विषय-सूची (Table of Contents)
- 1. प्रस्तावना: वैश्विक मंच पर भारत की बदलती भूमिका (Introduction: India’s Changing Role on the Global Stage)
- 2. विदेश नीति क्या होती है? (What is Foreign Policy?)
- 3. भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक विकास (Historical Evolution of India’s Foreign Policy)
- 4. भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत और स्तंभ (Core Principles and Pillars of India’s Foreign Policy)
- 5. भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व (Determinants of India’s Foreign Policy)
- 6. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): एक विस्तृत विश्लेषण (Non-Aligned Movement (NAM): A Detailed Analysis)
- 7. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की भूमिका (India’s Role in Major International Organizations)
- 8. भारत की विदेश नीति के समक्ष वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा (Current Challenges and Future Direction for India’s Foreign Policy)
- 9. निष्कर्ष: एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति (Conclusion: An Emerging Global Power)
- 10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
1. प्रस्तावना: वैश्विक मंच पर भारत की बदलती भूमिका (Introduction: India’s Changing Role on the Global Stage)
एक कहानी से शुरुआत (Starting with a Story)
कल्पना कीजिए, यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया है और हजारों भारतीय छात्र वहां फंसे हुए हैं। उनके माता-पिता भारत में चिंतित हैं, सरकार पर उन्हें सुरक्षित वापस लाने का भारी दबाव है। ऐसे में भारत सरकार रूस और यूक्रेन, दोनों से बात करती है। वह अपने पुराने संबंधों का हवाला देकर रूस से कुछ घंटों के लिए युद्धविराम का आग्रह करती है और साथ ही यूक्रेन को मानवीय सहायता भी भेजती है। इस जटिल कूटनीतिक नृत्य के परिणामस्वरूप, एक सुरक्षित गलियारा बनता है और ‘ऑपरेशन गंगा’ के तहत हजारों छात्रों को सफलतापूर्वक घर वापस लाया जाता है। यह सिर्फ एक बचाव अभियान नहीं था; यह भारत की विदेश नीति की शक्ति का एक जीवंत प्रदर्शन था, जो दोस्ती, संवाद और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने के सिद्धांतों पर आधारित है।
विदेश नीति का महत्व (Importance of Foreign Policy)
यह घटना दर्शाती है कि किसी देश की विदेश नीति केवल किताबों या राजनयिकों की बैठकों तक सीमित नहीं होती। इसका सीधा असर आम नागरिकों के जीवन पर पड़ता है। भारत की विदेश नीति, जिसे अंग्रेजी में India’s Foreign Policy कहते हैं, उन सिद्धांतों, रणनीतियों और लक्ष्यों का एक समूह है जो यह तय करती है कि भारत दुनिया के अन्य देशों के साथ कैसे संबंध रखेगा। यह हमारे देश की सुरक्षा, आर्थिक विकास और वैश्विक प्रतिष्ठा की कुंजी है। आज के तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में, भारत की विदेश नीति पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
इस लेख का उद्देश्य (Purpose of this Article)
इस लेख में, हम भारत की विदेश नीति के रहस्य को परत-दर-परत खोलेंगे। हम इसके ऐतिहासिक विकास, मूल सिद्धांतों, निर्धारक तत्वों और वर्तमान चुनौतियों को गहराई से समझेंगे। हमारा उद्देश्य इस जटिल विषय को सरल और सुलभ भाषा में प्रस्तुत करना है, ताकि छात्र और सामान्य पाठक भी यह समझ सकें कि भारत वैश्विक मंच पर अपने हितों की रक्षा कैसे करता है और एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका कैसे निभा रहा है।
2. विदेश नीति क्या होती है? (What is Foreign Policy?)
