तपोषण पैटर्न और योगदान (Funding Pattern and Contribution)
दोनों कोषों के लिए धन जुटाने का तरीका भी अलग-अलग है, जो उनके संघीय स्वरूप को दर्शाता है।
- SDRF: यह केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित है। सामान्य श्रेणी के राज्यों के लिए, केंद्र 75% और राज्य 25% का योगदान देता है। विशेष श्रेणी के राज्यों (जैसे पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य) के लिए, यह अनुपात 90:10 है।
- NDRF: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष पूरी तरह से केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित होता है। इसमें राज्यों का कोई वित्तीय योगदान नहीं होता है। इसका वित्तपोषण उपकर (cess) और केंद्रीय बजट से होता है।
प्रबंधन और नियंत्रण (Management and Control)
इन कोषों का प्रबंधन और नियंत्रण भी अलग-अलग स्तरों पर होता है।
- SDRF: इसका प्रबंधन राज्य स्तर पर एक राज्य कार्यकारी समिति (State Executive Committee) द्वारा किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता राज्य के मुख्य सचिव करते हैं। धन के उपयोग पर निर्णय लेने का अधिकार राज्य सरकार के पास होता है।
- NDRF: जैसा कि पहले बताया गया है, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का प्रबंधन और नियंत्रण पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन है। गृह मंत्रालय इसकी देखरेख करता है और HLC अंतिम निर्णय लेती है।
संबंध: जब NDRF, SDRF का पूरक बनता है (The Relationship: When NDRF Complements SDRF)
NDRF और SDRF प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं। उनकी बातचीत एक सुविचारित प्रणाली का हिस्सा है।
- चरण-1: आपदा आती है, राज्य सरकार तुरंत SDRF से धन का उपयोग कर राहत कार्य शुरू करती है।
- चरण-2: राज्य सरकार आपदा की गंभीरता का आकलन करती है। यदि नुकसान SDRF की क्षमता से बहुत अधिक है, तो वह केंद्र से सहायता का अनुरोध करती है।
- चरण-3: केंद्र सरकार IMCT के मूल्यांकन के बाद, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान करती है ताकि राहत कार्यों को जारी रखा जा सके और उनका विस्तार किया जा सके।
- इस प्रकार, यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि तत्काल प्रतिक्रिया के लिए राज्य के पास हमेशा धन उपलब्ध हो, जबकि गंभीर संकटों के लिए केंद्र के पास एक बड़ा बैकअप हो।
7. हाल की आपदाओं में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की भूमिका (Role of NDRF in Recent Disasters)
सिद्धांतों और प्रक्रियाओं से परे, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब देश किसी बड़ी आपदा का सामना करता है। पिछले दशक में, भारत ने कई विनाशकारी आपदाओं का सामना किया है, और इन सभी में इस कोष ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कुछ प्रमुख उदाहरण इसकी प्रासंगिकता और प्रभाव को दर्शाते हैं।
केरल बाढ़ (2018) (Kerala Floods, 2018)
2018 में केरल में आई सदी की सबसे भीषण बाढ़ ने राज्य में भारी तबाही मचाई। लाखों लोग विस्थापित हुए और बुनियादी ढांचा पूरी तरह से नष्ट हो गया।
- तत्काल प्रतिक्रिया: राज्य सरकार ने अपने SDRF का उपयोग करके तत्काल राहत अभियान शुरू किया।
- केंद्र की सहायता: आपदा की भयावहता को देखते हुए, केंद्र सरकार ने तुरंत अग्रिम सहायता जारी की। राज्य सरकार द्वारा ज्ञापन सौंपने और IMCT के मूल्यांकन के बाद, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से एक बड़ी राशि को मंजूरी दी गई।
- प्रभाव: इस अतिरिक्त धन ने राज्य को बड़े पैमाने पर राहत शिविर चलाने, चिकित्सा सहायता प्रदान करने और प्रभावित लोगों को तत्काल वित्तीय सहायता वितरित करने में सक्षम बनाया। इसने केरल को संकट के सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती दिनों से उबरने में मदद की।
चक्रवात अम्फान (2020) (Cyclone Amphan, 2020)
चक्रवात अम्फान एक अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान था जिसने पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भारी विनाश किया।
- अग्रिम सहायता: चक्रवात के आने से पहले ही, केंद्र सरकार ने तैयारियों और तत्काल राहत के लिए प्रभावित राज्यों को अग्रिम धनराशि जारी कर दी थी।
