पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य (Future of Eco-Diplomacy)
पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य (Future of Eco-Diplomacy)

पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य (Future of Eco-Diplomacy)

विषय-सूची (Table of Contents)

1. पर्यावरणीय कूटनीति: एक परिचय (Eco-Diplomacy: An Introduction)

परिचय (Introduction)

कल्पना कीजिए, दो पड़ोसी देश हैं, जिनके बीच एक विशाल नदी बहती है। एक देश नदी के ऊपरी हिस्से में है और दूसरा निचले हिस्से में। ऊपरी देश अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए एक बड़ा बांध बनाने का फैसला करता है। यह खबर निचले देश में चिंता की लहर दौड़ा देती है। उन्हें डर है कि बांध उनके किसानों के लिए पानी के प्रवाह को कम कर देगा, उनकी जैव विविधता (biodiversity) को नष्ट कर देगा और लाखों लोगों की आजीविका को खतरे में डाल देगा। तनाव बढ़ता है, सीमा पर तल्खी बढ़ जाती है और पारंपरिक कूटनीति विफल होती दिख रही है। यहीं पर एक नए और शक्तिशाली उपकरण की आवश्यकता महसूस होती है – पर्यावरणीय कूटनीति। यह सिर्फ सीमा विवाद या व्यापार समझौतों के बारे में नहीं है; यह साझा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन से निपटने और हमारे ग्रह के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए देशों के बीच सहयोग, बातचीत और समझौते की कला है।

पर्यावरणीय कूटनीति की परिभाषा (Defining Eco-Diplomacy)

सरल शब्दों में, पर्यावरणीय कूटनीति (Eco-Diplomacy) अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का वह क्षेत्र है जो वैश्विक और क्षेत्रीय पर्यावरणीय मुद्दों को हल करने के लिए राजनयिक रणनीतियों और प्रक्रियाओं का उपयोग करता है। यह इस समझ पर आधारित है कि पर्यावरण संबंधी समस्याएँ, जैसे कि जलवायु परिवर्तन (climate change), ओजोन परत का क्षरण, या सीमा पार प्रदूषण, किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं हैं। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए सामूहिक कार्रवाई और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। पर्यावरणीय कूटनीति का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रों को ऐसे समझौतों और संधियों पर एक साथ लाना है जो सतत विकास (sustainable development) को बढ़ावा दें और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करें। यह केवल समस्याओं को हल करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह संघर्ष को रोकने और साझा पर्यावरणीय हितों पर आधारित शांतिपूर्ण संबंध बनाने का भी एक माध्यम है।

इसका महत्व क्यों बढ़ रहा है? (Why is its Importance Growing?)

आज की दुनिया में, पर्यावरणीय कूटनीति पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। इसके कई कारण हैं:

  • वैश्विक चुनौतियों का पैमाना: जलवायु परिवर्तन, समुद्र के स्तर में वृद्धि, और बड़े पैमाने पर प्रजातियों का विलुप्त होना ऐसी समस्याएँ हैं जिनसे कोई भी देश अकेले नहीं निपट सकता। इन पर काबू पाने के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
  • आर्थिक अंतर्संबंध: पर्यावरण और अर्थव्यवस्था गहराई से जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक संसाधनों की कमी, चरम मौसम की घटनाएँ और प्रदूषण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं और आर्थिक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। प्रभावी पर्यावरणीय कूटनीति आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा दे सकती है।
  • सुरक्षा के लिए खतरा: पानी की कमी, भोजन की असुरक्षा और जलवायु-प्रेरित प्रवासन जैसे पर्यावरणीय मुद्दे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा पैदा कर सकते हैं। इन मुद्दों को संबोधित करके, पर्यावरणीय कूटनीति संघर्षों को रोकने में मदद करती है।
  • नैतिक जिम्मेदारी: हमारे पास आने वाली पीढ़ियों के लिए ग्रह को संरक्षित करने की एक नैतिक जिम्मेदारी है। पर्यावरणीय कूटनीति इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए एक व्यावहारिक ढांचा प्रदान करती है।

2. पर्यावरणीय कूटनीति का ऐतिहासिक विकास (Historical Evolution of Eco-Diplomacy)

प्रारंभिक चरण: संरक्षण की शुरुआत (Early Stages: The Beginnings of Conservation)

पर्यावरण को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का विचार नया नहीं है, लेकिन इसका स्वरूप समय के साथ बहुत बदल गया है। 20वीं सदी की शुरुआत में, इसके शुरुआती उदाहरण देखने को मिलते हैं। ये प्रयास मुख्य रूप से विशिष्ट प्रजातियों के संरक्षण या साझा जल संसाधनों के प्रबंधन पर केंद्रित थे।

  • 1909 का सीमा जल संधि (Boundary Waters Treaty): संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के बीच हुई यह संधि दोनों देशों द्वारा साझा की जाने वाली नदियों और झीलों के प्रबंधन के लिए एक ऐतिहासिक समझौता था। इसने विवादों को सुलझाने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त आयोग की स्थापना की।
  • 1911 का फर सील संधि (Fur Seal Treaty): यह दुनिया की पहली वन्यजीव संरक्षण संधियों में से एक थी, जिस पर अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन (कनाडा के लिए), जापान और रूस ने हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य उत्तरी प्रशांत में फर सील की आबादी को अत्यधिक शिकार से बचाना था।
  • ये शुरुआती प्रयास आज की जटिल पर्यावरणीय कूटनीति की नींव थे, जिन्होंने यह प्रदर्शित किया कि देश साझा प्राकृतिक विरासत की रक्षा के लिए अपनी संप्रभुता के कुछ पहलुओं पर सहयोग कर सकते हैं।