विदेश नीति की सरल परिभाषा (A Simple Definition of Foreign Policy)
किसी भी देश की विदेश नीति उसके ‘राष्ट्रीय हितों’ (National Interests) को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के लिए बनाई गई एक व्यापक योजना है। इसे आप एक देश का ‘रोडमैप’ समझ सकते हैं, जो यह बताता है कि उसे दुनिया के बाकी देशों के साथ किस तरह का व्यवहार करना है, किससे दोस्ती करनी है, किससे व्यापार करना है और किसी विवाद की स्थिति में क्या कदम उठाने हैं। यह नीति उस देश के मूल्यों, लक्ष्यों और वैश्विक परिस्थितियों की समझ पर आधारित होती है।
विदेश नीति के मुख्य उद्देश्य (Main Objectives of Foreign Policy)
हर देश की विदेश नीति के कुछ सामान्य उद्देश्य होते हैं, जो कमोबेश एक जैसे ही रहते हैं। भारत की विदेश नीति के भी कुछ प्रमुख उद्देश्य हैं:
- राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security): यह किसी भी विदेश नीति का सर्वोपरि लक्ष्य है। इसमें देश की सीमाओं की रक्षा, आतंकवाद का मुकाबला, और बाहरी खतरों से देश को सुरक्षित रखना शामिल है।
- आर्थिक विकास (Economic Development): दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाना, विदेशी निवेश (Foreign Investment) आकर्षित करना, और अपने नागरिकों के लिए आर्थिक अवसर पैदा करना विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- वैश्विक शांति और स्थिरता (Global Peace and Stability): भारत हमेशा से विश्व शांति का समर्थक रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करना, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान खोजना और निरस्त्रीकरण (Disarmament) को बढ़ावा देना इसकी नीति का हिस्सा है।
- राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि (Enhancing National Prestige): वैश्विक मंच पर देश की एक सकारात्मक और शक्तिशाली छवि बनाना, ताकि अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में उसकी आवाज सुनी जाए।
- प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा (Protecting the Interests of Overseas Indians): दुनिया भर में बसे करोड़ों भारतीय मूल के लोगों के हितों की रक्षा करना भी भारत की विदेश नीति का एक अहम पहलू है।
विदेश नीति का निर्माण कैसे होता है? (How is Foreign Policy Formulated?)
विदेश नीति का निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई संस्थाएं और व्यक्ति शामिल होते हैं। भारत में, इस प्रक्रिया के मुख्य कर्ताधर्ता निम्नलिखित हैं:
- प्रधानमंत्री कार्यालय (Prime Minister’s Office – PMO): प्रधानमंत्री विदेश नीति को अंतिम दिशा देते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs – MEA): यह मंत्रालय विदेश नीति के निर्माण और कार्यान्वयन के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। विदेश मंत्री और विदेश सचिव इसका नेतृत्व करते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप विदेश मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
- संसद (Parliament): संसद विदेश नीति से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करती है और सरकार की नीतियों पर नजर रखती है।
- अन्य मंत्रालय: रक्षा मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय भी अपने-अपने क्षेत्रों में विदेश नीति को प्रभावित करते हैं।
- थिंक टैंक और मीडिया (Think Tanks and Media): स्वतंत्र विशेषज्ञ, थिंक टैंक और मीडिया भी जनमत को प्रभावित करके और सरकार को सलाह देकर विदेश नीति निर्माण में योगदान देते हैं।
3. भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक विकास (Historical Evolution of India’s Foreign Policy)
आजादी के बाद से लेकर आज तक, भारत की विदेश नीति कई चरणों से गुजरी है। वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू जरूरतों के हिसाब से इसमें लगातार बदलाव और विकास होता रहा है। इसे हम मुख्य रूप से चार चरणों में बांट सकते हैं।
पहला चरण: नेहरूवादी युग (1947-1964) – आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता (The Nehruvian Era – Idealism and Non-Alignment)
आजादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की विदेश नीति की नींव रखी। यह दौर आदर्शवाद से प्रेरित था और इसके मूल में दो प्रमुख सिद्धांत थे:
- गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment): उस समय दुनिया दो महाशक्तियों – संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR) – के बीच विभाजित थी, जिसे शीत युद्ध (Cold War) कहा जाता है। नेहरू ने फैसला किया कि भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं होगा और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करेगा। इसका उद्देश्य भारत की संप्रभुता (Sovereignty) को बनाए रखना और दोनों महाशक्तियों से अच्छे संबंध बनाए रखना था।
- पंचशील (Panchsheel): 1954 में चीन के साथ हुए एक समझौते में इन पांच सिद्धांतों को अपनाया गया। ये थे – (1) एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, (2) एक दूसरे पर आक्रमण न करना, (3) एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, (4) समानता और पारस्परिक लाभ, और (5) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