- नुकसान का आकलन: चक्रवात के गुजर जाने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री ने हवाई सर्वेक्षण किया और IMCT को नुकसान का आकलन करने के लिए भेजा गया।
- NDRF से समर्थन: IMCT की रिपोर्ट के आधार पर, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से पश्चिम बंगाल और ओडिशा दोनों को महत्वपूर्ण वित्तीय पैकेज दिए गए। इस धन का उपयोग क्षतिग्रस्त घरों की मरम्मत, बिजली और संचार लाइनों की बहाली और प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए किया गया।
उत्तराखंड ग्लेशियर आपदा (2021) (Uttarakhand Glacier Burst, 2021)
चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से आई आकस्मिक बाढ़ ने ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में भारी तबाही मचाई, विशेषकर जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया।
- केंद्रित प्रतिक्रिया: यह एक स्थानीयकृत लेकिन अत्यंत गंभीर आपदा थी। बचाव अभियान बहुत जटिल और चुनौतीपूर्ण थे।
- वित्तीय बैकअप: राज्य सरकार ने SDRF से तत्काल बचाव अभियान शुरू किया। केंद्र ने बचाव कार्यों में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (National Disaster Response Force – NDRF, the force) की कई टीमों को तैनात किया। इन अभियानों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (the fund) ने एक महत्वपूर्ण बैकअप भूमिका निभाई।
- पीड़ितों को सहायता: इस कोष से स्वीकृत धन का उपयोग मृतकों के परिवारों को अनुग्रह राशि देने और लापता व्यक्तियों की तलाश के लिए चलाए गए लंबे अभियानों को समर्थन देने के लिए किया गया।
इन घटनाओं से सीखे गए सबक (Lessons Learned from These Events)
इन आपदाओं ने राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष की उपयोगिता को तो साबित किया, लेकिन साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सबक भी सिखाए।
- तेजी की आवश्यकता: यह स्पष्ट हो गया कि IMCT मूल्यांकन और HLC अनुमोदन की प्रक्रिया में तेजी लाने की आवश्यकता है ताकि धन और भी जल्दी पहुंच सके।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: आपदाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता यह दर्शाती है कि भविष्य में कोष पर दबाव बढ़ेगा, इसलिए इसके वित्तीय आधार को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
- बेहतर समन्वय: केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर और तेज समन्वय क्षति मूल्यांकन में विसंगतियों को कम कर सकता है और राहत प्रयासों को अधिक प्रभावी बना सकता है।
8. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का भविष्य और सुधार के सुझाव (Future of NDRF and Suggestions for Improvement)
जैसे-जैसे भारत विकसित हो रहा है और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां बढ़ रही हैं, आपदाओं का स्वरूप भी बदल रहा है। इस बदलते परिदृश्य में, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष को भी प्रासंगिक और प्रभावी बने रहने के लिए विकसित होना होगा। इसकी वर्तमान संरचना मजबूत है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए इसमें कुछ सुधारों की आवश्यकता है।
अनुमोदन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना (Streamlining the Approval Process)
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, लंबी अनुमोदन प्रक्रिया एक बड़ी बाधा है। इसे सुधारने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग: नुकसान के आकलन के लिए ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और GIS मैपिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। इससे IMCT को तेजी से और अधिक सटीक डेटा एकत्र करने में मदद मिलेगी, जिससे उनकी रिपोर्ट जल्दी तैयार होगी।
- समय-सीमा का निर्धारण: ज्ञापन प्राप्त होने से लेकर HLC की मंजूरी तक प्रत्येक चरण के लिए एक सख्त समय-सीमा निर्धारित की जा सकती है ताकि प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो।
- अग्रिम सहायता में वृद्धि: गंभीर आपदाओं की स्थिति में, मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी होने की प्रतीक्षा किए बिना, राज्यों को दी जाने वाली प्रारंभिक अग्रिम सहायता की राशि बढ़ाई जा सकती है।
कोष की राशि में वृद्धि करना (Increasing the Corpus of the Fund)