1972 का स्टॉकहोम सम्मेलन: एक वैश्विक जागृति (The 1972 Stockholm Conference: A Global Awakening)

पर्यावरणीय कूटनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ 1972 में आया, जब संयुक्त राष्ट्र ने स्टॉकहोम, स्वीडन में “मानव पर्यावरण पर सम्मेलन” (Conference on the Human Environment) आयोजित किया। यह पहली बार था जब वैश्विक समुदाय पर्यावरण के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए एक साथ आया था।

  • एक नए युग की शुरुआत: इस सम्मेलन ने पर्यावरण को एक प्रमुख वैश्विक चिंता के रूप में स्थापित किया। इसने “केवल एक पृथ्वी” (Only One Earth) के विचार को लोकप्रिय बनाया।
  • UNEP की स्थापना: इसका सबसे महत्वपूर्ण परिणाम संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (United Nations Environment Programme – UNEP) की स्थापना थी, जो आज भी वैश्विक पर्यावरण एजेंडे के समन्वय में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है।
  • विकास और पर्यावरण का लिंक: स्टॉकहोम सम्मेलन ने पहली बार विकास और पर्यावरण के बीच गहरे संबंध को स्वीकार किया, जिससे भविष्य में सतत विकास की अवधारणा का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह एक महत्वपूर्ण क्षण था जिसने आधुनिक पर्यावरणीय कूटनीति की नींव रखी।

रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन (1992) से लेकर क्योटो प्रोटोकॉल तक (From the Rio Earth Summit (1992) to the Kyoto Protocol)

1992 में रियो डी जनेरियो में आयोजित “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन”, जिसे पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit) के रूप में भी जाना जाता है, पर्यावरणीय कूटनीति के लिए एक और मील का पत्थर था।

  • प्रमुख परिणाम: इस शिखर सम्मेलन से तीन प्रमुख कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते निकले: जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), जैविक विविधता पर कन्वेंशन (CBD), और मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCCD)।
  • एजेंडा 21: इसने “एजेंडा 21” नामक एक व्यापक कार्य योजना भी तैयार की, जो 21वीं सदी में सतत विकास को प्राप्त करने के लिए एक वैश्विक खाका था।
  • क्योटो प्रोटोकॉल (1997): UNFCCC के तहत, 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल को अपनाया गया। यह पहला अंतर्राष्ट्रीय समझौता था जिसमें विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस (greenhouse gas) उत्सर्जन को कम करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। इसने “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” (Common but Differentiated Responsibilities) के सिद्धांत को स्थापित किया, जो आज भी पर्यावरणीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बहस का विषय है।

पेरिस समझौता (2015) और वर्तमान युग (The Paris Agreement (2015) and the Current Era)

21वीं सदी में, पर्यावरणीय कूटनीति का ध्यान मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित हो गया है। 2015 का पेरिस समझौता इस युग का सबसे महत्वपूर्ण राजनयिक मील का पत्थर है।

  • एक नया दृष्टिकोण: क्योटो प्रोटोकॉल के विपरीत, जो केवल विकसित देशों पर बाध्यकारी लक्ष्य लगाता था, पेरिस समझौते ने एक “बॉटम-अप” दृष्टिकोण अपनाया। इसमें लगभग सभी देशों (विकसित और विकासशील दोनों) ने स्वेच्छा से अपने उत्सर्जन को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDCs) प्रस्तुत किए।
  • दीर्घकालिक लक्ष्य: समझौते का मुख्य लक्ष्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करना है।
  • आधुनिक पर्यावरणीय कूटनीति का प्रतीक: पेरिस समझौता आधुनिक पर्यावरणीय कूटनीति की सफलता और चुनौतियों दोनों का प्रतीक है। यह वैश्विक सहमति बनाने की क्षमता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर करता है कि इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहयोग की आवश्यकता है।

3. पर्यावरणीय कूटनीति के प्रमुख स्तंभ और सिद्धांत (Key Pillars and Principles of Eco-Diplomacy)

अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और बहुपक्षीय समझौते (International Treaties and Multilateral Agreements)

अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ पर्यावरणीय कूटनीति की रीढ़ हैं। ये कानूनी रूप से बाध्यकारी दस्तावेज़ हैं जो उन नियमों और मानकों को निर्धारित करते हैं जिनका पालन करने के लिए हस्ताक्षरकर्ता देश सहमत होते हैं। ये समझौते वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक संरचित ढांचा प्रदान करते हैं।

  • कार्यान्वयन का आधार: ये संधियाँ देशों को विशिष्ट लक्ष्य देती हैं, जैसे ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल) या ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना (पेरिस समझौता)।
  • सहयोग का मंच: ये समझौते राष्ट्रों को नियमित रूप से मिलने, प्रगति की समीक्षा करने और भविष्य की कार्रवाई पर बातचीत करने के लिए एक मंच (जैसे कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज – COP) प्रदान करते हैं।
  • जवाबदेही सुनिश्चित करना: हालांकि प्रवर्तन एक चुनौती हो सकती है, ये संधियाँ पारदर्शिता और रिपोर्टिंग तंत्र स्थापित करती हैं, जिससे देशों को उनकी प्रतिबद्धताओं के लिए जवाबदेह ठहराया जाता है। सफल पर्यावरणीय कूटनीति इन संधियों के प्रभावी डिजाइन और कार्यान्वयन पर बहुत अधिक निर्भर करती है।