- एशियाई-अफ्रीकी एकता पर जोर: नेहरू ने नव-स्वतंत्र एशियाई और अफ्रीकी देशों को एकजुट करने का प्रयास किया ताकि वे उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ एक मजबूत आवाज बन सकें। 1955 का बांडुंग सम्मेलन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
दूसरा चरण: इंदिरा गांधी युग (1966-1984) – यथार्थवाद और शक्ति प्रदर्शन (The Indira Gandhi Era – Realism and Power Projection)
1962 में चीन के साथ हुए युद्ध ने भारत के आदर्शवाद को एक बड़ा झटका दिया। इसके बाद, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में यथार्थवाद (Realism) का पुट आया। इस दौर की मुख्य विशेषताएं थीं:
- सोवियत संघ की ओर झुकाव: 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध की आशंका और अमेरिका-चीन-पाकिस्तान की धुरी के जवाब में, भारत ने सोवियत संघ के साथ 20 वर्षीय ‘शांति, मित्रता और सहयोग संधि’ पर हस्ताक्षर किए। यह गुटनिरपेक्षता की नीति से एक महत्वपूर्ण विचलन था, लेकिन उस समय की सामरिक जरूरतों के लिए आवश्यक था।
- 1971 का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम: भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ एक निर्णायक सैन्य हस्तक्षेप किया, जिसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसने भारत को एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया।
- परमाणु कार्यक्रम: 1974 में भारत ने अपना पहला सफल परमाणु परीक्षण (पोखरण-I) किया, जिसे ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ का नाम दिया गया। इस कदम ने दुनिया को भारत की परमाणु क्षमता का परिचय दिया और भारत की विदेश नीति को एक नई सामरिक गहराई प्रदान की।
तीसरा चरण: शीत युद्ध के बाद का दौर (1991-2014) – आर्थिक उदारीकरण और बहु-ध्रुवीय विश्व (Post-Cold War Era – Economic Liberalization and a Multipolar World)
1991 में सोवियत संघ के विघटन और भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत ने भारत की विदेश नीति के लिए एक नया अध्याय खोला। इस दौर में विदेश नीति का फोकस आर्थिक विकास पर केंद्रित हो गया।
- पश्चिम के साथ संबंधों में सुधार: सोवियत संघ के पतन के बाद, भारत ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना शुरू किया। अमेरिका के साथ सामरिक और आर्थिक साझेदारी इस दौर की एक बड़ी उपलब्धि थी।
- ‘लुक ईस्ट’ नीति (‘Look East’ Policy): 1990 के दशक की शुरुआत में, भारत ने दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (ASEAN) के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए ‘लुक ईस्ट’ नीति अपनाई। इसका उद्देश्य व्यापार, निवेश और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना था।
- परमाणु शक्ति के रूप में उदय: 1998 में भारत ने पोखरण-II परमाणु परीक्षण किए और खुद को एक पूर्ण परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। शुरुआती अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद, भारत धीरे-धीरे वैश्विक परमाणु व्यवस्था में अपनी जगह बनाने में सफल रहा।
चौथा चरण: मोदी युग (2014-वर्तमान) – ऊर्जावान कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता (The Modi Era – Energetic Diplomacy and Strategic Autonomy)
2014 के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति में एक नई ऊर्जा और मुखरता देखी गई है। इस दौर को ‘मल्टी-एलाइनमेंट’ (Multi-alignment) या ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) का दौर कहा जा सकता है।
- पड़ोस पहले (Neighbourhood First): इस नीति के तहत दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
- एक्ट ईस्ट (Act East): ‘लुक ईस्ट’ नीति को ‘एक्ट ईस्ट’ में बदला गया, जिसमें दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया के साथ न केवल आर्थिक बल्कि सामरिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी अधिक सक्रिय रूप से बढ़ाने पर जोर दिया गया।
- प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलन: भारत आज एक ही समय में अमेरिका, रूस, जापान और यूरोप के साथ अपने संबंधों को साध रहा है। QUAD (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) और SCO (शंघाई सहयोग संगठन, जिसमें चीन और रूस प्रमुख हैं) दोनों में भारत की सक्रिय भागीदारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- वैश्विक मुद्दों पर नेतृत्व: भारत जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, और सतत विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर एक अग्रणी भूमिका निभा रहा है। G20 की अध्यक्षता और ‘वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ’ समिट का आयोजन इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
4. भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत और स्तंभ (Core Principles and Pillars of India’s Foreign Policy)
समय के साथ भारत की विदेश नीति में कई बदलाव आए हैं, लेकिन कुछ मूल सिद्धांत हैं जो आज भी इसकी नींव बने हुए हैं। ये सिद्धांत भारत के सभ्यतागत मूल्यों और आधुनिक réalités का एक अनूठा मिश्रण हैं।