बढ़ती आपदाओं का सामना करने के लिए, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के वित्तीय आधार को मजबूत करना आवश्यक है।
- उपकर का दायरा बढ़ाना: सरकार NCCD (उपकर) के दायरे में और अधिक वस्तुओं को शामिल करने पर विचार कर सकती है ताकि राजस्व बढ़ाया जा सके।
- बजटीय आवंटन में वृद्धि: वार्षिक बजट में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष के लिए आवंटन को मुद्रास्फीति और आपदा जोखिम में वृद्धि के अनुरूप नियमित रूप से बढ़ाया जाना चाहिए।
- कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR): कंपनियों को अपने CSR फंड का एक हिस्सा इस कोष में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए एक तंत्र बनाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन अनुकूलन को एकीकृत करना (Integrating Climate Change Adaptation)
भविष्य की अधिकांश आपदाएं जलवायु परिवर्तन से प्रेरित होंगी। इसलिए, प्रतिक्रिया तंत्र को भी इसके अनुकूल बनाना होगा।
- जोखिम मूल्यांकन: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से सहायता का निर्धारण करते समय, भविष्य के जलवायु जोखिमों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
- लचीले मानदंड: हीटवेव (लू), ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और तटीय क्षरण जैसी नई और उभरती आपदाओं को कवर करने के लिए कोष के उपयोग के मानदंडों को और अधिक लचीला बनाया जाना चाहिए।
- बीमा तंत्र से जुड़ाव: कोष को फसल और संपत्ति बीमा योजनाओं के साथ बेहतर ढंग से जोड़ा जा सकता है ताकि राहत के बोझ को साझा किया जा सके।
“बिल्ड बैक बेटर” पर अधिक जोर (“Build Back Better” on Greater Emphasis)
हालांकि राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का मुख्य उद्देश्य तत्काल राहत है, लेकिन इसके उपयोग में “बिल्ड बैक बेटर” (पहले से बेहतर निर्माण) के सिद्धांत को शामिल करने की गुंजाइश है।
- आपदा-प्रतिरोधी मरम्मत: तत्काल मरम्मत के लिए दिए गए धन के साथ यह शर्त लगाई जा सकती है कि मरम्मत आपदा-प्रतिरोधी मानकों (disaster-resilient standards) के अनुसार की जाए।
- शमन कोष के साथ समन्वय: राहत कार्यों के पूरा होने के बाद, प्रभावित क्षेत्रों में दीर्घकालिक पुनर्निर्माण और शमन परियोजनाओं के लिए राष्ट्रीय आपदा शमन कोष (NDMF) के साथ एक सहज हस्तांतरण प्रक्रिया होनी चाहिए।
9. निष्कर्ष: भारत की आपदा प्रबंधन की रीढ़ (Conclusion: The Backbone of India’s Disaster Management)
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष केवल एक वित्तीय तंत्र से कहीं बढ़कर है; यह आपदा की घड़ी में राष्ट्र की सामूहिक इच्छाशक्ति और अपने नागरिकों के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत इसकी स्थापना ने भारत के आपदा प्रतिक्रिया के तरीके में एक युगांतकारी परिवर्तन लाया, इसे एक तदर्थ और अनिश्चित प्रणाली से एक संरचित, कानूनी रूप से समर्थित और पूर्वानुमानित ढांचे में बदल दिया। इसने सुनिश्चित किया है कि गंभीर आपदाओं के समय, राज्य सरकारें संसाधनों की चिंता किए बिना अपने लोगों को बचाने और उनकी मदद करने पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
इसकी प्रक्रिया में कुछ चुनौतियां और देरी हो सकती हैं, और इसके वित्तीय आधार को मजबूत करने की हमेशा आवश्यकता बनी रहेगी, लेकिन इन कमियों के बावजूद, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष भारत के आपदा प्रबंधन ढांचे की एक अनिवार्य और अपरिहार्य आधारशिला है। यह केंद्र और राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है, जो सहकारी संघवाद को बढ़ावा देता है। जैसे-जैसे भारत जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली नई और अधिक जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, इस कोष की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। निरंतर सुधार, बढ़ी हुई पारदर्शिता और भविष्य की जरूरतों के प्रति अनुकूलन के माध्यम से, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष आने वाले कई वर्षों तक लाखों भारतीयों के लिए आशा और सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा।
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का पूरा नाम क्या है? (What is the full form of NDRF?)