वैज्ञानिक सहयोग और डेटा साझाकरण (Scientific Cooperation and Data Sharing)

प्रभावी पर्यावरणीय कूटनीति ठोस वैज्ञानिक सबूतों पर आधारित होती है। कूटनीतिज्ञों और नीति-निर्माताओं को पर्यावरणीय समस्याओं की प्रकृति, उनके कारणों और संभावित समाधानों को समझने के लिए वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

  • नीति-निर्माण को सूचित करना: जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) जैसे वैज्ञानिक निकाय नीति-निर्माताओं को नवीनतम शोध और डेटा प्रदान करते हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं का आधार बनता है।
  • विश्वास का निर्माण: जब देश वैज्ञानिक डेटा और अनुसंधान विधियों को साझा करते हैं, तो यह आपसी विश्वास बनाने में मदद करता है। यह “हम बनाम वे” की मानसिकता को कम करता है और साझा समझ को बढ़ावा देता है।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग उभरते पर्यावरणीय खतरों की पहचान करने और उनके वैश्विक प्रभावों का आकलन करने में मदद कर सकता है, जिससे समय पर राजनयिक कार्रवाई की जा सके।

वित्तीय तंत्र और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Financial Mechanisms and Technology Transfer)

कई विकासशील देशों के पास महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय लक्ष्यों को लागू करने के लिए वित्तीय संसाधनों या तकनीकी क्षमता का अभाव होता है। इसलिए, वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर्यावरणीय कूटनीति के महत्वपूर्ण घटक हैं।

  • हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund – GCF): पेरिस समझौते के तहत स्थापित यह कोष विकसित देशों से विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है ताकि वे उत्सर्जन को कम कर सकें और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल हो सकें।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: इसमें नवीकरणीय ऊर्जा (renewable energy), ऊर्जा दक्षता और टिकाऊ कृषि जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को विकसित देशों से विकासशील देशों में स्थानांतरित करना शामिल है। यह न केवल विकासशील देशों को उनके पर्यावरणीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी उत्सर्जन को कम करता है।
  • न्याय और समानता: ये तंत्र “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” के सिद्धांत को व्यवहार में लाते हैं, यह स्वीकार करते हुए कि जिन देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक प्रदूषण किया है, उनकी समाधान में योगदान करने की अधिक जिम्मेदारी है। यह सफल पर्यावरणीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण है।

गैर-राज्य अभिनेताओं की भूमिका (Role of Non-State Actors)

आधुनिक पर्यावरणीय कूटनीति अब केवल राष्ट्र-राज्यों तक ही सीमित नहीं है। गैर-सरकारी संगठन (NGOs), नागरिक समाज, निजी क्षेत्र और स्थानीय सरकारें इस प्रक्रिया में तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

  • गैर-सरकारी संगठन (NGOs): WWF और ग्रीनपीस जैसे संगठन अनुसंधान करते हैं, जन जागरूकता बढ़ाते हैं, और सरकारों पर कार्रवाई के लिए दबाव डालते हैं। वे अक्सर अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में पर्यवेक्षक के रूप में भाग लेते हैं।
  • निजी क्षेत्र (Private Sector): कंपनियाँ स्थायी प्रथाओं को अपनाकर, स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में निवेश करके और अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को डीकार्बोनाइज़ करके एक बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (Corporate Social Responsibility) अब एक महत्वपूर्ण कारक है।
  • शहर और स्थानीय सरकारें: C40 सिटीज जैसे नेटवर्क के माध्यम से दुनिया भर के शहर जलवायु कार्रवाई पर सीधे सहयोग कर रहे हैं, कभी-कभी राष्ट्रीय सरकारों की तुलना में अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करते हैं। यह बहु-स्तरीय पर्यावरणीय कूटनीति का एक उदाहरण है।

4. प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय समझौते: एक गहन विश्लेषण (Major International Environmental Agreements: A Deep Analysis)

अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर्यावरणीय कूटनीति के परिणाम और उपकरण दोनों हैं। वे वैश्विक सहयोग की भावना को दर्शाते हैं और भविष्य की कार्रवाई के लिए कानूनी और राजनीतिक ढांचा तैयार करते हैं। इनमें से, 2015 का पेरिस समझौता सबसे प्रमुख और दूरगामी है।

पेरिस समझौता (2015): एक ऐतिहासिक उपलब्धि (The Paris Agreement (2015): A Landmark Achievement)

पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक वैश्विक समझौता है, जिसे UNFCCC के पक्षकारों के 21वें सम्मेलन (COP21) में 196 देशों द्वारा अपनाया गया था। यह क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लेता है और जलवायु कार्रवाई के लिए एक नया, अधिक समावेशी मार्ग प्रस्तुत करता है। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को इस सदी में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है, जबकि इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना है।

पेरिस समझौते के सकारात्मक पहलू (Positive Aspects of the Paris Agreement)