पंचशील: शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांत (Panchsheel: The Five Principles of Peaceful Co-existence)
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, पंचशील के सिद्धांत भारत की विदेश नीति के आधार स्तंभों में से एक हैं। हालांकि ये 1954 में चीन के साथ एक समझौते के हिस्से के रूप में सामने आए, लेकिन ये सिद्धांत आज भी भारत के वैश्विक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
- इनका सार: ये सिद्धांत अनिवार्य रूप से कहते हैं कि सभी देशों को एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करना चाहिए और किसी भी विवाद को शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से हल करना चाहिए।
- वर्तमान प्रासंगिकता: आज की संघर्ष-ग्रस्त दुनिया में, पंचशील के सिद्धांत पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संवाद और कूटनीति के माध्यम से समस्याओं को हल करने की वकालत करता है।
गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता तक (From Non-Alignment to Strategic Autonomy)
यह भारत की विदेश नीति के विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। शीत युद्ध के दौरान, गुटनिरपेक्षता का अर्थ सैन्य गुटों से दूर रहना था। आज, इसका रूप ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ ने ले लिया है।
- रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ: इसका मतलब है कि भारत किसी एक देश या गुट पर निर्भर हुए बिना, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा। भारत अपने फैसले वाशिंगटन, मॉस्को या बीजिंग से पूछकर नहीं, बल्कि नई दिल्ली में लेगा।
- उदाहरण: रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत का रुख रणनीतिक स्वायत्तता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भारत ने रूस के आक्रमण की निंदा करने से परहेज किया, लेकिन साथ ही उसने यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने और बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने का आह्वान किया। इसने अपने ऊर्जा हितों को देखते हुए रूस से तेल खरीदना भी जारी रखा। यह नीति दर्शाती है कि भारत अपने हितों को सर्वोपरि रखता है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’: पूरी दुनिया एक परिवार है (Vasudhaiva Kutumbakam: The World is One Family)
यह एक प्राचीन भारतीय दर्शन है जो भारत की विदेश नीति को एक नैतिक आधार प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि पूरी दुनिया एक परिवार है।
- नीति में झलक: यह सिद्धांत भारत के मानवीय सहायता कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। चाहे तुर्की में भूकंप हो या श्रीलंका में आर्थिक संकट, भारत हमेशा मदद के लिए सबसे पहले पहुंचने वाले देशों में से एक रहा है। ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम के तहत, भारत ने COVID-19 महामारी के दौरान दुनिया भर के कई देशों को करोड़ों टीके प्रदान किए।
- G20 का आदर्श वाक्य: भारत ने अपनी G20 अध्यक्षता के लिए ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ (One Earth, One Family, One Future) को अपना आदर्श वाक्य बनाया, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दर्शन पर ही आधारित है।
‘पड़ोस पहले’ नीति (Neighbourhood First Policy)
यह नीति इस मान्यता पर आधारित है कि एक शांतिपूर्ण और समृद्ध पड़ोस भारत की अपनी सुरक्षा और विकास के लिए आवश्यक है।
- उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशियाई पड़ोसियों (जैसे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मालदीव) के साथ राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है।
- कार्यान्वयन: इस नीति के तहत, भारत अपने पड़ोसियों को विकास परियोजनाओं, ऋण और तकनीकी सहायता में प्राथमिकता देता है। उदाहरण के लिए, बांग्लादेश के साथ कनेक्टिविटी परियोजनाओं और नेपाल में भूकंप के बाद पुनर्निर्माण में भारत की सहायता।
‘एक्ट ईस्ट’ नीति (Act East Policy)
यह ‘लुक ईस्ट’ नीति का एक अधिक सक्रिय और परिणामोन्मुखी संस्करण है। इसका दायरा दक्षिण-पूर्व एशिया से आगे बढ़कर पूर्वी एशिया (जापान, दक्षिण कोरिया) और प्रशांत क्षेत्र तक फैला हुआ है।
- तीन ‘C’ पर फोकस: यह नीति तीन ‘C’ – कॉमर्स (Commerce), कनेक्टिविटी (Connectivity), और कल्चर (Culture) पर केंद्रित है।
- रणनीतिक महत्व: आर्थिक संबंधों के अलावा, इस नीति का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहलू भी है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए, भारत वियतनाम, फिलीपींस और जापान जैसे देशों के साथ अपने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को बढ़ा रहा है।
5. भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्व (Determinants of India’s Foreign Policy)
किसी भी देश की विदेश नीति शून्य में नहीं बनती है। यह कई आंतरिक और बाहरी कारकों से प्रभावित होती है। भारत की विदेश नीति के प्रमुख निर्धारक तत्व निम्नलिखित हैं:
भौगोलिक स्थिति (Geographical Location)
भूगोल किसी भी देश की नियति होती है, और यह विदेश नीति का सबसे स्थायी निर्धारक है।