उत्तर: NDRF का पूरा नाम “राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष” (National Disaster Response Fund) है। कृपया ध्यान दें कि यह “राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल” (National Disaster Response Force) से अलग है, जो आपदा के समय बचाव कार्य करने वाली एक विशेष टीम है, जबकि कोष एक वित्तीय तंत्र है।
प्रश्न 2: राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का प्रबंधन कौन करता है? (Who manages the NDRF?)
उत्तर: इस कोष का प्रबंधन और नियंत्रण भारत की केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। भारत का गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) आपदा प्रबंधन के लिए नोडल मंत्रालय है और इस कोष से संबंधित प्रक्रियाओं का समन्वय करता है। इसकी अंतिम मंजूरी गृह मंत्री की अध्यक्षता वाली एक उच्च-स्तरीय समिति (HLC) द्वारा दी जाती है।
प्रश्न 3: क्या NDRF का उपयोग मानव निर्मित आपदाओं के लिए किया जा सकता है? (Can NDRF be used for man-made disasters?)
उत्तर: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अनुसार, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष का उपयोग मुख्य रूप से गंभीर प्राकृतिक आपदाओं (natural disasters) जैसे बाढ़, चक्रवात, भूकंप, सूखा आदि के लिए किया जाता है। हालांकि, कुछ विशेष परिस्थितियों में, केंद्र सरकार परमाणु, रासायनिक या जैविक आपदाओं जैसी कुछ मानव निर्मित आपदाओं को भी इसके दायरे में शामिल कर सकती है, लेकिन यह सामान्य नहीं है।
प्रश्न 4: SDRF और NDRF में मुख्य अंतर क्या है? (What is the main difference between SDRF and NDRF?)
उत्तर: मुख्य अंतर यह है कि SDRF (राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष) आपदा प्रतिक्रिया की पहली पंक्ति है और इसका प्रबंधन राज्य सरकार द्वारा किया जाता है। जब आपदा इतनी बड़ी हो कि SDRF के संसाधन अपर्याप्त हों, तब राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) एक द्वितीयक वित्तीय स्रोत के रूप में सहायता प्रदान करता है, जिसका प्रबंधन केंद्र सरकार करती है।
प्रश्न 5: क्या कोई व्यक्ति सीधे राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से पैसा प्राप्त कर सकता है? (Can an individual get money directly from the NDRF?)
उत्तर: नहीं, कोई भी व्यक्ति या संस्था सीधे राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से धन प्राप्त नहीं कर सकती है। यह कोष केंद्र से राज्य सरकार को धन हस्तांतरित करता है। फिर, राज्य सरकार पूर्व-निर्धारित मानदंडों के अनुसार राहत सामग्री या अनुग्रह राशि के रूप में प्रभावित लोगों तक सहायता पहुंचाती है।