  • सार्वभौमिक भागीदारी: क्योटो प्रोटोकॉल के विपरीत, जो केवल कुछ विकसित देशों पर केंद्रित था, पेरिस समझौते में लगभग दुनिया के सभी देश शामिल हैं। इसने एक मजबूत संकेत दिया कि जलवायु परिवर्तन एक साझा वैश्विक जिम्मेदारी है।
  • लचीलापन और राष्ट्रीय स्वामित्व: “राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान” (NDCs) का मॉडल देशों को अपनी क्षमताओं और परिस्थितियों के अनुसार अपने स्वयं के जलवायु लक्ष्य निर्धारित करने की अनुमति देता है। इस लचीलेपन ने व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने में मदद की।
  • दीर्घकालिक दृष्टि: 1.5°C के लक्ष्य को शामिल करके, समझौते ने विज्ञान-आधारित, महत्वाकांक्षी दीर्घकालिक दृष्टि स्थापित की है। इसने सरकारों और निवेशकों को जीवाश्म ईंधन से दूर जाने और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश करने के लिए एक स्पष्ट संकेत दिया।
  • पारदर्शिता और समीक्षा तंत्र: समझौते में एक “वैश्विक स्टॉकटेक” (Global Stocktake) तंत्र शामिल है, जो हर पांच साल में सामूहिक प्रगति का आकलन करेगा। यह देशों को समय के साथ अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

पेरिस समझौते के नकारात्मक पहलू और चुनौतियाँ (Negative Aspects and Challenges of the Paris Agreement)

  • गैर-बाध्यकारी लक्ष्य: जबकि समझौते की प्रक्रियाएँ कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं, देशों द्वारा प्रस्तुत किए गए व्यक्तिगत NDCs (उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य) कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। इसका मतलब है कि यदि कोई देश अपने लक्ष्यों को पूरा नहीं करता है तो कोई दंड नहीं है।
  • महत्वाकांक्षा का अंतर: वर्तमान में प्रस्तुत किए गए सभी NDCs का कुल योग भी वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे रखने के लिए पर्याप्त नहीं है, 1.5°C की तो बात ही छोड़ दें। लक्ष्यों और आवश्यक कार्रवाई के बीच एक महत्वपूर्ण “महत्वाकांक्षा का अंतर” (ambition gap) है।
  • वित्तीय प्रतिबद्धताओं की कमी: यद्यपि समझौते में विकसित देशों से विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का आह्वान किया गया है, लेकिन $100 बिलियन प्रति वर्ष का लक्ष्य अभी तक पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है। वित्तपोषण एक विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है।
  • प्रवर्तन का अभाव: समझौते में एक मजबूत प्रवर्तन तंत्र का अभाव है। यह मुख्य रूप से देशों को उनकी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने के लिए “नाम और शर्म” (name and shame) और सहकर्मी दबाव पर निर्भर करता है, जो हमेशा प्रभावी नहीं होता है। इन चुनौतियों के बावजूद, यह समझौता पर्यावरणीय कूटनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।

अन्य महत्वपूर्ण समझौते: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Other Important Agreements: The Montreal Protocol)

यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि सफल पर्यावरणीय कूटनीति के अन्य उदाहरण भी हैं। 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल इसका सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है।

  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य उन पदार्थों, विशेष रूप से क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना था, जो पृथ्वी की ओजोन परत को नष्ट कर रहे थे।
  • सफलता का कारण: इसकी सफलता के पीछे कई कारण थे – समस्या का स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण, व्यवहार्य तकनीकी विकल्प (CFCs के विकल्प), और विकासशील देशों को संक्रमण में मदद करने के लिए एक बहुपक्षीय कोष की स्थापना।
  • एक प्रेरणा: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल यह साबित करता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक सहमति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एक साथ आते हैं, तो वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान किया जा सकता है। यह भविष्य की पर्यावरणीय कूटनीति के लिए एक शक्तिशाली मॉडल के रूप में कार्य करता है।

5. वैश्विक मंच पर भारत की पर्यावरणीय कूटनीति (India’s Eco-Diplomacy on the Global Stage)

भारत का दृष्टिकोण: न्याय और समानता (India’s Approach: Justice and Equity)

भारत की पर्यावरणीय कूटनीति “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं” (Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities – CBDR-RC) के सिद्धांत पर दृढ़ता से आधारित है। भारत का तर्क है कि विकसित देशों, जिन्होंने औद्योगिकीकरण के बाद से वायुमंडल में अधिकांश ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है, की जलवायु परिवर्तन से निपटने में अधिक ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।

  • जलवायु न्याय (Climate Justice): भारत “जलवायु न्याय” की वकालत करता है, जिसका अर्थ है कि जलवायु कार्रवाई का बोझ उन लोगों पर नहीं पड़ना चाहिए जिन्होंने समस्या पैदा करने में सबसे कम योगदान दिया है और जो इसके प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं।
  • विकास की आवश्यकताएँ: एक विकासशील देश के रूप में, भारत अपनी विशाल आबादी को गरीबी से बाहर निकालने की अपनी विकासात्मक आवश्यकताओं को संतुलित करने की चुनौती का सामना करता है, साथ ही एक स्थायी मार्ग का अनुसरण भी करता है। यह संतुलन भारत की पर्यावरणीय कूटनीति के केंद्र में है।
  • नेतृत्व की भूमिका: भारत खुद को केवल एक वार्ताकार के रूप में नहीं, बल्कि विकासशील देशों (Global South) के हितों के एक प्रमुख पैरोकार के रूप में देखता है, जो वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर विकसित देशों से अधिक प्रतिबद्धताओं की मांग करता है।