- विशाल तटरेखा और हिंद महासागर: भारत की लंबी तटरेखा और हिंद महासागर में इसकी केंद्रीय स्थिति इसे एक महत्वपूर्ण समुद्री राष्ट्र बनाती है। समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करना भारत की विदेश नीति की एक प्रमुख प्राथमिकता है।
- संवेदनशील सीमाएँ: भारत की सीमाएँ पाकिस्तान और चीन जैसे दो परमाणु-सशस्त्र और अक्सर शत्रुतापूर्ण पड़ोसियों से लगती हैं। यह भौगोलिक वास्तविकता भारत की सुरक्षा नीतियों और रक्षा तैयारियों को सीधे प्रभावित करती है।
- दक्षिण एशिया का केंद्र: भारत दक्षिण एशिया में आकार और जनसंख्या के हिसाब से सबसे बड़ा देश है, जो इसे इस क्षेत्र में एक स्वाभाविक नेतृत्व की भूमिका प्रदान करता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत (Historical and Cultural Heritage)
भारत की प्राचीन सभ्यता और स्वतंत्रता संग्राम के मूल्य इसकी विदेश नीति में गहराई से समाए हुए हैं।
- शांति और सहिष्णुता के मूल्य: बौद्ध धर्म और गांधीवादी दर्शन जैसे शांति और अहिंसा के विचारों ने भारत के वैश्विक दृष्टिकोण को आकार दिया है। यही कारण है कि भारत हमेशा अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का पक्षधर रहा है।
- उपनिवेशवाद-विरोधी विरासत: स्वतंत्रता संग्राम के अनुभवों ने भारत को उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नस्लवाद का प्रबल विरोधी बनाया है। भारत ने हमेशा विकासशील देशों के अधिकारों का समर्थन किया है।
आर्थिक कारक (Economic Factors)
आधुनिक युग में, किसी भी देश की विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा उसकी आर्थिक जरूरतों से प्रेरित होता है।
- ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित तेल और गैस पर बहुत अधिक निर्भर है। खाड़ी देशों और अन्य ऊर्जा उत्पादकों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- व्यापार और निवेश: अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए, भारत को विदेशी बाजारों, प्रौद्योगिकी और निवेश की आवश्यकता है। इसलिए, भारत की विदेश नीति का एक बड़ा फोकस व्यापार समझौतों को बढ़ावा देने और एक निवेशक-अनुकूल माहौल बनाने पर है।
- विकासशील अर्थव्यवस्था: एक विकासशील देश के रूप में, भारत की प्राथमिकता अपने करोड़ों नागरिकों को गरीबी से बाहर निकालना है। इसकी विदेश नीति इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अनुकूल अंतरराष्ट्रीय वातावरण बनाने का प्रयास करती है।
घरेलू राजनीति और नेतृत्व (Domestic Politics and Leadership)
देश की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व की दृष्टि भी विदेश नीति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।
- राजनीतिक स्थिरता: एक स्थिर सरकार एक सुसंगत और दीर्घकालिक विदेश नीति को आगे बढ़ा सकती है, जबकि राजनीतिक अस्थिरता विदेश नीति में अनिश्चितता पैदा कर सकती है।
- नेतृत्व की भूमिका: प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व और उनकी विश्व-दृष्टि विदेश नीति को एक विशिष्ट दिशा दे सकती है। नेहरू के आदर्शवाद से लेकर इंदिरा गांधी के यथार्थवाद और मोदी की ऊर्जावान कूटनीति तक, नेतृत्व ने हमेशा भारत की विदेश नीति पर अपनी छाप छोड़ी है।
- राष्ट्रीय हित पर आम सहमति: कुछ प्रमुख राष्ट्रीय हितों, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता, पर आमतौर पर सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति होती है, जो विदेश नीति को एक निरंतरता प्रदान करती है।
6. गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): एक विस्तृत विश्लेषण (Non-Aligned Movement (NAM): A Detailed Analysis)
गुटनिरपेक्षता शीत युद्ध के दौरान भारत की विदेश नीति की आत्मा थी। हालांकि आज इसकी प्रासंगिकता पर बहस होती है, लेकिन इसके योगदान और सीमाओं को समझना महत्वपूर्ण है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उदय और उद्देश्य (Rise and Objectives of NAM)
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement – NAM) की औपचारिक स्थापना 1961 में बेलग्रेड में हुई थी। इसके संस्थापक नेताओं में भारत के जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के गमाल अब्देल नासिर, घाना के क्वामे न्क्रूमा, इंडोनेशिया के सुकर्णो और यूगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज़ टीटो शामिल थे।
- मुख्य उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य नव-स्वतंत्र एशियाई, अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देशों को शीत युद्ध की गुटीय राजनीति से दूर रखना और उनकी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा करना था।
- अन्य लक्ष्य: इसके अन्य लक्ष्यों में उपनिवेशवाद का विरोध, नस्लवाद का उन्मूलन, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और एक अधिक न्यायसंगत अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करना शामिल था।
गुटनिरपेक्ष नीति के सकारात्मक पहलू (Positive Aspects of Non-Alignment Policy)
भारत की विदेश नीति के लिए गुटनिरपेक्षता के कई सकारात्मक परिणाम हुए।
- स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता: इसने भारत को किसी भी महाशक्ति के दबाव में आए बिना, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की। यह भारत की संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक था।