भारत की प्रमुख पहलें और योगदान (India’s Key Initiatives and Contributions)

भारत केवल बातचीत की मेज पर ही सक्रिय नहीं रहा है, बल्कि उसने वैश्विक पर्यावरणीय कूटनीति में ठोस योगदान देने वाली कई पहलों का भी नेतृत्व किया है।

  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA): 2015 में भारत और फ्रांस द्वारा शुरू किया गया, ISA सौर ऊर्जा से समृद्ध देशों का एक गठबंधन है। इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के विकास और तैनाती में तेजी लाना, वित्तपोषण की लागत को कम करना और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाना है। यह पर्यावरणीय कूटनीति के माध्यम से समाधान-उन्मुख नेतृत्व का एक प्रमुख उदाहरण है।
  • आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे के लिए गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure – CDRI): भारत के नेतृत्व में एक और वैश्विक साझेदारी, CDRI का उद्देश्य जलवायु और आपदा जोखिमों के प्रति नए और मौजूदा बुनियादी ढांचे के लचीलेपन को बढ़ावा देना है।
  • पंचामृत लक्ष्य: COP26 में, भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (net-zero emissions) प्राप्त करने के लक्ष्य सहित पांच महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य (“पंचामृत”) की घोषणा की। इन लक्ष्यों में 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना और अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करना शामिल है।

भारत के लिए अवसर और चुनौतियाँ (Opportunities and Challenges for India)

भारत की पर्यावरणीय कूटनीति की यात्रा अवसरों और चुनौतियों दोनों से भरी है।

  • अवसर:
    • वैश्विक नेता: भारत नवीकरणीय ऊर्जा, विशेष रूप से सौर ऊर्जा में एक वैश्विक नेता के रूप में उभर सकता है, जो इसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक लाभ प्रदान कर सकता है।
    • ग्रीन जॉब्स: एक हरित अर्थव्यवस्था में संक्रमण लाखों नई नौकरियां पैदा कर सकता है, आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकता है और ऊर्जा सुरक्षा में सुधार कर सकता है।
    • कूटनीतिक प्रभाव: विकासशील दुनिया के एक चैंपियन के रूप में, भारत वैश्विक पर्यावरणीय कूटनीति के भविष्य को आकार देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • चुनौतियाँ:
    • वित्तपोषण: अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारत को महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय वित्त और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होगी।
    • कोयले पर निर्भरता: भारत की ऊर्जा प्रणाली अभी भी कोयले पर बहुत अधिक निर्भर है, और इससे दूर जाना एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौती है।
    • जलवायु प्रभाव: भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, जैसे कि अत्यधिक गर्मी की लहरें, बाढ़ और सूखे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर अनुकूलन प्रयासों की आवश्यकता है।

भारत की सफलता न केवल उसके अपने भविष्य के लिए, बल्कि वैश्विक जलवायु प्रयासों की सफलता के लिए भी महत्वपूर्ण है। प्रभावी पर्यावरणीय कूटनीति इन चुनौतियों से निपटने में एक महत्वपूर्ण उपकरण बनी रहेगी। भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट (moef.gov.in) इन पहलों पर विस्तृत जानकारी प्रदान करती है।

6. पर्यावरणीय कूटनीति के भविष्य की राह में बाधाएँ (Hurdles in the Future Path of Eco-Diplomacy)

हालांकि पर्यावरणीय कूटनीति ने महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन इसका भविष्य कई गंभीर चुनौतियों से भरा है। इन बाधाओं को समझना और संबोधित करना एक स्थायी और न्यायसंगत दुनिया बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय संप्रभुता बनाम वैश्विक अनिवार्यता (National Sovereignty vs. Global Imperative)

पर्यावरणीय कूटनीति में सबसे स्थायी तनावों में से एक राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक पर्यावरणीय कार्रवाई की आवश्यकता के बीच का टकराव है। देश अक्सर अंतरराष्ट्रीय समझौतों को अपनी नीतियों को निर्धारित करने की क्षमता पर एक अतिक्रमण के रूप में देखते हैं।

  • आर्थिक चिंताएँ: सरकारें चिंतित हो सकती हैं कि सख्त पर्यावरणीय नियम उनकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाएँगे, उद्योगों को कम प्रतिस्पर्धी बना देंगे, या नौकरियों का नुकसान होगा।
  • संसाधनों पर नियंत्रण: देश अपने प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जंगल, खनिज और पानी) को अपनी संप्रभु संपत्ति मानते हैं और बाहरी हस्तक्षेप का विरोध कर सकते हैं कि उनका प्रबंधन कैसे किया जाए।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव: अल्पकालिक राजनीतिक लाभ अक्सर दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता पर हावी हो जाते हैं। नेता अलोकप्रिय निर्णय लेने से हिचकिचा सकते हैं, भले ही वे ग्रह के लिए आवश्यक हों। इस संप्रभुता की बाधा को दूर करने के लिए प्रभावी पर्यावरणीय कूटनीति की आवश्यकता है जो साझा लाभों पर जोर देती है।

विकसित और विकासशील देशों के बीच खाई (The Divide between Developed and Developing Nations)

विकसित (“उत्तर”) और विकासशील (“दक्षिण”) देशों के बीच ऐतिहासिक और आर्थिक मतभेद पर्यावरणीय कूटनीति में एक बड़ी बाधा बने हुए हैं। यह खाई मुख्य रूप से जिम्मेदारी, वित्त और प्रौद्योगिकी के सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है।

  • ऐतिहासिक जिम्मेदारी: विकासशील देश, भारत के नेतृत्व में, सही तर्क देते हैं कि विकसित देशों ने औद्योगिकीकरण के दौरान दशकों तक बिना किसी रोक-टोक के प्रदूषण फैलाया और इसलिए उन्हें उत्सर्जन को कम करने और समाधान के लिए भुगतान करने का सबसे बड़ा बोझ उठाना चाहिए।
  • वित्तीय प्रतिबद्धताएँ: विकासशील देशों का तर्क है कि उनके पास स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए धन की कमी है। वे विकसित देशों से अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की मांग करते हैं, लेकिन प्रगति धीमी रही है।
  • विश्वास की कमी: यह खाई अक्सर वार्ताओं में अविश्वास और गतिरोध पैदा करती है, जिससे प्रगति बाधित होती है। इस विभाजन को पाटना सफल पर्यावरणीय कूटनीति के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है।

प्रवर्तन और अनुपालन की समस्या (The Problem of Enforcement and Compliance)

अंतर्राष्ट्रीय कानून में एक केंद्रीय प्रवर्तन प्राधिकरण का अभाव है, जैसा कि घरेलू कानून में होता है। इसका मतलब है कि देशों को पर्यावरणीय समझौतों का पालन करने के लिए मजबूर करना बेहद मुश्किल है।

  • कोई वैश्विक पुलिस नहीं: कोई “विश्व पर्यावरण पुलिस” नहीं है जो उन देशों को दंडित कर सके जो अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करते हैं।
  • स्व-रिपोर्टिंग पर निर्भरता: अनुपालन की निगरानी अक्सर देशों द्वारा स्व-रिपोर्ट किए गए डेटा पर निर्भर करती है, जो हमेशा सटीक या पारदर्शी नहीं हो सकता है।
  • राजनीतिक परिणाम: किसी समझौते से हटने (जैसा कि अमेरिका ने पेरिस समझौते से अस्थायी रूप से किया था) के राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं, लेकिन शायद ही कभी प्रत्यक्ष कानूनी या आर्थिक दंड होते हैं। मजबूत अनुपालन तंत्र विकसित करना पर्यावरणीय कूटनीति के लिए एक बड़ी चुनौती है।

भू-राजनीतिक तनाव और अन्य संकटों का प्रभाव (Impact of Geopolitical Tensions and Other Crises)

पर्यावरणीय कूटनीति एक निर्वात में काम नहीं करती है। यह अन्य वैश्विक घटनाओं से बहुत प्रभावित होती है।

  • संघर्ष और युद्ध: देशों के बीच युद्ध या गंभीर भू-राजनीतिक तनाव (geopolitical tension) पर्यावरण सहित सभी क्षेत्रों में सहयोग को रोक सकते हैं। राष्ट्र सुरक्षा और रक्षा पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और जलवायु कार्रवाई एक निम्न प्राथमिकता बन जाती है।
  • आर्थिक मंदी: आर्थिक मंदी के दौरान, सरकारें अक्सर पर्यावरणीय खर्च में कटौती करती हैं और आर्थिक विकास को प्राथमिकता देती हैं, भले ही वह टिकाऊ न हो।
  • महामारी: COVID-19 महामारी जैसी वैश्विक स्वास्थ्य संकटों ने दिखाया कि कैसे तत्काल संकट दीर्घकालिक पर्यावरणीय मुद्दों से ध्यान और संसाधनों को हटा सकते हैं। इन संकटों के बावजूद पर्यावरण एजेंडे को सबसे आगे रखना एक निरंतर चुनौती है।

7. भविष्य की दिशा: पर्यावरणीय कूटनीति में नवीन रुझान और अवसर (The Way Forward: New Trends and Opportunities in Eco-Diplomacy)

चुनौतियों के बावजूद, पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य रोमांचक अवसरों और उभरते रुझानों से भी भरा है जो वैश्विक पर्यावरण शासन (global environmental governance) को नया आकार दे सकते हैं। ये नवाचार आशा प्रदान करते हैं कि हम वर्तमान बाधाओं को दूर कर सकते हैं।

प्रौद्योगिकी की भूमिका: एआई, उपग्रह और ब्लॉकचेन (The Role of Technology: AI, Satellites, and Blockchain)

प्रौद्योगिकी पर्यावरणीय कूटनीति में क्रांति लाने की क्षमता रखती है, विशेष रूप से निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) के क्षेत्रों में।

  • उपग्रह निगरानी: सैटेलाइट इमेजरी अब वनों की कटाई, अवैध खनन और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बड़े स्रोतों को लगभग वास्तविक समय में ट्रैक कर सकती है। यह डेटा देशों द्वारा स्व-रिपोर्टिंग पर निर्भरता को कम कर सकता है और अनुपालन की अधिक वस्तुनिष्ठ तस्वीर प्रदान कर सकता है।
  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI): AI विशाल जलवायु डेटासेट का विश्लेषण कर सकता है ताकि जलवायु प्रभावों का बेहतर मॉडल बनाया जा सके, कमजोरियों की पहचान की जा सके और नीतिगत हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता का अनुमान लगाया जा सके, जिससे वार्ताकारों को बेहतर जानकारी मिल सके।
  • ब्लॉकचेन: ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग के लिए एक सुरक्षित और पारदर्शी खाता बही बनाने, जलवायु वित्त के प्रवाह को ट्रैक करने और यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है कि धन अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुँचे। यह पर्यावरणीय कूटनीति में विश्वास और जवाबदेही बढ़ा सकता है।