- दोनों गुटों से संबंध: भारत गुटनिरपेक्ष रहकर अमेरिका और सोवियत संघ, दोनों से आर्थिक और तकनीकी सहायता प्राप्त करने में सफल रहा। उदाहरण के लिए, भिलाई स्टील प्लांट सोवियत संघ की मदद से बना, तो वहीं भारत को कृषि क्षेत्र में अमेरिका से भी सहायता मिली।
- वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि: गुटनिरपेक्ष आंदोलन के एक नेता के रूप में, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक महत्वपूर्ण आवाज मिली। इसने भारत को विकासशील देशों के एक स्वाभाविक नेता के रूप में स्थापित किया।
- संघर्ष टालने में मदद: गुटनिरपेक्षता की नीति ने भारत को कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में सीधे तौर पर शामिल होने से बचाया और अपनी ऊर्जा को देश के आर्थिक विकास पर केंद्रित करने में मदद की।
गुटनिरपेक्ष नीति के नकारात्मक पहलू (Negative Aspects of Non-Alignment Policy)
आलोचक मानते हैं कि गुटनिरपेक्षता की नीति हमेशा भारत के हितों के लिए फायदेमंद नहीं रही।
- अलगाव का खतरा: कई बार इस नीति के कारण भारत अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ गया। जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तो किसी भी बड़ी शक्ति ने भारत का खुलकर समर्थन नहीं किया, क्योंकि भारत किसी भी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं था।
- अनैतिक और अवसरवादी होने का आरोप: कुछ पश्चिमी देशों ने भारत की गुटनिरपेक्षता को एक ‘अनैतिक’ नीति माना, क्योंकि इसने लोकतंत्र और साम्यवाद के बीच नैतिक रूप से तटस्थ रहने का प्रयास किया। वहीं, कुछ ने इसे अवसरवादी माना, जो दोनों गुटों से लाभ उठाना चाहता था।
- सोवियत संघ की ओर झुकाव: 1971 में सोवियत संघ के साथ संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद, भारत की गुटनिरपेक्षता की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे। आलोचकों का कहना था कि भारत व्यवहार में गुटनिरपेक्ष नहीं, बल्कि सोवियत-समर्थक था।
- बदलते समय के साथ अप्रासंगिक: शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, जब दुनिया में कोई गुट ही नहीं रहा, तो गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता (Relevance in Today’s Context)
आज भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और ‘बहु-संरेखण’ (Multi-alignment) की ओर बढ़ चुकी है। भारत अब मुद्दों पर आधारित गठबंधन बनाने में विश्वास करता है। फिर भी, NAM के मूल सिद्धांत – संप्रभुता का सम्मान, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व – आज भी भारतीय कूटनीति के लिए प्रासंगिक हैं।
7. प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भारत की भूमिका (India’s Role in Major International Organizations)
एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में, भारत अंतरराष्ट्रीय संगठनों में एक सक्रिय और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह इन मंचों का उपयोग अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने और वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने के लिए करता है।
संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN)
भारत संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में से एक है और इसकी गतिविधियों में हमेशा सक्रिय रूप से भाग लेता रहा है।
- शांति अभियानों में योगदान: भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों (Peacekeeping Missions) में सबसे बड़े सैन्य योगदानकर्ताओं में से एक रहा है। भारतीय सैनिकों ने दुनिया भर के संघर्ष क्षेत्रों में शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का दावा: भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता का दावा कर रहा है। भारत का तर्क है कि UNSC को 21वीं सदी की réalités को दर्शाना चाहिए और भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र को इसमें एक स्थायी स्थान मिलना चाहिए।
- वैश्विक मुद्दों पर नेतृत्व: भारत ने UN के मंच का उपयोग आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, और सतत विकास जैसे मुद्दों पर वैश्विक सहमति बनाने के लिए किया है।
G20 (Group of Twenty)
G20 दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। हाल ही में भारत द्वारा इसकी सफल अध्यक्षता ने वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते कद को प्रदर्शित किया है।
- 2023 में सफल अध्यक्षता: भारत ने 2023 में G20 की अध्यक्षता की, जिसका समापन नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के साथ हुआ। भारत की अध्यक्षता में, अफ्रीकी संघ को G20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) की आवाज को बुलंद करने की दिशा में एक बड़ा कदम था।
- नई दिल्ली घोषणापत्र: भारत रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे विवादास्पद मुद्दे पर भी सभी सदस्यों को एक संयुक्त घोषणापत्र पर सहमत कराने में सफल रहा, जो इसकी कूटनीतिक सफलता का प्रमाण है। यह घटना भारत की विदेश नीति की एक बड़ी जीत मानी जाती है।
ब्रिक्स (BRICS) और शंघाई सहयोग संगठन (SCO)