शहरों और उप-राष्ट्रीय अभिनेताओं का उदय (The Rise of Cities and Sub-National Actors)

पर्यावरणीय कूटनीति तेजी से विकेंद्रीकृत हो रही है। शहर, राज्य और क्षेत्र वैश्विक मंच पर शक्तिशाली अभिनेता के रूप में उभर रहे हैं।

  • प्रत्यक्ष कार्रवाई: दुनिया के कई सबसे बड़े शहर C40 सिटीज जैसे नेटवर्क के माध्यम से सीधे सहयोग कर रहे हैं, सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा कर रहे हैं और महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं जो अक्सर उनकी राष्ट्रीय सरकारों से आगे निकल जाते हैं।
  • नीतिगत नवाचार के केंद्र: शहर अक्सर नीतिगत नवाचार के लिए “प्रयोगशाला” के रूप में काम करते हैं, जैसे कि भीड़भाड़ मूल्य निर्धारण, हरित भवन कोड और कुशल सार्वजनिक परिवहन प्रणाली, जिन्हें बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जा सकता है।
  • “पैरा-डिप्लोमेसी”: यह प्रवृत्ति, जिसे “पैरा-डिप्लोमेसी” के रूप में जाना जाता है, पारंपरिक राष्ट्र-राज्य-केंद्रित मॉडल को पूरक बनाती है और कार्रवाई के नए रास्ते खोलती है। भविष्य की पर्यावरणीय कूटनीति को इन उप-राष्ट्रीय अभिनेताओं को पूरी तरह से एकीकृत करने की आवश्यकता होगी।

कॉर्पोरेट पर्यावरणीय कूटनीति और हरित वित्त (Corporate Eco-Diplomacy and Green Finance)

निजी क्षेत्र अब केवल समस्या का हिस्सा नहीं है, बल्कि समाधान का एक अनिवार्य हिस्सा है। निवेशक, उपभोक्ता और कर्मचारी कंपनियों से अधिक पर्यावरणीय जिम्मेदारी की मांग कर रहे हैं।

  • कॉर्पोरेट प्रतिज्ञाएँ: सैकड़ों प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने विज्ञान-आधारित उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य निर्धारित किए हैं और 100% नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करने का संकल्प लिया है। ये प्रतिबद्धताएँ महत्वपूर्ण बाजार संकेत भेजती हैं।
  • हरित वित्त का विकास: ESG (पर्यावरण, सामाजिक और शासन) निवेश तेजी से बढ़ रहा है। निवेशक उन कंपनियों में पूंजी लगा रहे हैं जो स्थायी प्रथाओं का प्रदर्शन करती हैं और उन कंपनियों से दूर जा रही हैं जो जलवायु जोखिमों का प्रबंधन करने में विफल रहती हैं।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी: सरकारें और कंपनियाँ तेजी से बड़े पैमाने पर हरित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वित्तपोषित करने के लिए साझेदारी कर रही हैं। यह सहयोग पर्यावरणीय कूटनीति के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा।

जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा का एकीकरण (Integration of Climate Change and Security)

सुरक्षा प्रतिष्ठान अब जलवायु परिवर्तन को एक “खतरा गुणक” (threat multiplier) के रूप में तेजी से पहचान रहे हैं जो मौजूदा अस्थिरता को बढ़ा सकता है और नए संघर्ष पैदा कर सकता है।

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद: जलवायु परिवर्तन और सुरक्षा के बीच की कड़ी पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में तेजी से बहस हो रही है। यह इस मुद्दे को सर्वोच्च स्तर की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति तक ले जाता है।
  • जलवायु-प्रेरित प्रवासन: जैसे-जैसे समुद्र का स्तर बढ़ता है और सूखा तेज होता है, लाखों लोग विस्थापित हो सकते हैं, जिससे “जलवायु शरणार्थी” (climate refugees) का मुद्दा पैदा हो सकता है। इस मुद्दे को प्रबंधित करने के लिए नए राजनयिक ढांचे की आवश्यकता होगी।
  • संसाधन संघर्ष: पानी जैसे घटते संसाधनों पर प्रतिस्पर्धा क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा सकती है। पर्यावरणीय कूटनीति इन संघर्षों को रोकने और साझा संसाधनों पर सहकारी प्रबंधन समझौते बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

8. निष्कर्ष: एक स्थायी भविष्य के लिए सहयोगात्मक दृष्टिकोण (Conclusion: A Collaborative Approach for a Sustainable Future)

यात्रा का सार (Essence of the Journey)

हमने पर्यावरणीय कूटनीति की एक लंबी और जटिल यात्रा तय की है – संरक्षण पर केंद्रित शुरुआती संधियों से लेकर 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन की वैश्विक जागृति तक, और अंत में पेरिस समझौते के आधुनिक, सार्वभौमिक ढांचे तक। यह स्पष्ट है कि पर्यावरणीय कूटनीति पारंपरिक कूटनीति का एक विशिष्ट क्षेत्र मात्र नहीं है; यह 21वीं सदी में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का एक अनिवार्य और केंद्रीय स्तंभ बन गया है। यह इस मौलिक सत्य को स्वीकार करता है कि हमारी अर्थव्यवस्था, हमारी सुरक्षा और हमारा अस्तित्व एक स्वस्थ ग्रह पर निर्भर करता है, और उस ग्रह का स्वास्थ्य राष्ट्रीय सीमाओं की परवाह नहीं करता है।

चुनौतियों और अवसरों का संतुलन (Balancing Challenges and Opportunities)

आगे की राह निश्चित रूप से राष्ट्रीय संप्रभुता की चिंताओं, विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरे मतभेदों और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से उत्पन्न बाधाओं से भरी है। ये वास्तविक और महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हालांकि, आशा के कारण भी उतने ही प्रबल हैं। प्रौद्योगिकी में प्रगति हमें अभूतपूर्व निगरानी और सहयोग क्षमताएं प्रदान कर रही है। शहर, कंपनियाँ और नागरिक समाज कार्रवाई की मांग कर रहे हैं और अक्सर रास्ता दिखा रहे हैं। पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम इन चुनौतियों से कैसे निपटते हैं और इन उभरते अवसरों का कितनी अच्छी तरह लाभ उठाते हैं।

एक साझा भविष्य के लिए एक साझा जिम्मेदारी (A Shared Responsibility for a Shared Future)

अंततः, पर्यावरणीय कूटनीति का भविष्य केवल कूटनीतिज्ञों और विश्व नेताओं के हाथों में नहीं है। यह हम सभी पर निर्भर करता है। नागरिकों के रूप में, हम अपने नेताओं से महत्वाकांक्षी कार्रवाई की मांग कर सकते हैं। उपभोक्ताओं के रूप में, हम स्थायी व्यवसायों का समर्थन कर सकते हैं। छात्रों और शिक्षार्थियों के रूप में, हम इन जटिल मुद्दों के बारे में खुद को और दूसरों को शिक्षित कर सकते हैं। पर्यावरणीय कूटनीति का सार सहयोग में निहित है – न केवल राष्ट्रों के बीच, बल्कि समाज के सभी स्तरों पर। केवल एक साथ काम करके ही हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि पर्यावरणीय कूटनीति अपने वादे को पूरा करे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी, समृद्ध और शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण करे।

9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs – Frequently Asked Questions)

प्रश्न 1: पर्यावरणीय कूटनीति का मुख्य लक्ष्य क्या है? (What is the main goal of eco-diplomacy?)

उत्तर: पर्यावरणीय कूटनीति का मुख्य लक्ष्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और बातचीत के माध्यम से वैश्विक और क्षेत्रीय पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करना है। इसमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल हैं। इसका अंतिम उद्देश्य सतत विकास को बढ़ावा देना और ग्रह को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित करना है।

प्रश्न 2: पेरिस समझौता इतना महत्वपूर्ण क्यों है? (Why is the Paris Agreement so important?)

उत्तर: पेरिस समझौता ऐतिहासिक है क्योंकि यह जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई करने के लिए लगभग सभी देशों को एक ही समझौते के तहत लाने वाला पहला वैश्विक समझौता है। यह एक दीर्घकालिक, महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करता है (तापमान वृद्धि को 1.5-2°C तक सीमित करना) और देशों को अपनी जलवायु योजनाओं (NDCs) को नियमित रूप से बढ़ाने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। यह पर्यावरणीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

प्रश्न 3: जलवायु वार्ताओं में भारत का मुख्य सिद्धांत क्या है? (What is India’s main principle in climate negotiations?)

उत्तर: भारत का मुख्य सिद्धांत “साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं” (CBDR-RC) है। इसका मतलब है कि जबकि सभी देशों की जलवायु परिवर्तन से निपटने की साझा जिम्मेदारी है, विकसित देशों की ऐतिहासिक रूप से अधिक जिम्मेदारी है क्योंकि उन्होंने अतीत में अधिक प्रदूषण किया है, और उनके पास समाधान के लिए अधिक वित्तीय और तकनीकी क्षमताएं भी हैं।

प्रश्न 4: क्या प्रौद्योगिकी वास्तव में पर्यावरणीय कूटनीति में मदद कर सकती है? (Can technology really help in eco-diplomacy?)

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। उपग्रहों, AI और ब्लॉकचेन जैसी प्रौद्योगिकियाँ पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार करके पर्यावरणीय कूटनीति को बदल सकती हैं। वे देशों के उत्सर्जन को ट्रैक करने, समझौतों के अनुपालन को सत्यापित करने और जलवायु वित्त के प्रवाह की निगरानी करने में मदद कर सकते हैं, जिससे वार्ताओं में विश्वास बढ़ सकता है और बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

प्रश्न 5: सफल पर्यावरणीय कूटनीति का सबसे अच्छा उदाहरण क्या है? (What is the best example of successful eco-diplomacy?)

उत्तर: 1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल व्यापक रूप से पर्यावरणीय कूटनीति का सबसे सफल उदाहरण माना जाता है। इस संधि ने ओजोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों को सफलतापूर्वक चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया। इसकी सफलता स्पष्ट वैज्ञानिक सहमति, व्यवहार्य तकनीकी विकल्पों की उपलब्धता और विकासशील देशों की मदद के लिए एक समर्पित वित्तीय तंत्र के संयोजन के कारण थी, जो भविष्य के समझौतों के लिए एक शक्तिशाली सबक है।

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