ये संगठन भारत को गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ जुड़ने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करते हैं।
- ब्रिक्स (BRICS – Brazil, Russia, India, China, South Africa): यह पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है। ब्रिक्स के माध्यम से, भारत एक बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने और पश्चिमी प्रभुत्व वाले वित्तीय संस्थानों के विकल्प बनाने का प्रयास कर रहा है। न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना इसी दिशा में एक कदम है।
- शंघाई सहयोग संगठन (SCO – Shanghai Cooperation Organization): यह एक यूरेशियन राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संगठन है। इसमें चीन और रूस का प्रभुत्व है। SCO में भारत की सदस्यता मध्य एशिया के साथ कनेक्टिविटी बढ़ाने और आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है। यह भारत को चीन और पाकिस्तान के साथ एक ही मंच पर सीधे संवाद करने का अवसर भी देता है।
क्वाड (QUAD – Quadrilateral Security Dialogue)
क्वाड भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक अनौपचारिक रणनीतिक संवाद है। इसे अक्सर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के एक प्रयास के रूप में देखा जाता है।
- उद्देश्य: इसका घोषित उद्देश्य एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी इंडो-पैसिफिक (Indo-Pacific) क्षेत्र को बढ़ावा देना है।
- भारत के लिए महत्व: क्वाड भारत को समान विचारधारा वाले लोकतंत्रों के साथ जुड़ने और समुद्री सुरक्षा, कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में सहयोग करने का एक मंच प्रदान करता है। यह भारत की विदेश नीति के बहु-संरेखण दृष्टिकोण का एक प्रमुख उदाहरण है।
8. भारत की विदेश नीति के समक्ष वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा (Current Challenges and Future Direction for India’s Foreign Policy)
वैश्विक मंच पर भारत का कद बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही भारत की विदेश नीति के सामने कई गंभीर चुनौतियाँ भी हैं।
चीन के साथ जटिल संबंध (Complex Relationship with China)
चीन भारत की विदेश और सुरक्षा नीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
- सीमा विवाद: दोनों देशों के बीच लंबा और अनसुलझा सीमा विवाद है, जो अक्सर तनाव और सैन्य गतिरोध को जन्म देता है, जैसा कि 2020 में गलवान घाटी में हुआ।
- रणनीतिक प्रतिस्पर्धा: चीन हिंद महासागर क्षेत्र और भारत के पड़ोस (श्रीलंका, नेपाल, मालदीव) में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, जो भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती है। चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजना को लेकर भी भारत को गंभीर आपत्तियां हैं।
- आर्थिक निर्भरता: रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद, भारत व्यापार के लिए चीन पर काफी हद तक निर्भर है। इस आर्थिक निर्भरता को कम करना और साथ ही तनाव को प्रबंधित करना एक मुश्किल संतुलन है।
पड़ोस में अस्थिरता (Instability in the Neighbourhood)
भारत का पड़ोस कई चुनौतियों से जूझ रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ता है।
- पाकिस्तान: पाकिस्तान के साथ संबंध आतंकवाद और कश्मीर मुद्दे के कारण लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। पाकिस्तान में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता भी भारत के लिए चिंता का विषय है।
- अन्य पड़ोसी देश: म्यांमार में सैन्य तख्तापलट, श्रीलंका में आर्थिक संकट, और अफगानिस्तान में तालिबान का शासन जैसी घटनाएँ पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करती हैं, जिससे भारत को निपटना पड़ता है।
वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन साधना (Balancing Between Global Powers)
बढ़ते अमेरिका-चीन तनाव और रूस-पश्चिम टकराव के बीच, भारत के लिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
- अमेरिका और रूस: भारत के अमेरिका के साथ घनिष्ठ रणनीतिक संबंध हैं, खासकर इंडो-पैसिफिक में। वहीं, रूस भारत का एक पारंपरिक और महत्वपूर्ण रक्षा भागीदार रहा है। इन दोनों के बीच बिगड़ते संबंधों के बीच भारत को एक नाजुक संतुलन साधना पड़ रहा है। यह संतुलन भारत की विदेश नीति की कुशलता की सबसे बड़ी परीक्षा है।
भविष्य की दिशा: आगे की राह (The Way Forward: Future Direction)
इन चुनौतियों का सामना करने के लिए, भारत की विदेश नीति को भविष्य में कुछ प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
- आर्थिक शक्ति का निर्माण: एक मजबूत और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा संबल होगी। ‘मेक इन इंडिया’ और अन्य पहलों के माध्यम से अपनी विनिर्माण क्षमता को बढ़ाना और निर्यात को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।
- रक्षा आधुनिकीकरण: अपनी सीमाओं और समुद्री हितों की रक्षा के लिए सैन्य आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर जोर देना जारी रखना होगा।
- कूटनीतिक चपलता: भारत को अपनी ‘बहु-संरेखण’ की नीति को जारी रखना होगा, जिसमें वह विभिन्न देशों और समूहों के साथ मुद्दों पर आधारित गठबंधन बनाएगा।
- सॉफ्ट पावर का उपयोग: भारत को अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) – जैसे लोकतंत्र, संस्कृति, योग, और आईटी उद्योग – का प्रभावी ढंग से उपयोग करके वैश्विक मंच पर अपनी सकारात्मक छवि को और मजबूत करना होगा।
9. निष्कर्ष: एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति (Conclusion: An Emerging Global Power)
एक लंबा सफर (A Long Journey)
आजादी के बाद से, भारत की विदेश नीति ने एक लंबा और सफल सफर तय किया है। नेहरू के आदर्शवादी गुटनिरपेक्षता से लेकर आज की यथार्थवादी और आत्मविश्वास से भरी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ तक, यह नीति लगातार विकसित हुई है। इसने भारत को न केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में मदद की है, बल्कि इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक और एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है।
‘विश्व गुरु’ से ‘विश्व मित्र’ तक (From ‘Vishwa Guru’ to ‘Vishwa Mitra’)
भारत की महत्वाकांक्षा दुनिया पर हावी होने की नहीं, बल्कि एक अग्रणी शक्ति (Leading Power) बनने की है – एक ऐसा देश जो वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने में मदद करता है। आज भारत की भूमिका एक ‘विश्व गुरु’ (दुनिया का शिक्षक) से अधिक एक ‘विश्व मित्र’ (दुनिया का दोस्त) की है। यह एक ऐसा देश है जो अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए भी वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि में योगदान देना चाहता है। भारत की विदेश नीति इसी महान दृष्टिकोण को साकार करने का एक साधन है।
अंतिम विचार (Final Thoughts)
जैसे-जैसे भारत एक प्रमुख वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, इसकी विदेश नीति और अधिक जटिल और महत्वपूर्ण होती जाएगी। चुनौतियों के बावजूद, भारत के पास अपनी विशाल युवा आबादी, मजबूत लोकतंत्र और बढ़ती आर्थिक ताकत के रूप में अपार अवसर हैं। अपने ऐतिहासिक ज्ञान और आधुनिक आकांक्षाओं के अनूठे मिश्रण के साथ, भारत की विदेश नीति निश्चित रूप से 21वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य को आकार देने में एक निर्णायक भूमिका निभाएगी।
10. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)
प्रश्न 1: ‘भारत की विदेश नीति’ का मुख्य उद्देश्य क्या है? (What is the main objective of India’s Foreign Policy?)
उत्तर: भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देना है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना, आर्थिक विकास को गति देना, वैश्विक शांति और स्थिरता में योगदान देना, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाना शामिल है।
प्रश्न 2: गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता में क्या अंतर है? (What is the difference between Non-Alignment and Strategic Autonomy?)
उत्तर: गुटनिरपेक्षता शीत युद्ध के दौर की नीति थी, जिसका मुख्य अर्थ सैन्य गुटों (अमेरिका और सोवियत संघ) से दूर रहना था। वहीं, रणनीतिक स्वायत्तता आज के बहु-ध्रुवीय विश्व की नीति है, जिसका अर्थ है कि भारत किसी भी देश या गुट के दबाव में आए बिना, अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा। यह गुटनिरपेक्षता का एक अधिक सक्रिय और व्यावहारिक रूप है।
प्रश्न 3: ‘पड़ोस पहले’ नीति क्या है? (What is the ‘Neighbourhood First’ Policy?)
उत्तर: ‘पड़ोस पहले’ नीति भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसके तहत भारत अपने दक्षिण एशियाई पड़ोसी देशों (जैसे नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका) के साथ संबंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। इसका उद्देश्य एक शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध पड़ोस का निर्माण करना है, जो भारत के अपने विकास और सुरक्षा के लिए भी आवश्यक है।
प्रश्न 4: भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य क्यों बनना चाहता है? (Why does India want to become a permanent member of the UN Security Council?)
उत्तर: भारत का मानना है कि UNSC का वर्तमान ढांचा 1945 की दुनिया को दर्शाता है, जो आज अप्रासंगिक हो चुका है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, एक प्रमुख अर्थव्यवस्था और एक परमाणु शक्ति के रूप में, भारत का तर्क है कि उसे वैश्विक शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में एक स्थायी भूमिका मिलनी चाहिए। यह 21वीं सदी की वैश्विक réalités के अनुरूप होगा।
प्रश्न 5: भारत की विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? (What is the biggest challenge for India’s Foreign Policy?)
उत्तर: वर्तमान में, भारत की विदेश नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन के साथ अपने जटिल संबंधों को प्रबंधित करना है। इसमें सीमा विवाद, हिंद महासागर में बढ़ती चीनी उपस्थिति और आर्थिक निर्भरता जैसे मुद्दे शामिल हैं। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए सहयोग के क्षेत्रों की तलाश करना भारतीय कूटनीति के लिए एक प्रमुख प्राथमिकता और चुनौती है।

